(ब्यूरो कार्यालय)
बिजनौर (साई)। उत्तर प्रदेश के बिजनौर में वन विभाग की देखरेख में रह रहे उल्लू के छह बच्चों के भोजन में अब बदलाव किया जा रहा है। अब तक इन बच्चों को प्रतिदिन चिकन-मटन खिलाया जा रहा था, लेकिन उनके प्राकृतिक भोजन को ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने देहरादून से 50 चूहे मंगवाए हैं। अधिकारियों के अनुसार, चूहों की आपूर्ति होने के बाद उल्लू के बच्चों को भोजन के रूप में चूहे दिए जाएंगे। एक चूहे की कीमत करीब 150 रुपये बताई गई है, यानी दो चूहों के लिए 300 रुपये खर्च होंगे।
ये छह उल्लू के बच्चे बिजनौर की कृष्ण बिहार कॉलोनी में एक घर के अंदर फंसे हुए मिले थे। घर के काम के चलते वह खिड़की बंद कर दी गई थी, जिससे उल्लू के बच्चों के माता-पिता का अंदर आना-जाना बंद हो गया। बच्चों की आवाज सुनने के बाद परिवार को उनके घर में मौजूद होने का पता चला। इसके बाद मकान मालिक जगदीश ने वन विभाग को सूचना दी और टीम ने मौके पर पहुंचकर सभी छह बच्चों को रेस्क्यू कर लिया।
अब वन विभाग के रेंजर कार्यालय में उनकी देखभाल की जा रही है। रेंजर महेश गौतम के अनुसार, शुरुआत में उल्लू के बच्चों को भोजन के रूप में दो चूहे दिए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि बड़े होने और पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उन्हें जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
कृष्ण बिहार कॉलोनी के घर में मिले थे उल्लू के छह बच्चे
बिजनौर की कृष्ण बिहार कॉलोनी निवासी जगदीश के घर में उल्लू के छह बच्चे मौजूद थे। घर में एक खिड़की थी, जिसके रास्ते उल्लू के माता-पिता अंदर आते और बाहर जाते थे। इसी स्थान पर उनके बच्चों ने अपना ठिकाना बना रखा था।
घर में काम होने के कारण परिवार ने वह खिड़की बंद कर दी। परिजनों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि अंदर उल्लू के बच्चे भी मौजूद हैं। खिड़की बंद होने के बाद उनके माता-पिता का आना-जाना रुक गया और बच्चे भोजन के अभाव में आवाज करने लगे।
जब घरवालों ने उनकी आवाज सुनी, तब उन्हें घर के अंदर उल्लू के बच्चों की मौजूदगी का पता चला। इसके बाद जगदीश ने तत्काल वन विभाग को सूचना दी।
सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम घर पहुंची और छह बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू कर अपने साथ ले आई। इसके बाद से उनकी देखभाल वन विभाग के रेंजर कार्यालय में की जा रही है।
यह घटना इस बात की ओर भी ध्यान दिलाती है कि घरों में मरम्मत, निर्माण या सफाई के दौरान खिड़कियों, छतों और ऐसे अन्य स्थानों की जांच करना जरूरी है, जहां पक्षी या दूसरे वन्यजीव अपना ठिकाना बना सकते हैं।
प्रतिदिन खिलाया जा रहा था करीब एक किलो चिकन-मटन
रेस्क्यू किए जाने के बाद उल्लू के छह बच्चों के भोजन की व्यवस्था वन विभाग की ओर से की जा रही थी। रेंजर महेश गौतम ने बताया कि बच्चों को प्रतिदिन करीब एक किलो चिकन-मटन खिलाया जा रहा था।
अधिकारियों के अनुसार, ये उल्लू मांसाहारी होते हैं और रात के समय अधिक सक्रिय रहते हैं। इसी कारण उनके भोजन की व्यवस्था भी उनकी सक्रियता और खाने के समय को ध्यान में रखकर की जा रही है।
अब तक चिकन-मटन से उनका पेट भरा जा रहा था, लेकिन वन विभाग ने उनके प्राकृतिक भोजन को ध्यान में रखते हुए चूहों की व्यवस्था करने का निर्णय लिया है। इसके लिए देहरादून से 50 चूहे मंगाए गए हैं।
रेंजर महेश गौतम के अनुसार, एक चूहे की कीमत 150 रुपये है। इस हिसाब से दो चूहों की कीमत 300 रुपये होगी। अधिकारियों ने बताया कि शुरुआत में उल्लू के बच्चों को दो चूहे भोजन के रूप में दिए जाएंगे।
यह व्यवस्था उनके भोजन में बदलाव के साथ उनके प्राकृतिक शिकार व्यवहार के अनुरूप देखभाल करने की कोशिश के रूप में सामने आई है।
देहरादून से मंगाए गए 50 चूहे, अब बदलेगा भोजन
वन विभाग ने उल्लू के बच्चों के लिए देहरादून से 50 चूहे मंगवाए हैं। अधिकारियों के अनुसार, चूहे देर शाम तक रेंजर कार्यालय पहुंचने की उम्मीद थी। इसके बाद बच्चों को भोजन के रूप में चूहे दिए जाने की व्यवस्था की जाएगी।
उल्लू सामान्य तौर पर रात में सक्रिय रहने वाले पक्षी हैं। वे अंधेरे में शिकार करते हैं और छोटे जीवों को अपना भोजन बनाते हैं। चूहे उनके प्राकृतिक भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।
वन विभाग की ओर से किए जा रहे इस बदलाव का उद्देश्य रेस्क्यू किए गए बच्चों को उनकी प्राकृतिक भोजन संबंधी जरूरतों के अनुरूप भोजन उपलब्ध कराना है। हालांकि छह बच्चों की उम्र और शारीरिक स्थिति एक जैसी नहीं है। रेंजर के अनुसार, इनमें कुछ बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं और भरपेट भोजन कर रहे हैं, जबकि कुछ अभी छोटे हैं।
ऐसे में भोजन की मात्रा और व्यवस्था करते समय उनकी स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है। वन्यजीवों की देखभाल में भोजन के साथ उनकी उम्र, स्वास्थ्य और व्यवहार को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
रात में सक्रिय रहते हैं उल्लू, चूहों का करते हैं शिकार
उल्लू को सामान्य तौर पर रात्रिचर पक्षी माना जाता है। इसका अर्थ है कि वे दिन की तुलना में रात में अधिक सक्रिय रहते हैं। उनकी आंखों और सुनने की क्षमता उन्हें कम रोशनी में भी शिकार करने में मदद करती है।
उल्लू की कई प्रजातियां छोटे स्तनधारी जीवों, चूहों और अन्य छोटे जीवों को भोजन बनाती हैं। इसी कारण खेतों और ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी प्राकृतिक पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
चूहों का शिकार करने की उनकी क्षमता कृषि क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकती है। खेतों और अनाज भंडारण के आसपास चूहों की संख्या बढ़ने से फसलों और खाद्यान्न को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में प्राकृतिक शिकारी के रूप में उल्लू पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में योगदान देते हैं।
बिजनौर में रेस्क्यू किए गए बच्चों को अब चूहे खिलाने की तैयारी इसी प्राकृतिक भोजन व्यवस्था को ध्यान में रखकर की जा रही है। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि उल्लू बड़े होने पर जंगल में छोड़ दिए जाएंगे।
वन विभाग ने बताया, शेड्यूल-वन का वन्यजीव है उल्लू
रेंजर महेश गौतम के अनुसार, रेस्क्यू किए गए उल्लू ‘ब्रान’ प्रजाति के हैं और वन्यजीव संरक्षण के तहत शेड्यूल-वन में आते हैं। उन्होंने बताया कि इस श्रेणी के वन्यजीव से संबंधित अपराध में सात साल तक की सजा का प्रावधान है।
वन्यजीव संरक्षण कानून का उद्देश्य जंगली जीवों को अवैध शिकार, पकड़ने, व्यापार और अन्य नुकसान से बचाना है। संरक्षित वन्यजीवों को बिना अनुमति पकड़ना या उन्हें नुकसान पहुंचाना कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है।
इस मामले में वन विभाग ने छह बच्चों को रेस्क्यू कर अपनी देखरेख में रखा है। अधिकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित रखना और उनके स्वस्थ होने के बाद उन्हें प्राकृतिक वातावरण में वापस पहुंचाना है।
वन्यजीवों के संरक्षण में केवल बड़े जानवरों की सुरक्षा ही महत्वपूर्ण नहीं है। उल्लू जैसे पक्षियों और छोटे जीवों की सुरक्षा भी प्राकृतिक संतुलन के लिए जरूरी है।
कुछ बच्चे स्वस्थ, तो कुछ अभी छोटे; देखरेख में रखे गए सभी छह उल्लू
रेंजर महेश गौतम के अनुसार, रेस्क्यू किए गए छह बच्चों में कुछ पूरी तरह स्वस्थ हैं और भरपेट भोजन कर रहे हैं, जबकि कुछ अभी छोटे हैं।
ऐसी स्थिति में सभी बच्चों की देखभाल एक जैसी नहीं की जा सकती। छोटे बच्चों को भोजन देने और उनकी निगरानी करने में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है। वन विभाग की टीम फिलहाल उन्हें रेंजर कार्यालय में रखकर उनकी देखभाल कर रही है।
रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों को वापस जंगल में छोड़ने से पहले यह देखना जरूरी होता है कि वे प्राकृतिक वातावरण में रहने और भोजन जुटाने की स्थिति में हैं या नहीं। इस मामले में भी वन विभाग ने बताया है कि उल्लू के बच्चे बड़े होने और स्वस्थ होने के बाद जंगल में छोड़े जाएंगे।
हालांकि उन्हें जंगल में छोड़ने की कोई निश्चित तारीख अभी सामने नहीं आई है। उनकी उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार आगे का निर्णय लिया जाएगा।
दीपावली पर उल्लू के बच्चों को देखने पहुंच रहे लोग
दीपावली के अवसर पर रेंजर कार्यालय में रखे गए उल्लू के बच्चों को देखने के लिए कई लोग पहुंच रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, फिलहाल इन बच्चों को किसी को दिखाया नहीं जा रहा है।
वन विभाग की यह सावधानी बच्चों की सुरक्षा और देखभाल के लिहाज से महत्वपूर्ण है। रेस्क्यू के बाद वन्यजीव पहले से ही तनाव और असामान्य वातावरण का सामना कर रहे होते हैं। ऐसे में बार-बार लोगों का उनके पास पहुंचना, शोर करना या उन्हें छूने की कोशिश करना उनकी स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
दीपावली के दौरान उल्लू को लेकर कई तरह की मान्यताएं और जिज्ञासाएं भी देखने को मिलती हैं। लेकिन वन्यजीवों को देखने या उनके साथ तस्वीर लेने के लिए उन्हें परेशान करना उचित नहीं है।
वन विभाग की देखरेख में रखे गए इन बच्चों के लिए फिलहाल शांत वातावरण और नियमित भोजन अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए लोगों को अधिकारियों के निर्देशों का पालन करना चाहिए और बिना अनुमति उनके पास जाने या उन्हें छूने से बचना चाहिए।
घरों में पक्षियों के घोंसलों और वन्यजीवों की मौजूदगी पर रखें ध्यान
बिजनौर की यह घटना घरों और आसपास के निर्माण स्थलों में पक्षियों के घोंसले होने की संभावना की ओर ध्यान दिलाती है। कई बार पक्षी घरों की खिड़कियों, छज्जों, रोशनदानों, छतों या खाली कमरों में अपना ठिकाना बना लेते हैं।
घर की मरम्मत, सफाई या निर्माण कार्य के दौरान यदि ऐसे स्थानों को बंद किया जाता है, तो पहले यह देख लेना जरूरी है कि वहां कोई पक्षी या उसके बच्चे तो मौजूद नहीं हैं।
विशेष रूप से प्रजनन के समय पक्षियों के घोंसलों को नुकसान पहुंचने से उनके बच्चे भोजन और सुरक्षा से वंचित हो सकते हैं। यदि किसी घर में उल्लू या अन्य वन्यजीव के बच्चे दिखाई दें, तो उन्हें स्वयं पकड़ने या स्थानांतरित करने के बजाय वन विभाग को सूचना देना उचित है।
इस घटना में भी मकान मालिक ने बच्चों की आवाज सुनने के बाद वन विभाग को सूचना दी और टीम ने उन्हें रेस्क्यू किया। समय पर सूचना मिलने से बच्चों को सुरक्षित निकालने में मदद मिली।
उल्लू को प्राकृतिक वातावरण में वापस छोड़ना होगा अगला चरण
वन विभाग के अनुसार, इन छह उल्लू के बच्चों को फिलहाल रेंजर कार्यालय में रखा गया है। उनके भोजन और स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा रहा है। बड़े होने और पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उन्हें जंगल में छोड़ने की योजना है।
किसी भी रेस्क्यू किए गए वन्यजीव को उसके प्राकृतिक वातावरण में वापस छोड़ना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। इसके लिए उसकी शारीरिक स्थिति, भोजन जुटाने की क्षमता और प्राकृतिक व्यवहार को ध्यान में रखना पड़ता है।
उल्लू के बच्चों के मामले में भी यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वे अपने प्राकृतिक भोजन को पहचानने और शिकार करने में सक्षम हो चुके हैं या नहीं। इसके बाद ही उन्हें जंगल में छोड़ने का निर्णय लिया जा सकेगा।
वन्यजीव संरक्षण का उद्देश्य केवल किसी जीव को तत्काल खतरे से निकालना नहीं, बल्कि उसे इस स्थिति में पहुंचाना भी है कि वह दोबारा प्राकृतिक वातावरण में स्वतंत्र रूप से रह सके।
छह नन्हे उल्लुओं की देखभाल के साथ वन्यजीव संरक्षण का संदेश
बिजनौर की कृष्ण बिहार कॉलोनी में एक घर के अंदर फंसे उल्लू के छह बच्चों को वन विभाग ने रेस्क्यू कर सुरक्षित रखा है। अब तक उन्हें प्रतिदिन करीब एक किलो चिकन-मटन खिलाया जा रहा था, लेकिन उनके प्राकृतिक भोजन को ध्यान में रखते हुए देहरादून से 50 चूहे मंगाए गए हैं।
रेंजर महेश गौतम के अनुसार, शुरुआत में बच्चों को दो चूहे भोजन के रूप में दिए जाएंगे। इनमें कुछ बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं, जबकि कुछ अभी छोटे हैं। वन विभाग की योजना है कि सभी बच्चों के बड़े और स्वस्थ होने के बाद उन्हें जंगल में छोड़ दिया जाए।
दीपावली के दौरान लोगों की उत्सुकता के बावजूद फिलहाल उन्हें देखने की अनुमति नहीं दी जा रही है। यह कदम बच्चों को अनावश्यक परेशानी से बचाने के लिए महत्वपूर्ण है।
यह घटना एक छोटा लेकिन जरूरी संदेश देती है कि घरों और आसपास मौजूद पक्षियों तथा वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। किसी जीव के बच्चे संकट में दिखाई दें, तो उन्हें खुद नुकसान पहुंचाने या पकड़ने के बजाय वन विभाग को सूचना देना चाहिए। वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण ही उन्हें सुरक्षित भविष्य देने का रास्ता है।