(सौरभ वार्ष्णेय)
भारतीय कृषि व्यवस्था में किसानों की सबसे बड़ी चुनौतियों में खेती की बढ़ती लागत और फसलों से मिलने वाली आय के बीच संतुलन बनाए रखना शामिल है। डीजल, बिजली, बीज, कीटनाशक और उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। विशेष रूप से नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए इस्तेमाल होने वाली यूरिया खाद भारतीय खेती का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में यदि भविष्य में कम लागत पर प्रभावी खाद उपलब्ध कराने का कोई विकल्प विकसित होता है तो यह कृषि अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है।
इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ग्रीन अमोनिया के कृषि उपयोग का परीक्षण कर रही है। देश के छह राज्यों में लगभग 10 हजार एकड़ कृषि भूमि पर इसके प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य यह पता लगाना है कि पारंपरिक यूरिया के स्थान पर ग्रीन अमोनिया को सीधे मिट्टी में पहुंचाने से फसलों को पर्याप्त नाइट्रोजन मिल सकती है या नहीं और इससे खेती की लागत में कितनी कमी संभव है।
नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष सारंगी के अनुसार, अमोनिया को सीधे मिट्टी में डालने से उर्वरक की लागत मौजूदा स्तर के लगभग एक-तिहाई तक आ सकती है। यह अनुमान किसानों के लिए उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन इसकी वास्तविक उपयोगिता का निर्णय खेतों में होने वाले परीक्षण, फसल उत्पादन, तकनीकी सुरक्षा और आर्थिक परिणामों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
सरकार की इस पहल को केवल नई खाद तकनीक के प्रयोग के रूप में नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और कृषि लागत कम करने की व्यापक कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
खेती की बढ़ती लागत के बीच नई तकनीक से उम्मीद
भारत कृषि प्रधान देश है और बड़ी आबादी की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर करती है। इसके बावजूद किसानों के सामने खेती को लाभकारी बनाए रखने की चुनौती लगातार बनी हुई है। उत्पादन के लिए आवश्यक संसाधनों की लागत बढ़ने और बाजार में फसलों के उचित मूल्य को लेकर अनिश्चितता के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।
खेती में उर्वरकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। फसलों की बढ़वार और उत्पादन के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इनमें नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए यूरिया का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर किया जाता है।
यूरिया की मांग अधिक होने के कारण इसकी उपलब्धता, वितरण और सरकारी सब्सिडी कृषि क्षेत्र के महत्वपूर्ण मुद्दे बने रहते हैं। ऐसे में ग्रीन अमोनिया को एक संभावित विकल्प के रूप में विकसित करने की कोशिश शुरू हुई है।
यदि इस तकनीक से कम मात्रा में उर्वरक का इस्तेमाल करके बेहतर पोषक तत्व उपलब्धता सुनिश्चित होती है तो किसानों को आर्थिक लाभ मिलने की संभावना बन सकती है। हालांकि, इसके लिए अलग-अलग फसलों और मिट्टी की परिस्थितियों में वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक हैं।
छह राज्यों में 10 हजार एकड़ पर हो रहा परीक्षण
ग्रीन अमोनिया के कृषि उपयोग को समझने के लिए देश में व्यापक प्रदर्शन कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसका लक्ष्य रबी सीजन 2026 के दौरान लगभग 10 हजार एकड़ भूमि पर परीक्षण करना है।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा से जुड़े संस्थानों के माध्यम से इस पहल को आगे बढ़ाया जा रहा है। पंजाब में 24 अक्टूबर 2026 को संगरूर जिले के बिजालपुर गांव से राष्ट्रीय प्रदर्शन पहल की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत पंजाब के छह कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से कुल 1,800 प्रदर्शन आयोजित करने की योजना है।<Cite refs={[“turn410255search1″,”turn410255search0”]}/>
इसके अलावा हरियाणा के महेंद्रगढ़ में लगभग 300 एकड़ सरसों के खेतों में भी ग्रीन अमोनिया के इस्तेमाल का प्रदर्शन किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 29 अक्टूबर को भी इस तकनीक का एक प्रदर्शन शुरू किया गया।<Cite refs={[“turn410255search0″,”turn410255search5”]}/>
इन परीक्षणों का प्रमुख उद्देश्य यह पता लगाना है कि अलग-अलग कृषि परिस्थितियों में ग्रीन अमोनिया किस प्रकार काम करती है और क्या इससे पारंपरिक यूरिया की तुलना में नाइट्रोजन का अधिक प्रभावी उपयोग संभव है।
ग्रीन अमोनिया क्या है और इसे कैसे तैयार किया जाता है?
ग्रीन अमोनिया को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि सामान्य अमोनिया का उत्पादन किस प्रकार होता है। अमोनिया एक रासायनिक यौगिक है, जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के निर्माण में किया जाता है। यूरिया सहित कई उर्वरकों के उत्पादन में अमोनिया महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
परंपरागत तरीके से अमोनिया तैयार करने के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से प्राप्त हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन की खपत होती है और कार्बन डाइऑक्साइड सहित ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
इसके विपरीत ग्रीन अमोनिया के उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्यतः इसकी प्रक्रिया में निम्न चरण शामिल होते हैं:
- सौर या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से बिजली तैयार करना।
- इलेक्ट्रोलाइजर की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करना।
- वातावरण से प्राप्त नाइट्रोजन को हाइड्रोजन के साथ निर्धारित औद्योगिक प्रक्रिया में मिलाना।
- तैयार अमोनिया का भंडारण और आवश्यक उपयोग के लिए आपूर्ति करना।
इस प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की संभावना रहती है। हालांकि, ग्रीन अमोनिया को वास्तव में पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए उत्पादन से लेकर परिवहन और इस्तेमाल तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला में स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है।
सीधे मिट्टी में डाली जाएगी अमोनिया, क्या है नई तकनीक?
ग्रीन अमोनिया की इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सीधे मिट्टी में इस्तेमाल करना है। सामान्यतः किसान खेतों में यूरिया के दाने डालते हैं, जिनसे मिट्टी में नाइट्रोजन उपलब्ध होती है।
नई तकनीक में विशेष उपकरणों की मदद से तरल अमोनिया को मिट्टी की निर्धारित गहराई में पहुंचाया जाता है। इससे नाइट्रोजन को सीधे मिट्टी के भीतर फसल की जड़ों के आसपास उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, परीक्षणों में विशेष उपकरणों के माध्यम से अमोनिया को लगभग छह इंच की गहराई तक पहुंचाने की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य नाइट्रोजन के नुकसान को कम करना और पौधों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाना है।
इस तकनीक के संभावित लाभों में शामिल हैं:
- नाइट्रोजन के उपयोग की दक्षता में सुधार।
- उर्वरक की बर्बादी में कमी की संभावना।
- खेत में बार-बार खाद डालने की आवश्यकता कम होना।
- उर्वरक के इस्तेमाल की कुल लागत में संभावित कमी।
- कृषि उत्पादन में संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग।
हालांकि, यह लाभ सभी फसलों और मिट्टी में समान रूप से मिलेगा, ऐसा अभी नहीं कहा जा सकता। इसी कारण खेतों में प्रदर्शन और वैज्ञानिक निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक-तिहाई तक लागत आने का दावा, किसानों को कितना लाभ?
इस पूरी पहल में सबसे अधिक चर्चा उर्वरक की लागत में संभावित कमी को लेकर हो रही है। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष सारंगी के अनुसार, यूरिया के स्थान पर अमोनिया को सीधे मिट्टी में डालने से लागत मौजूदा स्तर के लगभग एक-तिहाई तक आ सकती है।
इसके पीछे तर्क यह है कि खेतों में यूरिया डालने के बाद नाइट्रोजन का एक हिस्सा विभिन्न प्रक्रियाओं के कारण नष्ट हो जाता है। यदि अमोनिया को विशेष उपकरणों से मिट्टी के भीतर पहुंचाया जाए तो इस नुकसान को कम करने और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग करने की संभावना है।
लेकिन यहां किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि लागत में संभावित कमी का लाभ उन्हें किस रूप में मिलेगा?
क्या यूरिया की खुदरा कीमत कम होगी? क्या सरकार की उर्वरक सब्सिडी का खर्च घटेगा? क्या किसानों को नई तकनीक अपनाने के लिए उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे?
इन सभी सवालों का जवाब अभी परीक्षणों के परिणाम और भविष्य की नीतिगत व्यवस्था से ही मिलेगा।
यह भी समझना जरूरी है कि उत्पादन लागत में संभावित कमी और किसान को मिलने वाली वास्तविक बचत दो अलग-अलग बातें हैं। उत्पादन, भंडारण, परिवहन, मशीनरी, प्रशिक्षण और वितरण का खर्च जोड़ने के बाद ही वास्तविक आर्थिक लाभ का आकलन किया जा सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यूरिया और अमोनिया का विकल्प?
भारत में यूरिया कृषि उत्पादन व्यवस्था का प्रमुख नाइट्रोजन उर्वरक है। इसकी उपलब्धता और कीमत सीधे तौर पर किसानों की खेती की लागत को प्रभावित करती है।
सरकार किसानों को यूरिया नियंत्रित और कम खुदरा कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी देती है। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और अन्य कच्चे माल की कीमतों में होने वाले बदलाव का आर्थिक असर कई बार सरकारी खजाने पर पड़ता है।
अमोनिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण कच्चा माल है। ऐसे में पारंपरिक उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा की कीमत और आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां बनी रहती हैं।
ग्रीन अमोनिया का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा आधारित हाइड्रोजन से होने के कारण भविष्य में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
इसका महत्व केवल खेतों तक सीमित नहीं है। यदि देश में ग्रीन अमोनिया का उत्पादन बड़े स्तर पर विकसित होता है तो इससे उर्वरक उद्योग की ऊर्जा जरूरतों और आपूर्ति व्यवस्था में भी बदलाव आ सकता है।
ग्रीन अमोनिया परियोजना और भारत की हरित हाइड्रोजन नीति
केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया था। इस मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन और उससे बनने वाले उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का प्रमुख केंद्र बनाना है।
उर्वरक क्षेत्र इस मिशन के महत्वपूर्ण उपयोग क्षेत्रों में शामिल है। ग्रीन हाइड्रोजन से तैयार अमोनिया का उपयोग उर्वरक उद्योग में करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं।
इस संबंध में मार्च 2026 में उर्वरक कंपनियों और ग्रीन अमोनिया उत्पादकों के बीच आपूर्ति समझौतों से जुड़ी महत्वपूर्ण पहल सामने आई। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने 13 उर्वरक इकाइयों के लिए सालाना लगभग 7.24 लाख टन ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति आवंटित की है। इन समझौतों की अवधि 10 वर्ष रखी गई है।
इन आपूर्ति समझौतों का उद्देश्य ग्रीन अमोनिया के लिए निश्चित बाजार तैयार करना और इसके उत्पादन में निवेश को प्रोत्साहित करना है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार की कोशिश केवल ग्रीन अमोनिया के उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि उर्वरक उद्योग में इसके व्यावसायिक इस्तेमाल की संभावनाएं भी विकसित की जा रही हैं।
मध्य प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है यह पहल
मध्य प्रदेश देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां गेहूं, सोयाबीन, चना, सरसों और अन्य फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है।
राज्य के किसानों के लिए उर्वरकों की उपलब्धता और कीमत महत्वपूर्ण विषय हैं। यदि ग्रीन अमोनिया की तकनीक परीक्षणों में सफल रहती है और भविष्य में इसे व्यावहारिक रूप से अपनाया जाता है तो मध्य प्रदेश के कृषि क्षेत्र में भी इसके इस्तेमाल की संभावनाएं बन सकती हैं।
विशेष रूप से ऐसी फसलों के लिए परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे, जिनमें नाइट्रोजन की जरूरत और खाद डालने का समय अलग-अलग होता है।
हालांकि, फिलहाल मध्य प्रदेश के प्रत्येक जिले में इसके इस्तेमाल या किसानों को इसकी उपलब्धता की कोई निश्चित जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए इसे राज्य में लागू योजना बताने के बजाय भविष्य की संभावित तकनीक के रूप में देखना उचित होगा।
सबसे बड़ी चुनौती: ग्रीन अमोनिया का उत्पादन खर्च
ग्रीन अमोनिया से सस्ती खाद उपलब्ध कराने की राह में सबसे बड़ी चुनौती इसकी उत्पादन लागत है।
इसके निर्माण के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रोलाइजर, पानी, औद्योगिक संयंत्र और आधुनिक तकनीक की आवश्यकता होती है। इन सभी व्यवस्थाओं के लिए बड़े निवेश की जरूरत पड़ती है।
यदि ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन महंगा रहेगा तो उससे तैयार अमोनिया की कीमत भी प्रतिस्पर्धी स्तर तक लाना मुश्किल हो सकता है।
इसके अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी हैं:
- क्या देश में पर्याप्त नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध होगी?
- क्या इलेक्ट्रोलाइजर और अन्य उपकरणों का उत्पादन घरेलू स्तर पर बढ़ सकेगा?
- क्या ग्रीन अमोनिया का उत्पादन पारंपरिक अमोनिया की तुलना में प्रतिस्पर्धी कीमत पर संभव होगा?
- क्या किसानों तक इसकी आपूर्ति के लिए अलग वितरण व्यवस्था विकसित की जाएगी?
- क्या नई तकनीक को अपनाने के लिए छोटे किसानों को आर्थिक सहायता मिलेगी?
इन सवालों का समाधान हुए बिना केवल उत्पादन की संभावनाओं के आधार पर किसानों को सस्ती खाद मिलने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
अमोनिया के इस्तेमाल में सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता
ग्रीन अमोनिया का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सुरक्षा है। अमोनिया एक विषैला रसायन है। इसके रिसाव से आंखों, त्वचा और श्वसन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
इसलिए इसका भंडारण, परिवहन और खेतों में इस्तेमाल सामान्य ठोस यूरिया की तरह नहीं किया जा सकता।
नई तकनीक में विशेष उपकरणों से अमोनिया को मिट्टी के भीतर निर्धारित गहराई पर पहुंचाया जाता है। इसके लिए प्रशिक्षित ऑपरेटर, उचित मशीनरी और सुरक्षा नियमों का पालन जरूरी है।
किसानों को भी इसके इस्तेमाल की पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि नई तकनीक अपनाने के दौरान उन पर अतिरिक्त मशीनरी और प्रशिक्षण का आर्थिक बोझ न पड़े।
सरकार और कृषि अनुसंधान संस्थानों को इसके लिए सुरक्षित संचालन, उपकरणों की उपलब्धता और आपातकालीन प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करनी होगी।
मिट्टी की सेहत और फसल उत्पादन पर भी होगा मूल्यांकन
किसी भी उर्वरक तकनीक की सफलता केवल उसकी कीमत से निर्धारित नहीं होती। यह भी देखना जरूरी है कि उससे फसल उत्पादन, मिट्टी की सेहत और पोषक तत्वों के संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
भारत के अलग-अलग राज्यों में मिट्टी की संरचना, तापमान, सिंचाई की व्यवस्था और फसल चक्र में काफी अंतर है।
ऐसे में एक ही तकनीक का परिणाम सभी कृषि क्षेत्रों में समान नहीं हो सकता।
ग्रीन अमोनिया के परीक्षणों में फसल की बढ़वार, उत्पादन, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता और खेती की कुल लागत का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है। कृषि अनुसंधान संस्थानों की ओर से इन पहलुओं की निगरानी की जा रही है।
इसके साथ ही मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक की मात्रा निर्धारित करना भी महत्वपूर्ण होगा।
अत्यधिक यूरिया के इस्तेमाल से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए ग्रीन अमोनिया का उपयोग भी वैज्ञानिक सिफारिशों और फसल की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए।
क्या ग्रीन अमोनिया यूरिया का पूरा विकल्प बन पाएगी?
यह इस पहल से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
ग्रीन अमोनिया में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होती है और इसे सीधे मिट्टी में इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित की जा रही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निकट भविष्य में देशभर में यूरिया का इस्तेमाल पूरी तरह बंद हो जाएगा।
दोनों के इस्तेमाल की तकनीक, भंडारण, परिवहन और वितरण व्यवस्था अलग-अलग है।
यूरिया ठोस दानेदार उर्वरक है, जिसे किसान सामान्य तौर पर खेत में डाल सकते हैं। इसके विपरीत अमोनिया के सीधे इस्तेमाल के लिए विशेष उपकरण और प्रशिक्षित व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा अलग-अलग फसलों की पोषक तत्व संबंधी जरूरतों का वैज्ञानिक मूल्यांकन भी जरूरी है।
इसलिए फिलहाल ग्रीन अमोनिया को यूरिया का संभावित विकल्प या पूरक नाइट्रोजन प्रबंधन तकनीक मानना अधिक उचित होगा। अंतिम निर्णय व्यापक परीक्षणों और आर्थिक परिणामों के आधार पर ही लिया जा सकेगा।
किसानों को कैसे मिलेगा वास्तविक लाभ?
ग्रीन अमोनिया की पहल की असली सफलता इस बात से तय होगी कि इससे किसानों की जेब पर पड़ने वाला बोझ कितना कम होता है।
सरकार को इस तकनीक के परीक्षण के साथ-साथ किसानों को मिलने वाले संभावित लाभ का स्पष्ट आर्थिक मॉडल भी तैयार करना होगा।
इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम आवश्यक होंगे:
- परीक्षण के परिणाम सार्वजनिक हों: अलग-अलग फसलों और राज्यों में उत्पादन तथा लागत के परिणाम किसानों के सामने रखे जाएं।
- मशीनरी उपलब्ध कराई जाए: छोटे किसानों को विशेष उपकरण खरीदने के लिए मजबूर न होना पड़े। सहकारी समितियों और कृषि सेवा केंद्रों के माध्यम से मशीनरी उपलब्ध कराने पर विचार हो।
- सुरक्षा प्रशिक्षण मिले: अमोनिया के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए किसानों और ऑपरेटरों को प्रशिक्षण दिया जाए।
- कीमतों में पारदर्शिता हो: उत्पादन लागत में कमी का लाभ किसानों तक किस प्रकार पहुंचेगा, यह स्पष्ट किया जाए।
- मिट्टी की जांच हो: फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार ही नाइट्रोजन की मात्रा निर्धारित की जाए।
इन उपायों से नई तकनीक को केवल औद्योगिक प्रयोग तक सीमित रखने के बजाय कृषि की वास्तविक जरूरतों से जोड़ा जा सकता है।
विशेषज्ञों के सामने होंगे कई महत्वपूर्ण सवाल
कृषि और उर्वरक क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए ग्रीन अमोनिया का प्रयोग कई स्तरों पर अध्ययन का विषय है।
सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या इससे नाइट्रोजन का उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या फसल उत्पादन में सुधार के साथ खेती की कुल लागत वास्तव में कम होती है।
तीसरा सवाल तकनीक की व्यावहारिकता का है। भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत श्रेणी के हैं। उनके लिए विशेष मशीनरी, सुरक्षित भंडारण और तकनीकी सहायता की व्यवस्था कितनी आसानी से उपलब्ध होगी, यह महत्वपूर्ण रहेगा।
इसके अतिरिक्त कृषि वैज्ञानिकों को अलग-अलग मिट्टी, जलवायु और फसल प्रणालियों में इसके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन करना होगा।
किसी नई तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले पारंपरिक उर्वरक व्यवस्था के साथ तुलनात्मक परीक्षण जरूरी हैं। केवल एक फसल या एक क्षेत्र के परिणामों के आधार पर देशव्यापी नीति बनाना उचित नहीं होगा।
कृषि सुधारों में नई तकनीक के साथ किसान की आय भी हो प्राथमिकता
भारत में कृषि सुधारों की चर्चा अक्सर आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज और उत्पादन बढ़ाने के उपायों तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसकी खेती की कुल लागत कितनी है और फसल बेचने के बाद उसके हाथ में कितनी आय बचती है।
ग्रीन अमोनिया को भी इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यदि इससे उर्वरक की लागत घटती है, मिट्टी में पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव कम होता है तो यह कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकती है।
लेकिन यदि नई तकनीक अपनाने के लिए किसानों को महंगे उपकरण खरीदने पड़ें या अमोनिया की आपूर्ति सीमित रहे तो इसके लाभ का दायरा सीमित हो सकता है।
इसलिए सरकार को तकनीकी विकास के साथ वितरण व्यवस्था, आर्थिक सहायता और किसानों के हितों को भी प्राथमिकता देनी होगी।
आगे क्या होगा, परीक्षण के परिणाम तय करेंगे भविष्य
ग्रीन अमोनिया के कृषि उपयोग का वर्तमान परीक्षण भारतीय खेती के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। आने वाले समय में इसके परिणामों से पता चलेगा कि यह तकनीक कितनी प्रभावी और किफायती साबित होती है।
विशेष रूप से निम्नलिखित विषयों पर नजर रहेगी:
- विभिन्न फसलों में उत्पादन पर इसका प्रभाव।
- पारंपरिक यूरिया की तुलना में नाइट्रोजन उपयोग दक्षता।
- प्रति एकड़ खेती की कुल लागत में वास्तविक बदलाव।
- अमोनिया के सुरक्षित इस्तेमाल और भंडारण की व्यवस्था।
- किसानों के लिए मशीनरी और तकनीकी सहायता की उपलब्धता।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन और आपूर्ति की आर्थिक व्यवहार्यता।
यदि इन सभी पहलुओं पर सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं तो भविष्य में ग्रीन अमोनिया भारतीय कृषि व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकती है।
हालांकि, अभी इसे पूरी तरह सफल विकल्प मानने के बजाय वैज्ञानिक परीक्षणों के परिणामों की प्रतीक्षा करना अधिक उचित होगा।
सस्ती खाद का सपना तभी होगा पूरा, जब लाभ खेत तक पहुंचे
ग्रीन अमोनिया के इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार की पहल भारतीय कृषि के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है। छह राज्यों में लगभग 10 हजार एकड़ भूमि पर किए जा रहे परीक्षणों से यह समझने का अवसर मिलेगा कि नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार अमोनिया को सीधे मिट्टी में पहुंचाकर खाद की लागत कम की जा सकती है या नहीं।
नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष सारंगी का एक-तिहाई लागत तक पहुंचने का अनुमान उम्मीद जगाता है, लेकिन इसकी वास्तविक पुष्टि खेतों में प्राप्त परिणामों और आर्थिक मूल्यांकन से ही होगी।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में उर्वरक की उपलब्धता, कीमत और गुणवत्ता का सीधा संबंध किसानों की आर्थिक स्थिति से है। ऐसे में नई तकनीक की सफलता का पैमाना केवल उत्पादन लागत में कमी नहीं, बल्कि किसानों को मिलने वाली वास्तविक बचत, फसल उत्पादन और मिट्टी की सेहत भी होनी चाहिए।
सरकार को परीक्षण के परिणाम पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने और किसानों को इस तकनीक के लाभ तथा सुरक्षा संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
अंततः ग्रीन अमोनिया की सार्थकता तभी साबित होगी, जब हरित ऊर्जा से तैयार यह नई तकनीक किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने, खेती की लागत घटाने और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में वास्तविक योगदान दे सकेगी।
लेखक परिचय
B.Sc. (Agriculture), LL.B., PGDJMC, MJ
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं राजनीतिक विचारक हैं)
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