अपराधियों के लिए कानून का भय क्यों? डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही साइबर ठगी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
(सौरभ वार्ष्णेय)
डिजिटल तकनीक ने आधुनिक जीवन को जितना सरल, सुविधाजनक और तेज बनाया है, उतना ही साइबर अपराधियों के लिए ठगी के नए रास्ते भी खोल दिए हैं। आज बैंकिंग, खरीदारी, सरकारी सेवाओं, संवाद और आर्थिक लेन-देन का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन माध्यमों से संचालित हो रहा है। लेकिन इसी डिजिटल व्यवस्था का दुरुपयोग कर अपराधियों ने आम नागरिकों की मेहनत की कमाई पर हमला करने का एक नया तरीका विकसित कर लिया है। कभी बैंक अधिकारी बनकर लोगों को निशाना बनाया जाता है, तो कभी पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अथवा अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बनकर उन्हें भयभीत किया जाता है।
वीडियो कॉल पर फर्जी वर्दी, सरकारी कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि, कथित गिरफ्तारी वारंट और जांच के नाम पर लगातार पूछताछ का नाटक करके लोगों को घंटों या कई दिनों तक मानसिक दबाव में रखा जाता है। इसके बाद गिरफ्तारी, जेल और सामाजिक बदनामी का भय दिखाकर उनसे लाखों रुपये तक हस्तांतरित करवा लिए जाते हैं। आम बोलचाल में इस अपराध को ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। वास्तव में यह न तो कोई वैधानिक गिरफ्तारी है और न ही कानून में निर्धारित कोई न्यायिक प्रक्रिया, बल्कि भय, भ्रम और तकनीक के दुरुपयोग से की जाने वाली संगठित आर्थिक ठगी है।
इस गंभीर समस्या पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर देश का ध्यान आकर्षित किया है। अदालत ने डिजिटल अरेस्ट के जरिए होने वाली साइबर ठगी को ‘डिजिटल डकैती’ की संज्ञा देते हुए ऐसे अपराधों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह टिप्पणी केवल अपराधियों के लिए चेतावनी नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है, जिनकी जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना है।
डिजिटल अरेस्ट नहीं, भय के जरिए आर्थिक लूट का नया तरीका
डिजिटल अरेस्ट की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि इसमें अपराधी पीड़ित के मनोविज्ञान, सामाजिक प्रतिष्ठा और कानून के प्रति सम्मान का इस्तेमाल उसके विरुद्ध करते हैं। अपराधी पहले फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को बताते हैं कि उसके नाम से अवैध पार्सल भेजा गया है, उसके बैंक खाते का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है अथवा वह किसी गंभीर आपराधिक मामले में संदिग्ध है।
इसके बाद कथित पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी का प्रतिनिधि बनकर उसे गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है। पीड़ित को बताया जाता है कि यदि उसने उनकी बात नहीं मानी तो उसे तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाएगा। कई मामलों में परिवार के सदस्यों को भी मामले में फंसाने और उनकी प्रतिष्ठा खराब करने की धमकी दी जाती है।
अपराधियों की कार्यप्रणाली में कुछ बातें सामान्य रूप से सामने आती हैं—
- फर्जी पुलिस या जांच एजेंसी अधिकारी बनकर फोन करना।
- आधार कार्ड, मोबाइल नंबर या बैंक खाते से जुड़े कथित अपराध का आरोप लगाना।
- वीडियो कॉल पर नकली पुलिस स्टेशन और सरकारी कार्यालय दिखाना।
- पीड़ित को परिवार तथा परिचितों से संपर्क करने से रोकना।
- लगातार निगरानी में रखने का भ्रम पैदा करना।
- जांच, सत्यापन अथवा कथित जमानत के नाम पर धन की मांग करना।
इस तरह व्यक्ति को मानसिक रूप से इस सीमा तक भयभीत कर दिया जाता है कि वह अपनी वर्षों की बचत, सेवानिवृत्ति के बाद मिली राशि और कभी-कभी परिवार की आर्थिक सुरक्षा तक अपराधियों के हवाले कर देता है।
भारत सरकार की साइबर अपराध संबंधी एडवाइजरी में भी इस तरह की कार्यप्रणाली को संगठित ऑनलाइन आर्थिक अपराध बताया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि भारतीय कानून में डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई व्यवस्था नहीं है और वास्तविक कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी नागरिक को वीडियो कॉल के माध्यम से डिजिटल रूप से गिरफ्तार नहीं करतीं।
बुजुर्गों को निशाना बनाना समाज के लिए गंभीर चिंता
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में बुजुर्गों को निशाना बनाया जाना विशेष चिंता का विषय है। जीवनभर की कमाई सुरक्षित रखने वाले वरिष्ठ नागरिक सामान्यतः सरकारी संस्थाओं और कानून के प्रति विश्वास रखते हैं। जब कोई व्यक्ति स्वयं को पुलिस अधिकारी बताकर उनके सामने गिरफ्तारी का भय खड़ा करता है, तो अनेक बुजुर्ग घबराकर उसकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं।
सेवानिवृत्त कर्मचारी, पेंशनभोगी, व्यापारी और ऐसे नागरिक जिनके बैंक खातों में जीवनभर की बचत जमा होती है, अपराधियों के निशाने पर आ सकते हैं। अपराधी जानते हैं कि कानून और सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर भयभीत व्यक्ति जल्दबाजी में निर्णय ले सकता है।
यह केवल आर्थिक अपराध नहीं है। इसके परिणामस्वरूप पीड़ित मानसिक तनाव, अवसाद, पारिवारिक परेशानी और सामाजिक असुरक्षा का सामना कर सकता है। कई बार ठगी की जानकारी सार्वजनिक होने के डर से पीड़ित शिकायत तक दर्ज नहीं कराते।
ऐसी स्थिति में समाज में यह जागरूकता पैदा करना आवश्यक है कि किसी भी वास्तविक जांच एजेंसी को गिरफ्तारी का नाटक करके किसी नागरिक से निजी बैंक खाते में धन जमा कराने का अधिकार नहीं है। कानून की प्रक्रिया में भय और गोपनीयता के नाम पर किसी को मनमाने ढंग से धन हस्तांतरित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और 35 साइबर अपराध मामलों का मामला
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गौरव कुमार साहा और निधि भंडारी की याचिका का मामला चर्चा में रहा। इस मामले में 12 राज्यों में दर्ज 35 साइबर अपराध से संबंधित मामलों को एक स्थान पर स्थानांतरित कर एक साथ सुनवाई करने की मांग की गई थी।
मीडिया में प्रकाशित अदालती कार्यवाही के विवरण के अनुसार, आरोप था कि याचिकाकर्ताओं की कंपनी के बैंक खाते का इस्तेमाल साइबर ठगी से प्राप्त रकम को जमा करने और आगे हस्तांतरित करने के लिए किया गया। याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में यह दलील दी कि वे स्वयं भी धोखाधड़ी के शिकार हैं और उनके खाते का इस्तेमाल किस प्रकार हुआ, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी।
28 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे, ने इस याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने डिजिटल अरेस्ट और इस तरह के साइबर अपराधों को ‘डिजिटल डकैती’ बताते हुए अपराधियों के प्रति कठोर रुख अपनाया। अदालत ने आरोपियों की सुविधा के लिए विभिन्न राज्यों में चल रही जांच को प्रभावित करने वाली मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केरल के एर्नाकुलम में रहने वाले 81 वर्षीय बुजुर्ग के साथ हुई कथित ठगी का उल्लेख किया, जिसमें लगभग 1.90 करोड़ रुपये की रकम ठगे जाने और याचिकाकर्ताओं के कथित म्यूल खाते में जमा होने की बात सामने आई।
यहां म्यूल अकाउंट का अर्थ ऐसे बैंक खाते से है, जिसका इस्तेमाल साइबर अपराध से प्राप्त धन को जमा करने और दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है। कई बार अपराधी फर्जी पहचान, दूसरे व्यक्तियों और कंपनियों के बैंक खातों का इस्तेमाल करके वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचना कठिन बना देते हैं।
अदालत की चिंता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि पीड़ितों को केवल आरोपियों की सुविधा के लिए दिल्ली आने को क्यों बाध्य किया जाए। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि आरोपियों की सुविधा के लिए मुकदमों का स्थानांतरण पीड़ितों और जांच एजेंसियों के हितों को प्रभावित नहीं कर सकता।
साइबर अपराध में बैंक खातों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी
इस पूरे मामले से एक महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न भी सामने आता है। साइबर ठगी की रकम अक्सर एक बैंक खाते से दूसरे खाते में और फिर कई अन्य खातों में स्थानांतरित की जाती है। अपराधी दूसरों के बैंक खातों, कंपनियों और फर्जी पहचान का इस्तेमाल करते हैं। इस कारण वास्तविक अपराधियों और धन के अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
ऐसी स्थिति में किसी बैंक खाते में संदिग्ध धनराशि आने मात्र से उसके संचालक को स्वतः दोषी मान लेना उचित नहीं होगा। जांच में यह पता लगाना आवश्यक है कि खाते का वास्तविक इस्तेमाल किसने किया, लेन-देन किस उद्देश्य से हुआ, धन का स्रोत क्या था और संबंधित व्यक्ति की वास्तविक भूमिका क्या रही।
दूसरी ओर, केवल यह दावा कर देना कि खाते का इस्तेमाल जानकारी के बिना हुआ, किसी व्यक्ति को स्वतः दोषमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य, बैंकिंग रिकॉर्ड, संचार विवरण और धन के प्रवाह की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
इसलिए जांच एजेंसियों को दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाना होगा। पहला, साइबर अपराधियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई हो। दूसरा, किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।
कठोर कार्रवाई और निष्पक्ष न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि प्रभावी न्याय व्यवस्था के दो आवश्यक आधार हैं।
ठगी की रकम पर तत्काल रोक लगाने की जरूरत
डिजिटल ठगी के मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। जैसे ही ठगी की रकम एक खाते में पहुंचती है, अपराधी उसे कई अन्य खातों में स्थानांतरित करके निकालने की कोशिश करते हैं। कुछ मामलों में रकम देश के बाहर भी भेज दी जाती है।
यदि समय रहते संबंधित बैंक और जांच एजेंसियां कार्रवाई नहीं करतीं, तो पीड़ित के लिए अपनी धनराशि वापस पाना अत्यंत कठिन हो सकता है।
इसलिए ठगी की शिकायत मिलने पर संदिग्ध लेन-देन की तत्काल पहचान, धनराशि पर कानून के अनुरूप रोक और संबंधित खातों की जांच जरूरी है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी वैध कारोबारी या निर्दोष खाताधारक का खाता बिना पर्याप्त आधार के लंबे समय तक बंद न रहे।
खाते को फ्रीज करना जांच का प्रभावी माध्यम हो सकता है, लेकिन इसे बिना उचित कानूनी आधार के किसी व्यक्ति को दंडित करने का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। कार्रवाई के साथ समयबद्ध समीक्षा, पारदर्शिता और प्रभावित व्यक्ति को उपलब्ध कानूनी उपाय भी सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
मुकदमे से पहले सजा देने की प्रवृत्ति से बचना भी जरूरी
अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग अपनी जगह उचित है, लेकिन कानून के शासन में यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले दोषी मानकर दंडित न किया जाए।
अपराध से अर्जित धन को रोकना, संदिग्ध संपत्ति को सुरक्षित करना और किसी व्यक्ति को दोषी ठहराकर सजा देना तीन अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। संविधान और विधि के शासन के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने, साक्ष्य प्रस्तुत करने और निष्पक्ष सुनवाई पाने का अधिकार है।
इसलिए साइबर अपराध की गंभीरता को देखते हुए जांच में तेजी लाई जानी चाहिए, लेकिन किसी निर्दोष व्यक्ति या वैध कारोबारी के अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। कानून का भय अपराधियों के मन में होना चाहिए, न कि उन नागरिकों के मन में जो न्याय पाने के लिए व्यवस्था के सामने खड़े हैं।
क्या डिजिटल अरेस्ट के लिए अलग कानून की जरूरत है?
डिजिटल अरेस्ट की बढ़ती घटनाओं ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या इस अपराध को अलग श्रेणी में परिभाषित कर इसके लिए विशेष दंडात्मक प्रावधान बनाए जाने चाहिए?
वर्तमान में धोखाधड़ी, प्रतिरूपण, आपराधिक धमकी, पहचान के दुरुपयोग और सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित अपराधों के लिए भारतीय कानूनों में प्रावधान मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत अपराध की प्रकृति तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है।
फिर भी डिजिटल अरेस्ट की विशिष्ट कार्यप्रणाली को देखते हुए कानून में अधिक स्पष्टता, जांच के मानक और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करने की आवश्यकता है।
विशेष रूप से निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए—
- सरकारी अधिकारियों और जांच एजेंसियों का प्रतिरूपण करके ठगी करने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई।
- फर्जी वीडियो कॉल, नकली सरकारी पहचान और डिजिटल दस्तावेजों के इस्तेमाल की जांच।
- ठगी की रकम प्राप्त करने वाले म्यूल खातों के वास्तविक संचालकों और लाभार्थियों की पहचान।
- अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क पर समन्वित कार्रवाई।
- पीड़ितों की धनराशि वापस दिलाने के लिए समयबद्ध व्यवस्था।
- वरिष्ठ नागरिकों और डिजिटल रूप से कम जागरूक लोगों के लिए विशेष सुरक्षा तंत्र।
हालांकि केवल नया कानून बना देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। जब तक पुलिस की तकनीकी क्षमता, बैंकिंग संस्थाओं की जवाबदेही और अपराधियों तक पहुंचने की जांच प्रक्रिया प्रभावी नहीं होगी, तब तक कानून का अपेक्षित परिणाम प्राप्त करना कठिन रहेगा।
आंकड़े बताते हैं कि चुनौती कितनी गंभीर है
डिजिटल अरेस्ट की समस्या का आकलन केवल व्यक्तिगत घटनाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह संगठित साइबर अपराध का ऐसा स्वरूप है, जिसका प्रभाव देश के अलग-अलग राज्यों और सामाजिक वर्गों तक पहुंच चुका है।
अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट से संबंधित दर्ज शिकायतों की संख्या वर्ष 2024 में 1,23,672 थी, जो वर्ष 2025 में घटकर 58,249 रह गई। वहीं 30 जून 2026 तक 16,377 शिकायतें दर्ज की गई थीं। ये आंकड़े शिकायतों में कमी का संकेत देते हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि समस्या समाप्त हो गई है।
डिजिटल अरेस्ट संबंधी शिकायतों के आंकड़े
| अवधि | दर्ज शिकायतें |
| वर्ष 2024 | 1,23,672 |
| वर्ष 2025 | 58,249 |
| 30 जून 2026 तक | 16,377 |
स्रोत: अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों पर आधारित।
इन आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि शिकायतों में कमी के बावजूद अपराधियों की कार्यप्रणाली लगातार बदल रही है। फर्जी पहचान, तकनीकी उपकरणों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से अपराध को अंजाम देना जांच एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां पैदा करता है।
इसलिए केवल शिकायतों की संख्या कम होना पर्याप्त सफलता का प्रमाण नहीं है। वास्तविक सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि कितने अपराधियों की पहचान हुई, कितनी धनराशि बरामद हुई, पीड़ितों को कितना मुआवजा या पैसा वापस मिला और कितने मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई।
सरकार, पुलिस और बैंकों की जवाबदेही भी तय हो
साइबर अपराध से मुकाबला केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों, बैंकों, दूरसंचार कंपनियों तथा डिजिटल मंचों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
संदिग्ध मोबाइल नंबरों की पहचान, फर्जी कॉलिंग नेटवर्क पर कार्रवाई, असामान्य बैंकिंग लेन-देन की निगरानी और शिकायत मिलने पर तत्काल प्रतिक्रिया जैसे कदम ठगी से होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं।
सरकार ने भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से शिकायतों तथा जांच में समन्वय की व्यवस्था विकसित की है। लेकिन इस व्यवस्था का लाभ तभी अधिक प्रभावी होगा, जब शिकायतकर्ता को समय पर सहायता मिले और विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान तेजी से हो।
पुलिस थानों में साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया भी सरल होनी चाहिए। कई बार पीड़ित व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि वह किस थाने में शिकायत करे, बैंक से कैसे संपर्क करे और अपनी रकम वापस पाने के लिए क्या कदम उठाए।
यदि शिकायत दर्ज कराने में देरी होती है या पीड़ित को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक भटकना पड़ता है, तो अपराधियों को ठगी की रकम निकालने का अतिरिक्त समय मिल जाता है।
इसलिए शिकायत प्राप्त होने से लेकर बैंक खातों की जांच, धनराशि पर रोक और आरोपियों की गिरफ्तारी तक एक जवाबदेह तथा समयबद्ध व्यवस्था विकसित करना जरूरी है।
नागरिकों को भी अपनानी होंगी जरूरी सावधानियां
साइबर अपराधियों की तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, नागरिकों की सतर्कता उनके मंसूबों को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
डिजिटल अरेस्ट जैसी ठगी से बचने के लिए प्रत्येक नागरिक को कुछ बुनियादी बातें समझनी होंगी।
- किसी अनजान व्यक्ति को अपना ओटीपी, बैंक पासवर्ड, एटीएम विवरण या गोपनीय जानकारी न दें।
- पुलिस, सीबीआई, ईडी अथवा किसी अन्य एजेंसी का अधिकारी बनकर फोन करने वाले व्यक्ति की पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें।
- गिरफ्तारी, जांच या जमानत के नाम पर किसी खाते में पैसे जमा न करें।
- किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर मोबाइल का स्क्रीन शेयरिंग विकल्प चालू न करें।
- वीडियो कॉल पर लगातार जुड़े रहने और परिवार से संपर्क नहीं करने के निर्देशों को संदेह की दृष्टि से देखें।
- फर्जी सरकारी दस्तावेज, गिरफ्तारी वारंट और वर्दी देखकर घबराने के बजाय संबंधित विभाग से संपर्क करें।
- किसी भी संदिग्ध कॉल या संदेश की जानकारी परिवार के सदस्यों को अवश्य दें।
यदि कोई व्यक्ति डिजिटल अरेस्ट के नाम पर धमकी देता है, तो कॉल काटकर उसकी बातों पर अमल न करें। ठगी होने पर तत्काल अपने बैंक को सूचना दें और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से भी शिकायत की जा सकती है।
शुरुआती समय में शिकायत करने से संदिग्ध लेन-देन को रोकने और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
अपराधियों के लिए कानून का भय और नागरिकों के लिए कानून पर भरोसा जरूरी
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी केवल आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के मन में कानून, पुलिस और सरकारी संस्थाओं के प्रति विश्वास को कमजोर करने का भी प्रयास है। जब अपराधी सरकारी वर्दी और जांच एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल करके लोगों को लूटते हैं, तो इससे वास्तविक संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है।
सुप्रीम कोर्ट की ‘डिजिटल डकैती’ संबंधी टिप्पणी व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अब आवश्यकता इस बात की है कि साइबर अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई केवल न्यायालयों की टिप्पणियों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका प्रभाव पुलिस जांच, बैंकिंग व्यवस्था और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में भी दिखाई दे।
अपराधियों के लिए कानून का भय जरूरी है, लेकिन निर्दोष नागरिकों के लिए कानून पर भरोसा उससे भी अधिक जरूरी है। कठोर दंड, त्वरित जांच, ठगी की धनराशि की बरामदगी, पीड़ितों की सहायता, तकनीकी क्षमता और व्यापक जनजागरूकता को साथ लेकर ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है।
डिजिटल भारत की सफलता केवल तेज इंटरनेट, ऑनलाइन बैंकिंग और सरकारी सेवाओं के विस्तार से नहीं मापी जाएगी। इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि देश का प्रत्येक नागरिक डिजिटल दुनिया में कितना सुरक्षित महसूस करता है और संकट के समय उसे न्याय व्यवस्था से कितनी प्रभावी सहायता मिलती है।
कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि आम नागरिकों के मन में सुरक्षा और न्याय का विश्वास कायम रखना भी है। यही किसी मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक पहचान है।
लेखक परिचय
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं राजनीतिक विचारक हैं)
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