(डॉ. प्रीतम भी. गेडाम)
(विश्व स्ट्रोक दिवस विशेष – 29 अक्टूबर 2026)
29 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व स्ट्रोक दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को स्ट्रोक के लक्षणों, जोखिम कारकों, बचाव और समय पर उपचार के प्रति जागरूक करना है। वर्ष 2026 में भी इस अवसर पर सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को पहचानने और तुरंत चिकित्सा सहायता लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। मस्तिष्क पर पड़ने वाला इसका प्रभाव कई बार जानलेवा हो सकता है, जबकि समय पर इलाज से गंभीर नुकसान को कम करने की संभावना बढ़ जाती है।
बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी, असंतुलित खानपान, धूम्रपान, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे कारक स्ट्रोक के खतरे को बढ़ाते हैं। मानसिक तनाव भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, खासकर जब उसके कारण नींद खराब हो, शारीरिक गतिविधियां घटें या रक्तचाप नियंत्रित न रहे। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि स्ट्रोक किसी एक कारण से नहीं होता। इसके पीछे कई चिकित्सकीय और जीवनशैली संबंधी जोखिम एक साथ काम कर सकते हैं।
भारत में सामने आए अस्पताल-आधारित आंकड़े बताते हैं कि स्ट्रोक केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं है। कम उम्र के कामकाजी लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में विश्व स्ट्रोक दिवस पर जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ नियमित स्वास्थ्य जांच, स्वस्थ दिनचर्या और आपातकालीन लक्षणों की पहचान पर ध्यान देना जरूरी है।
आधुनिक जीवनशैली और मानसिक तनाव से क्यों बढ़ती हैं चिंताएं?
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, पारिवारिक अपेक्षाएं और लगातार उपलब्ध रहने की आदत लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। कई लोग देर रात तक जागते हैं, लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं और नियमित व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाते। भोजन में भी ताजे और पोषक विकल्पों की जगह अधिक नमक, चीनी और वसा वाले खाद्य पदार्थ बढ़ते जा रहे हैं।
इन आदतों का असर धीरे-धीरे शरीर पर पड़ सकता है। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने, असंतुलित खानपान और पर्याप्त नींद न मिलने से वजन बढ़ने, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। ये सभी स्थितियां स्ट्रोक के जोखिम से जुड़ी हैं।
मानसिक तनाव को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार तनाव में रहने वाले व्यक्ति की नींद, खानपान और शारीरिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। कुछ लोगों में रक्तचाप भी बढ़ सकता है। हालांकि, तनाव को स्ट्रोक का अकेला या प्रत्यक्ष कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। तनाव का प्रबंधन और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना समग्र स्वास्थ्य की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
धूम्रपान, तंबाकू और असंतुलित खानपान से बढ़ सकता है जोखिम
स्ट्रोक से बचाव के लिए उन आदतों पर ध्यान देना जरूरी है, जो रक्त वाहिकाओं और हृदय संबंधी स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। इनमें प्रमुख हैं:
- धूम्रपान और तंबाकू का सेवन।
- अत्यधिक नमक वाला भोजन।
- अधिक वजन और मोटापा।
- शारीरिक गतिविधियों की कमी।
- उच्च रक्तचाप और अनियंत्रित मधुमेह।
- खराब कोलेस्ट्रॉल का बढ़ा हुआ स्तर।
- शराब का हानिकारक सेवन।
- नींद की समस्याएं और कुछ मामलों में स्लीप एपनिया।
इनमें से कई जोखिमों को उचित चिकित्सा, नियमित जांच और व्यवहार में बदलाव से नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए बीमारी के गंभीर रूप लेने का इंतजार करने के बजाय शुरुआती स्तर पर ही स्वास्थ्य की देखभाल करना जरूरी है।
युवाओं में भी सामने आ रहे स्ट्रोक के मामले
पहले आम धारणा थी कि स्ट्रोक मुख्य रूप से अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित करता है। लेकिन अब उपलब्ध भारतीय अस्पताल-आधारित आंकड़े बताते हैं कि कम उम्र के वयस्क भी इस बीमारी का सामना कर रहे हैं।
भारत के 30 अस्पतालों में वर्ष 2020 से 2022 के बीच दर्ज 34,792 स्ट्रोक मरीजों के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में लगभग 13.8 प्रतिशत मरीज 45 वर्ष से कम उम्र के थे। यानी अध्ययन में शामिल मरीजों में करीब हर सातवां व्यक्ति इस आयु वर्ग का था। इनमें लगभग 63.4 प्रतिशत पुरुष थे और 72.1 प्रतिशत मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे। <Cite refs={[“turn401598search1″,”turn401598search4”]}/>
ये आंकड़े पूरे देश की आबादी में स्ट्रोक की दर का सीधा अनुमान नहीं हैं, क्योंकि अध्ययन अस्पतालों में दर्ज मरीजों पर आधारित था। फिर भी इनसे यह स्पष्ट होता है कि कम उम्र होने के कारण स्ट्रोक के खतरे को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
युवाओं में लगातार बैठकर काम करना, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और नींद संबंधी समस्याएं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को बढ़ा सकती हैं। इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
भारत में स्ट्रोक के आंकड़े क्या बताते हैं?
अस्पताल-आधारित अध्ययन में स्ट्रोक के मरीजों में उच्च रक्तचाप सबसे आम जोखिम कारक पाया गया। अध्ययन में लगभग 74.5 प्रतिशत मरीजों को उच्च रक्तचाप था। इसके अलावा 28.5 प्रतिशत मरीजों में तंबाकू सेवन और 27.3 प्रतिशत में मधुमेह दर्ज किया गया। <Cite refs={[“turn401598search1″,”turn401598search8”]}/>
इन आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि रक्तचाप को नियंत्रित रखना स्ट्रोक की रोकथाम में अहम भूमिका निभा सकता है। उच्च रक्तचाप कई बार बिना स्पष्ट लक्षणों के मौजूद रहता है। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन लंबे समय तक अनियंत्रित रक्तचाप रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
अध्ययन में इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने में देरी भी चिंता का विषय रही। केवल 20.1 प्रतिशत मरीज लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचे, जबकि 37.8 प्रतिशत मरीज 24 घंटे से अधिक समय बाद पहुंचे। तीन महीने के अनुवर्ती आंकड़ों में 27.8 प्रतिशत मरीजों की मृत्यु और लगभग 29.7 प्रतिशत मरीजों में महत्वपूर्ण विकलांगता दर्ज की गई। <Cite refs={[“turn401598search1″,”turn401598search3”]}/>
इन परिणामों को सभी भारतीय स्ट्रोक मरीजों पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन ये समय पर उपचार और बेहतर आपातकालीन सेवाओं की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
विश्व स्तर पर भी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना स्ट्रोक
स्ट्रोक का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2021 में दुनिया भर में स्ट्रोक के लगभग 9.38 करोड़ मामले मौजूद थे और करीब 1.19 करोड़ नए मामले दर्ज हुए। इसी वर्ष स्ट्रोक मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में तीसरे स्थान पर था।
पिछले दो दशकों में जीवनकाल के दौरान स्ट्रोक होने का अनुमानित जोखिम लगभग 50 प्रतिशत बढ़ा है। वैश्विक स्तर पर 25 वर्ष से अधिक उम्र के प्रत्येक चार वयस्कों में से लगभग एक को जीवन में कभी न कभी स्ट्रोक होने का जोखिम बताया गया है। <Cite refs={[“turn401598search0″,”turn401598search7”]}/>
वैश्विक आंकड़ों में उच्च रक्तचाप, वायु प्रदूषण, धूम्रपान, उच्च कोलेस्ट्रॉल, अधिक नमक वाला भोजन, बढ़ा हुआ रक्त शर्करा स्तर, गुर्दों की खराब कार्यक्षमता, अधिक वजन, शारीरिक निष्क्रियता और शराब का हानिकारक सेवन महत्वपूर्ण परिवर्तनीय जोखिम कारकों में शामिल हैं।
इसका अर्थ यह है कि स्ट्रोक की रोकथाम केवल अस्पतालों या चिकित्सकों की जिम्मेदारी नहीं है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल, जागरूकता, बेहतर खानपान, सुरक्षित वातावरण और समय पर चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच भी महत्वपूर्ण हैं।
क्या है स्ट्रोक और यह कैसे होता है?
स्ट्रोक एक गंभीर चिकित्सकीय स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव होने लगता है। मस्तिष्क की कोशिकाओं को सामान्य रूप से काम करने के लिए ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। रक्त प्रवाह बाधित होने पर कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है।
स्ट्रोक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है।
- इस्केमिक स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क की रक्त वाहिका में रुकावट आ जाती है, जिससे रक्त की आपूर्ति प्रभावित होती है। रक्त का थक्का इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है।
- हेमरेजिक स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क की किसी रक्त वाहिका के फटने से रक्तस्राव होता है। अनियंत्रित उच्च रक्तचाप इसके महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल है।
दोनों स्थितियां आपातकालीन चिकित्सा की मांग करती हैं। इनके लक्षण एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन उपचार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए बिना चिकित्सकीय जांच के स्वयं दवा लेना या उपचार का अनुमान लगाना खतरनाक हो सकता है।
स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण पहचानना है बेहद जरूरी
स्ट्रोक के लक्षण कई बार अचानक दिखाई देते हैं। इनके प्रति जागरूक रहना मरीज और उसके आसपास मौजूद लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकता है।
प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
- चेहरे का एक तरफ झुक जाना।
- एक हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन, खासकर शरीर के एक तरफ।
- बोलने में परेशानी या बात समझने में कठिनाई।
- अचानक देखने में परेशानी।
- चलते समय संतुलन बिगड़ना या चक्कर आना।
- अचानक अत्यधिक तेज सिरदर्द, विशेषकर जब उसका कोई स्पष्ट कारण न हो।
इनमें से कोई भी लक्षण अचानक दिखाई दे तो उसे सामान्य थकान, कमजोरी या उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लक्षण कुछ देर बाद ठीक हो जाएं, तब भी तत्काल चिकित्सा जांच आवश्यक है, क्योंकि यह अस्थायी इस्केमिक अटैक का संकेत हो सकता है। <Cite refs={[“turn401598search2″,”turn401598search5”]}/>
स्ट्रोक की आशंका होने पर क्या करें?
स्ट्रोक के मामलों में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी व्यक्ति में अचानक चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ में कमजोरी या बोलने में परेशानी दिखाई दे, तो तुरंत स्थानीय आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करें।
मरीज को जल्द से जल्द ऐसे अस्पताल पहुंचाना जरूरी है, जहां स्ट्रोक का निदान और आवश्यक उपचार उपलब्ध हो। संभव हो तो एम्बुलेंस की सहायता लें, क्योंकि आपातकालीन चिकित्सा कर्मी रास्ते में भी आवश्यक सहायता शुरू कर सकते हैं।
मरीज को भोजन, पानी या मुंह से दवा न दें, क्योंकि निगलने में परेशानी होने पर ये चीजें श्वासनली में जा सकती हैं। लक्षण पहली बार कब शुरू हुए, इसका समय नोट करें और चिकित्सकों को बताएं।
यदि मरीज बेहोश हो जाए या उसकी सांस सामान्य न हो, तो आपातकालीन ऑपरेटर के निर्देशों का पालन करें। सीपीआर का प्रशिक्षण हो तो आवश्यकतानुसार शुरू करें। मरीज को घरेलू उपचार देने या लक्षण अपने आप ठीक होने का इंतजार करने में समय न गंवाएं।
स्ट्रोक से बचाव के लिए जीवनशैली में करें बदलाव
स्ट्रोक के सभी मामलों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन कई महत्वपूर्ण जोखिम कारकों को नियंत्रित करके इसकी संभावना घटाई जा सकती है। इसके लिए छोटे लेकिन नियमित बदलाव प्रभावी साबित हो सकते हैं।
रक्तचाप की नियमित जांच करें: उच्च रक्तचाप के लक्षण हमेशा स्पष्ट नहीं होते। नियमित जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार जारी रखें।
मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें: रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की जांच कराएं। निर्धारित दवाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के बंद न करें।
संतुलित आहार अपनाएं: फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भोजन में शामिल करें। अधिक नमक, अतिरिक्त चीनी और संतृप्त वसा वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें।
नियमित शारीरिक गतिविधि करें: अपनी उम्र और स्वास्थ्य के अनुरूप पैदल चलना या अन्य व्यायाम अपनाएं। लंबे समय तक बैठकर काम करने वाले लोग बीच-बीच में उठकर चलें।
धूम्रपान और तंबाकू से दूरी रखें: तंबाकू छोड़ने से रक्त वाहिकाओं और समग्र स्वास्थ्य को लाभ मिलता है। शराब का सेवन न करना सबसे सुरक्षित विकल्प है; यदि सेवन करते हैं तो इसके स्वास्थ्य जोखिमों को समझें।
नींद और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें: पर्याप्त और नियमित नींद लें। लगातार तनाव, चिंता या नींद की समस्या बनी रहने पर चिकित्सकीय सलाह लेने में संकोच न करें।
नींद संबंधी विकारों की जांच कराएं: तेज खर्राटे, सोते समय सांस रुकने के संकेत या दिन में अत्यधिक नींद आने जैसी समस्याओं को नजरअंदाज न करें। डॉक्टर आवश्यकता के अनुसार जांच की सलाह दे सकते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और उपचार की पहुंच भी महत्वपूर्ण
स्ट्रोक के प्रभाव को कम करने के लिए केवल व्यक्तिगत स्तर पर सावधानी पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए समय पर अस्पताल पहुंचना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
अस्पताल-आधारित भारतीय अध्ययन में अधिकांश मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और बड़ी संख्या में मरीज उपचार के लिए देर से पहुंचे। इससे पता चलता है कि स्ट्रोक के लक्षणों के बारे में जनजागरूकता, एम्बुलेंस सेवाओं की उपलब्धता और अस्पतालों में समय पर जांच की व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
स्वास्थ्य संस्थानों, स्थानीय प्रशासन, सामुदायिक संगठनों और जनसंचार माध्यमों की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण हो सकती है। गांवों और छोटे शहरों में जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को स्ट्रोक के लक्षण, आपातकालीन सहायता और उच्च रक्तचाप की जांच के महत्व के बारे में बताया जा सकता है।
परिवार के सदस्यों को भी यह जानकारी होनी चाहिए कि स्ट्रोक की आशंका होने पर किस तरह तुरंत सहायता प्राप्त की जाए। इससे इलाज में होने वाली देरी कम करने में मदद मिल सकती है।
विश्व स्ट्रोक दिवस 2026 पर क्या है सबसे जरूरी संदेश?
विश्व स्ट्रोक दिवस का उद्देश्य केवल बीमारी के बारे में जानकारी देना नहीं, बल्कि लोगों को समय पर कदम उठाने के लिए प्रेरित करना भी है। स्ट्रोक के शुरुआती संकेत पहचानना, जोखिम कारकों को नियंत्रित रखना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
मानसिक शांति, पर्याप्त नींद, संतुलित खानपान और नियमित व्यायाम स्वस्थ जीवन का हिस्सा होने चाहिए। साथ ही, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को केवल घरेलू उपायों से ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग या नींद संबंधी समस्याओं का उचित उपचार स्ट्रोक के जोखिम को कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
परिवार और समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक वातावरण बनाना भी जरूरी है। कामकाज और जिम्मेदारियों के बीच अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। समय-समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह भविष्य में गंभीर समस्याओं से बचाव में मदद कर सकती है।
विश्व स्ट्रोक दिवस 2026 हमें याद दिलाता है कि स्ट्रोक उम्र देखकर नहीं आता और इसके लक्षणों को नजरअंदाज करना गंभीर परिणाम दे सकता है। भारत में अस्पताल-आधारित आंकड़ों में 45 वर्ष से कम उम्र के मरीजों की मौजूदगी और इलाज में देरी चिंता का विषय है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, तंबाकू सेवन, असंतुलित खानपान और शारीरिक निष्क्रियता जैसे जोखिमों पर ध्यान देना जरूरी है।
आधुनिक जीवनशैली में स्वस्थ आदतों को जगह देना, मानसिक तनाव का बेहतर प्रबंधन करना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना स्ट्रोक की रोकथाम में मददगार हो सकता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ में अचानक कमजोरी या बोलने में परेशानी जैसे लक्षण दिखते ही तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता ली जाए।
स्ट्रोक के मामले में हर मिनट कीमती है। समय पर पहचान और उपचार से जीवन बचाने तथा गंभीर विकलांगता का खतरा कम करने की संभावना बढ़ सकती है।
(लेखक महाराष्ट्र सरकार द्वारा सम्मानित लेखक है)
मोबाइल और व्हाट्सएप नंबर – 08237417041
ईमेल आईडी – prit00786@gmail.com
संपादकीय नोट: यह लेख स्वास्थ्य-जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह व्यक्तिगत चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं है। स्ट्रोक के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
(साई फीचर्स)