लिमटी की लालटेन 761
सरकार की एक एजेंसी बनाम पिंजरे का तोता और न्याय की दहलीज
क्या जांच एजेंसीज की खोई साख को वापस पुर्नस्थापित करने में है किसी माननीय को दिलचस्पी!
(लिमटी खरे)
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देश की राजधानी दिल्ली में आए एक अदालत के फैसले ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को कथित शराब नीति मामले में बरी किए जाने के बाद यह प्रश्न केंद्र में आ गया है कि क्या जांच एजेंसियां अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही हैं।
यह मामला केवल कानूनी प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख, राजनीतिक नैरेटिव और न्यायिक संतुलन का भी विषय बन गया है।
दिल्ली शराब नीति मामला: आरोप और जांच की कहानी
दिल्ली की कथित शराब नीति को लेकर जांच एजेंसियों ने गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। मामला तीन प्रमुख आधारों पर टिका था:
- एजेंसी की थ्योरी
- सरकारी गवाहों के बयान
- कथित मनी ट्रेल
जांच के दौरान कई छापेमार कार्रवाइयां हुईं, दस्तावेज जब्त किए गए और गिरफ्तारियां की गईं। राजनीतिक गलियारों में इसे भ्रष्टाचार के बड़े मामले के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन अदालत ने अंतिम सुनवाई के बाद पाया कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
अदालत का फैसला: न्यायपालिका की निर्णायक भूमिका
दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप और आशंकाएं दोष सिद्धि का आधार नहीं बन सकतीं। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा।
कानून विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला तीन महत्वपूर्ण संदेश देता है:
- न्यायालय राजनीतिक विमर्श से प्रभावित नहीं होता।
- चार्जशीट अंतिम सत्य नहीं होती।
- साक्ष्य की गुणवत्ता सर्वोपरि है।
इस निर्णय ने लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्र भूमिका को पुनः रेखांकित किया।
“पिंजरे का तोता” टिप्पणी: ऐतिहासिक संदर्भ
साल 2013 में कोयला आवंटन मामले की सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने Central Bureau of Investigation को “पिंजरे का तोता” कहा था। अदालत की टिप्पणी थी कि एजेंसी अपने “मालिक की आवाज” में बोल रही है।
उस समय केंद्र में Indian National Congress के नेतृत्व वाली सरकार थी। इस टिप्पणी के बाद एजेंसी की स्वायत्तता पर व्यापक बहस हुई।
यह टिप्पणी आज भी हर उस मामले में संदर्भित की जाती है, जहां एजेंसियों की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
यूपीए से एनडीए तक: आरोपों की निरंतरता
जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव के आरोप किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रहे हैं।
यूपीए काल (2004–2014)
- कोयला घोटाला और 2जी स्पेक्ट्रम जैसे बड़े मामले
- विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई को लेकर पक्षपात के आरोप
- गठबंधन राजनीति में “मैनेजमेंट” की चर्चा
एनडीए काल (2014–वर्तमान)
- पीएमएलए के तहत कार्रवाई में वृद्धि
- विपक्षी नेताओं पर ईडी और सीबीआई की छापेमारी
- चुनावी समय में कार्रवाई को लेकर विवाद
विपक्षी दलों का आरोप है कि एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है।
प्रक्रिया बनाम सजा: एक नया विमर्श
कई कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि कुछ मामलों में “प्रक्रिया ही सजा” बन जाती है। लंबी हिरासत, कठिन जमानत शर्तें और लंबी जांच अवधि राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव डालती हैं।
पीएमएलए जैसे कानूनों के तहत जमानत मिलना कठिन माना जाता है। इस कारण विपक्ष इसे कठोर कानूनी ढांचे का राजनीतिक उपयोग बताता है।
हालांकि सरकार का तर्क है कि आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए सख्त प्रावधान आवश्यक हैं।
विश्वसनीयता का संकट: आंकड़ों की भाषा
पिछले वर्षों में केंद्रीय एजेंसियों द्वारा दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। लेकिन दोष सिद्धि की दर को लेकर अक्सर प्रश्न उठते रहे हैं।
यदि लंबे समय तक जांच के बाद अदालत में आरोप सिद्ध नहीं होते, तो एजेंसी की साख प्रभावित होती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार:
- उच्च प्रोफाइल मामलों में सबूत की गुणवत्ता अधिक महत्वपूर्ण होती है।
- केवल गवाहों के बयान पर्याप्त नहीं होते।
- वित्तीय मामलों में स्पष्ट मनी ट्रेल अनिवार्य होता है।
राजनीतिक प्रभाव: नैरेटिव की जंग
केजरीवाल और सिसोदिया को मिली राहत को आम आदमी पार्टी ने “सत्य की जीत” बताया है। वहीं भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
इस फैसले के राजनीतिक प्रभाव:
- विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर
- केंद्र बनाम राज्य संबंधों पर बहस
- आगामी चुनावों में एजेंसियों की भूमिका पर चर्चा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकता है।
जनता की धारणा और लोकतांत्रिक विश्वास
जनता के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या जांच एजेंसियां पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
यदि जनता को लगता है कि एजेंसियां राजनीतिक प्रभाव में काम कर रही हैं, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। दूसरी ओर, यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, तो भी असंतोष पैदा होता है।
लोकतंत्र में संतुलन आवश्यक है—सख्ती भी और निष्पक्षता भी।
विशेषज्ञों की राय: समाधान क्या?
संवैधानिक विशेषज्ञ कुछ संभावित सुधारों की ओर संकेत करते हैं:
- नियुक्ति प्रक्रिया में बहुदलीय समिति की भूमिका
- एजेंसी प्रमुखों का निश्चित कार्यकाल
- संसदीय निगरानी तंत्र
- जांच की समयबद्धता और पारदर्शिता
कुछ विशेषज्ञ एजेंसियों को संवैधानिक दर्जा देने की भी वकालत करते हैं, ताकि उनकी स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके।
आगे की राह: क्या साख लौटेगी?
केजरीवाल और सिसोदिया का बरी होना केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता की परीक्षा है।
अब महत्वपूर्ण प्रश्न हैं:
- क्या एजेंसियों की संरचना में सुधार होगा?
- क्या राजनीतिक दल सर्वदलीय सहमति बनाएंगे?
- क्या न्यायिक निगरानी और मजबूत होगी?
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि संस्थाएं स्वतंत्र भी हों और जवाबदेह भी।
निष्कर्ष
दिल्ली अदालत का फैसला यह दर्शाता है कि अंतिम निर्णय न्यायपालिका के हाथ में है। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बरी किए जाने से यह स्पष्ट हुआ कि आरोप और दोष सिद्धि दो अलग बातें हैं।
“पिंजरे का तोता” टिप्पणी से लेकर आज तक जांच एजेंसियां राजनीतिक बहस के केंद्र में रही हैं। चाहे कांग्रेस का दौर हो या भाजपा का, एजेंसियों की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते रहे हैं।
यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संस्थाओं पर भरोसा है। यदि जांच एजेंसियां पारदर्शी, निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित कार्रवाई करेंगी, तो उनकी साख स्वतः मजबूत होगी।
न्याय की दहलीज पर खड़ा यह फैसला केवल दो नेताओं की राहत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन का संकेत है—जहां सत्ता से ऊपर कानून और कानून से ऊपर न्याय का सिद्धांत कायम रहता है।
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आज बात उस खबर की, जिसने देश की राजधानी की सियासी गलियारों में भूकंप ला दिया है। राजनीति में आरोप लगते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, और फिर शुरू होता है हेडलाइंस का खेल। लेकिन जब देश की सबसे बड़ी अदालत या ट्रायल कोर्ट किसी को बरी करती है, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की बेगुनाही का नहीं होता… सवाल होता है उन जांच एजेंसियों की साख का, जिन्हें हम लोकतंत्र का रक्षक मानते हैं। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को मिली राहत क्या सिर्फ एक कानूनी जीत है? या फिर ये उन आरोपों पर तमाचा है जो सालों से एक खास स्क्रिप्ट के तहत लिखे जा रहे थे?
दिल्ली की एक अदालत द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बरी किए जाने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है। यह मामला केवल दो नेताओं की कानूनी राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में जांच एजेंसियों की भूमिका, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है।
आज लिमटी की लालटेन के इस एपीसोड में हम पूरे घटनाक्रम की तथ्यपरक पड़ताल करने की कोशिश करेंगे। अदालत के फैसले के कानूनी निहितार्थ, अतीत में केंद्रीय जांच एजेंसी पर लगे आरोप, सरकार का तोता टिप्पणी का संदर्भ, और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग पर उठते सवाल, सब पर चर्चा करने का प्रयास होगा हमारा।
सबसे पहले बात करते हैं मामले का विश्लेषणात्मक पहलू जिसमें आरोपों की बिसात और हकीकत की कसौटी क्या है यह देखा जाए। दिल्ली के कथित शराब नीति मामले ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया है, जिसे दशकों तक याद रखा जाएगा। विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो यह मामला तीन स्तंभों पर टिका था जिसमें एजेंसी की थ्योरी, गवाहों के बयान और मनी ट्रेल शामिल था।
राजनीतिक घेराबंदी की बात की जाए तो केजरीवाल और सिसोदिया की गिरफ्तारी महज कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक उभरती हुई तीसरी शक्ति को प्रशासनिक रूप से पंगु बनाने की कोशिश के रूप में देखी गई। दिल्ली के शिक्षा और स्वास्थ्य मॉडल के पीछे के चेहरों को जेल के पीछे डालना, सुशासन की छवि पर सीधा प्रहार था।
बात करें माननीय न्यायालय के रुख की तो अदालतों ने समय-समय पर यह टिप्पणी की है कि बिना किसी ठोस सबूत के किसी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। जमानत और फिर बरी होने की प्रक्रिया यह दर्शाती है कि एजेंसियों ने संभावनाओं और सरकारी गवाहों के बयानों पर अधिक जोर दिया, जबकि ठोस दस्तावेजी साक्ष्य की कमी रही।
इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है एजेंसी की विश्वसनीयता का। जब महीनों की जांच और सैकड़ों छापों के बाद भी रिकवरी शून्य रहती है, तो न्याय पालिका की नजर में केस कमजोर हो जाता है। यह विश्लेषण बताता है कि जांच एजेंसियां अक्सर कानूनी परिणाम से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव सेट करने में व्यस्त दिखी।
अब बात करें अदालत के फैसले और उसके कानूनी महत्व की तो दिल्ली की अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन की दलीलों का परीक्षण करने के बाद केजरीवाल और सिसोदिया को बरी किया। अदालत का तर्क यह रहा कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
कानून विदों के अनुसार कानूनी दृष्टि से यह फैसला तीन महत्वपूर्ण संकेत देता है कि अदालत साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय देती है, न कि राजनीतिक विमर्श के आधार पर। जांच एजेंसियों की ओर से प्रस्तुत चार्जशीट और दस्तावेजों की न्यायिक कसौटी पर कठोर जांच होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम निर्णायक भूमिका न्यायपालिका की होती है। इस फैसले से एक ओर जहां आम आदमी पार्टी को राजनीतिक संबल मिला है, वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल भी खड़े हुए हैं।
अब बात की जाए सीबीआई को सरकार का तोता कहा गया था, साल 2013 में कोयला आवंटन घोटाले की सुनवाई के दौरान देश की सर्वाेच्च अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा था। अदालत की टिप्पणी थी कि एजेंसी अपने मालिक की आवाज में बोल रही है। उस समय केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए टू सरकार थी। यह टिप्पणी भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे चर्चित टिप्पणियों में से एक मानी जाती है। इस टिप्पणी के बाद सीबीआई की स्वायत्तता, नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार से उसके संबंधों पर व्यापक बहस छिड़ी।
वर्तमान केंद्र सरकार और आरोप की बात की जाए तो, वर्तमान में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है। विपक्षी दल, विशेषकर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। विपक्ष के प्रमुख आरोप हैं, विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच और छापों की संख्या में वृद्धि। चुनावी राज्यों में कार्रवाई की टाइमिंग पर सवाल। एजेंसियों के जरिए राजनीतिक दबाव बनाने के आरोप। इन आरोपों को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा का रुख स्पष्ट रहा है कि एजेंसियां कानून के अनुसार कार्य कर रही हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती आवश्यक है।
वहीं, केजरीवाल और सिसोदिया को बरी किया जाना इस बात का उदाहरण है कि अदालतें स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का मूल्यांकन करती हैं। यह भी स्पष्ट हुआ कि जांच एजेंसी का आरोप पत्र अंतिम सत्य नहीं होता। न्यायिक समीक्षा लोकतांत्रिक संतुलन का महत्वपूर्ण अंग है। राजनीतिक विमर्श और कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग धाराएं हैं।
आईए अब यूपीए शासनकाल जो 2004 से 2014 तक रहा है में कुछ विषयों पर जो यहां प्रासंगिक हैं, पर चर्चा की जाए। कोयला घोटाला प्रकरण में जस्टिस आर.एम. लोढ़ा के द्वारा सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता कहा गया था। इसके साथ ही 2010 में सोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह को गिरफ्तार किया गया था और बाद में वे बरी हुए थे।
इतना ही नहीं यूपीए शासनकाल में यूपीए के सहयोगियों पर ही सीबीआई के जरिए दबाव के आरोप लगे थे। इस दौरान मुलायम सिंह यादव और मायावती पर आय से अधिक संपत्ति के मामले लादे गए। सीबीआई का उपयोग गठबंधन की सियासत को ही साधने के लिए होने के आरोप लगते थे उस दौर में। उस दौर में प्रकरण की फाईल खोलना और बंद करना यही होता था और उसे मैनेजमेंट की संज्ञा भी दी जाती रही है।
अब बात की जाए एनडीए शासनकाल की जो 2014 से आज तक है। तो अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया मामले में माननीय न्यायालयों के द्वज्ञरा अनेक बार कहा गया कि जांच का उद्देश्य केवल उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। 2023 – 2024 में शराब नीति प्रकरण में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी हुई, एवं बाद में दोनो बरी हुए
यूपीए की तर्ज पर ही एनडीए में अभिषेक बनर्जी, संजय राऊत हेमंत सोरेन जैसे विपक्षी नेताओं पर छापेमारी की गई। ईडी का उपयोग मनी लॉन्ड्रिग को हथियार बनाकर विपक्ष को तहस नहस करने के लिए करने के आरोप लगे। यूपीए के दौर में इसे मैनेजमेंट कहा जाता था तो अब इसे दाग धुलने वाली वाशिंग मशीन और हिटलरशाही कहा जाने लगा है।
कांग्रेस काल में भ्रष्टाचार के आरोप जैसे 2जी, कोयला आदि बड़े थे, लेकिन सजा की दर कम रही। भाजपा काल में प्रक्रिया ही सजा बन गई है, क्योंकि पीएमएलए के तहत जमानत मिलना बहुत कठिन है। पिछले 10 वर्षों में एक पैटर्न देखा गया है-जैसे ही कोई आरोपी विपक्षी नेता भाजपा में शामिल होता है, जांच की रफ्तार धीमी हो जाती है या केस बंद हो जाता है (जैसे अजीत पवार, हिमंता बिस्वा सरमा के मामले)। केजरीवाल और सिसोदिया का बरी होना यह साबित करता है कि एजेंसियां प्रक्रियात्मक जीत तो हासिल कर लेती हैं (जेल में रखकर), लेकिन कानूनी जीत (दोष सिद्धि) के लिए सबूतों की कमी आज भी एक बड़ी चुनौती है।
वर्तमान भाजपा सरकार पर विपक्ष के आरोप पिछले एक दशक में और अधिक तीखे हुए हैं। विपक्ष इसे विपक्ष-मुक्त भारत की दिशा में एक कदम बताता है। ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल अब प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत किया जा रहा है, जिसमें जमानत मिलना लगभग असंभव बना दिया गया। विपक्ष इसे हिटलरशाही का आधुनिक स्वरूप कहता है, जहाँ प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।
एक दिलचस्प डेटा यह बताता है कि 2014 के बाद से जिन विपक्षी नेताओं पर सीबीआई/ईडी के मामले थे, उनमें से दर्जनों नेता भाजपा में शामिल हो गए और उनके केस या तो बंद हो गए या ठंडे बस्ते में चले गए। इसे ही राजनीतिक वॉशिंग मशीन कहा गया। विपक्ष का आरोप है कि स्वायत्त संस्थाएं अब स्वतंत्र नहीं रहीं। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनाव से ठीक पहले अंजाम देना, लोकतंत्र में लेवल प्लेइंग फील्ड को खत्म करने जैसा बताया गया।
वहीं, इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी ने इसे सत्य की जीत बताया है। वहीं भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
राजनीतिक रूप से इसके संभावित प्रभावों की बात की जाए तो विपक्ष को नैरेटिव बनाने का अवसर मिलेंगे, केंद्र बनाम राज्य संबंधों पर नई बहस का आगाज हो सकता है एवंचुनावी रणनीति में एजेंसियों की भूमिका पर चर्चा भी आरंभ हो सकती है।
जनता के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या जांच एजेंसियां पूरी तरह निष्पक्ष हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखना अनिवार्य है। यदि जनता को यह महसूस होता है कि एजेंसियां राजनीतिक प्रभाव में काम कर रही हैं, तो यह लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंताजनक संकेत है। दूसरी ओर, यदि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई नहीं होती, तो भी जनता में असंतोष पैदा होता है।
वहीं, संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि समाधान निम्न बिंदुओं में निहित है जिसमें जांच एजेंसियों की नियुक्ति प्रक्रिया में बहुदलीय समिति की भूमिका। कार्यकाल की सुरक्षा। संसदीय निगरानी तंत्र। समयबद्ध जांच और पारदर्शिता शामिल हैं। कई विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि एजेंसियों को संवैधानिक दर्जा देने पर विचार किया जाना चाहिए।
देखा जाए तो केजरीवाल और सिसोदिया का बरी होना केवल एक केस का अंत नहीं, बल्कि एक बहस की शुरुआत है। अब आगे के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न होंगे जिसमें मुख्य रूप से क्या एजेंसियों की संरचना में सुधार होगा? क्या राजनीतिक दल जांच एजेंसियों के उपयोग पर सर्वदलीय सहमति बना पाएंगे? क्या न्यायपालिका की निगरानी को और मजबूत किया जाएगा? लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि संस्थाएं स्वतंत्र और जवाबदेह दोनों रहें। शामिल रह सकते हैं।
दिल्ली अदालत का फैसला भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना को पुष्ट करता है, जिसमें अंतिम निर्णय न्यायपालिका के हाथ में होता है। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बरी किए जाने से राजनीतिक बहस तेज हुई है, लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ है कि आरोप और दोष सिद्धि दो अलग बातें हैं।
अतीत में कांग्रेस सरकार के दौरान सीबीआई सरकार का तोता टिप्पणी से लेकर वर्तमान में भाजपा सरकार पर लगाए जा रहे दुरुपयोग के आरोपों तक, जांच एजेंसियां लगातार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रही हैं। सच्चाई यही है कि लोकतंत्र की सेहत जांच एजेंसियों की निष्पक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और राजनीतिक दलों की जवाबदेही पर निर्भर करती है। यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है-और यही भरोसा भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को आगे बढ़ाता रहेगा।
दोस्तों, केजरीवाल और सिसोदिया का बरी होना सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, यह एक संदेश है। संदेश यह कि सत्ता किसी की भी हो-चाहे वो कांग्रेस की हो या भाजपा की-संस्थाओं को हथियार बनाना अंततः लोकतंत्र को कमजोर करता है। अगर एजेंसियां सिर्फ राजनीति के इशारे पर नाचेंगी, तो जनता का न्याय से भरोसा उठ जाएगा। आज सवाल ये नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा… सवाल ये है कि क्या हमारा लोकतंत्र में सरकार का तोता कभी आजाद उड़ पाएगा?
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

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