अमूल्य जीवन से ज्यादा महत्व शरीर गलाते मौत के शौक को, तंबाकू की लत बन रही समाज के लिए बड़ा खतरा

31 मई 2026 को विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर तंबाकू सेवन के बढ़ते खतरे और उसके सामाजिक, आर्थिक तथा स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। देश में करोड़ों लोग तंबाकू की लत के शिकार हैं, जबकि हर दिन हजारों लोगों की मौत इससे जुड़ी बीमारियों के कारण हो रही है। आधुनिकता, दिखावे और गलत धारणाओं के चलते युवाओं में धूम्रपान और हुक्का संस्कृति तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, इच्छाशक्ति और सरकारी सहायता के माध्यम से इस घातक लत से छुटकारा पाया जा सकता है।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस 2026: आधुनिकता, दिखावा और लत के बीच खोती जिंदगी

31 मई को पूरी दुनिया में विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “आकर्षण का पर्दाफ़ाश — निकोटीन और तंबाकू की लत का मुकाबला” रखी गई है। यह थीम केवल एक जागरूकता संदेश नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाला गंभीर अभियान है। आज तंबाकू केवल एक नशा नहीं रह गया, बल्कि यह करोड़ों लोगों की जिंदगी, परिवार और देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बन चुका है।

तंबाकू के खतरों को लेकर जागरूकता की कमी नहीं है। टीवी, अखबार, सोशल मीडिया और सार्वजनिक स्थानों पर लगातार चेतावनियां दिखाई जाती हैं। सिगरेट और गुटखे के पैकेटों पर भयावह तस्वीरें और चेतावनी संदेश भी छपे होते हैं। इसके बावजूद लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। यही सबसे बड़ी चिंता का विषय बन चुका है।

युवाओं में तेजी से बढ़ रही तंबाकू और हुक्का संस्कृति

आज शहरों से लेकर गांवों तक तंबाकू का सेवन आम होता जा रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्कूली बच्चे और कॉलेज के युवा भी इस लत की गिरफ्त में तेजी से आ रहे हैं। कई जगहों पर छात्र-छात्राएं आधुनिकता और स्टेटस सिंबल के नाम पर सिगरेट और हुक्का पीते नजर आते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया पर ग्लैमराइजेशन, दोस्तों का दबाव और परिवार की निगरानी में कमी इसके प्रमुख कारण हैं। शहरों में तेजी से खुल रहे हुक्का पार्लर भी युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली के भ्रम में युवा पीढ़ी धीरे-धीरे निकोटीन की खतरनाक गिरफ्त में फंसती जा रही है।

तंबाकू सेवन को लेकर समाज में फैली गलत धारणाएं

समाज में तंबाकू को लेकर कई मिथक फैले हुए हैं। कुछ लोग दावा करते हैं कि तंबाकू खाने से पाचन सुधरता है, कुछ कहते हैं इससे तनाव कम होता है, जबकि कई लोग इसे नींद और काम में एकाग्रता से जोड़ते हैं। यही गलत धारणाएं धीरे-धीरे आदत को लत में बदल देती हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि निकोटीन कुछ समय के लिए मस्तिष्क को उत्तेजित जरूर करता है, लेकिन लंबे समय में यह शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचाता है। धीरे-धीरे फेफड़े, हृदय, मुंह, गला और पाचन तंत्र गंभीर बीमारियों की चपेट में आने लगते हैं।

कितने प्रकार से किया जाता है तंबाकू का सेवन

भारत में तंबाकू का उपयोग कई रूपों में किया जाता है। इनमें शामिल हैं:

  • बीड़ी
  • सिगरेट
  • पाइप और सिगार
  • हुक्का और चिलम
  • गुटखा
  • खैनी
  • पान मसाला
  • नसवार
  • मिश्री और गुल

विशेषज्ञ बताते हैं कि स्मोकलेस तंबाकू यानी बिना धुएं वाले उत्पाद भी उतने ही खतरनाक हैं जितना धूम्रपान। भारत में मुंह के कैंसर के लगभग 90 प्रतिशत मामलों के पीछे स्मोकलेस तंबाकू को जिम्मेदार माना जाता है।

भारत में हर दिन हजारों मौतों की वजह बन रहा तंबाकू

स्वास्थ्य आंकड़े बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। भारत में हर दिन लगभग 3500 लोगों की मौत तंबाकू सेवन से जुड़ी बीमारियों के कारण होती है। 15 वर्ष से अधिक आयु के करीब 26.7 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपयोग करते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार:

  • हर साल दुनिया में 70 लाख से अधिक मौतें तंबाकू से होती हैं
  • करीब 16 लाख लोग सेकेंड हैंड स्मोक के कारण जान गंवाते हैं
  • भारत में हर वर्ष 13.5 लाख से अधिक असमय मौतें तंबाकू से जुड़ी होती हैं
  • स्मोकलेस तंबाकू से 2.3 लाख से अधिक भारतीयों की मौत होती है

विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग नियमित रूप से बीड़ी और सिगरेट पीते हैं, उनकी औसत आयु धूम्रपान न करने वालों की तुलना में 6 से 10 वर्ष तक कम हो जाती है।

सेकेंड हैंड स्मोक भी उतना ही खतरनाक

धूम्रपान केवल करने वाले व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि आसपास के लोगों को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है। घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान का धुआं अन्य लोगों के फेफड़ों में भी पहुंचता है।

इसे सेकेंड हैंड स्मोक कहा जाता है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है। लगातार ऐसे धुएं के संपर्क में रहने से अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियों का बड़ा कारण

तंबाकू शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह निम्न गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण है:

तंबाकू से होने वाली प्रमुख बीमारियां

  • मुंह और गले का कैंसर
  • फेफड़ों का कैंसर
  • हृदय रोग
  • स्ट्रोक
  • मधुमेह
  • टीबी
  • अंधापन
  • बांझपन
  • सांस संबंधी रोग

भारत में कैंसर के लगभग 27 प्रतिशत मामलों के पीछे तंबाकू सेवन को जिम्मेदार माना जाता है। पुरुषों में लगभग 50 प्रतिशत और महिलाओं में 20 प्रतिशत कैंसर तंबाकू से जुड़े पाए गए हैं।

तंबाकू से देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ

तंबाकू केवल स्वास्थ्य संकट नहीं बल्कि आर्थिक संकट भी बन चुका है। एक ओर सरकार को तंबाकू उद्योग से टैक्स और निर्यात के जरिए बड़ा राजस्व मिलता है, वहीं दूसरी ओर इलाज और उत्पादकता में कमी के कारण समाज को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

  • भारत में तंबाकू उद्योग का आकार 1.16 लाख करोड़ रुपये से अधिक है
  • सरकार को हर साल लगभग 76 हजार करोड़ रुपये का टैक्स मिलता है
  • वर्ष 2023-24 में तंबाकू निर्यात 12,005 करोड़ रुपये से अधिक रहा
  • 127 देशों को भारतीय तंबाकू निर्यात किया गया
  • करीब 4.6 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला

लेकिन दूसरी तरफ तंबाकू से जुड़ी बीमारियों और उत्पादकता में कमी के कारण देश को हर साल लगभग 1773 बिलियन रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। एक रिसर्च के अनुसार तंबाकू उत्पादों से सरकार को मिलने वाले हर 100 रुपये के मुकाबले समाज पर 816 रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

सरकारी नीतियों पर उठते सवाल

एक ओर सरकार तंबाकू निषेध अभियान चलाती है, दूसरी ओर तंबाकू उद्योग को आर्थिक दृष्टि से बढ़ावा भी मिलता है। यही विरोधाभास अक्सर बहस का विषय बनता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तंबाकू उत्पादन और रोजगार के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ लगातार सख्त कानून, ज्यादा टैक्स, सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिबंध और युवाओं को लक्षित विज्ञापनों पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं।

समाज और परिवार पर गहरा असर

तंबाकू की लत केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करती है। कई परिवारों की आर्थिक स्थिति इलाज के खर्च के कारण बिगड़ जाती है। बच्चों की शिक्षा, परिवार की बचत और भविष्य पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान करने वाले माता-पिता के बच्चों में भी भविष्य में नशे की प्रवृत्ति बढ़ने की संभावना अधिक रहती है। यही कारण है कि इसे केवल व्यक्तिगत आदत नहीं बल्कि सामाजिक समस्या माना जाता है।

तंबाकू छोड़ना कठिन जरूर, असंभव नहीं

डॉक्टरों के अनुसार तंबाकू छोड़ने में सबसे बड़ी भूमिका इच्छाशक्ति की होती है। अगर व्यक्ति ठान ले तो सही मार्गदर्शन और सहयोग से इस लत से बाहर निकला जा सकता है।

तंबाकू छोड़ने के बाद:

  • फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है
  • हृदय रोग का खतरा कम होता है
  • कैंसर की संभावना घटती है
  • स्वास्थ्य पर खर्च कम होता है
  • जीवन प्रत्याशा बढ़ती है

सरकार की ओर से उपलब्ध हैं सहायता सेवाएं

देशभर में तंबाकू छोड़ने के लिए कई सरकारी और सामाजिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। लोगों को परामर्श, दवाइयां और व्यवहार चिकित्सा के जरिए सहायता दी जाती है।

उपलब्ध प्रमुख सुविधाएं

  • टोल फ्री हेल्पलाइन: 1800 11 2356
  • मोबाइल मैसेज पर सलाह सुविधा
  • जिला तंबाकू नियंत्रण केंद्र
  • टोबैको सेसेशन सेंटर
  • नशा मुक्ति केंद्र
  • विशेषज्ञ परामर्श सेवाएं

विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार और समाज का सहयोग भी तंबाकू छोड़ने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती: युवाओं को बचाना

स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि आने वाली पीढ़ी को तंबाकू से बचाना है तो स्कूल स्तर से जागरूकता अभियान को मजबूत करना होगा। सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार, फिल्मों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर धूम्रपान के प्रभाव को नियंत्रित करना भी जरूरी होगा।

साथ ही अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार और संगति पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि तंबाकू आधुनिकता नहीं बल्कि धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ने वाला रास्ता है।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस केवल एक औपचारिक अभियान नहीं, बल्कि जीवन बचाने का संदेश है। तंबाकू की लत व्यक्ति के शरीर, परिवार, समाज और देश की अर्थव्यवस्था सभी को नुकसान पहुंचाती है। जागरूकता के बावजूद यदि लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह हो सकता है।

आज आवश्यकता है मजबूत इच्छाशक्ति, सामाजिक जागरूकता और सरकारी प्रयासों को एक साथ आगे बढ़ाने की। अनमोल जीवन किसी भी क्षणिक नशे या दिखावे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि समय रहते लोग तंबाकू छोड़ने का निर्णय लें, तो लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं और समाज को एक स्वस्थ भविष्य की दिशा दी जा सकती है।

(साई फीचर्स)