सिवनी में बिना पंजीयन अस्पताल-क्लीनिकों पर कार्रवाई की चेतावनी, लेकिन सीएमएचओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे सवाल; सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों की जांच कब?

सिवनी में बिना पंजीयन अस्पताल-क्लीनिकों पर कार्रवाई की चेतावनी, सीएमएचओ कार्यालय की निगरानी पर भी सवाल

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। जिले में बिना पंजीयन अस्पताल, चिकित्सा क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब संचालित करने वालों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ), जिला सिवनी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, निजी स्वास्थ्य संस्थानों को निर्धारित कानूनी प्रावधानों और विभागीय नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा। नियमों के विपरीत ऑपरेशन थियेटर अथवा पैथोलॉजी लैब संचालित करने वाले संस्थानों को भी चेतावनी दी गई है। निरीक्षण और जांच के लिए दल गठित किए जाने की बात कही गई है।

लेकिन इस कार्रवाई के साथ जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कुछ दूसरे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। चिकित्सकों और स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीयन की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या विभाग को प्राप्त शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो रही है? सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से की गई शिकायतों के निराकरण की गुणवत्ता की जांच कौन करेगा? और यदि बिना आवश्यक पंजीयन या अनुमति के स्वास्थ्य सेवाएं संचालित हो रही हैं, तो अब तक संबंधित मामलों में क्या कार्रवाई की गई?

इन सवालों का जवाब केवल चेतावनी जारी करने से नहीं मिलेगा। इसके लिए पंजीकृत संस्थानों की सूची, निरीक्षण रिपोर्ट, शिकायतों के निस्तारण का रिकॉर्ड और नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध की गई कार्रवाई सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए।

जिले में 3 पैथोलॉजी लैब, 21 निजी अस्पताल और 75 क्लीनिक पंजीकृत

सीएमएचओ कार्यालय की ओर से जारी विवरण के अनुसार, सिवनी जिले में वर्तमान में 3 पैथोलॉजी लैब, 21 निजी चिकित्सालय और 75 चिकित्सा क्लीनिक पंजीकृत हैं। इसी जानकारी में यह भी कहा गया है कि बिना पंजीयन स्वास्थ्य संस्थानों का संचालन तथा कुछ पंजीकृत क्लीनिकों में निर्धारित अनुमति और मानकों के विपरीत ऑपरेशन थियेटर एवं पैथोलॉजी लैब संचालित किए जाने की स्थिति संज्ञान में आई है।

ये आंकड़े जिले में पंजीकृत स्वास्थ्य संस्थानों की स्थिति बताते हैं। हालांकि, इनसे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जिले में कुल कितने अपंजीकृत संस्थान संचालित हैं या कितने संस्थान नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। इसके लिए विभागीय निरीक्षण और सत्यापित आंकड़ों की आवश्यकता होगी।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि विभाग के संज्ञान में नियम विरुद्ध संचालन की जानकारी आ चुकी है, तो ऐसे संस्थानों की पहचान, जांच और कार्रवाई की स्थिति क्या है? क्या निरीक्षण दल ने संबंधित संस्थानों का भौतिक सत्यापन किया है? कितने मामलों में नोटिस जारी किए गए और कितने मामलों में संचालन बंद कराने अथवा अन्य वैधानिक कार्रवाई की गई?

इन सवालों के जवाब सामने आने से ही यह स्पष्ट होगा कि स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई कितनी प्रभावी है।

क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट और स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीयन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण

जिले में चिकित्सकों के पंजीयन और स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीयन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं की ओर से यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि संबंधित कानूनों के अंतर्गत आवश्यक पंजीयन और अनुमतियों की जांच गंभीरता से होनी चाहिए।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। किसी अस्पताल, क्लीनिक या पैथोलॉजी लैब का पंजीयन और किसी चिकित्सक का अपने पेशे के लिए आवश्यक पंजीयन अलग-अलग विषय हैं। किसी संस्थान के पंजीयन में कमी होने मात्र से वहां कार्यरत प्रत्येक चिकित्सक को स्वतः झोलाछाप घोषित नहीं किया जा सकता। इसी तरह, चिकित्सक की पेशेवर योग्यता और पंजीयन की जांच किए बिना भी उसके संबंध में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य संस्थानों के नियमन के लिए मध्यप्रदेश उपचर्यागृह तथा रुजोपचार संबंधी स्थापनाएं (रजिस्ट्रीकरण तथा अनुज्ञापन) अधिनियम, 1973 एवं उसके अंतर्गत लागू नियमों का उल्लेख सीएमएचओ कार्यालय ने किया है। इसलिए विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित संस्थानों के पंजीयन, चिकित्सकों की पेशेवर पात्रता और विशेष सेवाओं की अनुमति की जांच किस प्रक्रिया से की जा रही है।

यदि किसी चिकित्सक के आवश्यक पेशेवर पंजीयन या किसी स्वास्थ्य संस्थान की अनिवार्य अनुमति में कमी पाई जाती है, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, किसी व्यक्ति को झोलाछाप चिकित्सक बताने से पहले उसकी योग्यता, पंजीयन और चिकित्सा कार्य करने की वैधानिक पात्रता की तथ्यात्मक जांच आवश्यक है।

 

सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें बिना निराकरण बंद कराने के आरोप

स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था के साथ सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों का निस्तारण भी जांच का महत्वपूर्ण विषय है। शिकायतकर्ताओं की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि चिकित्सकों और स्वास्थ्य संस्थानों से संबंधित कुछ शिकायतों को वास्तविक निराकरण किए बिना ही बंद करा दिया गया।

यदि शिकायतें वास्तव में बिना पर्याप्त जांच और समाधान के बंद की गई हैं, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल है। किसी शिकायत को पोर्टल पर बंद कर देना और शिकायत में उठाई गई समस्या का वास्तविक समाधान करना दो अलग-अलग बातें हैं।

इस मामले में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित शिकायतों में क्या आरोप लगाए गए थे, उनका परीक्षण किस अधिकारी ने किया, क्या मौके पर निरीक्षण हुआ और शिकायत बंद करने से पहले शिकायतकर्ता की समस्या का समाधान किया गया या नहीं।

सीएमएचओ कार्यालय को शिकायतों की स्थिति और उन पर की गई कार्रवाई का विवरण जांच के लिए उपलब्ध कराना चाहिए। साथ ही, यदि शिकायतकर्ता असंतुष्ट हैं, तो उन्हें नियमानुसार पुनर्विचार या अन्य उपलब्ध शिकायत निवारण प्रक्रिया की जानकारी दी जानी चाहिए।

हालांकि, उपलब्ध विवरण में शिकायतों के क्रमांक, तारीखें और बंद किए जाने के आदेश शामिल नहीं हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सभी शिकायतें बिना निराकरण के बंद की गई हैं। इस आरोप की पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड की जांच से ही हो सकती है।

कथित चौथ वसूली की चर्चा, लेकिन जांच और प्रमाण जरूरी

जिले में कथित रूप से नियमों के विपरीत चिकित्सा सेवाएं संचालित करने वाले कुछ लोगों के बीच यह चर्चा होने का दावा भी किया जा रहा है कि नए आदेश के पीछे चौथ वसूली का उद्देश्य हो सकता है। यह एक गंभीर आरोप है, लेकिन अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

यदि किसी व्यक्ति या संस्था से नियमों के पालन अथवा निरीक्षण के नाम पर अवैध धन की मांग किए जाने की शिकायत है, तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। ऐसी शिकायत में संबंधित तारीख, स्थान, मांग किए गए धन का विवरण और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।

दूसरी ओर, स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीयन और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निरीक्षण करना प्रशासन की वैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए किसी भी जांच या कार्रवाई को केवल आरोपों के आधार पर गलत अथवा सही घोषित करने के बजाय उसके दस्तावेजी आधार, प्रक्रिया और परिणाम की समीक्षा होनी चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि निरीक्षण दल में कौन-कौन अधिकारी शामिल हैं, निरीक्षण के मानक क्या हैं और कार्रवाई का रिकॉर्ड किस तरह रखा जाएगा। पारदर्शी प्रक्रिया से एक ओर नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित हो सकती है, तो दूसरी ओर निरीक्षण के दुरुपयोग की आशंका से संबंधित शिकायतों की भी जांच की जा सकती है।

दूसरे प्रदेशों और शहरों से आकर चिकित्सा सेवाएं देने वालों की जांच का सवाल

शिकायतकर्ताओं की ओर से यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि दूसरे प्रदेशों और शहरों से आकर कुछ चिकित्सक सिवनी में चिकित्सा सेवाएं दे रहे हैं और मरीजों से अधिक रकम वसूलने की शिकायतें सामने आती हैं। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित चिकित्सकों की पहचान, उनकी शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर पंजीयन, संस्थान की अनुमति और मरीजों से संबंधित शिकायतों की जांच आवश्यक है।

किसी चिकित्सक का दूसरे शहर या प्रदेश से आना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि संबंधित व्यक्ति के पास आवश्यक योग्यता और वैध पेशेवर पंजीयन है या नहीं, वह किस प्रकार की चिकित्सा सेवा दे रहा है और संबंधित संस्थान निर्धारित नियमों का पालन कर रहा है या नहीं।

इसी तरह, अधिक शुल्क लेने का आरोप भी अपने आप में अवैध वसूली साबित नहीं करता। इसके लिए मरीज से लिए गए शुल्क, उपलब्ध बिल, घोषित दरों, उपचार की प्रकृति और लागू नियमों की जांच आवश्यक होगी।

सीएमएचओ कार्यालय की जिम्मेदारी है कि वह प्राप्त शिकायतों और निरीक्षण में सामने आए तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करे। यदि कोई संस्थान बिना आवश्यक पंजीयन या अनुमति के संचालित पाया जाता है, तो लागू कानून के अनुसार कदम उठाए जाने चाहिए। यदि किसी चिकित्सक के पेशेवर पंजीयन या योग्यता पर सवाल है, तो संबंधित सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से उसकी जांच कराई जानी चाहिए।

क्लीनिक के पंजीयन से ऑपरेशन थियेटर और पैथोलॉजी लैब की स्वतः अनुमति नहीं

सीएमएचओ कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि किसी चिकित्सा क्लीनिक का पंजीयन होने मात्र से वहां ऑपरेशन थियेटर या पैथोलॉजी लैब संचालित करने की स्वतः अनुमति नहीं मिल जाती। संबंधित सेवाओं के लिए लागू नियमों के अनुसार आवश्यक अनुमति, पात्रता और निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य है।

यह प्रावधान मरीजों की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ऑपरेशन थियेटर के संचालन में संक्रमण नियंत्रण, उपकरणों की उपलब्धता, आवश्यक सुविधाओं और प्रशिक्षित कर्मचारियों की भूमिका होती है। इसी तरह पैथोलॉजी जांच में नमूनों की सही प्रक्रिया, तकनीकी योग्यता, गुणवत्ता नियंत्रण और जांच रिपोर्ट की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण होती है।

यदि कोई क्लीनिक अपनी स्वीकृत सेवाओं से आगे बढ़कर बिना आवश्यक अनुमति के ऑपरेशन या जांच संबंधी सुविधाएं संचालित करता है, तो संबंधित गतिविधि की जांच होनी चाहिए। कार्रवाई का आधार संस्थान का पंजीयन, अनुमत सेवाएं, निरीक्षण में मिले तथ्य और लागू कानूनी प्रावधान होने चाहिए।

इसलिए जिले में केवल पंजीकृत संस्थानों की संख्या बताना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनमें से कितने संस्थानों को कौन-कौन सी सेवाएं संचालित करने की अनुमति है और निरीक्षण के दौरान क्या कमियां सामने आई हैं।

निरीक्षण दल की जिम्मेदारी और कार्रवाई की पारदर्शिता

सीएमएचओ कार्यालय के अनुसार, निजी चिकित्सालयों, चिकित्सा क्लीनिकों और पैथोलॉजी लैब के निरीक्षण के लिए जांच दल गठित किया गया है। दल द्वारा समय-समय पर औचक निरीक्षण किए जाने की बात कही गई है।

निरीक्षण के दौरान संस्थान के पंजीयन प्रमाणपत्र, जरूरी दस्तावेज, स्वीकृत सेवाओं और निर्धारित मानकों के अनुपालन की जांच की जाएगी। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित अधिनियम और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

इस कार्रवाई की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए कुछ सवालों के जवाब जरूरी होंगे:

  • जिले में कितने अपंजीकृत स्वास्थ्य संस्थानों की पहचान की गई है?
  • कितने संस्थानों को नोटिस जारी किए गए हैं?
  • कितने क्लीनिकों में अनुमति के विपरीत ऑपरेशन थियेटर या पैथोलॉजी लैब पाए गए हैं?
  • कितने मामलों में सुधार के निर्देश दिए गए और कितने मामलों में संचालन बंद कराने की कार्रवाई हुई?
  • चिकित्सकों के पेशेवर पंजीयन और योग्यता की जांच के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है?
  • सीएम हेल्पलाइन पर प्राप्त शिकायतों में से कितनी शिकायतों का वास्तविक समाधान हुआ?

इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी व्यक्ति या अधिकारी पर बिना प्रमाण आरोप लगाना नहीं, बल्कि यह जानना है कि घोषित कार्रवाई जमीन पर किस स्तर तक पहुंची है।

मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि, जवाबदेही भी तय हो

स्वास्थ्य सेवाओं में नियमों का पालन केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। इसका सीधा संबंध मरीजों की सुरक्षा, उपचार की गुणवत्ता और चिकित्सा सेवाओं पर जनता के विश्वास से है।

मरीज अक्सर बीमारी और आपात स्थिति में चिकित्सक या अस्पताल की सेवाएं लेते हैं। ऐसे में उनके लिए यह जानना जरूरी है कि संबंधित संस्थान आवश्यक पंजीयन और अनुमति के साथ संचालित हो रहा है या नहीं। वहीं, प्रशासन की जिम्मेदारी है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की पहचान कर निष्पक्ष कार्रवाई करे।

साथ ही, किसी चिकित्सक या संस्थान के विरुद्ध शिकायत आने पर जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। आरोप सही पाए जाने पर कार्रवाई की जाए और आरोप प्रमाणित नहीं होने पर संबंधित पक्ष को अनावश्यक रूप से दोषी न ठहराया जाए। यही प्रक्रिया मरीजों के हित और कानून के पालन, दोनों के लिए आवश्यक है।

सीएमएचओ कार्यालय की ओर से जारी चेतावनी के बाद अब निरीक्षण दल की कार्रवाई, शिकायतों के निस्तारण और नियमों के पालन की स्थिति महत्वपूर्ण होगी। यदि विभाग नियमित निरीक्षण, दस्तावेजी जांच और पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित करता है, तो जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही बढ़ सकती है।

चेतावनी के साथ ठोस कार्रवाई और शिकायतों की जांच भी जरूरी

सिवनी जिले में बिना पंजीयन अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब के संचालन पर कठोर वैधानिक कार्रवाई की चेतावनी जारी की गई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिले में 3 पैथोलॉजी लैब, 21 निजी चिकित्सालय और 75 चिकित्सा क्लीनिक पंजीकृत हैं। नियमों के विपरीत ऑपरेशन थियेटर या पैथोलॉजी लैब संचालित किए जाने की जानकारी सामने आने के बाद निरीक्षण दल गठित किया गया है।

लेकिन इस कार्रवाई के साथ चिकित्सकों के पेशेवर पंजीयन, स्वास्थ्य संस्थानों की अनुमतियों और सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के वास्तविक निराकरण की स्थिति भी स्पष्ट होना जरूरी है। शिकायतों को बिना समाधान बंद किए जाने और कथित चौथ वसूली से संबंधित आरोपों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के आधार पर ही हो सकती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या निरीक्षण दल की कार्रवाई केवल चेतावनी जारी करने तक सीमित रहेगी, या नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की पहचान कर वास्तविक वैधानिक कार्रवाई भी की जाएगी? सीएमएचओ कार्यालय को पंजीयन, निरीक्षण, शिकायतों और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही भी बनी रहे।