(ब्यूरो कार्यालय)
जयपुर (साई)। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 25 सितंबर को जोधपुर के सवाई मानसिंह हॉस्पिटल में जधपुर में हुए अग्निकांड में घायल लोगों की स्थिति पूछते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। गहलोत ने कहा कि आयुक्त ने दो कमिश्नर SIR मामलों में आपत्तियों को अनदेखा किया और वोटर लिस्ट में छेड़छाड़ की, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुँचा। यह बयान चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर बढ़ती चिंताओं को उजागर करता है।
घटना का विवरण
गहलोत ने बताया कि ज्ञानेश कुमार ने बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव करवाने के दौरान वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव किए, जिससे कई बार मतदान करने वाले नागरिकों को वोट से वंचित किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे कुकर्म के कारण देश उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। इस बीच, गहलोत ने यह भी उल्लेख किया कि निकाय चुनावों में गुंडागर्दी, पुलिस की दबंगता और घर‑घर में नोटिस देने जैसी धमकियों का स्तर पहले कभी नहीं देखा गया। इन घटनाओं ने सामान्य वर्ग के मतदाता के लिए वोट देना एक सम्मान की बात बना दिया है।
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गहलोत के आरोप और प्रतिक्रिया
अशोक गहलोत ने कहा कि चुनाव आयोग के कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने दो कमिश्नर SIR मामलों में आपत्तियों को नज़रअंदाज़ किया और कोई सुनवाई नहीं करवाई। उन्होंने यह भी कहा कि हाइकोर्ट को रात 2 बजे सुनवाई करनी पड़ी, जो चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप का स्पष्ट संकेत है। गहलोत ने यूपी और भजनलाल पुलिस के चुनावी उपयोग को भी उजागर किया, जिससे चुनावी सुरक्षा और प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर खुली चर्चा की मांग की।
खबर के प्रमुख बिंदु
- कंपनी: मुख्य चुनाव आयुक्त कार्यालय • आयोजन: गहलोत का सार्वजनिक बयान • स्थान: जोधपुर (सवाई मानसिंह हॉस्पिटल) • मुख्य उद्देश्य: चुनाव आयोग की कार्यवाही पर प्रश्न उठाना • प्रमुख संकल्प/घोषणाएं: आयुक्त के कुकर्म का खुलासा, निष्पक्ष चुनाव की मांग • लक्ष्य: चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना
अशोक गहलोत के इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, तकनीकी सुधार और निरंतर निगरानी आवश्यक है। यदि चुनाव आयोग अपने कार्यों में सुधार नहीं करता, तो सार्वजनिक विश्वास में गिरावट आएगी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता खतरे में पड़ेगी। भविष्य में नियमित समीक्षा, आधुनिक तकनीक का उपयोग और कर्मचारियों व मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा से ही भारत में स्थायी चुनावी उत्कृष्टता और सामाजिक स्थिरता प्राप्त की जा सकती है।