आजम खान की गिरफ्तारी: कानून का तकाजा या सियासी टकराव का नया अध्याय? जौहर यूनिवर्सिटी मामले में ED की कार्रवाई से फिर गरमाई सियासत

(सौरभ वार्ष्णेय)

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान की गिरफ्तारी ने एक बार फिर देश की राजनीति में जांच एजेंसियों की भूमिका, राजनीतिक जवाबदेही और कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है। रामपुर जेल से रिहाई के कुछ ही समय बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा गिरफ्तार किए जाने और फिर गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं तथा धनशोधन की जांच से संबंधित है। जांच एजेंसी का आरोप है कि विश्वविद्यालय के निर्माण और वित्तीय प्रबंधन में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग तथा संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की जांच आवश्यक है। हालांकि, इन आरोपों का अंतिम न्यायिक निर्णय अभी होना बाकी है।

इस घटनाक्रम में 2 नवंबर 2026 को एक नया मोड़ तब आया, जब आजम खान ने अपनी गिरफ्तारी को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। तत्काल सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने उसी समय सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार किया, हालांकि याचिका को इसी सप्ताह सूचीबद्ध किए जाने की संभावना जताई गई।

सवाल केवल इतना नहीं है कि एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता को गिरफ्तार क्यों किया गया, बल्कि यह भी है कि क्या जांच की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप आगे बढ़ रही है? लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि है। किसी नेता का राजनीतिक कद उसे कानून से ऊपर नहीं रख सकता, लेकिन जांच एजेंसियों को भी अपनी कार्रवाई की वैधानिकता और निष्पक्षता प्रमाणित करनी होती है।

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान की गिरफ्तारी ने एक बार फिर देश की राजनीति में जांच एजेंसियों की भूमिका, राजनीतिक जवाबदेही और कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है। रामपुर जेल से रिहाई के कुछ ही समय बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा गिरफ्तार किए जाने और फिर गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं तथा धनशोधन की जांच से संबंधित है। जांच एजेंसी का आरोप है कि विश्वविद्यालय के निर्माण और वित्तीय प्रबंधन में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग तथा संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की जांच आवश्यक है। हालांकि, इन आरोपों का अंतिम न्यायिक निर्णय अभी होना बाकी है।

इस घटनाक्रम में 2 नवंबर 2026 को एक नया मोड़ तब आया, जब आजम खान ने अपनी गिरफ्तारी को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। तत्काल सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने उसी समय सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार किया, हालांकि याचिका को इसी सप्ताह सूचीबद्ध किए जाने की संभावना जताई गई।

सवाल केवल इतना नहीं है कि एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता को गिरफ्तार क्यों किया गया, बल्कि यह भी है कि क्या जांच की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप आगे बढ़ रही है? लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि है। किसी नेता का राजनीतिक कद उसे कानून से ऊपर नहीं रख सकता, लेकिन जांच एजेंसियों को भी अपनी कार्रवाई की वैधानिकता और निष्पक्षता प्रमाणित करनी होती है।

रिहाई के कुछ ही समय बाद गिरफ्तारी, घटनाक्रम ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल

आजम खान के मामले में घटनाक्रम ने उस समय असामान्य राजनीतिक परिस्थिति पैदा कर दी, जब लगभग 11 महीने जेल में रहने के बाद उन्हें रामपुर जेल से रिहाई मिली। 31 अक्टूबर 2026 को वह अपने बेटे अब्दुल्ला आजम खान के साथ जेल से बाहर आए थे। दोनों को कथित दोहरे पैन कार्ड मामले में राहत मिलने के बाद रिहा किया गया था।

लेकिन यह राहत अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। रामपुर जेल से बाहर आने के कुछ ही समय बाद प्रवर्तन निदेशालय ने आजम खान को जौहर ट्रस्ट से जुड़े धनशोधन मामले में गिरफ्तार कर लिया।

इसके बाद उन्हें जांच के लिए दिल्ली ले जाया गया। अगले दिन 1 नवंबर को गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। इसके बाद उन्हें गाजियाबाद की डासना जिला जेल में रखा गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा को जन्म दिया। एक ओर जांच एजेंसी अपनी कार्रवाई को वित्तीय अनियमितताओं की जांच का हिस्सा बता रही है, वहीं दूसरी ओर आजम खान के समर्थकों और उनके राजनीतिक सहयोगियों के बीच इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

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जौहर यूनिवर्सिटी के वित्तीय प्रबंधन पर क्यों है जांच एजेंसी की नजर?

आजम खान से जुड़ा यह मामला रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और उसके अंतर्गत संचालित जौहर यूनिवर्सिटी के वित्तीय लेन-देन से संबंधित है।

किसी भी विश्वविद्यालय की स्थापना और संचालन के लिए बड़े वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। जमीन की व्यवस्था, भवन निर्माण, शैक्षणिक सुविधाओं का विकास, कर्मचारियों की नियुक्ति और प्रशासनिक खर्च जैसे अनेक कार्यों में धन का उपयोग होता है।

ऐसे में यह आवश्यक है कि संस्थान को प्राप्त होने वाले धन के स्रोत, उसके उपयोग और वित्तीय लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध हो।

प्रवर्तन निदेशालय की जांच में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है:

  • जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में इस्तेमाल किए गए धन का स्रोत क्या था?
  • क्या सरकारी परियोजनाओं के लिए आवंटित धन का उपयोग विश्वविद्यालय के निर्माण में किया गया?
  • ट्रस्ट और विश्वविद्यालय के बीच वित्तीय लेन-देन की प्रकृति क्या थी?
  • कथित अनियमितताओं से जुड़े धन का उपयोग किन संपत्तियों और कार्यों में हुआ?
  • क्या वित्तीय लेन-देन में किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की भूमिका रही?

इन सभी सवालों का जवाब जांच के दौरान सामने आने वाले दस्तावेजों, बैंक खातों, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों से ही मिल सकता है।

किसी भी जांच में आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। जांच एजेंसी का आरोप अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं होता। अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा साक्ष्यों और कानूनी दलीलों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

1,170 करोड़ रुपये की संपत्तियों की कुर्की ने मामले को बनाया गंभीर

जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम विश्वविद्यालय की जमीन और भवनों की कुर्की भी है।

जांच से संबंधित उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय ने अक्टूबर 2026 के अंतिम सप्ताह में रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन और इमारतों को अस्थायी रूप से कुर्क करने की कार्रवाई की थी। इन संपत्तियों का अनुमानित बाजार मूल्य लगभग 1,170 करोड़ रुपये बताया गया है।

जांच एजेंसी का आरोप है कि सार्वजनिक कार्यों के लिए आवंटित सरकारी धन का इस्तेमाल निजी विश्वविद्यालय के निर्माण में किया गया।

ईडी ने यह भी आरोप लगाया है कि आजम खान ने उत्तर प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्री के पद पर रहते हुए और उत्तर प्रदेश जल निगम से जुड़े अपने प्रभाव का कथित रूप से इस्तेमाल करके अनियमितताओं को अंजाम दिया।

यहां यह समझना जरूरी है कि संपत्ति की कुर्की और किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप न्यायिक दोषसिद्धि के समान नहीं हैं। संपत्ति की कुर्की धनशोधन रोकथाम अधिनियम के अंतर्गत जांच से संबंधित एक कानूनी कार्रवाई है, जिसे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार चुनौती दी जा सकती है।

इसलिए इस मामले में वास्तविक स्थिति का निर्धारण जांच के निष्कर्षों और न्यायालय के निर्णय से ही होगा।

58 प्राथमिकी से जुड़ी जांच, कई कानूनी सवालों के घेरे में मामला

जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े धनशोधन मामले की जांच का दायरा भी व्यापक बताया जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय ने आजम खान और अन्य संबंधित लोगों के विरुद्ध उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज 58 प्राथमिकी के आधार पर धनशोधन की जांच शुरू की थी।

ईडी का तर्क है कि कथित वित्तीय लेन-देन, संपत्तियों के हस्तांतरण और धन के स्रोत का पता लगाने के लिए आजम खान से पूछताछ आवश्यक है।

वहीं, आजम खान के अधिवक्ता ने अदालत में उनकी गिरफ्तारी की वैधानिकता पर सवाल उठाए। बचाव पक्ष ने धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 19 के अनुपालन को लेकर आपत्ति दर्ज कराई।

यह विवाद केवल आरोपों की प्रकृति तक सीमित नहीं है। गिरफ्तारी की प्रक्रिया, गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी, उपलब्ध साक्ष्य और आरोपी के अधिकार भी न्यायिक परीक्षण के महत्वपूर्ण विषय हैं।

कानून का उद्देश्य केवल अपराध की जांच करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जांच के दौरान किसी नागरिक के मौलिक और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन न हो।

न्यायिक हिरासत का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं

आजम खान को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद इस मामले को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य समझना जरूरी है।

न्यायिक हिरासत का अर्थ यह नहीं होता कि अदालत ने आरोपी को दोषी घोषित कर दिया है। इसका अर्थ है कि फिलहाल आरोपी को न्यायालय के आदेश के अनुसार जेल में रखा जाएगा।

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न्यायिक हिरासत और पुलिस अथवा जांच एजेंसी की कस्टडी अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं।

न्यायिक हिरासत में व्यक्ति जेल प्रशासन के नियंत्रण में रहता है। वहीं जांच एजेंसी की कस्टडी में पूछताछ के लिए आरोपी को एजेंसी के पास रखने की अनुमति अदालत से प्राप्त करनी होती है।

इसलिए ईडी द्वारा पूछताछ की आवश्यकता जताने और अदालत द्वारा न्यायिक हिरासत का आदेश देने के बीच कानूनी अंतर समझना आवश्यक है।

भारतीय संविधान और आपराधिक न्याय व्यवस्था प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई, कानूनी सहायता और अपने बचाव का अवसर प्रदान करती है।

आजम खान को भी ये सभी अधिकार प्राप्त हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचे आजम खान, गिरफ्तारी को दी चुनौती

इस मामले में 2 नवंबर 2026 को एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया, जब आजम खान ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई गिरफ्तारी को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।

उनके वकील निजाम पाशा ने सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग रखी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तत्काल सुनवाई के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया, हालांकि याचिका को उसी सप्ताह सूचीबद्ध किए जाने की संभावना जताई गई।

यह घटनाक्रम बताता है कि अब मामला केवल जांच एजेंसी और आरोपी के बीच की कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गिरफ्तारी की वैधानिकता का प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष भी पहुंच चुका है।

आजम खान के पक्ष को अपनी कानूनी दलीलें प्रस्तुत करने का अवसर मिलना चाहिए। वहीं जांच एजेंसी को भी अपने कदमों के पक्ष में उपलब्ध कानूनी आधार और साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।

न्यायालय के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया निर्धारित कानून के अनुरूप थी या नहीं।

जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर उठते सवाल

पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर देश की राजनीति में लगातार बहस होती रही है।

विपक्षी दल कई मामलों में आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाव में लाने के लिए किया जाता है। दूसरी ओर सरकार और जांच एजेंसियों का पक्ष रहा है कि भ्रष्टाचार तथा आर्थिक अपराधों के मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई की जाती है।

इस बहस का समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी से संभव नहीं है।

यदि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई करती हैं तो उन्हें अपने प्रत्येक कदम का कानूनी आधार स्पष्ट करना चाहिए। गिरफ्तारी, पूछताछ, संपत्ति कुर्की और आरोपपत्र दाखिल करने जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन महत्वपूर्ण हैं।

किसी भी राजनीतिक दल के नेता के विरुद्ध कार्रवाई होने पर केवल उसकी राजनीतिक पहचान के आधार पर जांच को सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता।

इसी प्रकार राजनीतिक विरोधी होने के आधार पर किसी कार्रवाई को स्वतः निष्पक्ष मान लेना भी उचित नहीं होगा।

जनता के मन में उठने वाले संदेहों का समाधान ठोस साक्ष्य, न्यायिक समीक्षा और पारदर्शी प्रक्रिया से ही हो सकता है।

आजम खान का राजनीतिक सफर और मौजूदा चुनौती

आजम खान उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक चर्चित चेहरा रहे हैं। रामपुर से अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने वाले आजम खान समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं।

वह कई बार विधायक चुने गए और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। संसद में भी उन्होंने लोकसभा और राज्यसभा सदस्य के रूप में भूमिका निभाई।

उनकी राजनीतिक यात्रा में उपलब्धियों के साथ विवाद और कानूनी चुनौतियां भी जुड़ी रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में उनके विरुद्ध दर्ज विभिन्न मुकदमों और अदालती कार्रवाइयों ने उनके राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया है। अब जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित धनशोधन मामले ने उनके सामने एक नई कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है।

हालांकि, किसी भी व्यक्ति के राजनीतिक अतीत को उसके वर्तमान मामले में दोष सिद्ध करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। प्रत्येक आरोप का परीक्षण अलग-अलग साक्ष्यों और कानूनी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

जौहर यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और कर्मचारियों का भविष्य भी महत्वपूर्ण

इस पूरे मामले का एक ऐसा पक्ष भी है, जिस पर राजनीतिक बहस के बीच पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।

जौहर यूनिवर्सिटी केवल एक राजनीतिक नेता से जुड़ा संस्थान नहीं है। किसी भी विश्वविद्यालय के साथ विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और उनके परिवारों की उम्मीदें जुड़ी होती हैं।

यदि वित्तीय अनियमितताओं की जांच के कारण विश्वविद्यालय की गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो उसका असर सबसे पहले विद्यार्थियों की पढ़ाई और भविष्य पर पड़ सकता है।

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इसलिए जांच एजेंसियों और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि कानून के तहत कार्रवाई करते समय विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों की भी अनदेखी न हो।

यदि किसी संस्थान में वित्तीय अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो जवाबदेही तय की जानी चाहिए। लेकिन उसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था अनावश्यक रूप से बाधित न हो।

शिक्षा किसी राजनीतिक व्यक्ति की प्रतिष्ठा या राजनीतिक संघर्ष से बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है।

राजनीतिक दलों की भूमिका और लोकतांत्रिक जवाबदेही

आजम खान की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक दलों के सामने भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

सत्ता पक्ष को जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए।

विपक्ष को भी प्रत्येक जांच को बिना साक्ष्य राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करने के बजाय तथ्यों और कानूनी आधार पर अपना पक्ष रखना चाहिए।

लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक विपक्ष की रचनात्मक भूमिका भी है।

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर तय नहीं हो सकती।

जांच एजेंसियां किसी सरकार या राजनीतिक दल की निजी संस्था नहीं हैं। उनकी जिम्मेदारी कानून के तहत अपराधों की जांच करना है।

इसी प्रकार राजनीतिक पद और प्रभाव किसी व्यक्ति को कानून से छूट प्रदान नहीं करते।

लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत होती है, जब सभी पक्ष संवैधानिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें।

आगे क्या होगा? अदालत के फैसले पर टिकी निगाहें

आजम खान के मामले में आने वाले दिनों में कई कानूनी घटनाक्रम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सबसे पहले उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत में आगे की कार्यवाही और ईडी की जांच भी इस प्रकरण की दिशा तय करेगी।

जांच एजेंसी को कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज, धन के स्रोत और लेन-देन की कड़ियों को स्थापित करना होगा।

वहीं आजम खान के पक्ष को अपने बचाव में उपलब्ध दस्तावेज और कानूनी दलीलें प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

आने वाले समय में इस मामले के कुछ प्रमुख पहलू सामने आ सकते हैं:

  • गिरफ्तारी की वैधानिकता पर न्यायिक परीक्षण।
  • जौहर ट्रस्ट और विश्वविद्यालय के वित्तीय लेन-देन की जांच।
  • कथित सरकारी धन के उपयोग से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण।
  • संपत्ति कुर्की की कार्रवाई पर कानूनी पक्ष।
  • संबंधित अन्य व्यक्तियों की भूमिका की जांच।
  • विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों पर संभावित प्रभाव।

इन सभी पहलुओं पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकेगा।

कानून का तराजू राजनीतिक पहचान नहीं, साक्ष्यों से चले

आजम खान की गिरफ्तारी को केवल एक राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह मामला देश की जांच व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है।

यदि जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण या वित्तीय प्रबंधन में सरकारी धन के दुरुपयोग और धनशोधन के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों की जवाबदेही किसी भी स्थिति में कम नहीं हो सकती।

लेकिन दूसरी ओर, किसी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर अपराधी घोषित करना भी न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। जांच एजेंसियों को अपनी कार्रवाई की वैधानिकता और निष्पक्षता साबित करनी होगी तथा आरोपी को अपने बचाव का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

आजम खान का मामला अंततः एक व्यापक लोकतांत्रिक कसौटी बन सकता है। कानून का तराजू न सत्ता पक्ष का पक्षधर होना चाहिए और न विपक्ष का। उसे केवल साक्ष्यों, तथ्यों और संविधान के आधार पर निर्णय करना चाहिए।

लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इसी में है कि कानून के सामने न कोई प्रभावशाली व्यक्ति विशेषाधिकार प्राप्त हो और न किसी सामान्य नागरिक के अधिकार कमजोर पड़ें। अपराध प्रमाणित होने पर सजा मिले और आरोप प्रमाणित न होने पर व्यक्ति को न्याय मिले। क्योंकि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, उसकी निष्पक्षता जनता को दिखाई भी देनी चाहिए।

आजम खान प्रकरण में भी देश की निगाहें इसी न्यायिक कसौटी पर टिकी हैं।

लेखक परिचय

(लेखक | वरिष्ठ पत्रकार | चिंतक | राजनीतिक विचारक हैं)

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(साई फीचर्स)