(सौरभ वार्ष्णेय)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर उठती चर्चाओं ने विपक्षी एकता की वास्तविक मजबूती पर बहस तेज कर दी है। एक तरफ दोनों दल भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले मजबूत राजनीतिक चुनौती पेश करने की तैयारी में दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर सीटों की संख्या, राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक हिस्सेदारी को लेकर मतभेद गठबंधन की राह को कठिन बना सकते हैं।
लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि समाजवादी पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है या कांग्रेस कितनी सीटों पर अपना दावा मजबूत मानती है। असली सवाल यह है कि क्या दोनों दल एक ऐसे गठबंधन की राजनीतिक जरूरत को समझ पाएंगे, जिसमें व्यक्तिगत और दलगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर साझा चुनावी लक्ष्य को रखा जाता है?
राजनीति में गठबंधन केवल सीटों का जोड़ नहीं होता। यह विश्वास, संगठन, सामाजिक समीकरण, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल का भी नाम है। यदि इन सभी पहलुओं के बीच संतुलन नहीं बनता तो कागज पर मजबूत दिखाई देने वाला गठबंधन चुनावी मैदान में कमजोर पड़ सकता है।
अखिलेश यादव का संदेश और उसके राजनीतिक मायने
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का यह कहना कि “बात सीट की नहीं, जीत की है” गठबंधन की मौजूदा स्थिति में महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है।
इस कथन का सीधा अर्थ यह निकाला जा सकता है कि चुनावी राजनीति में सीटों की संख्या अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं होनी चाहिए। अंतिम लक्ष्य उन सीटों पर जीत हासिल करना होना चाहिए, जहां गठबंधन मिलकर अपने प्रतिद्वंद्वी को प्रभावी चुनौती दे सकता है।
गठबंधन की राजनीति में कई बार ऐसा होता है कि कोई दल अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने को अपनी राजनीतिक ताकत का प्रतीक मानता है। लेकिन अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना और अधिक सीटें जीतना दो अलग-अलग बातें हैं।
यदि कोई पार्टी ऐसी सीटों पर भी प्रत्याशी उतारती है जहां उसका संगठन कमजोर है या सामाजिक समीकरण उसके पक्ष में नहीं हैं, तो केवल सीटों की संख्या बढ़ाने से राजनीतिक लाभ नहीं मिलता। इसके विपरीत, कुछ सीटों पर समझौता करके उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना जहां जीत की वास्तविक संभावना अधिक हो, अधिक प्रभावी रणनीति साबित हो सकती है।
सीट बंटवारा ही गठबंधन की पूरी कहानी नहीं
चुनावी गठबंधन को केवल सीटों के फार्मूले से समझना राजनीतिक रूप से अधूरा दृष्टिकोण होगा।
एक सफल गठबंधन के लिए कई स्तरों पर समन्वय जरूरी होता है। इनमें प्रमुख हैं—
- सीटों का व्यावहारिक और जीत की संभावना आधारित बंटवारा
- उम्मीदवार चयन में पारस्परिक सहमति
- स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल
- कार्यकर्ताओं को साझा रणनीति के लिए तैयार करना
- संयुक्त चुनाव अभियान
- मतदाताओं के सामने स्पष्ट राजनीतिक संदेश
- सरकार बनने की स्थिति में साझा प्राथमिकताओं की स्पष्टता
यदि शीर्ष नेतृत्व एक मंच पर एकता का संदेश देता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के नेता एक-दूसरे पर निशाना साधते रहते हैं, तो मतदाता के बीच गठबंधन की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से विविध राज्य में यह चुनौती और भी गंभीर है। यहां हर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र का सामाजिक समीकरण अलग है। स्थानीय नेतृत्व की भूमिका, जातीय समीकरण, उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता और पिछले चुनावों का प्रदर्शन परिणाम को प्रभावित करता है।
इसलिए सीट बंटवारे का निर्णय केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक उपलब्ध संगठन और जीत की संभावना को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
गठबंधन के भीतर विश्वास सबसे बड़ी पूंजी
सपा-कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीटों की संख्या नहीं बल्कि आपसी विश्वास की है।
यदि दोनों दलों को एक-दूसरे की राजनीतिक नीयत, संगठनात्मक क्षमता और चुनावी प्रतिबद्धता पर पर्याप्त भरोसा नहीं होगा, तो सीट समझौता होने के बाद भी समस्याएं खत्म नहीं होंगी।
आज सीट को लेकर विवाद हो सकता है। कल उम्मीदवार को लेकर असहमति सामने आ सकती है। उसके बाद प्रचार अभियान और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल चुनौती बन सकता है।
यही कारण है कि किसी भी गठबंधन के लिए सीट समझौता केवल शुरुआत है। असली परीक्षा उसके बाद होती है।
गठबंधन के कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि दूसरे दल का उम्मीदवार भी साझा राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा है। यदि कार्यकर्ता ही मैदान में एक-दूसरे का सहयोग नहीं करेंगे तो शीर्ष नेतृत्व की सहमति का चुनावी लाभ सीमित रह जाएगा।
कांग्रेस की चिंता भी समझनी होगी
सपा-कांग्रेस समीकरण में कांग्रेस की राजनीतिक चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए लंबे समय से संगठन को मजबूत करने और अपनी राजनीतिक जमीन को विस्तार देने की चुनौती रही है। ऐसे में पार्टी स्वाभाविक रूप से ऐसी सीट हिस्सेदारी चाह सकती है, जिससे वह राज्य में अपना संगठन और राजनीतिक प्रभाव मजबूत कर सके।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के पास उत्तर प्रदेश में अपना व्यापक राजनीतिक आधार और संगठनात्मक नेटवर्क होने का दावा है। ऐसे में सपा का स्वाभाविक तर्क यह हो सकता है कि सीटों का बंटवारा केवल राजनीतिक सम्मान के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी ताकत और जीत की संभावना के आधार पर होना चाहिए।
दोनों पक्षों के तर्कों में राजनीतिक आधार है। इसलिए समाधान तभी संभव है जब दोनों दल अपनी-अपनी मांग को अंतिम सत्य मानने के बजाय साझा चुनावी सफलता को प्राथमिकता दें।
भाजपा के लिए विपक्षी मतभेद राजनीतिक अवसर
सपा और कांग्रेस के बीच किसी भी प्रकार का सार्वजनिक मतभेद भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक अवसर बन सकता है।
विपक्षी दलों के बीच असहमति को भाजपा यह संदेश देने के लिए इस्तेमाल कर सकती है कि जो दल सत्ता का विकल्प बनने का दावा कर रहे हैं, वे चुनाव से पहले ही आपसी राजनीतिक संघर्ष में उलझे हुए हैं।
भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी द्वारा गठबंधन को “लठबंधन” कहे जाने जैसी राजनीतिक टिप्पणियां इसी व्यापक चुनावी रणनीति के संदर्भ में देखी जा सकती हैं। विपक्षी गठबंधन के भीतर जितनी अधिक सार्वजनिक खींचतान होगी, उसके विरोधियों को उतना ही अधिक राजनीतिक मुद्दा मिलेगा।
इसलिए सपा और कांग्रेस के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि गठबंधन के भीतर की हर सार्वजनिक असहमति केवल दोनों दलों के बीच का मामला नहीं रहती। वह चुनावी विमर्श का हिस्सा बन जाती है।
जनता केवल गठबंधन नहीं, विकल्प चाहती है
विपक्षी एकता का अर्थ केवल भाजपा के खिलाफ एक मंच तैयार करना नहीं होना चाहिए।
मतदाता यह जानना चाहता है कि यदि वह गठबंधन को समर्थन देता है तो उसके सामने शासन का कैसा विकल्प होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की स्थिति, युवाओं के लिए रोजगार और अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था तथा सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर गठबंधन का साझा दृष्टिकोण क्या होगा?
यदि गठबंधन केवल सीटों के बंटवारे तक सीमित रहता है तो उसका राजनीतिक संदेश कमजोर हो सकता है।
इसके विपरीत यदि दोनों दल जनता के सामने साझा मुद्दों और साझा नीति की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं तो गठबंधन को राजनीतिक विश्वसनीयता मिल सकती है।
आज का मतदाता केवल यह नहीं देखता कि कौन किसके साथ खड़ा है। वह यह भी देखता है कि उसके अपने जीवन से जुड़े सवालों पर राजनीतिक दल क्या समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।
चुनावी गणित से आगे सामाजिक समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हर सीट का अपना स्थानीय राजनीतिक इतिहास होता है। कहीं किसी दल का संगठन मजबूत हो सकता है, तो कहीं दूसरे दल का उम्मीदवार अधिक स्वीकार्य हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में जातीय समीकरण निर्णायक हो सकते हैं, जबकि कुछ सीटों पर स्थानीय मुद्दे और प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
ऐसे में पूरे राज्य के लिए एक समान सीट बंटवारा फार्मूला बनाना आसान नहीं होगा।
दोनों दलों को पिछले चुनावों के आंकड़ों, वर्तमान संगठनात्मक स्थिति, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों का अध्ययन करना होगा।
जीत की संभावना कैसे तय हो?
सीट चयन के लिए कुछ व्यावहारिक मानक बनाए जा सकते हैं—
- पिछले चुनावों में प्रदर्शन।
- वर्तमान संगठन की मजबूती।
- संभावित उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता।
- विपक्षी वोटों के एकीकरण की संभावना।
- क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण।
- स्थानीय मुद्दों की दिशा।
- गठबंधन के दोनों दलों के कार्यकर्ताओं की स्वीकार्यता।
इस तरह का वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण सीट बंटवारे को राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने से रोक सकता है।
कार्यकर्ताओं की भूमिका होगी निर्णायक
गठबंधन की सफलता केवल अखिलेश यादव और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत पर निर्भर नहीं करेगी।
अंततः चुनाव बूथ स्तर के कार्यकर्ता लड़ते हैं।
यदि सपा कार्यकर्ता कांग्रेस उम्मीदवार को और कांग्रेस कार्यकर्ता सपा उम्मीदवार को अपना साझा प्रत्याशी मानकर काम नहीं करेंगे तो गठबंधन का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
इसलिए सीट समझौते के साथ-साथ संयुक्त कार्यकर्ता सम्मेलन, साझा प्रचार रणनीति और स्थानीय स्तर पर समन्वय समितियां बनाना भी उपयोगी हो सकता है।
कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना होगा कि गठबंधन में एक सीट पर दूसरे दल का प्रत्याशी खड़ा होना हार नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
क्या गठबंधन केवल भाजपा विरोध तक सीमित रहेगा?
यह सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्नों में से एक है।
लोकतांत्रिक राजनीति में गठबंधन किसी एक दल को रोकने के लिए बन सकता है, लेकिन लंबे समय तक राजनीतिक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सकारात्मक एजेंडा जरूरी होता है।
सपा और कांग्रेस को यह बताना होगा कि वे उत्तर प्रदेश के विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए क्या साझा दृष्टिकोण रखते हैं।
यदि गठबंधन जनता को केवल यह बताता है कि वह किसके खिलाफ है, तो राजनीतिक संदेश अधूरा रहेगा।
इसके बजाय यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि वह सत्ता में आने पर क्या करेगा।
यही अंतर किसी चुनावी गठबंधन को केवल रणनीतिक समझौते से राजनीतिक विकल्प में बदल सकता है।
राजनीतिक अहंकार से ऊपर उठना होगा
गठबंधन की राजनीति में सबसे कठिन काम अपने राजनीतिक अहंकार को नियंत्रित करना होता है।
हर दल चाहता है कि उसे अधिक सीटें मिलें, उसका नेतृत्व अधिक दिखाई दे और उसके कार्यकर्ताओं को अधिक राजनीतिक अवसर प्राप्त हों। लेकिन गठबंधन का अर्थ ही यह है कि कुछ राजनीतिक इच्छाओं को साझा लक्ष्य के लिए पीछे रखना पड़ता है।
यदि सपा और कांग्रेस यह तय कर लें कि प्राथमिकता “कौन अधिक सीटों पर लड़ेगा” नहीं बल्कि “कौन कितनी सीटें जीत सकता है” होगी, तो बातचीत की दिशा बदल सकती है।
यही वह अंतर है जो एक सफल गठबंधन और केवल चुनावी समझौते के बीच होता है।
भविष्य की राजनीति के लिए क्या संकेत?
आने वाले समय में सपा-कांग्रेस के सामने तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं।
पहला रास्ता है कि दोनों दल सीट बंटवारे पर व्यावहारिक समझौता करें और साझा अभियान शुरू करें। इससे गठबंधन को चुनावी मजबूती मिल सकती है।
दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सीटों को लेकर खींचतान लंबी चले और दोनों दल सार्वजनिक रूप से अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत प्रदर्शित करते रहें। ऐसी स्थिति में गठबंधन का संदेश कमजोर हो सकता है।
तीसरा रास्ता यह है कि सीटों का समझौता तो हो जाए, लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता और नेता उसका पालन न करें। यह स्थिति भी चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है।
इसलिए केवल शीर्ष नेतृत्व की सहमति पर्याप्त नहीं होगी। उस सहमति को संगठन के अंतिम स्तर तक लागू करना होगा।
अब समय बंद कमरे में गंभीर बातचीत का
उत्तर प्रदेश की जनता राजनीतिक दलों के बयानों को ध्यान से देखती है। वह यह भी समझती है कि कौन-सा विवाद वास्तविक है और कौन-सा चुनावी दबाव बनाने की रणनीति।
ऐसे में सपा और कांग्रेस के लिए बेहतर होगा कि वे सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय गंभीर और लगातार बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशें।
सीटों का फैसला आंकड़ों, स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों और जीत की संभावना के आधार पर होना चाहिए। राजनीतिक दबाव और प्रतिष्ठा की लड़ाई को निर्णायक आधार बनाना गठबंधन के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
यदि दोनों दलों के बीच विश्वास मजबूत होगा तो कठिन से कठिन सीट समझौता भी संभव है। लेकिन यदि विश्वास कमजोर रहा तो सबसे अच्छा फार्मूला भी विवादों से घिर सकता है।
सीटों से बड़ी है जीत की राजनीति
सपा और कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा। असली सवाल यह है कि दोनों दल मिलकर कितनी सीटें जीत सकते हैं और क्या वे जनता के सामने एक विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प पेश कर सकते हैं।
अखिलेश यादव का यह संदेश कि “बात सीट की नहीं, जीत की है” इसी व्यापक राजनीतिक सोच की ओर संकेत करता है। लेकिन इस सोच को केवल बयान तक सीमित रखने के बजाय उसे सीट बंटवारे, उम्मीदवार चयन, कार्यकर्ता समन्वय और साझा अभियान में दिखाई देना होगा।
गठबंधन की राजनीति में हर दल को कुछ छोड़ना पड़ता है। कभी कम सीटों पर चुनाव लड़ना ही अधिक सीटें जीतने की रणनीति बन सकता है। इसके विपरीत अधिक सीटों पर लड़ने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा कई बार जीत की संभावनाओं को कमजोर कर देती है।
उत्तर प्रदेश में विपक्ष के सामने चुनौती बड़ी है। उसे केवल भाजपा का विरोध करने वाला मंच नहीं बनना है, बल्कि जनता के सामने शासन, विकास और सामाजिक न्याय का विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करना है।
आखिरकार बात सचमुच सीट की नहीं, जीत की है। लेकिन जीत के लिए सबसे पहले गठबंधन के भीतर विश्वास जरूरी है। यही विश्वास सपा और कांग्रेस के राजनीतिक रिश्ते को चुनावी मजबूती में बदल सकता है। यदि दोनों दल इसे समझ लेते हैं तो सीट बंटवारे का विवाद भी समाधान की दिशा में जा सकता है। यदि राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई प्राथमिकता बन गई, तो विपक्षी एकता का उद्देश्य चुनावी मैदान में ही कमजोर पड़ सकता है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं राजनीतिक विचारक हैं)
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