(लिमटी खरे)
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछने लगी है। सत्ता की इस शतरंज में भाजपा ने एक ऐसा मोहरा आगे किया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का नया दौर शुरू कर दिया है। कभी भाजपा के शीर्ष नेताओं में शुमार रहे डॉ. मुरली मनोहर जोशी को उत्तर प्रदेश भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। इसे महज एक संगठनात्मक नियुक्ति माना जाए या फिर ब्राह्मण समाज के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कवायद? यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।
दिलचस्प यह है कि जिस मुरली मनोहर जोशी को वर्ष 2014 के बाद पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में स्थान देकर सक्रिय राजनीतिक जिम्मेदारियों से दूर कर दिया गया था, उनकी याद अब उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में आई है। ऐसे में राजनीतिक व्यंग्य करने वाले भी कह रहे हैं कि भाजपा को अब अपनी पुरानी ‘मुरली’ से नई चुनावी धुन निकालने की उम्मीद है।
लेकिन सवाल केवल जोशी की वापसी का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज के बीच प्रतिनिधित्व, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी को लेकर उठ रही चर्चाओं ने भाजपा को अपने पुराने नेताओं की ओर देखने के लिए प्रेरित किया है?
92 साल के जोशी की वापसी, सियासत में फिर बजी ‘मुरली’!
26 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने प्रदेश कार्यसमिति की नई सूची जारी की। इस कार्यसमिति में कुल 712 लोगों को स्थान दिया गया है। इनमें 548 नियमित सदस्य, 30 स्थायी आमंत्रित सदस्य और 134 विशेष आमंत्रित सदस्य शामिल हैं।
स्थायी आमंत्रित सदस्यों की सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक और वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे नाम शामिल हैं।
जोशी की नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे भाजपा के उन नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने पार्टी के वैचारिक और संगठनात्मक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं। राम मंदिर आंदोलन और पार्टी के शुरुआती राजनीतिक विस्तार के दौर में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही है।
वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका में बदलाव आया। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया। इसके बाद सक्रिय संगठनात्मक राजनीति में उनकी भूमिका सीमित होती चली गई।
अब उत्तर प्रदेश की नई कार्यसमिति में जोशी की मौजूदगी को पार्टी के पुराने नेतृत्व और वर्तमान संगठन के बीच एक सेतु के रूप में भी देखा जा सकता है।
ब्राह्मणों की नाराजगी की चर्चा, भाजपा को पुराने चेहरे का सहारा!
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों का महत्व किसी से छिपा नहीं है। यहां चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं होता, बल्कि सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व, राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व के सवाल भी चुनावी चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
ब्राह्मण समुदाय लंबे समय से भाजपा के पारंपरिक समर्थक वर्गों में शामिल रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के दौर में भाजपा की पहचान में ब्राह्मण नेतृत्व की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
लेकिन पिछले एक दशक में भाजपा ने अपनी सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का विस्तार करते हुए गैर-यादव पिछड़े वर्गों और गैर-जाटव दलित समुदायों तक अपनी पहुंच बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया। इससे पार्टी का सामाजिक आधार विस्तृत हुआ, लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक समर्थक वर्गों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर नई चर्चाएं भी सामने आईं।
मार्च 2026 में प्रकाशित राजनीतिक विश्लेषणों में भी उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर ब्राह्मण नेताओं की असहजता और पिछड़े वर्गों पर बढ़ते संगठनात्मक फोकस को लेकर चर्चा की गई थी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर कुछ विपक्षी नेताओं और ब्राह्मण संगठनों की ओर से ठाकुर समुदाय को अधिक महत्व देने के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों को भाजपा सरकार की ओर से स्वीकार नहीं किया गया है। प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के अपने दावे और आंकड़े हैं।
ऐसे में यह कहना कि पूरा ब्राह्मण समाज भाजपा से नाराज है, उचित नहीं होगा। लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सम्मान का सवाल चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण जरूर हो सकता है।
भाजपा के सामने चुनौती केवल अपने परंपरागत समर्थकों को साथ बनाए रखने की नहीं है, बल्कि पिछड़े वर्गों और अन्य सामाजिक समूहों के बीच बनाए गए समर्थन को भी संतुलित रखने की है।
ऐसे में मुरली मनोहर जोशी की नियुक्ति को एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या केवल पुराने चेहरे को सम्मानजनक स्थान देने से सामाजिक असंतोष से जुड़े सवालों का समाधान हो पाएगा?
राम मंदिर चंदे का विवाद भी चर्चा में, राजनीतिक सवाल अपनी जगह!
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण भाजपा की राजनीति और हिंदुत्व के विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। मंदिर निर्माण के लिए देशभर से लोगों ने आर्थिक सहयोग दिया। इस अभियान में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी रही।
हालांकि मंदिर परिसर में नकदी और अन्य कीमती वस्तुओं की कथित चोरी का मामला भी सामने आया। उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने इस मामले की जांच की और अगस्त 2026 में अपनी अंतिम रिपोर्ट श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंपे जाने की खबर सामने आई।
इस मामले को लेकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष ने भी सवाल उठाए थे। भाजपा की ओर से जवाब दिया गया कि एसआईटी रिपोर्ट में किसी भाजपा नेता या कार्यकर्ता का नाम नहीं है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मंदिर परिसर में कथित चोरी और मंदिर निर्माण के लिए दिए गए चंदे के व्यापक उपयोग को लेकर उठे सवाल अलग-अलग संदर्भ हैं। इन्हें एक ही आरोप के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
फिर भी राजनीतिक दृष्टि से यह सवाल महत्वपूर्ण है कि राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दे से जुड़े विवादों और उनके राजनीतिक प्रभाव को विभिन्न सामाजिक वर्ग किस तरह देखते हैं।
भाजपा के लिए चुनौती यह भी है कि धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों के साथ-साथ आम नागरिकों की अपेक्षाओं, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवालों का भी जवाब दिया जाए।
अमित शाह सूची से बाहर, लेकिन चुनावी रणनीति से नहीं!
नई कार्यसमिति की सूची में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम स्थायी आमंत्रित सदस्यों में नहीं होना भी राजनीतिक चर्चाओं का विषय बना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सूची में स्थान मिला, लेकिन अमित शाह का नाम इसमें दिखाई नहीं दिया।
अब सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति में अमित शाह की भूमिका सीमित की जा रही है?
लेकिन घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी है। 30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में आयोजित प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का उद्घाटन अमित शाह ने किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समापन सत्र में संबोधन दिया।
बैठक में मिशन-2027 की तैयारियों, बूथ प्रबंधन, संगठन की सक्रियता और सामाजिक समीकरणों पर चर्चा की गई। इस लिहाज से अमित शाह को संगठनात्मक सूची में स्थान नहीं मिलने को उनकी चुनावी भूमिका से बाहर किए जाने का संकेत मानना सही नहीं होगा।
अमित शाह वर्ष 2013 में उत्तर प्रदेश के भाजपा प्रभारी बनाए गए थे। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीती थीं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 312 सीटें हासिल की थीं।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 255 सीटें मिलीं, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उसकी सीटों की संख्या घटकर 33 रह गई। समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें हासिल की थीं।
इन चुनावी आंकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा के सामने 2027 के लिए संगठनात्मक मजबूती और सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती है।
अमित शाह की भूमिका को देखते हुए यह कहना अधिक उचित होगा कि भाजपा संगठन में नए चेहरों और पुराने अनुभवी नेताओं के बीच तालमेल बनाने की कोशिश कर रही है।
2024 के चुनाव परिणामों ने भाजपा को फिर सोचने पर किया मजबूर?
उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम भाजपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत लेकर आए थे। राज्य में पार्टी की सीटें 2019 की तुलना में कम हुईं और समाजवादी पार्टी सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बनकर सामने आई।
समाजवादी पार्टी ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने के लिए पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का राजनीतिक विमर्श आगे बढ़ाया।
इस रणनीति के बीच भाजपा के सामने अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थकों के साथ पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों के समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय रखना रहा है। इसके अलावा स्थानीय नेताओं की स्वीकार्यता, सरकारी योजनाओं का लाभ, कानून-व्यवस्था और विकास से जुड़े मुद्दे भी चुनावी चर्चा को प्रभावित करते हैं।
नई कार्यसमिति में 712 लोगों को शामिल करना भी संगठन के विस्तार और विभिन्न क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने की कवायद के रूप में देखा जा सकता है।
क्या केवल जोशी की मौजूदगी से साध जाएंगे ब्राह्मण समीकरण?
मुरली मनोहर जोशी का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी पहचान रखता है। वे ब्राह्मण समाज से आने वाले ऐसे वरिष्ठ नेता हैं, जिनका राजनीतिक जीवन भाजपा के वैचारिक विकास और संगठनात्मक विस्तार से जुड़ा रहा है।
लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। आज मतदाता केवल किसी नेता की जातीय पहचान या पुराने राजनीतिक योगदान के आधार पर निर्णय नहीं लेते। स्थानीय समस्याएं, रोजगार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था, महंगाई, विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हैं।
ब्राह्मण समाज के भीतर भी राजनीतिक विचार और प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। युवाओं की अपेक्षाएं अलग हो सकती हैं, जबकि परंपरागत राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मुद्दे अलग हो सकते हैं।
इसलिए जोशी की नियुक्ति को एक संकेत के रूप में जरूर देखा जा सकता है, लेकिन इसे किसी पूरे समुदाय के समर्थन की गारंटी मानना जल्दबाजी होगी।
भाजपा को यदि सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान करना है तो उसे संगठनात्मक नियुक्तियों के साथ सरकार और स्थानीय नेतृत्व के स्तर पर भी संवाद स्थापित करना होगा।
आरएसएस की भूमिका और पुराने नेताओं का महत्व
भाजपा की राजनीतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। मुरली मनोहर जोशी भी लंबे समय से संघ की विचारधारा से जुड़े रहे हैं।
भाजपा के संगठनात्मक फैसलों और चुनावी तैयारियों में संघ तथा उसके विभिन्न संगठनों के साथ समन्वय का महत्व समय-समय पर सामने आता रहा है।
ऐसे में जोशी जैसे वरिष्ठ नेता को प्रदेश कार्यसमिति में स्थान देना पार्टी की वैचारिक विरासत और पुराने नेतृत्व को सम्मान देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
हालांकि इस नियुक्ति को सीधे संघ के किसी विशेष निर्देश का परिणाम बताने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाजपा का वर्तमान नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचा पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। आज चुनावी राजनीति में डेटा, बूथ प्रबंधन, सोशल मीडिया और स्थानीय संगठन की सक्रियता की भूमिका बढ़ गई है।
ऐसे में पुराने नेताओं का अनुभव किस तरह नए संगठनात्मक ढांचे के साथ तालमेल बैठाता है, यह आने वाले समय में देखने वाली बात होगी।
2027 से पहले भाजपा के सामने कई चुनौतियां
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के पहले भाजपा को कई मोर्चों पर अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक तैयारियों का परीक्षण करना होगा।
इनमें प्रमुख मुद्दे हैं:
- ब्राह्मण और अन्य सवर्ण वर्गों के बीच प्रतिनिधित्व तथा राजनीतिक भागीदारी को लेकर उठ रहे सवाल।
- गैर-यादव पिछड़े वर्गों और गैर-जाटव दलितों के बीच समर्थन बनाए रखना।
- 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद संगठनात्मक कमजोरियों की समीक्षा।
- बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय नेतृत्व के साथ समन्वय।
- रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे जनहित के मुद्दों पर जवाबदेही।
- सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों का वास्तविक लाभ लोगों तक पहुंचाना।
इन चुनौतियों के बीच भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति को केवल पदाधिकारियों और आमंत्रित सदस्यों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय करने के प्रयास के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
चुनावी बांसुरी में पुरानी ‘मुरली’ का नया राग!
उत्तर प्रदेश भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति में डॉ. मुरली मनोहर जोशी की वापसी ने राजनीतिक चर्चाओं को नया विषय दे दिया है। 2014 के बाद सक्रिय राजनीति से लगभग दूर रहे वरिष्ठ नेता को 2027 के चुनाव से पहले संगठन में सम्मानजनक स्थान मिलना निश्चित रूप से ध्यान खींचता है।
ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच इस नियुक्ति के सामाजिक और राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। हालांकि भाजपा ने इसे ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की आधिकारिक रणनीति नहीं बताया है।
दूसरी ओर अमित शाह की सूची में अनुपस्थिति के बावजूद प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में उनकी सक्रिय भूमिका यह बताती है कि चुनावी तैयारियों में उनका महत्व बना हुआ है। योगी आदित्यनाथ का समापन सत्र में संबोधन भी प्रदेश नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित करता है।
अब असली परीक्षा नियुक्तियों और राजनीतिक संदेशों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर होगी। क्या भाजपा सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों का जवाब दे पाएगी? क्या पुराने नेताओं का अनुभव नए राजनीतिक समीकरणों में उपयोगी साबित होगा? और क्या ब्राह्मण समाज सहित विभिन्न वर्गों की अपेक्षाओं के अनुरूप संगठन में बदलाव दिखाई देगा?
फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनावी मौसम आने से पहले भाजपा ने अपनी पुरानी ‘मुरली’ को फिर याद किया है। लेकिन केवल मुरली बजाने से चुनावी राग नहीं बनता, उसके लिए सुर, ताल और संगत भी सही होनी चाहिए।
अब देखना यह है कि 2027 के चुनाव में भाजपा की यह पुरानी ‘मुरली’ कितना नया राजनीतिक संगीत पैदा कर पाती है!
(साई फीचर्स)