ऊर्जा नगरी सिंगरौली में फिर गरमाया अवैध रेत खनन का मुद्दा
(विद्याधर जाधव)
भोपाल (साई)।मध्य प्रदेश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले सिंगरौली जिले में एक बार फिर अवैध रेत खनन का मामला सुर्खियों में है। जिले की प्रमुख नदियों से कथित रूप से निर्धारित मानकों से अधिक रेत खनन और परिवहन किए जाने के आरोपों ने प्रशासनिक व्यवस्था और पर्यावरणीय निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि शिकायतों और केंद्रीय स्तर के निर्देशों के बावजूद गठित जांच समिति निर्धारित समय सीमा में अपनी जांच पूरी नहीं कर सकी। अब मानसून के दौरान संभावित साक्ष्यों के नष्ट होने की आशंका ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
सहकार ग्लोबल लिमिटेड पर लगे गंभीर आरोप
जानकारी के अनुसार जिले में रेत खनन का कार्य कर रही सहकार ग्लोबल लिमिटेड पर जीवनदायिनी नदियों से तय सीमा से अधिक रेत उत्खनन और परिवहन करने के आरोप लगाए गए हैं।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कई स्थानों पर मशीनों का उपयोग कर निर्धारित सीमा से अधिक खनन किया गया। मामले की शिकायत केंद्र सरकार तक पहुंचने के बाद केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्य के पर्यावरण विभाग को जांच के निर्देश दिए थे।
यह मामला केवल एक कंपनी या एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और खनन नियमों के पालन से जुड़ा एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
15 दिन में रिपोर्ट देनी थी, 51 दिन बाद भी जांच अधूरी
राज्य पर्यावरण विभाग के निर्देश पर मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल और राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) के सचिव ने 11 मई को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था।
समिति की अध्यक्षता सिया सदस्य डॉ. सुनंदा सिंह रघुवंशी को सौंपी गई थी। समिति को मात्र 15 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन आश्चर्यजनक रूप से—
- समिति ने स्थल निरीक्षण नहीं किया।
- आरोपित क्षेत्रों का मौका मुआयना नहीं हुआ।
- निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।
- जांच प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी।
इस देरी ने जांच प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच से अलग हुईं समिति अध्यक्ष, नई समिति पर भी संशय
मामले में नया मोड़ तब आया जब समिति की अध्यक्ष डॉ. सुनंदा सिंह रघुवंशी ने स्वयं को जांच से अलग करने की जानकारी दी।
उन्होंने यह भी बताया कि नई समिति गठित कर दी गई है, हालांकि उन्होंने उसके सदस्यों के नामों की जानकारी नहीं दी।
उधर, राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण के सचिव और अध्यक्ष की ओर से भी इस विषय पर स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जांच प्रक्रिया में देरी क्यों हो रही है और नई समिति कब तक अपनी जांच शुरू करेगी।
मानसून के कारण मिट सकते हैं अहम सबूत
अवैध रेत खनन मामले में सबसे बड़ी चिंता जांच के समय को लेकर जताई जा रही है।
शिकायत वर्ष की शुरुआत में हुई थी और मई में जांच समिति भी गठित हो गई थी, लेकिन स्थल निरीक्षण और कार्रवाई मानसून तक टाल दी गई।
अब प्रदेश में मानसून सक्रिय हो चुका है और जिन स्थानों पर अवैध खनन के आरोप लगाए गए हैं, वे जल्द ही जलमग्न हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि—
- नदी किनारों के निशान मिट सकते हैं।
- अवैध खनन के प्रमाण नष्ट हो सकते हैं।
- वास्तविक स्थिति का आकलन कठिन हो जाएगा।
- जांच प्रभावित होने की संभावना बढ़ सकती है।
इस कारण शिकायतकर्ताओं ने समय रहते जांच कराने की मांग की थी।
शिकायतकर्ता ने पहले ही जताई थी चिंता
शिकायतकर्ता विश्वमित्र शाह ने 15 मई को सिंगरौली एडीएम को आवेदन देकर मानसून से पहले जांच कराने की मांग की थी।
उन्होंने भुड़ाखुद, राजामिलन और हर्राहवा क्षेत्र के खसरा क्रमांक 412 और 413 में बड़े पैमाने पर मशीनों से अवैध खनन किए जाने के आरोप लगाए थे।
उन्होंने यह भी कहा था कि मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में भी विचाराधीन है और वहां की स्वतंत्र जांच में ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो विभागीय जांच के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
हालांकि शिकायतकर्ता का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन ने उनकी मांग को गंभीरता से नहीं लिया।
नदियों में लगातार सामने आ रहे अवैध खनन के मामले
सिंगरौली जिले की कई नदियां पिछले कुछ वर्षों से अवैध रेत खनन के आरोपों को लेकर चर्चा में रही हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- सोन नदी
- रिहंद नदी
- महान नदी
- गोपद नदी
- रेण नदी
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इन नदियों से लगातार अवैध खनन और परिवहन की शिकायतें मिलती रही हैं, लेकिन कार्रवाई अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाती।
प्रशासनिक सुस्ती से बढ़े रेत माफिया के हौसले
बैढ़न थाना क्षेत्र के बलियरी गांव में रेण नदी से अवैध उत्खनन और परिवहन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉलियां रेत का परिवहन करती हैं। कई बार रात के अंधेरे में खनन गतिविधियां संचालित होती हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक ढिलाई और प्रभावी निगरानी के अभाव में रेत माफिया के हौसले बढ़े हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध खनन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह राजस्व हानि, कानून व्यवस्था और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए भी गंभीर चुनौती है।
ग्रामीणों ने खुद पकड़ीं रेत से भरी ट्रॉलियां
खनन गतिविधियों से परेशान ग्रामीणों ने स्वयं पहल करते हुए रेत से भरी चार ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को पकड़कर प्रशासन के हवाले कर दिया।
इसके बाद खनिज विभाग ने जेसीबी की मदद से नदी तक जाने वाले मार्गों पर अवरोधक खड़े किए। हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि इसके आगे कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई।
आरोप हैं कि—
- कथित अवैध भंडारण जब्त नहीं किया गया।
- जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हुई।
- अवैध परिवहन पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई।
हालांकि संबंधित विभागों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पर्यावरण पर पड़ सकता है गंभीर असर
विशेषज्ञों के अनुसार नदियों से अनियंत्रित रेत खनन का सीधा असर पर्यावरण और जल संसाधनों पर पड़ता है।
अवैध खनन के कारण—
- नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होता है।
- जलस्तर में गिरावट आ सकती है।
- नदी किनारों का कटाव बढ़ता है।
- जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है।
- भूजल पुनर्भरण प्रभावित होता है।
कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि अनियंत्रित रेत खनन से नदियों की पारिस्थितिकी पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं।
शासन और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
सिंगरौली का यह मामला केवल एक जिले का प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन और संसाधनों के संरक्षण की चुनौती को भी उजागर करता है।
यदि जांच समय पर नहीं होती और साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं, तो इससे पूरे मामले की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध खनन के मामलों में त्वरित जांच, तकनीकी निगरानी और जवाबदेही तय करना बेहद आवश्यक है।
सिंगरौली में अवैध रेत खनन का मामला अब केवल खनन नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पर्यावरण संरक्षण और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। 51 दिन बाद भी जांच पूरी न होना और मानसून के बीच साक्ष्य मिटने की आशंका कई सवाल खड़े करती है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नई जांच समिति कब सक्रिय होती है और क्या अवैध खनन के आरोपों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो पाएगी।

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