ई-रिक्शा व्यवस्था पर हाईकोर्ट की सख्ती, सड़क सुरक्षा बना बड़ा मुद्दा
(के.के. पाहवा)
जबलपुर (साई)।मध्यप्रदेश में तेजी से बढ़ रही ई-रिक्शा की संख्या अब न्यायपालिका की चिंता का विषय बन गई है। प्रदेश के कई शहरों में बैटरी चालित ई-रिक्शा सार्वजनिक परिवहन का एक सस्ता और लोकप्रिय साधन बन चुके हैं, लेकिन इनके अनियंत्रित संचालन, बढ़ते ट्रैफिक दबाव और सड़क सुरक्षा से जुड़े सवालों ने प्रशासनिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
इन्हीं मुद्दों को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि नियमों की अनदेखी से शहरों की यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है, तो सरकार को इस पर प्रभावी कदम उठाने होंगे।
क्या है पूरा मामला?
जबलपुर निवासी डॉ. पी.जी. नाजपांडे और रजत भार्गव ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दावा किया कि प्रदेश के विभिन्न शहरों में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा बिना पर्याप्त नियमन के संचालित हो रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि:
- ई-रिक्शा की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
- कई चालक बिना वैध ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चला रहे हैं।
- नाबालिग भी सड़कों पर ई-रिक्शा चलाते देखे जा रहे हैं।
- शहरों में ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है।
- मौजूदा नियमों का प्रभावी पालन नहीं हो रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि ई-रिक्शा संचालन के लिए सख्त नियम लागू किए जाएं और मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की जाए।
जबलपुर में 9 हजार से ज्यादा ई-रिक्शा
याचिका में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि अकेले जबलपुर शहर में ही 9 हजार से अधिक ई-रिक्शा सड़कों पर संचालित हो रहे हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शहर की सड़क क्षमता सीमित होती है। जब सार्वजनिक परिवहन के वाहनों की संख्या बिना योजना के बढ़ती है, तो इसके कई दुष्परिणाम सामने आते हैं:
- ट्रैफिक जाम में वृद्धि
- पार्किंग की समस्या
- सड़क दुर्घटनाओं का खतरा
- यातायात नियमों का उल्लंघन
- आपातकालीन सेवाओं के संचालन में बाधा
जबलपुर समेत प्रदेश के अन्य शहरों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।
2018 की अधिसूचना क्यों बनी विवाद का कारण?
मामले की जड़ वर्ष 2018 की वह अधिसूचना है, जिसमें केंद्र सरकार ने ई-रिक्शा और बैटरी चालित वाहनों को मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 66 के तहत परमिट लेने की अनिवार्यता से छूट प्रदान की थी।
उस समय इस निर्णय का उद्देश्य था:
- पर्यावरण अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देना।
- गरीब और बेरोजगार युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना।
- प्रदूषण कम करना।
- छोटे शहरों में सस्ती परिवहन सुविधा विकसित करना।
लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस छूट का अब बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है और कई शहरों में ई-रिक्शा की संख्या अनियंत्रित हो गई है।
नाबालिगों द्वारा ई-रिक्शा संचालन पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि कई स्थानों पर 14 से 16 वर्ष तक के किशोर ई-रिक्शा चलाते दिखाई देते हैं।
यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
1. सड़क सुरक्षा पर खतरा
नाबालिगों के पास पर्याप्त ड्राइविंग अनुभव नहीं होता, जिससे दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है।
2. कानून का उल्लंघन
बिना वैध लाइसेंस वाहन चलाना मोटर वाहन नियमों के विरुद्ध है।
3. यात्रियों की सुरक्षा
ई-रिक्शा में बैठने वाले यात्रियों की जान भी जोखिम में पड़ सकती है।
4. प्रशासनिक निगरानी की कमी
यदि नाबालिग खुलेआम वाहन चला रहे हैं, तो यह स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
बिना लाइसेंस संचालन बना नई चुनौती
याचिका में यह भी कहा गया कि वाहन खरीदने और पंजीयन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान होने के कारण कई लोग ई-रिक्शा खरीदकर सड़कों पर उतार देते हैं, लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य नियमों का पालन नहीं करते।
परिणामस्वरूप:
- नियमों की अनदेखी बढ़ रही है।
- यातायात अनुशासन कमजोर हो रहा है।
- दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ रही है।
- अवैध संचालन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा।
हाईकोर्ट ने सरकार से क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी जानना चाहा कि वर्ष 2018 में दी गई परमिट छूट की समीक्षा क्यों नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने सरकार से कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जवाब मांगा है:
- ई-रिक्शा की संख्या नियंत्रित करने के लिए क्या व्यवस्था है?
- बिना लाइसेंस संचालन रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए?
- नाबालिग चालकों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा रही है?
- परमिट छूट की समीक्षा की संभावना क्या है?
- यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए सरकार की योजना क्या है?
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
ई-रिक्शा आज हजारों परिवारों की आजीविका का साधन बन चुके हैं। ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है।
एक ओर:
- रोजगार प्रभावित न हो।
- गरीब और निम्न आय वर्ग की आय पर असर न पड़े।
दूसरी ओर:
- यातायात व्यवस्था को नियंत्रित करना।
- सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- नियमों का पालन कराना।
इसी संतुलन को बनाना सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
क्या परमिट व्यवस्था वापस आ सकती है?
यदि अदालत की टिप्पणियों और याचिका में उठाए गए सवालों के बाद सरकार समीक्षा करती है, तो भविष्य में ई-रिक्शा संचालन के लिए नई व्यवस्था लागू की जा सकती है।
संभावित कदमों में शामिल हो सकते हैं:
- सीमित संख्या में परमिट जारी करना।
- अनिवार्य ड्राइविंग प्रशिक्षण।
- लाइसेंस सत्यापन अभियान।
- नाबालिग चालकों पर सख्त कार्रवाई।
- नगरवार ई-रिक्शा नीति तैयार करना।
- जीपीएस और डिजिटल पंजीयन व्यवस्था लागू करना।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
ई-रिक्शा ने शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में परिवहन की तस्वीर बदली है। हजारों लोगों को रोजगार मिला है और यात्रियों को सस्ती सुविधा उपलब्ध हुई है।
लेकिन यदि इनका संचालन अनियंत्रित रहता है तो इसके दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं:
सामाजिक प्रभाव
- बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं
- ट्रैफिक अव्यवस्था
- यात्रियों की सुरक्षा पर खतरा
आर्थिक प्रभाव
- सड़क जाम से व्यापार प्रभावित
- ईंधन और समय की बर्बादी
- नगर प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव
जनता की बढ़ती चिंता
कई शहरों में लोगों की शिकायत है कि प्रमुख चौराहों और बाजार क्षेत्रों में ई-रिक्शा की अनियोजित आवाजाही के कारण जाम की स्थिति सामान्य हो गई है।
विशेषकर:
- स्कूलों के आसपास
- अस्पतालों के पास
- रेलवे स्टेशन क्षेत्रों में
- मुख्य बाजारों में
यातायात दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को चार सप्ताह की अंतिम मोहलत दी है। अब सभी की निगाहें सरकार के जवाब और अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
यदि सरकार कोई नई नीति बनाती है या 2018 की व्यवस्था में बदलाव पर विचार करती है, तो इसका असर प्रदेश के लाखों यात्रियों और हजारों ई-रिक्शा चालकों पर पड़ सकता है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की सख्ती ने ई-रिक्शा संचालन से जुड़े कई गंभीर सवालों को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। पर्यावरण अनुकूल और सस्ते परिवहन के रूप में ई-रिक्शा की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन बिना नियमन के बढ़ती संख्या, नाबालिग चालकों की मौजूदगी और सड़क सुरक्षा के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आने वाले दिनों में सरकार का जवाब और संभावित नीतिगत बदलाव यह तय करेंगे कि प्रदेश में ई-रिक्शा व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सड़क सुरक्षा, यातायात अनुशासन और रोजगार के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संस्कारधानी जबलपुर ब्यूरो में कार्यरत सुमित खरे लगभग 15 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं, एवं डेढ़ दशकों से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से जुड़े हुए हैं.
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