एमपी में आज दवा दुकानों पर ताला! ई-फार्मेसी के खिलाफ केमिस्टों की हड़ताल से बढ़ी मरीजों की परेशानी

(विद्याधर जाधव)

भोपाल (साई)।मध्यप्रदेश समेत पूरे देश में आज दवा दुकानों पर असर दिखाई देने वाला है। अखिल भारतीय औषधि विक्रेता संगठन (AIOCD) द्वारा घोषित राष्ट्रव्यापी हड़ताल के कारण लाखों मेडिकल स्टोर बंद रहने की संभावना जताई गई है। इस हड़ताल का मुख्य उद्देश्य ऑनलाइन दवा बेचने वाली ई-फार्मेसी कंपनियों के खिलाफ विरोध दर्ज कराना है।

राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के कई जिलों में मेडिकल स्टोर्स बंद रहने से आम मरीजों, बुजुर्गों और नियमित दवाइयों पर निर्भर लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। केमिस्ट संगठनों का कहना है कि यदि सरकार ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन और भी बड़ा रूप ले सकता है।

ऑनलाइन दवा बिक्री को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब सड़क पर उतर आया है और इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं तथा आम जनता पर दिखाई दे रहा है।

देशभर में 12 लाख से ज्यादा मेडिकल स्टोर बंद रहने का अनुमान

अखिल भारतीय औषधि विक्रेता संगठन के अनुसार देशभर में लगभग 12 लाख 40 हजार से अधिक दवा दुकानों के इस हड़ताल में शामिल होने की संभावना है।

मध्यप्रदेश में भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है। केवल भोपाल में ही लगभग तीन हजार मेडिकल स्टोर प्रभावित होने की बात कही जा रही है। इसके अलावा इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर और अन्य बड़े शहरों में भी दवा दुकानदारों ने समर्थन दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हड़ताल लंबे समय तक जारी रहती है, तो स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका असर गंभीर हो सकता है।

आखिर क्यों नाराज हैं केमिस्ट?

केमिस्ट संगठनों का आरोप है कि ई-फार्मेसी कंपनियां नियमों का उल्लंघन कर दवाइयों की बिक्री कर रही हैं। उनका कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कई बार बिना उचित चिकित्सकीय जांच और सत्यापन के दवाइयां उपलब्ध कराई जा रही हैं।

AIOCD का कहना है कि इससे न केवल मरीजों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है, बल्कि पारंपरिक मेडिकल स्टोर्स का कारोबार भी प्रभावित हो रहा है।

संगठन के नेताओं का कहना है कि दवाइयों की बिक्री कोई सामान्य व्यापार नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा संवेदनशील मामला है। इसलिए इसमें सख्त निगरानी और नियंत्रित व्यवस्था जरूरी है।

बिना डॉक्टर की जांच बिक रही दवाइयों पर चिंता

केमिस्ट संगठनों ने सबसे बड़ी चिंता बिना उचित जांच के दवाइयों की ऑनलाइन बिक्री को लेकर जताई है।

उनका आरोप है कि कई ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म पुराने प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर बार-बार दवाइयां उपलब्ध करा रहे हैं। इससे एंटीबायोटिक और अन्य संवेदनशील दवाओं का गलत उपयोग बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं का अनियंत्रित इस्तेमाल भविष्य में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या पैदा कर सकता है।

इसके अलावा नशे में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऑनलाइन उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ी है।

AI तकनीक से नकली प्रिस्क्रिप्शन का खतरा

केमिस्ट संगठनों ने यह भी दावा किया है कि आधुनिक AI तकनीक का इस्तेमाल कर नकली प्रिस्क्रिप्शन तैयार किए जा सकते हैं।

यदि इस तरह की गतिविधियां बढ़ती हैं, तो मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल सुविधाजनक जरूर है, लेकिन दवाइयों जैसे संवेदनशील क्षेत्र में मजबूत नियामक व्यवस्था जरूरी है।

छोटे केमिस्टों के सामने रोजी-रोटी का संकट

ऑनलाइन दवा कंपनियों द्वारा भारी डिस्काउंट दिए जाने से छोटे मेडिकल स्टोर्स का कारोबार प्रभावित हो रहा है।

गांव और छोटे शहरों में जहां लोग वर्षों से स्थानीय मेडिकल दुकानों पर भरोसा करते हैं, वहां यह समस्या और गंभीर मानी जा रही है।

केमिस्ट संगठनों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो हजारों छोटे मेडिकल स्टोर बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं।

छोटे दुकानदारों की प्रमुख समस्याएं

  • भारी ऑनलाइन डिस्काउंट से प्रतिस्पर्धा कठिन
  • ग्राहकों की संख्या में गिरावट
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कारोबार प्रभावित
  • किराया और कर्मचारियों का खर्च बढ़ना
  • बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों का दबदबा

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि छोटे मेडिकल स्टोर बंद होते हैं, तो दूरदराज क्षेत्रों में दवाइयों की उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा।

प्रधानमंत्री को भेजा गया ज्ञापन

AIOCD ने अपनी मांगों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भी भेजा है।

संगठन का कहना है कि ई-फार्मेसी कंपनियों की अनियमितताएं केवल कारोबार का मामला नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा हैं।

संगठन के अनुसार देशभर में लगभग पांच करोड़ लोग फार्मास्यूटिकल व्यापार और उससे जुड़े रोजगार पर निर्भर हैं। ऐसे में ऑनलाइन कंपनियों के कारण लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।

केमिस्ट संगठनों की मुख्य मांगें

हड़ताल के दौरान संगठन ने सरकार के सामने कई प्रमुख मांगें रखी हैं।

प्रमुख मांगें

  • कोविड काल के दौरान बनाए गए अस्थायी नियम G.S.R. 220(E) को हटाया जाए
  • ई-फार्मेसी नियम G.S.R. 817(E) को रद्द किया जाए
  • ऑनलाइन दवा बिक्री पर सख्त निगरानी लागू हो
  • भारी डिस्काउंट पर रोक लगाई जाए
  • प्रिस्क्रिप्शन सत्यापन की मजबूत व्यवस्था बनाई जाए
  • मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानून लागू हों

संगठन का कहना है कि यदि मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन को आगे भी जारी रखा जा सकता है।

मरीजों को हो सकती है बड़ी परेशानी

हड़ताल का सबसे बड़ा असर आम मरीजों पर पड़ सकता है।

विशेष रूप से वे लोग जो नियमित दवाइयों पर निर्भर हैं, जैसे:

  • डायबिटीज मरीज
  • हृदय रोगी
  • ब्लड प्रेशर मरीज
  • बुजुर्ग नागरिक
  • गंभीर बीमारियों का इलाज करा रहे लोग

इन मरीजों को दवाइयां खरीदने में कठिनाई हो सकती है।

हालांकि कुछ अस्पतालों और इमरजेंसी सेवाओं के लिए सीमित व्यवस्था बनाए जाने की संभावना जताई गई है, लेकिन सामान्य मेडिकल स्टोर्स बंद रहने से परेशानी बढ़ सकती है।

क्या ई-फार्मेसी पूरी तरह गलत हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन दवा सेवाएं पूरी तरह नकारात्मक नहीं हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने कई लोगों तक दवाइयां पहुंचाने में मदद भी की है, खासकर महामारी के दौरान।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब नियमन कमजोर हो जाता है।

स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को ऐसा संतुलित मॉडल तैयार करना होगा जिसमें:

  • मरीजों की सुरक्षा बनी रहे
  • डिजिटल सुविधा जारी रहे
  • छोटे दुकानदारों का हित सुरक्षित रहे
  • दवाइयों की गुणवत्ता और सत्यापन सुनिश्चित हो

सरकार के सामने बढ़ी चुनौती

यह विवाद अब सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

एक ओर डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन सेवाओं को बढ़ावा देने की नीति है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक व्यापार से जुड़े लाखों लोग विरोध कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तर पर बड़ा विवाद बन सकता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमन क्यों जरूरी?

दवाइयों की बिक्री सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • फर्जी दवाइयों की रोकथाम जरूरी है
  • गलत दवा उपयोग रोकना आवश्यक है
  • मरीजों के डेटा की सुरक्षा जरूरी है
  • डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन सत्यापन मजबूत होना चाहिए

यदि यह व्यवस्था मजबूत नहीं हुई तो ऑनलाइन दवा बाजार भविष्य में बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है।

जनता की प्रतिक्रिया भी बंटी हुई

इस मुद्दे पर जनता की राय भी दो हिस्सों में बंटी दिखाई दे रही है।

कुछ लोग ऑनलाइन दवा सेवाओं को सुविधाजनक मानते हैं क्योंकि इससे घर बैठे दवाइयां मिल जाती हैं और कीमत भी कम होती है।

वहीं दूसरी ओर कई लोग मानते हैं कि मेडिकल स्टोर पर फार्मासिस्ट की सलाह और दवा की तत्काल उपलब्धता अधिक भरोसेमंद होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी स्थानीय मेडिकल स्टोर्स पर लोगों की निर्भरता काफी अधिक है।

भविष्य में क्या हो सकते हैं बड़े बदलाव?

विशेषज्ञों के अनुसार इस विवाद के बाद सरकार स्वास्थ्य और ई-फार्मेसी क्षेत्र में नए नियम लागू कर सकती है।

संभावित बदलाव

  • ऑनलाइन दवा बिक्री के लिए लाइसेंस प्रक्रिया सख्त हो सकती है
  • AI आधारित प्रिस्क्रिप्शन सत्यापन सिस्टम विकसित हो सकता है
  • डिस्काउंट और विज्ञापन नियम तय किए जा सकते हैं
  • ऑफलाइन और ऑनलाइन फार्मेसी के लिए समान नियम लागू हो सकते हैं
  • मरीज सुरक्षा के लिए नई गाइडलाइन जारी हो सकती है

मध्यप्रदेश समेत पूरे देश में केमिस्टों की हड़ताल ने एक बार फिर ऑनलाइन दवा बिक्री और मरीज सुरक्षा के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।

एक ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म सुविधा और सस्ती दवाइयों का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक केमिस्ट मरीजों की सुरक्षा और रोजगार पर खतरे की बात कर रहे हैं। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संतुलित व्यवस्था बनाने की है, ताकि तकनीक और स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों के बीच सही संतुलन कायम रखा जा सके।

आने वाले दिनों में सरकार और केमिस्ट संगठनों के बीच बातचीत इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।