(श्वेता यादव)
बंग्लुरू (साई)। आज की तेज़-तर्रार जीवनशैली और असंतुलित खान‑पान ने इंसुलिन रेजिस्टेंस को एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या बना दिया है। कई लोग लगातार वजन घटाने की कोशिशों के बावजूद स्केल पर वही अंक देखते हैं, जिससे वे निराश हो जाते हैं। यह स्थिति केवल सौंदर्य संबंधी नहीं, बल्कि टाइप‑2 डायबिटीज, हृदय रोग और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी गंभीर बीमारियों की ओर ले जा सकती है। क्लिनिकल डाइटिशियन उर्वी गोहिल ने इस मुद्दे को समझाने के लिए कुछ स्पष्ट संकेत और रोकथाम उपाय साझा किए हैं, जिन्हें अगर समय पर अपनाया जाए तो रोग की प्रगति को रोका जा सकता है। इस लेख में हम इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण, लक्षण, सांख्यिकी और प्रभावी समाधान को विस्तार से चर्चा करेंगे।
इंसुलिन रेजिस्टेंस क्या है? वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य
सेल्स में इंसुलिन का कार्य विफलता
इंसुलिन एक हार्मोन है जो रक्त में शर्करा को कोशिकाओं तक पहुँचाने में मदद करता है। जब शरीर की कोशिकाएँ इस हार्मोन के प्रति संवेदनशीलता खो देती हैं, तो ग्लूकोज़ रक्त में ही रह जाता है और रक्त शर्करा स्तर लगातार बढ़ता है। यह प्रक्रिया धीरे‑धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति बनाती है, जिससे अगली चरण में टाइप‑2 डायबिटीज का खतरा उत्पन्न होता है।
वजन बढ़ने की शारीरिक प्रक्रिया
इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण शरीर में इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे वसा कोशिकाओं में लिपिड जमा होना तेज़ हो जाता है। परिणामस्वरूप, व्यक्ति को वजन घटाने में कठिनाई होती है, जबकि कैलोरी सेवन वही रहता है। यह चक्र अक्सर “वज़न नहीं घट रहा” की शिकायत में बदल जाता है, जो कई लोगों को भ्रमित कर देता है।
इंसुलिन रेजिस्टेंस के प्रमुख लक्षण और दैनिक संकेत
थकान और ऊर्जा में कमी
जब कोशिकाएँ इंसुलिन को सही ढंग से उपयोग नहीं कर पातीं, तो ग्लूकोज़ ऊर्जा के रूप में नहीं बदल पाता। इससे दिन भर थकान, सुस्ती और काम करने की क्षमता में गिरावट महसूस होती है। अक्सर यह लक्षण “सिर्फ थकान” के रूप में अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि यह एक गंभीर संकेत हो सकता है।
भूख में अनियमितता व मीठी cravings
इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण रक्त शर्करा स्तर में उतार‑चढ़ाव अधिक हो जाता है, जिससे अचानक मीठी चीज़ों की तीव्र इच्छा उत्पन्न होती है। साथ ही, भोजन के बाद भी भूख लगना सामान्य हो जाता है, जिससे अधिक कैलोरी सेवन की ओर झुकाव बढ़ता है। यह चक्र वजन बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बनता है।
आंकड़े और शोध: भारत में इंसुलिन रेजिस्टेंस का प्रचलन
हाल के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में लगभग 30 % वयस्कों को इंसुलिन रेजिस्टेंस का जोखिम है, जो शहरी क्षेत्रों में और भी अधिक है। यह आंकड़ा न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चेतावनी है, बल्कि नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि जीवनशैली‑संबंधी हस्तक्षेप आवश्यक हैं।
- रिसर्च डेटा 2023: शहरी मध्यम वर्ग में इंसुलिन रेजिस्टेंस की दर 38 % तक पहुँच गई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 22 % रही।
- उम्र समूह विश्लेषण: 35‑45 वर्ष के आयु वर्ग में सबसे अधिक जोखिम देखा गया, जिसमें पुरुषों में 42 % और महिलाओं में 35 % मामलों की रिपोर्ट मिली।
- आर्थिक प्रभाव: अनुमानित वार्षिक स्वास्थ्य खर्च में 1.2 अर्ब डॉलर की अतिरिक्त लागत इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी जटिलताओं के कारण उत्पन्न होती है।
रोकथाम और उपचार: डाइटिशियन उर्वी गोहिल की सिफारिशें
आहार में परिवर्तन
उर्वी गोहिल के अनुसार, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थों का चयन, जैसे कि साबुत अनाज, दालें, हरी पत्तेदार सब्जियाँ और नट्स, रक्त शर्करा को स्थिर रखने में मदद करता है। साथ ही, प्रोसेस्ड शुगर और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट को सीमित करना चाहिए, क्योंकि ये इंसुलिन सेंसिटिविटी को और घटाते हैं।
जीवनशैली एवं व्यायाम
नियमित शारीरिक गतिविधि, विशेषकर एरोबिक एक्सरसाइज़ जैसे तेज़ चलना, साइक्लिंग या तैराकी, इंसुलिन रिसेप्टर की संवेदनशीलता को बढ़ाती है। उर्वी यह भी सुझाव देती हैं कि रोज़ाना कम से कम 30 मिनट की मध्यम‑तीव्रता वाली कसरत को जीवन में शामिल किया जाए, साथ ही पर्याप्त नींद और तनाव‑प्रबंधन तकनीकों को अपनाया जाए।

कर्नाटक की राजधानी बंग्लुरू में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के ब्यूरो के रूप में कार्यरत श्वेता यादव ने नई दिल्ली के एक ख्यातिलब्ध मास कम्यूनिकेशन इंस्टीट्यूट से पोस्ट ग्रेजुएशन की उपाधि लेने के बाद वे पिछले लगभग 15 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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