33 साल बाद मध्यप्रदेश में फिर गूंजेगी सोन चिरैया की आवाज, राजस्थान से ग्वालियर लाए जाएंगे गोडावण के जोड़े

करीब 33 वर्षों बाद मध्यप्रदेश के ग्वालियर में एक बार फिर सोन चिरैया यानी गोडावण की वापसी की तैयारी शुरू हो गई है। वन विभाग राजस्थान के जैसलमेर स्थित सैम कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर से गोडावण के जोड़े और चूजों को लाने की योजना बना रहा है। यह कदम देश की सबसे संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में शामिल गोडावण के संरक्षण और मध्यप्रदेश की जैव विविधता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मध्यप्रदेश की जैव विविधता को संवारने की बड़ी तैयारी

(स्वाति खरे)

भोपाल/ग्वालियर (साई)।मध्यप्रदेश में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल शुरू होने जा रही है। करीब 33 वर्षों पहले प्रदेश से लुप्त हो चुकी दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षी प्रजाति सोन चिरैया यानी गोडावण को एक बार फिर उसके पुराने प्राकृतिक आवास में बसाने की तैयारी की जा रही है।

वन विभाग ने राजस्थान के जैसलमेर स्थित सैम कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर से गोडावण के जोड़े और चूजों को मध्यप्रदेश लाने का प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार किया है। यदि यह योजना सफल होती है तो ग्वालियर की धरती पर दशकों बाद एक बार फिर इस दुर्लभ पक्षी की मौजूदगी दिखाई दे सकती है।

यह प्रयास केवल एक पक्षी को वापस लाने की योजना नहीं है, बल्कि यह मध्यप्रदेश की खोई हुई जैविक विरासत को पुनर्स्थापित करने का अभियान भी माना जा रहा है।

आखिर क्यों खास है सोन चिरैया या गोडावण?

सोन चिरैया, जिसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) कहा जाता है, भारत की सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में से एक है। यह राजस्थान का राज्य पक्षी भी है और इसे दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में गिना जाता है।

यह पक्षी घास के विशाल मैदानों में निवास करता है और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जहां गोडावण की उपस्थिति होती है, वहां का घासीय पारिस्थितिक तंत्र संतुलित और स्वस्थ माना जाता है।

इसकी खास शारीरिक बनावट और जमीन पर रहने की आदत इसे अन्य पक्षियों से अलग बनाती है। गोडावण आमतौर पर दो से ढाई फुट ऊंची घास के बीच अपना बसेरा बनाता है।

33 साल पहले क्यों गायब हो गई थी मध्यप्रदेश की सोन चिरैया?

एक समय ऐसा था जब ग्वालियर और आसपास के घास के मैदानों में सोन चिरैया बड़ी संख्या में दिखाई देती थी। लेकिन बदलते पर्यावरण, प्राकृतिक आवासों में कमी और मानव गतिविधियों के बढ़ते प्रभाव के कारण इसकी संख्या लगातार घटती चली गई।

लगभग 33 साल पहले मध्यप्रदेश में इस पक्षी को अंतिम बार देखा गया था। इसके बाद यह प्रदेश के जंगलों और घास के मैदानों से पूरी तरह गायब हो गया।

विशेषज्ञों के अनुसार गोडावण की संख्या कम होने के प्रमुख कारण हैं—

  • घास के प्राकृतिक मैदानों का समाप्त होना।
  • अवैध शिकार और मानव हस्तक्षेप।
  • बिजली की ऊंची तारों से टकराकर होने वाली मौतें।
  • कृषि और विकास कार्यों के कारण आवास में बदलाव।
  • प्राकृतिक प्रजनन दर का कम होना।

इन कारणों ने इस दुर्लभ प्रजाति को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया।

देश में केवल लगभग 150 गोडावण ही बचे

वर्तमान समय में गोडावण की स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाती है। देशभर में इनकी संख्या लगभग 150 के आसपास रह गई है।

इनमें से करीब 135 पक्षी राजस्थान में पाए जाते हैं, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इनकी संख्या बहुत सीमित रह गई है।

चौंकाने वाली बात यह है कि राजस्थान में कभी इनकी संख्या लगभग छह हजार बताई जाती थी, लेकिन समय के साथ यह घटकर कुछ दर्जन जोड़ों तक सीमित हो गई। इस स्थिति ने वन्यजीव संरक्षण एजेंसियों और वैज्ञानिकों को विशेष संरक्षण कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया।

ग्वालियर की धरती फिर बनेगी सोन चिरैया का घर

ग्वालियर वन प्रभाग के अधिकारियों के अनुसार यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से गोडावण का प्राकृतिक आवास रहा है। इसलिए इसी क्षेत्र में इस दुर्लभ पक्षी को पुनः स्थापित करने की योजना बनाई गई है।

इस योजना के तहत ग्वालियर की सोन चिरैया सैंक्चुअरी और उसके आसपास के क्षेत्रों में पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जाएगा।

बाराई गांव और पनिहार के आसपास विशेष रूप से घास के मैदान विकसित किए जाएंगे ताकि पक्षियों को भोजन, सुरक्षा और प्रजनन के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध हो सके।

वन विभाग का मानना है कि यदि प्राकृतिक परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो आने वाले वर्षों में गोडावण की संख्या धीरे-धीरे बढ़ाई जा सकेगी।

राजस्थान के सैम कंजर्वेशन सेंटर से आएंगे गोडावण

राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित सैम कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर वर्तमान समय में गोडावण संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

यहां आधुनिक तकनीक की मदद से गोडावण के अंडों को सुरक्षित रखा जाता है, कृत्रिम तरीके से उनका ऊष्मायन किया जाता है और नए चूजों का पालन किया जाता है।

हाल ही में इस केंद्र में नए चूजों का जन्म भी हुआ है, जिससे संरक्षण कार्यक्रम को नई सफलता मिली है।

मध्यप्रदेश के वन अधिकारी इस केंद्र का अध्ययन करेंगे और वहां की संरक्षण प्रणाली को समझने के बाद गोडावण के चूजों एवं वयस्क नर-मादा पक्षियों को ग्वालियर लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

केवल पक्षी लाना नहीं, उनके सफल प्रजनन की भी चुनौती

वन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी विलुप्त हो चुकी प्रजाति को वापस बसाना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है।

गोडावण को केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए उचित घास के मैदान, पर्याप्त भोजन, शिकारियों से सुरक्षा और शांत वातावरण उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी होता है।

वन विभाग की योजना है कि ग्वालियर में लाए जाने वाले पक्षियों के प्राकृतिक प्रजनन को प्रोत्साहित किया जाए ताकि भविष्य में यहां उनकी एक स्थायी आबादी विकसित हो सके।

वन्यजीव संरक्षण में नए अध्याय की शुरुआत

मध्यप्रदेश पहले से ही बाघ, तेंदुआ और चीता जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों के लिए देशभर में जाना जाता है। अब गोडावण को वापस लाने की योजना प्रदेश की वन्यजीव संरक्षण रणनीति में एक नया अध्याय जोड़ सकती है।

वन विभाग की कार्ययोजना के तहत कई अन्य महत्वपूर्ण कदम भी उठाए जा रहे हैं—

  • आंध्र प्रदेश के साथ वन्यजीव संरक्षण सहयोग के अंतर्गत मध्यप्रदेश से तीन बाघिनों को वहां के जंगलों की समृद्धि के लिए भेजने की तैयारी की जा रही है।
  • इसके बदले आंध्र प्रदेश से भारतीय जंगली कुत्ते (ढोल) और अन्य वन्यजीव प्रजातियों को मध्यप्रदेश लाने की योजना बनाई गई है।
  • संगठित वन अपराधों पर नियंत्रण के लिए स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स की तर्ज पर विशेष टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा।
  • वन और वन्यजीवों की चौबीसों घंटे निगरानी के लिए आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की स्थापना की जाएगी।
  • गांधी सागर अभयारण्य में अगले चरण में चीतों के नए जोड़े को छोड़ने की तैयारी की जा रही है। वर्तमान में कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण में बढ़ेगी मध्यप्रदेश की भूमिका

विशेषज्ञों का मानना है कि गोडावण की वापसी केवल एक वन्यजीव परियोजना नहीं बल्कि घास के मैदानों के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

भारत में वन संरक्षण के साथ-साथ घासीय क्षेत्रों का संरक्षण भी आवश्यक है क्योंकि कई दुर्लभ प्रजातियां इन्हीं पर निर्भर करती हैं। गोडावण की मौजूदगी किसी क्षेत्र की पर्यावरणीय गुणवत्ता का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है।

यदि ग्वालियर में यह परियोजना सफल होती है तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है।

भविष्य की राह और चुनौतियां

गोडावण संरक्षण की सफलता कई कारकों पर निर्भर करेगी। उचित आवास निर्माण, बिजली लाइनों से सुरक्षा, मानव हस्तक्षेप को कम करना और वैज्ञानिक निगरानी इस योजना की सफलता के प्रमुख आधार होंगे।

वन विभाग को लंबे समय तक इस परियोजना पर लगातार कार्य करना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस दुर्लभ पक्षी को प्राकृतिक वातावरण में देख सकें।

ग्वालियर में विकसित किए जा रहे घास के मैदान और संरक्षण सुविधाएं इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं।

करीब तीन दशक बाद मध्यप्रदेश में सोन चिरैया की वापसी की तैयारी राज्य के वन्यजीव संरक्षण इतिहास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है। राजस्थान से गोडावण के जोड़े और चूजों को लाकर ग्वालियर के प्राकृतिक आवास में बसाने की योजना जैव विविधता संरक्षण की नई उम्मीद लेकर आई है।

हालांकि इस अभियान की सफलता उचित वैज्ञानिक प्रबंधन, सुरक्षित आवास और दीर्घकालीन संरक्षण प्रयासों पर निर्भर करेगी। यदि यह प्रयास सफल रहा तो आने वाले वर्षों में ग्वालियर के घास के मैदानों में एक बार फिर सोन चिरैया की मौजूदगी दिखाई दे सकती है और मध्यप्रदेश की प्राकृतिक धरोहर को नई पहचान मिलेगी।