दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज, 11 हजार का इंजेक्शन 1.30 लाख में मिलने का मामला स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल

दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज, जीवनरक्षक इलाज आम आदमी की पहुंच से बाहर क्यों?

(सौरभ वार्ष्णेय)

स्वास्थ्य किसी भी सभ्य समाज की बुनियादी आवश्यकता है। जीवन बचाने वाली दवाओं तक सुलभ पहुंच प्रत्येक नागरिक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन जब गंभीर बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति इलाज के खर्च के सामने बेबस हो जाए, तब स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकताओं और सरकारी नियमन की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में भारी अंतर को लेकर जो चिंता जताई है, वह केवल दवा बाजार की अनियमितताओं का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, सरकारी जवाबदेही और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

27 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक ऐसा मामला आया, जिसमें कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाला इंजेक्शन मेडिकल वितरक को लगभग 11,000 रुपये में उपलब्ध होने के बावजूद एक निजी अस्पताल में उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले जाने की बात कही गई। अदालत ने इस बड़े अंतर का औचित्य जानना चाहा और सवाल उठाया कि मरीजों पर इतना अधिक आर्थिक बोझ क्यों डाला जा रहा है। सुनवाई के बाद अदालत ने संबंधित याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। यानी इस मुद्दे पर अंतिम न्यायिक निर्णय अभी घोषित नहीं हुआ था। <Cite refs={[“turn730392search2″,”turn730392search4”]}/>

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज और उनके परिजन पहले ही मानसिक, शारीरिक और आर्थिक संकट से गुजरते हैं। परिवार अपनी बचत खर्च करता है, संपत्ति बेचने को मजबूर हो सकता है और कई बार उधार लेकर उपचार कराता है। ऐसे समय में यदि दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच असाधारण अंतर हो, तो उसकी पारदर्शी जांच और जवाबदेही आवश्यक है।

दवा की कीमत और अस्पताल के बिल में अंतर का सवाल

यह समझना जरूरी है कि दवा की निर्माता कीमत, वितरक की खरीद कीमत, अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी और अस्पताल द्वारा मरीज से वसूली जाने वाली राशि हमेशा एक समान नहीं होती। अस्पताल में दवा उपलब्ध कराने, उसे सुरक्षित रखने, देने और उपचार के दौरान आवश्यक निगरानी जैसी सेवाओं का खर्च भी हो सकता है।

लेकिन इन खर्चों के नाम पर यदि किसी दवा की कीमत में कई गुना अंतर आता है, तो उसका उचित आधार स्पष्ट होना चाहिए। मरीज को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि बिल में दवा का मूल्य कितना है, अस्पताल की सेवा का शुल्क कितना है और अन्य मदों में कितनी राशि ली गई है।

सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया कैंसर इंजेक्शन का उदाहरण इसी पारदर्शिता की आवश्यकता को उजागर करता है। अदालत के समक्ष रखे गए विवरण के अनुसार, संबंधित मरीज के परिजन ने अस्पताल को बताया था कि इंजेक्शन उन्हें वितरक मूल्य पर लगभग 11,000 रुपये में मिल सकता है। इसके बावजूद अस्पताल ने बाहर से उपलब्ध इंजेक्शन देने से इनकार किया और कथित तौर पर 1.30 लाख रुपये का शुल्क लिया। यह विवरण सुनवाई में सामने आया पक्ष है; इसे सभी अस्पतालों की मूल्य निर्धारण व्यवस्था का प्रतिनिधि उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए। <Cite refs={[“turn730392search2″,”turn730392search11”]}/>

फिर भी यह मामला एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है: जब मरीज गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो और उसके पास उपचार टालने का विकल्प न हो, तब दवा की कीमत तय करने और वसूलने की व्यवस्था कितनी पारदर्शी होनी चाहिए?

सलाइन ड्रिप, हार्ट स्टेंट और एंटीबायोटिक की कीमतों पर भी सवाल

सर्वोच्च न्यायालय में दवाओं और चिकित्सा उत्पादों के मूल्य अंतर से जुड़े अन्य उदाहरण भी सामने आए। इनमें सलाइन ड्रिप लाइन, हार्ट स्टेंट और एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन की कीमतों का उल्लेख किया गया।

सुनवाई में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, लगभग 11 से 15 रुपये की खरीद कीमत वाली सलाइन ड्रिप लाइन के लिए 250 से 270 रुपये तक वसूले जाने का उदाहरण दिया गया। इसी तरह, लगभग 5,000 रुपये के भारतीय निर्मित हार्ट स्टेंट की कीमत 25,000 रुपये से अधिक होने और लगभग 28.50 रुपये में स्टॉकिस्ट को मिलने वाली एजिथ्रोमाइसिन की एमआरपी लगभग 78.29 रुपये होने की बात सामने आई। इन आंकड़ों का संदर्भ संबंधित उत्पादों की खरीद और बिक्री के अलग-अलग स्तरों से है; सभी उत्पादों के लिए इन्हें एक समान लागत या लाभ का प्रमाण नहीं माना जा सकता। <Cite refs={[“turn730392search5″,”turn730392search7”]}/>

इन उदाहरणों से यह सवाल उठता है कि कीमत में अंतर के पीछे वास्तविक लागत, वितरण व्यवस्था, कर, सेवा शुल्क और व्यापारिक मार्जिन की क्या भूमिका है। प्रत्येक उत्पाद के मामले में समान गुणवत्ता, पैकिंग, मात्रा और बिक्री के स्तर की तुलना किए बिना केवल दो कीमतों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

लेकिन जहां असाधारण अंतर सामने आता है, वहां नियामक संस्थाओं को उसके कारणों की जांच करनी चाहिए। मरीजों को स्पष्ट बिल और मूल्य संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना इस दिशा में आवश्यक कदम है।

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की भूमिका पर सवाल

दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत में औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) और राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) निर्धारित दवाओं की कीमतों पर निगरानी रखने और लागू नियमों के अनुसार मूल्य संबंधी कार्रवाई करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसके बावजूद सभी दवाएं और चिकित्सा उत्पाद एक ही तरह के मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आते। निर्धारित सूची में शामिल दवाओं पर मूल्य सीमा लागू हो सकती है, जबकि गैर-अनुसूचित दवाओं के लिए शुरुआती मूल्य निर्धारण की व्यवस्था अलग है। ऐसी दवाओं की कीमतों में वृद्धि पर कुछ नियामक प्रतिबंध लागू होते हैं, लेकिन उनका मूल्य निर्धारण ढांचा अनुसूचित दवाओं से अलग है। <Cite refs={[“turn730392news12″,”turn730392search6”]}/>

सर्वोच्च न्यायालय ने इसी अंतर को लेकर सवाल उठाया कि जीवनरक्षक दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में बड़े अंतर को रोकने के लिए मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त क्यों नहीं है। अदालत ने यह भी पूछा कि कैंसर की दवाओं के लिए व्यापारिक मार्जिन पर नियंत्रण की व्यवस्था अन्य दवाओं तक क्यों नहीं बढ़ाई जा सकती।

यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मूल्य नियंत्रण के नियम तभी प्रभावी माने जा सकते हैं, जब उनका लाभ मरीज तक पहुंचे। केवल नियमों का होना पर्याप्त नहीं है; उनकी निगरानी, उल्लंघन पर कार्रवाई और मरीजों की शिकायतों का समाधान भी जरूरी है।

कैंसर की 137 दवाओं पर 30 प्रतिशत मार्जिन सीमा

दवाओं की कीमतों पर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के एक समूह पर व्यापारिक मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने की व्यवस्था अधिसूचित की है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह व्यवस्था 137 कैंसर दवाओं पर लागू होनी है और संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होने वाली हैं। <Cite refs={[“turn730392search0″,”turn730392search1”]}/>

यह कदम कैंसर के मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इसी प्रकार की व्यवस्था अन्य जीवनरक्षक दवाओं और चिकित्सा उत्पादों के लिए भी विकसित की जानी चाहिए?

सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान इसी व्यापक मुद्दे पर केंद्र सरकार से सवाल किए। सरकार की ओर से दलील दी गई कि भारत में दवाओं की कीमतें कई देशों की तुलना में कम हैं और मूल्य निर्धारण की नीति में मरीजों की पहुंच, दवा उद्योग की जरूरतों तथा आपूर्ति के बीच संतुलन रखना जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय तुलना उपयोगी हो सकती है, लेकिन भारतीय परिवारों की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी दवा का दूसरे देश की तुलना में सस्ता होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह भारत के हर मरीज की पहुंच में है।

असली कसौटी यह होनी चाहिए कि मरीज को आवश्यक उपचार कितने खर्च में, कितनी आसानी से और कितनी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध हो रहा है।

दवा उद्योग का लाभ और मरीजों का हित

दवा उद्योग अनुसंधान, नई दवाओं के विकास, उत्पादन और वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कंपनियों को उचित लाभ कमाने का अधिकार है और दवा निर्माण के लिए अनुसंधान, गुणवत्ता परीक्षण, उत्पादन सुविधाओं तथा वितरण व्यवस्था में निवेश की आवश्यकता होती है।

लेकिन जीवनरक्षक दवाओं का बाजार सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार से अलग है। गंभीर बीमारी में मरीज के पास दवा खरीदने का निर्णय टालने या कई विकल्पों में से मनचुना विकल्प चुनने की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। उपचार में देरी का स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।

इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में बाजार की प्रतिस्पर्धा, उद्योग के आर्थिक हित और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन आवश्यक है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उचित लाभ की गुंजाइश बनी रहे, लेकिन मरीजों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाने की संभावना भी कम हो।

निजी अस्पतालों का पक्ष भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। अस्पतालों को भवन, उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारियों, चौबीस घंटे सेवाओं और संक्रमण नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं पर खर्च करना पड़ता है। लेकिन इन खर्चों का विवरण और दवाओं की कीमतों का आधार पारदर्शी होना चाहिए। सेवा की वास्तविक लागत और दवा पर लगाए गए अतिरिक्त मार्जिन के बीच अंतर समझना जरूरी है।

मरीजों को राहत देने के लिए क्या होना चाहिए?

दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सरकार, अस्पतालों, दवा कंपनियों और नियामक संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। इसके लिए कुछ कदम विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं।

  • स्पष्ट बिलिंग: अस्पतालों में दवा की कीमत, उपचार शुल्क और अन्य मदों का अलग-अलग विवरण मरीज को दिया जाए।
  • खरीद और बिक्री कीमतों की जांच: जहां असामान्य मूल्य अंतर सामने आए, वहां संबंधित उत्पाद और बिक्री स्तर के आधार पर जांच की जाए।
  • मूल्य नियंत्रण की समीक्षा: आवश्यक दवाओं की सूची और मूल्य नियंत्रण व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा हो।
  • शिकायतों का त्वरित समाधान: मरीजों को अनुचित वसूली की शिकायत करने और उसका जवाब पाने की प्रभावी व्यवस्था मिले।
  • नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई: जांच में नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होने पर संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जाए।
  • किफायती विकल्पों की जानकारी: चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त होने पर मरीजों को उपलब्ध जेनेरिक दवाओं और अन्य अनुमत विकल्पों के बारे में जानकारी दी जाए।

इन उपायों का उद्देश्य केवल दवाओं के दाम कम करना नहीं, बल्कि मरीज को मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया समझने और अनुचित वसूली के विरुद्ध प्रभावी उपाय उपलब्ध कराना भी होना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय की चिंता के बाद आगे क्या?

27 अक्टूबर 2026 की सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की कीमतों और संबंधित याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अदालत का अंतिम आदेश उस समय घोषित नहीं हुआ था। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अदालत ने सभी दवाओं के लिए कोई नई मूल्य सीमा लागू कर दी है। <Cite refs={[“turn730392search0″,”turn730392search2”]}/>

आगे की दिशा न्यायालय के आदेश, सरकार की नीतिगत कार्रवाई और नियामक संस्थाओं द्वारा उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। कैंसर की 137 दवाओं के लिए घोषित मार्जिन सीमा एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन व्यापक मूल्य नियंत्रण का प्रश्न अभी भी सार्वजनिक महत्व का विषय बना हुआ है।

इस बहस में मरीजों के वास्तविक अनुभवों और प्रमाणित आंकड़ों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। दवाओं की कीमतों की तुलना करते समय समान उत्पाद, समान मात्रा, गुणवत्ता, बिक्री का स्तर और संबंधित सेवाओं की लागत को ध्यान में रखना आवश्यक है।

निष्कर्ष: जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता जनहित की अनिवार्य शर्त

सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में सामने आए बड़े अंतर पर चिंता जताकर एक महत्वपूर्ण जनहित के प्रश्न को केंद्र में रखा है। 11,000 रुपये के कैंसर इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले जाने का मामला इस बहस का प्रमुख उदाहरण बना है। साथ ही, सलाइन ड्रिप लाइन, हार्ट स्टेंट और एंटीबायोटिक की कीमतों को लेकर उठे सवाल भी मूल्य निर्धारण व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत बताते हैं।

लेकिन केवल न्यायालय की टिप्पणियों से मरीजों का आर्थिक बोझ कम नहीं होगा। इसके लिए सरकार को प्रभावी नियमन, अस्पतालों को पारदर्शी बिलिंग और नियामक संस्थाओं को समयबद्ध निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। दवा कंपनियों और अस्पतालों की वास्तविक लागत का उचित आकलन करते हुए मरीजों को अनुचित आर्थिक बोझ से बचाने के उपाय भी आवश्यक हैं।

लोककल्याणकारी व्यवस्था की पहचान केवल अस्पतालों की संख्या या चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार से नहीं होती, बल्कि इससे होती है कि संकट की घड़ी में आम नागरिक को कितना सहारा मिलता है।

जीवनरक्षक दवाओं के मामले में उचित मूल्य, पारदर्शिता और जवाबदेही कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि जनहित की अनिवार्य शर्तें हैं। सर्वोच्च न्यायालय की चिंता का वास्तविक महत्व तभी सामने आएगा, जब उससे ऐसी व्यवस्था विकसित हो जो मरीजों की सुरक्षा और उपचार की उपलब्धता को केंद्र में रखे तथा यह सुनिश्चित करे कि गंभीर बीमारी किसी परिवार को आर्थिक संकट में धकेलने का अनिवार्य कारण न बने।

लेखक परिचय:

सौरभ वार्ष्णेय वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक एवं राजनीतिक विचारक हैं

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