(ब्यूरो कार्यालय)
सिवनी (साई)। कृषि विज्ञान केंद्र सिवनी के वैज्ञानिकों ने जिले के विभिन्न सोयाबीन फसल प्रक्षेत्रों का विस्तृत निरीक्षण किया। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शेखर सिंह बघेल, डॉ. निखिल सिंह और डॉ. जी.के. राणा ने किसानों को पीला मोजेक रोग, सफेद मक्खी, गर्डल बीटल और विभिन्न इल्लियों के प्रकोप की जानकारी सुनवाई और त्वरित नियंत्रण के लिए तकनीकी सलाह दी। इस कदम का उद्देश्य रोग‑कीट प्रबंधन को सुदृढ़ बनाकर फसल उत्पादन में स्थिरता लाना है।
विस्तृत कवरेज
निरीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने रोग के शुरुआती लक्षणों की पहचान की और बताया कि पीला मोजेक रोग विषाणुजनित है, जिसका कोई सीधा उपचार नहीं है; इसलिए रोग के प्रसार को रोकना आवश्यक है। सफेद मक्खी को रोग के मुख्य वाहक के रूप में बताया गया और इसकी नियमित निगरानी व नियंत्रण पर बल दिया गया।
रोग‑कीट नियंत्रण के लिए किसानों को दो मुख्य उपाय सुझाए गए: पहला, रोगग्रस्त पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर मिट्टी में दबा देना या नष्ट करना; दूसरा, अनुशंसित कीटनाशकों का सही मात्रा में प्रयोग। प्रमुख रसायन में एसिटामिप्रिड + बायफेन्थ्रिन (100 ग्राम/एकड़), थायमेथॉक्सम (40 ग्राम/एकड़), इमिडाक्लोप्रिड (50‑60 मिलीलीटर/एकड़) और फ्लोनिकामिड (80 ग्राम/एकड़) शामिल हैं। इन दवाओं को 150‑200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिकों ने यह भी कहा कि कीटनाशकों के चयन में स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेना आवश्यक है और फसल के विकास चरण के अनुसार दोहरावदार स्प्रे शेड्यूल अपनाना चाहिए। इससे कीटों की जनसंख्या को नियंत्रित रखकर फसल की स्वस्थ वृद्धि सुनिश्चित होगी।
खबर के प्रमुख बिंदु
• कंपनी: कृषि विज्ञान केंद्र सिवनी
• आयोजन: सोयाबीन फसल रोग‑कीट निरीक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन
• स्थान: सिवनी, उत्तर प्रदेश
• मुख्य उद्देश्य: पीला मोजेक रोग एवं सफेद मक्खी के प्रकोप को रोकना
• प्रमुख संकल्प/घोषणाएं: रोग‑ग्रस्त पौधों का उखाड़‑फेंक, अनुशंसित कीटनाशकों का सही मात्रा में उपयोग
• लक्ष्य: फसल उत्पादन में गिरावट को न्यूनतम करना और किसानों की आय स्थिर रखना
कृषि विज्ञान केंद्र सिवनी की यह पहल नियमित फसल निगरानी, वैज्ञानिक उपचार और किसानों के साथ सतत संवाद को सुदृढ़ करती है। रोग‑कीट प्रबंधन में आधुनिक रसायनों और समय पर कार्रवाई को अपनाने से सोयाबीन उत्पादन की स्थिरता बढ़ेगी और क्षेत्रीय कृषि अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। भविष्य में भी इस प्रकार की तकनीकी सहायता और समयबद्ध समीक्षा से किसान समुदाय को आत्मविश्वास मिलेगा और सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा।