पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
(प्रीति भौंसले)
सिवनी (साई)।मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में पर्यावरण संरक्षण, जल संवर्धन और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने की दिशा में प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है। इसी कड़ी में कलेक्टर श्रीमती नेहा मीना ने शुक्रवार को शासकीय जैविक कृषि प्रक्षेत्र भोमा कटिया का भ्रमण किया और किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया।
भ्रमण के दौरान कलेक्टर ने जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत पौधरोपण किया और किसानों को हरित एवं जल-संरक्षित भविष्य के निर्माण का संदेश दिया। उन्होंने प्रक्षेत्र में संचालित विभिन्न कृषि गतिविधियों का अवलोकन करते हुए किसानों से संवाद भी किया।
पौधरोपण कर दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
भोमा कटिया प्रक्षेत्र में आयोजित पौधरोपण कार्यक्रम के दौरान कलेक्टर श्रीमती नेहा मीना ने किसानों को पौधे भेंट किए और उनसे अपने खेतों, मेड़ों और आसपास के क्षेत्रों में अधिक से अधिक पौधरोपण करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि पौधरोपण केवल एक औपचारिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पर्यावरण तैयार करने का माध्यम है। लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल करना भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि पौधे ही भविष्य में बड़े वृक्ष बनकर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कलेक्टर ने कहा कि जल गंगा संवर्धन अभियान केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का व्यापक जनआंदोलन है।
बीज उत्पादन कार्यक्रम का किया निरीक्षण
भ्रमण के दौरान कलेक्टर ने प्रक्षेत्र में संचालित बीज उत्पादन कार्यक्रम की कार्यप्रणाली का विस्तार से अवलोकन किया। उन्होंने विभिन्न फसलों के गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, बीज शुद्धता बनाए रखने तथा किसानों तक प्रमाणित बीज पहुंचाने की प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त की।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि किसानों को समय पर उच्च गुणवत्ता वाले बीज और आधुनिक कृषि तकनीकों का लाभ मिलना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण बीज कृषि उत्पादन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यदि किसानों को समय पर प्रमाणित बीज उपलब्ध हो जाएं तो उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि उन्नत और प्रमाणित बीजों का उपयोग कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्राकृतिक खेती को बताया भविष्य की आवश्यकता
कलेक्टर श्रीमती नेहा मीना ने किसानों से संवाद करते हुए कहा कि प्राकृतिक एवं जैविक खेती भविष्य की टिकाऊ कृषि व्यवस्था है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती अपनाने से—
- मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
- रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
- उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होती है।
- खेती की लागत घटती है।
- उपभोक्ताओं को सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं।
- पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
कलेक्टर ने किसानों से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित खेती को अपनाने और इसे एक जनआंदोलन बनाने की अपील की।
क्यों बढ़ रही है जैविक खेती की जरूरत?
पिछले कुछ वर्षों में देशभर में जैविक खेती के प्रति किसानों और उपभोक्ताओं की रुचि तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे कई कारण हैं।
प्रमुख कारण
- रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता में कमी।
- उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि।
- स्वास्थ्य के प्रति लोगों की बढ़ती जागरूकता।
- पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता।
- जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कृषि को दीर्घकाल तक लाभकारी और टिकाऊ बनाना है तो प्राकृतिक और जैविक खेती की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।
वर्मी कम्पोस्ट इकाई का भी किया निरीक्षण
कलेक्टर ने प्रक्षेत्र में संचालित वर्मी कम्पोस्ट इकाई का भी निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट निर्माण की प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त की और किसानों को इसके उपयोग एवं लाभों के बारे में विस्तार से समझाया।
वर्मी कम्पोस्ट को प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। यह मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ाता है और पौधों के विकास में सहायक होता है।
वर्मी कम्पोस्ट के प्रमुख लाभ
- मिट्टी की संरचना में सुधार।
- उत्पादन लागत में कमी।
- जल धारण क्षमता में वृद्धि।
- रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होना।
- फसल की गुणवत्ता में सुधार।
कलेक्टर ने किसानों को अपने स्तर पर वर्मी कम्पोस्ट इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि यह टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
किसानों से सीधा संवाद, सुनी समस्याएं
भ्रमण के दौरान कलेक्टर ने किसानों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याओं और सुझावों की जानकारी भी ली। किसानों ने प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, बीज उपलब्धता और तकनीकी मार्गदर्शन से जुड़े विषयों पर चर्चा की।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन और किसानों के बीच इस प्रकार का सीधा संवाद योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में सहायक होता है। इससे किसानों की वास्तविक जरूरतों को समझने और योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलती है।
जल गंगा संवर्धन अभियान से जुड़ा व्यापक संदेश
भोमा कटिया प्रक्षेत्र का यह दौरा केवल कृषि गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके माध्यम से जल संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन का व्यापक संदेश भी दिया गया।
जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत जिले में विभिन्न स्थानों पर—
- पौधरोपण अभियान,
- जल स्रोतों का संरक्षण,
- वर्षा जल संचयन,
- जल संरचनाओं का पुनर्जीवन,
- जनजागरूकता कार्यक्रम
जैसी गतिविधियां लगातार संचालित की जा रही हैं।
प्रशासन का उद्देश्य है कि जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़कर इसे एक स्थायी अभियान बनाया जाए।
टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण का मजबूत संबंध
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। यदि मिट्टी, जल और जैव विविधता का संरक्षण किया जाता है तो कृषि उत्पादन लंबे समय तक स्थिर बना रह सकता है।
प्राकृतिक खेती का मॉडल इसी सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और जल संकट जैसी चुनौतियां बढ़ रही हैं, तब जैविक और प्राकृतिक खेती की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।
प्रशासनिक प्रयासों से बढ़ रही किसानों की जागरूकता
जिले में कृषि विभाग द्वारा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारी प्रदान की जा रही है। भोमा कटिया जैविक कृषि प्रक्षेत्र भी किसानों के लिए एक प्रशिक्षण और प्रेरणा केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है।
इस अवसर पर सीईओ जिला पंचायत श्रीमती अंजली शाह, कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारी तथा क्षेत्र के अनेक किसान उपस्थित रहे।
सिवनी के भोमा कटिया स्थित शासकीय जैविक कृषि प्रक्षेत्र का कलेक्टर नेहा मीना का दौरा पर्यावरण संरक्षण, जल संवर्धन और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। पौधरोपण, प्राकृतिक खेती, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और वर्मी कम्पोस्ट जैसी गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि भविष्य की कृषि व्यवस्था को अधिक पर्यावरण अनुकूल और लागत प्रभावी बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। यदि किसानों की भागीदारी और जनजागरूकता इसी प्रकार बढ़ती रही तो जैविक और प्राकृतिक खेती न केवल कृषि क्षेत्र को नई दिशा देगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान करेगी।

आशीष कौशल का नाम महाराष्ट्र के विदर्भ में जाना पहचाना है. पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 30 वर्षों से ज्यादा समय से सक्रिय आशीष कौशल वर्तमान में समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के नागपुर ब्यूरो के रूप में कार्यरत हैं .
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