(ब्यूरो कार्यालय)
लखनऊ (साई)। सरकार ने हाल ही में चार प्रमुख राज्यों में दाल‑तिलहन की खरीद को मंजूरी दी, जिससे भारतीय किसानों को अभूतपूर्व आर्थिक राहत मिलने की संभावना है। इस कदम ने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा लाभार्थी बना दिया, जहाँ लाखों छोटे और सीमांत किसान सीधे इस योजना से जुड़ेंगे। नीति परिवर्तन के पीछे कृषि बाजार में स्थिरता लाने और मौसमी मूल्य उतार‑चढ़ाव को नियंत्रित करने का रणनीतिक उद्देश्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगी और ग्रामीण आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती है। इस रिपोर्ट में हम योजना के विस्तृत पहलुओं, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संभावित सामाजिक‑आर्थिक प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे।
उत्तरी प्रदेश में लागू विस्तृत प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस वर्ष के बजट में दाल‑तिलहन खरीद के लिए विशेष कोटा निर्धारित किया, जिसमें प्रत्येक किसान को न्यूनतम 10 क्विंटल दाल या 5 क्विंटल तिलहन की खरीद का अधिकार मिलेगा। इस प्रक्रिया में स्थानीय मंडियों, एग्री‑कोऑपरेटिव्स और निजी एग्री‑ट्रेडर्स को मिलकर कार्य करने की व्यवस्था है, जिससे वितरण में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी। प्रमुख अधिकारी ने कहा कि इस कदम से किसानों को बाजार में अस्थिर कीमतों से बचाव मिलेगा और उन्हें स्थिर आय का भरोसा मिलेगा।
अन्य तीन राज्यों में समान कदम
पंजाब, मध्य प्रदेश और बिहार ने भी समान खरीद योजना अपनाई है, लेकिन प्रत्येक राज्य ने अपनी कृषि संरचना के अनुसार कोटा और मूल्य निर्धारण में थोड़ा अंतर रखा है। पंजाब ने मुख्यतः सरसों और काली दाल पर फोकस किया, जबकि मध्य प्रदेश ने मूंग और चना को प्राथमिकता दी। बिहार ने छोटे किसानों की भागीदारी बढ़ाने के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को सरल बनाया है, जिससे लाभार्थियों की सूची में पारदर्शिता बनी रहे।
पिछले पाँच वर्षों में दाल‑तिलहन खरीद की प्रवृत्ति
पिछले पाँच वर्षों में केंद्र और राज्य स्तर पर दाल‑तिलहन खरीद में औसतन 15% की वार्षिक वृद्धि देखी गई है। 2019 में कुल 2.5 मिलियन टन की खरीद से 2023 में यह आंकड़ा 4.1 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ। इस अवधि में प्रमुख चुनौतियों में मूल्य निर्धारण में असंगतियाँ और वितरण में देरी शामिल थीं, जिन्हें नई नीति द्वारा दूर करने का प्रयास किया गया है।
राज्य‑स्तर के विविधताएँ और आर्थिक प्रभाव
राज्य‑स्तर पर विभिन्न कृषि संरचनाओं के कारण खरीद नीति में विविधताएँ देखी गईं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े कृषि राज्य में बड़े कोटा और विस्तृत बिचौलियों का नेटवर्क स्थापित किया गया, जबकि छोटे राज्य जैसे झारखंड ने अधिक केंद्रित खरीद केंद्रों के माध्यम से प्रक्रिया को सरल बनाया। आर्थिक रूप से, इस नीति ने ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता मूल्य स्थिरता को बढ़ावा दिया और बाजार में अस्थायी कमी को रोकते हुए खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ किया।
नीति के कार्यान्वयन के बाद प्रारंभिक आँकड़े दर्शाते हैं कि लाभार्थियों की संख्या और वित्तीय प्रवाह दोनों ही अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है।
- लाभार्थी किसान संख्या: उत्तर प्रदेश में अनुमानित 12 लाख किसान इस योजना से सीधे जुड़ेंगे, जबकि अन्य तीन राज्यों में कुल 8 लाख किसान लाभान्वित होंगे।
- कुल खरीद मात्रा: चार राज्यों में मिलाकर 4.3 मिलियन टन दाल‑तिलहन की खरीद का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 2.5 मिलियन टन दाल और 1.8 मिलियन टन तिलहन शामिल हैं।
- आर्थिक प्रभाव: प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, इस योजना से ग्रामीण आय में औसतन 7-9% की वृद्धि होने की संभावना है, जिससे गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या में कमी आएगी।
किसानों की प्रतिक्रिया और सामाजिक प्रभाव
स्थानीय स्तर पर किसानों ने इस योजना को “आशा की नई किरण” कहा है। कई किसान संघों ने बताया कि अब उन्हें बाजार में कीमतों के उतार‑चढ़ाव की चिंता नहीं करनी पड़ेगी और वे अपने उत्पादन को बेहतर योजना के साथ बढ़ा सकते हैं। सामाजिक रूप से, महिलाओं और युवा किसानों की भागीदारी में भी वृद्धि देखी गई है, क्योंकि नई डिजिटल रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया ने प्रक्रिया को अधिक सुलभ बना दिया है।
आगे की संभावनाएँ और सरकारी रणनीति
सरकार ने इस योजना को अगले पाँच वर्षों तक जारी रखने और कोटा को और बढ़ाने का इरादा जताया है। साथ ही, मूल्य स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित बाजार निगरानी प्रणाली स्थापित करने की योजना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस नीति को सही ढंग से लागू किया गया, तो यह भारत की कृषि संरचना में दीर्घकालिक परिवर्तन लाने में सक्षम होगी, जिससे निर्यात क्षमता और खाद्य सुरक्षा दोनों में सुधार होगा।

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