नाना पाटेकर नहीं रहे, लेकिन उनका अभिनय हमेशा जिंदा रहेगा; ‘मुझे सच्ची मारो’ से ‘नटसम्राट’ तक ऐसा था उनका सफर

(सुनील सोनी)

पणजिम (साई)। भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया है, जिसकी पहचान केवल लोकप्रिय फिल्मों या चर्चित संवादों से नहीं बनी थी। नाना पाटेकर के अभिनय की असली ताकत उस सच्चाई में थी, जिसे वह पर्दे पर लेकर आते थे। वह किरदार को सिर्फ निभाते नहीं थे, बल्कि उसकी मानसिकता, उसकी बेचैनी, उसकी पीड़ा और उसकी खामोशी को अपने अभिनय का हिस्सा बना लेते थे।

75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर के निधन के साथ भारतीय रंगमंच और सिनेमा के एक विशिष्ट अध्याय का अंत हुआ है। उनके निधन की खबर 8 अक्टूबर 2026 को सामने आई और भारतीय फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

नाना पाटेकर की अभिनय यात्रा को समझने के लिए उनकी फिल्मों की सूची देखना पर्याप्त नहीं है। उनके अभिनय को समझने के लिए उस सोच को समझना जरूरी है, जिसके अनुसार अभिनय में भी वास्तविकता होनी चाहिए।

इसी सोच का एक बेहद चर्चित उदाहरण उनके शुरुआती फिल्मी दौर से जुड़ा है।

‘मुझे सच्ची मारो’—अभिनय के पीछे छिपी थी सच्चाई की जिद

1970 के दशक में विजय तेंदुलकर का लिखा नाटक ‘पाहिजे जातीचे’ जाति, सत्ता और प्रेम के सवालों पर तीखा व्यंग्य था। इसी नाटक को देखने एक बार निर्देशक जब्बार पटेल पहुंचे।

उनकी नजर एक युवा कलाकार पर टिक गई। वह कलाकार अभिनय के दौरान हास्य, राजनीति और युवा मन की उलझनों को जिस तरह प्रस्तुत कर रहा था, उसमें उन्हें कुछ अलग दिखाई दिया।

वही युवा आगे चलकर नाना पाटेकर के नाम से भारतीय अभिनय का एक बड़ा चेहरा बना।

जब्बार पटेल ने उन्हें अपनी फिल्म ‘सिंहासन’ में भूमिका देने का प्रस्ताव दिया। वर्ष 1979 की इस फिल्म के साथ नाना पाटेकर के फिल्मी सफर का एक महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ।

फिल्म में एक दृश्य ऐसा था जिसमें नाना के किरदार की कुछ लोगों द्वारा पिटाई की जानी थी। निर्देशक ने उनसे कहा कि उन्हें घायल और बेहद पीड़ित दिखाई देना होगा।

नाना ने इसके जवाब में कहा—“मुझे सच्ची मारो।”

इसके बाद जो हुआ, वह उनके अभिनय दर्शन का प्रतीक बन गया। उन्हें वास्तव में मारा गया और उनके शरीर पर चोट के निशान तक आ गए।

जब्बार पटेल ने उन्हें समझाया कि इतनी वास्तविकता की जरूरत नहीं है। यह अभिनय है।

लेकिन नाना पाटेकर का जवाब उनके पूरे करियर की पहचान बन गया—अभिनय में भी वास्तविकता होनी चाहिए।

यही वह दृष्टिकोण था जिसने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाया।

रंगमंच से शुरू हुआ था अभिनय का सफर

नाना पाटेकर की अभिनय यात्रा अचानक फिल्मों से शुरू नहीं हुई थी। उन्होंने प्रदर्शन कला की दुनिया में स्कूल के दिनों से ही कदम रखा था।

परिवार की आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं। इसके बावजूद अभिनय के प्रति उनका लगाव बना रहा। धीरे-धीरे रंगमंच उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

मुंबई का रंगमंच उनके लिए केवल अभिनय का मंच नहीं था, बल्कि सीखने और अपने भीतर के कलाकार को विकसित करने की जगह भी था।

उन्होंने मराठी रंगमंच पर अलग-अलग भूमिकाएं कीं और बाद में हिंदी तथा मराठी फिल्मों में भी अपनी जगह बनाई।

रंगमंच ने उन्हें संवाद बोलना ही नहीं सिखाया, बल्कि संवाद के बीच की खामोशी को समझना भी सिखाया।

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नाना की अभिनय शैली में यही बात बाद में साफ दिखाई दी।

नाना पाटेकर की खासियत क्या थी?

नाना पाटेकर का अभिनय अक्सर तीव्र माना जाता रहा, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत केवल गुस्सा या तेज आवाज नहीं थी।

वह जरूरत पड़ने पर बेहद संयमित भी हो सकते थे।

कभी आवाज ऊंची होती थी तो कभी सिर्फ आंखों का इस्तेमाल पूरा संवाद कह देता था। कभी लंबे संवाद होते थे तो कभी कुछ सेकंड की खामोशी किरदार की पूरी कहानी कह देती थी।

उनकी अभिनय शैली में कई परतें थीं—

  • आवाज में अलग पहचान।
  • संवाद बोलने का अनूठा अंदाज।
  • आंखों और चेहरे से भाव व्यक्त करने की क्षमता।
  • लंबे संवादों के बीच अचानक पैदा होने वाला मौन।
  • आम आदमी की भाषा और भावनाओं से जुड़ाव।
  • गुस्से के साथ संवेदनशीलता।
  • हास्य के भीतर छिपी गंभीरता।
  • और सबसे बढ़कर किरदार की आंतरिक सच्चाई।

यही वजह थी कि नाना पाटेकर का अभिनय आसानी से किसी दूसरे कलाकार की शैली में फिट नहीं होता था।

कला के कई रूपों से गहरा रिश्ता

नाना पाटेकर केवल फिल्मों और रंगमंच तक सीमित कलाकार नहीं थे। उन्होंने मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से कला की शिक्षा ली थी।

चित्रकला के प्रशिक्षण ने उनके चरित्र निर्माण को भी प्रभावित किया।

किसी चित्रकार की तरह वह किरदार को केवल बाहरी रूप में नहीं देखते थे। वह उसकी बनावट, मनोविज्ञान, व्यवहार और परिस्थितियों को समझने की कोशिश करते थे।

संगीत से भी उनका गहरा लगाव था। कुमार गंधर्व और किशोरी अमोनकर जैसे महान कलाकारों का संगीत उन्हें पसंद था।

मराठी कविता में भी उनकी रुचि गहरी थी। कई कविताएं उन्हें याद थीं।

नाटक ‘घाशीराम कोतवाल’ को उन्होंने कई बार देखा था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके लिए अभिनय केवल रोजी-रोटी या लोकप्रियता का माध्यम नहीं था। वह कला को लगातार सीखने और समझने की प्रक्रिया मानते थे।

‘गुस्सैल अभिनेता’ से कहीं ज्यादा थे नाना पाटेकर

नाना पाटेकर को अक्सर ‘एंग्री यंग मैन’ जैसी छवि से जोड़ा गया। उनकी आवाज, संवाद और तीखे चेहरे के भाव ने इस पहचान को मजबूत किया।

लेकिन उनकी प्रतिभा को केवल गुस्से वाले किरदारों तक सीमित करना उनके अभिनय के साथ न्याय नहीं होगा।

उन्होंने गंभीर, भावनात्मक, सामाजिक, राजनीतिक, हास्य और मानवीय भूमिकाओं में अलग-अलग रंग दिखाए।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि जब किसी भूमिका की लोकप्रिय शैली उनके ऊपर चढ़ने लगती थी, तो वह अपने अभिनय को फिर से बदल लेते थे।

फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के कुलपति धीरज सिंह ने उन्हें ऐसा कलाकार बताया, जिसने अभिनय में तीव्रता के साथ संयम भी दिखाया और लोकप्रियता के कारण पैदा होने वाली आत्म-नकल से बार-बार खुद को बचाया।

यही उनकी कला की महत्वपूर्ण पहचान थी।

‘यशवंतराव चव्हाण’ के किरदार में भी दिखाई दी तैयारी

जब्बार पटेल ने वर्षों बाद 2014 में नाना पाटेकर के साथ फिर काम किया। यह फिल्म थी ‘यशवंतराव चव्हाण: बखर एका वादळाची’।

पटेल के अनुसार नाना ने भूमिका को समझने के लिए व्यापक अध्ययन किया था। उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया और अपनी भूमिका के पक्ष में तर्क तथा विश्लेषण प्रस्तुत किए।

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यह उदाहरण बताता है कि नाना पाटेकर केवल संवाद याद करके सेट पर पहुंचने वाले अभिनेता नहीं थे।

वह किरदार की पृष्ठभूमि, राजनीतिक वातावरण और उसके मानसिक संसार को समझने की कोशिश करते थे।

यही तैयारी उनके अभिनय को गहराई देती थी।

NSD में भी छात्रों पर छोड़ी गहरी छाप

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी NSD से भी नाना पाटेकर का जुड़ाव रहा।

2016 में भारत रंग महोत्सव के दौरान वह वहां पहुंचे थे। उनके साथ छात्रों की बातचीत का एक प्रसंग आज भी उनके सहज व्यक्तित्व की झलक देता है।

बताया जाता है कि वह निर्धारित समय से करीब 30 मिनट पहले पहुंच गए थे। मुख्य सभागार की सीढ़ियों पर बैठकर उन्होंने छात्रों और दर्शकों के साथ अनौपचारिक बातचीत की।

मंच को लेकर उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था कि वहां से गिरने का डर रहता है, जबकि नीचे बैठने में ऐसा डर नहीं है।

यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को दिखाता है जो पर्दे पर दिखाई देने वाली गंभीरता से बिल्कुल अलग था।

नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए बने मिसाल

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने नाना पाटेकर के अभिनय को एक अलग स्कूल की तरह देखा।

उनके अनुसार नाना की अभिनय शैली में आम आदमी की भाषा दिखाई देती थी। भावनाएं कच्ची, सहज और गहरी लगती थीं, लेकिन वे कृत्रिम या बनावटी नहीं होती थीं।

उनकी आवाज, आंखें, मौन और मानवीय व्यवहार को समझने की क्षमता मिलकर ऐसी अभिनय भाषा बनाती थी, जिसे आसानी से दोहराया नहीं जा सकता।

यही कारण है कि नाना पाटेकर ने केवल फिल्मों में लोकप्रियता हासिल नहीं की, बल्कि कई पीढ़ियों के कलाकारों को प्रभावित किया।

‘नटसम्राट’ में अभिनय की चरम अभिव्यक्ति

नाना पाटेकर की सबसे यादगार भूमिकाओं में ‘नटसम्राट’ के गणपत बेलवलकर का नाम विशेष रूप से लिया जाता है।

यह किरदार उम्र, अकेलेपन, परिवार, सम्मान, स्मृतियों और कलाकार के टूटते हुए संसार की कहानी था।

एक समय मंच का महान अभिनेता रहा व्यक्ति जब जीवन के अंतिम दौर में अपने अस्तित्व और रिश्तों से जूझता है, तो नाना पाटेकर ने उस दर्द को केवल संवादों के माध्यम से नहीं, बल्कि पूरे शरीर और चेहरे से व्यक्त किया।

‘घर चाहिए, घर’ की पुकार में केवल एक बुजुर्ग की जरूरत नहीं थी। उसमें उस कलाकार का अकेलापन था जिसने पूरी जिंदगी दूसरों के सामने किरदार निभाए, लेकिन अंत में अपने लिए एक सुरक्षित जगह खोजने लगा।

यह भूमिका उनकी अभिनय यात्रा के सबसे शक्तिशाली पड़ावों में गिनी जाएगी।

राजनीति और समाज पर भी बेबाक राय

नाना पाटेकर की पहचान केवल अभिनेता के रूप में नहीं थी। वह सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी राय रखने के लिए जाने जाते थे।

वह राजनीतिक नेताओं से बातचीत में भी अपनी बात कहने से नहीं हिचकते थे। उनका यह बेबाक स्वभाव उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा रहा।

समाज को लेकर उनकी चिंता उनके अभिनय में भी दिखाई देती थी।

उनके कई किरदार केवल मनोरंजन के लिए नहीं थे। वे व्यवस्था, गरीबी, हिंसा, अन्याय, राजनीति, रिश्तों और आम आदमी की परेशानियों पर सवाल खड़े करते थे।

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एक कलाकार जिसने लोकप्रियता के साथ खुद को नहीं खोया

भारतीय सिनेमा में लोकप्रियता अक्सर अभिनेता की शैली को दोहराने के लिए मजबूर कर देती है। दर्शक किसी एक अंदाज को पसंद करते हैं और फिर उसी तरह के किरदारों की मांग बढ़ती जाती है।

नाना पाटेकर ने इस खतरे से खुद को काफी हद तक बचाए रखा।

उनके भीतर लोकप्रिय अभिनेता और गंभीर कलाकार दोनों मौजूद थे।

उन्होंने गंभीर फिल्मों में अपनी क्षमता साबित की तो मुख्यधारा के मनोरंजन में भी दर्शकों का दिल जीता।

यही कारण है कि एक ओर ‘परिंदा’, ‘प्रतिघात’, ‘अंकुश’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसी फिल्मों में उनका गंभीर और तीखा रूप दिखाई दिया, वहीं दूसरी ओर ‘वेलकम’ जैसी फिल्म में उनके हास्य और टाइमिंग ने नई पीढ़ी के दर्शकों को भी अपना प्रशंसक बनाया।

नाना पाटेकर की विरासत क्या है?

नाना पाटेकर की विरासत केवल उनकी फिल्मों की संख्या या पुरस्कारों में नहीं है।

उनकी सबसे बड़ी विरासत अभिनय के प्रति वह दृष्टिकोण है जिसमें कलाकार किरदार की सच्चाई को सबसे ऊपर रखता है।

उन्होंने यह दिखाया कि संवाद चिल्लाने से प्रभावशाली नहीं बनता। कभी-कभी धीमी आवाज और लंबी खामोशी ज्यादा कुछ कह सकती है।

उन्होंने यह भी साबित किया कि लोकप्रिय अभिनेता होने के बावजूद गंभीर कला के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखी जा सकती है।

उनका अभिनय बताता है कि किरदार को समझने के लिए उसकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

अंतिम विदाई, लेकिन कला का सफर जारी

नाना पाटेकर के निधन से भारतीय सिनेमा और रंगमंच को निश्चित रूप से बड़ा नुकसान हुआ है। लेकिन किसी महान कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही होती है कि उसके जाने के बाद भी उसका काम नए दर्शकों और कलाकारों को प्रभावित करता रहे।

नाना पाटेकर की फिल्मों को आने वाली पीढ़ियां देखेंगी। उनके संवाद दोहराए जाएंगे। उनके किरदारों पर चर्चा होगी। रंगमंच और अभिनय के विद्यार्थी उनकी शैली को समझने की कोशिश करेंगे।

लेकिन शायद नाना पाटेकर को याद करने का सबसे सही तरीका उनकी नकल करना नहीं, बल्कि उनके उस सिद्धांत को समझना है कि अभिनय में भी सच्चाई होनी चाहिए।

नाना पाटेकर का सफर एक ऐसे कलाकार की कहानी है जिसने रंगमंच से शुरुआत की, संघर्ष देखा, कला को गंभीरता से समझा और फिर हिंदी तथा मराठी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।

‘सिंहासन’ के उस युवा कलाकार से लेकर ‘नटसम्राट’ के टूटते हुए गणपत बेलवलकर तक उनकी यात्रा कई दशकों और अनेक किरदारों से होकर गुजरी।

उन्होंने अभिनय में आवाज का इस्तेमाल किया, लेकिन केवल आवाज पर निर्भर नहीं रहे। उन्होंने गुस्सा दिखाया, लेकिन केवल गुस्से के अभिनेता नहीं बने। उन्होंने लोकप्रियता हासिल की, लेकिन लोकप्रियता को अपनी कला की सीमा नहीं बनने दिया।

आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका अभिनय आने वाले लंबे समय तक जीवित रहेगा।

और शायद उनके पूरे अभिनय दर्शन को एक ही वाक्य में याद किया जा सकता है—“अभिनय में भी वास्तविकता होनी चाहिए।”

यही सच्चाई नाना पाटेकर को सिर्फ एक लोकप्रिय अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय रंगमंच और सिनेमा का एक विशिष्ट और यादगार कलाकार बनाती है।