(ब्यूरो कार्यालय)
देहरादून (साई)। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक तैयारियां तेज करने के संकेत दिए हैं। चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष रहने के बीच पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश संगठन को सक्रिय करने और जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर अभियान तैयार करने पर जोर दे रहा है। इसी क्रम में 2 नवंबर को नई दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने उत्तराखंड के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर आगामी चुनाव की रणनीति पर चर्चा की।
बैठक में प्रदेश के नेताओं को भाजपा सरकार की नीतियों, कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर एक महीने का एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है। पार्टी नेतृत्व का लक्ष्य 2027 में उत्तराखंड की सत्ता में वापसी करना बताया गया है। इसके लिए प्रदेश के नेताओं को एकजुट होकर काम करने और संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने पर जोर दिया गया।
इस राजनीतिक तैयारी के बीच दीपावली के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के उत्तराखंड दौरे की योजना भी चर्चा में है। पार्टी की ओर से इन दौरों की निश्चित तारीख और कार्यक्रम का विस्तृत ब्योरा अभी सामने नहीं आया है। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की नजर केंद्रीय नेताओं के संभावित कार्यक्रमों और आगामी संगठनात्मक फैसलों पर रहेगी।
दिल्ली में हुई कांग्रेस हाईकमान की अहम बैठक
सोमवार, 2 नवंबर को नई दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक हुई। इसमें राहुल गांधी, कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा सहित प्रदेश संगठन के प्रमुख पदाधिकारी शामिल हुए।
बैठक का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की तैयारी की समीक्षा करना और आगे की रणनीति तय करना था। इसमें प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों, संगठन की स्थिति, जनसमस्याओं और चुनावी कार्यक्रमों पर चर्चा की गई।
बैठक में उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह तथा चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत भी शामिल हुए। प्रदेश के सह प्रभारी सुरेंद्र शर्मा और मनोज यादव की मौजूदगी भी बताई गई है।
केंद्रीय नेतृत्व की इस बैठक को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कांग्रेस आगामी चुनाव में केवल सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि संगठनात्मक तैयारी और जनसंपर्क अभियान को भी व्यवस्थित रूप देना चाहती है।
एक महीने का एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश
बैठक में प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को एक महीने का एक्शन प्लान बनाने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है। इस योजना के केंद्र में प्रदेश के स्थानीय और जनहित से जुड़े मुद्दे रहेंगे।
कांग्रेस की रणनीति के अनुसार, पार्टी को ऐसे मुद्दों की पहचान करनी होगी जिनका सीधा संबंध आम नागरिकों के जीवन से है। इनमें रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, महिला सुरक्षा, कानून व्यवस्था और पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन जैसे विषय शामिल हैं।
एक महीने का एक्शन प्लान तैयार होने के बाद पार्टी इन मुद्दों को अलग-अलग जिलों और विधानसभा क्षेत्रों तक ले जाने की तैयारी कर सकती है। इसके लिए जनसभाओं, विरोध प्रदर्शनों, जनसंवाद और स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक बैठकों जैसे कार्यक्रमों का सहारा लिया जा सकता है।
हालांकि, एक्शन प्लान की विस्तृत समय-सारणी और कार्यक्रमों की अंतिम सूची सार्वजनिक होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किस जिले में कौन-सा अभियान चलाया जाएगा।
2027 में सत्ता में वापसी का लक्ष्य
कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश नेताओं के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने का लक्ष्य रखा है। पार्टी नेतृत्व का जोर इस बात पर है कि सभी नेता व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर संगठन के लिए एकजुट होकर काम करें।
उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए यह चुनाव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 70 में से 47 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी, जबकि कांग्रेस को 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। शेष सीटें अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गई थीं। <Cite refs={[“turn254164search0″,”turn254164search1”]}/>
इस चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस के सामने संगठन को मजबूत करने, स्थानीय नेतृत्व के बीच समन्वय बढ़ाने और मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ को विस्तार देने की चुनौती रही है।
2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए पिछले चुनाव के प्रदर्शन से आगे बढ़ने का अवसर होगा। वहीं, भाजपा के सामने अपनी सरकार के कामकाज और पिछले कार्यकाल के आधार पर जनता का विश्वास बनाए रखने की चुनौती रहेगी।
कानून व्यवस्था से लेकर बेरोजगारी तक मुद्दों पर भाजपा को घेरने की तैयारी
प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने बैठक के बाद भाजपा सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले लगभग दस वर्षों में प्रदेश सरकार कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और पलायन जैसे प्रमुख मुद्दों पर विफल रही है।
शैलजा के अनुसार, जनता सरकार की नीतियों से परेशान है और राज्य में परिवर्तन चाहती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस प्रदेश की जनता के अधिकारों और सम्मान की लड़ाई मजबूती से लड़ेगी।
कांग्रेस जिन मुद्दों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी कर रही है, उनमें प्रमुख रूप से ये विषय शामिल हैं:
- कानून व्यवस्था: अपराध नियंत्रण और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सरकार की जवाबदेही।
- महिला सुरक्षा: महिलाओं के खिलाफ अपराध और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल।
- बेरोजगारी: युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और सरकारी भर्ती प्रक्रिया।
- शिक्षा: सरकारी स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता और उच्च शिक्षा की पहुंच।
- स्वास्थ्य: पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में अस्पतालों, डॉक्टरों और चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता।
- पलायन: गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन और स्थानीय रोजगार के अवसर।
- जनहित और विकास: सड़क, पेयजल, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल।
इन मुद्दों को उठाने के साथ कांग्रेस को प्रत्येक क्षेत्र में तथ्य और स्थानीय उदाहरणों के आधार पर अपनी बात रखनी होगी। केवल राजनीतिक आरोपों के बजाय जनता को यह बताना भी जरूरी होगा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए पार्टी के पास क्या प्रस्ताव हैं।
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के दौरे पर निगाहें
कांग्रेस की चुनावी रणनीति में राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पार्टी की योजना के अनुसार, दीपावली के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उत्तराखंड का दौरा कर सकते हैं।
राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। प्रियंका गांधी भी पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव हैं और चुनावी अभियानों तथा जनसभाओं में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं।
दोनों नेताओं के संभावित दौरे से उत्तराखंड में कांग्रेस के जनसंपर्क अभियान को गति देने का प्रयास किया जा सकता है। पार्टी के लिए यह अवसर होगा कि वह राष्ट्रीय नेतृत्व के माध्यम से प्रदेश के मुद्दों को व्यापक राजनीतिक चर्चा में लाए और कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद स्थापित करे।
हालांकि, इन दौरों की तारीख, स्थान और कार्यक्रमों की आधिकारिक घोषणा अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए फिलहाल इन्हें प्रस्तावित राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में केंद्रीय स्तर पर हुई बैठक से यह संकेत जरूर मिला है कि पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व उत्तराखंड चुनाव को लेकर प्रदेश संगठन के साथ नियमित संवाद और रणनीतिक समीक्षा करना चाहता है।
प्रदेश संगठन की भूमिका होगी महत्वपूर्ण
किसी भी विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका के साथ प्रदेश संगठन की सक्रियता भी निर्णायक महत्व रखती है। उत्तराखंड जैसे राज्य में भौगोलिक परिस्थितियां, पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों की अलग-अलग समस्याएं तथा क्षेत्रीय मुद्दे चुनावी रणनीति को प्रभावित करते हैं।
इसलिए कांग्रेस के सामने चुनौती केवल बड़े नेताओं की रैलियां आयोजित करने की नहीं, बल्कि बूथ और विधानसभा स्तर पर संगठन को सक्रिय करने की भी है।
प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और अन्य वरिष्ठ नेताओं को स्थानीय इकाइयों के साथ समन्वय बनाकर काम करना होगा। जिलाध्यक्षों, ब्लॉक अध्यक्षों, मंडल स्तर के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
संगठनात्मक तैयारी के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हो सकते हैं:
- प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का आकलन।
- स्थानीय जनसमस्याओं की सूची तैयार करना।
- पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण।
- युवाओं, महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाना।
- जनहित के मुद्दों पर तथ्य आधारित अभियान चलाना।
- पार्टी के संभावित उम्मीदवारों और चुनाव प्रबंधन से जुड़े विषयों पर समय रहते विचार-विमर्श करना।
यदि एक्शन प्लान को इन स्तरों तक लागू किया जाता है, तो पार्टी के लिए चुनावी तैयारी को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।
कांग्रेस के सामने एकजुटता की चुनौती
उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना भी एक अहम विषय है।
दिल्ली में हुई बैठक में प्रदेश के कई प्रमुख नेताओं की मौजूदगी रही। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत बैठक में शामिल नहीं हुए। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस संबंध में कहा कि बैठक विशेष रूप से प्रदेश पदाधिकारियों और प्रमुख समितियों के अध्यक्षों के लिए बुलाई गई थी। उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत के अनुसार हरीश रावत आगे की बैठकों में शामिल होंगे। <Cite refs={[“turn254164search0″,”turn254164search4”]}/>
इस घटनाक्रम को पार्टी के भीतर किसी विवाद का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन चुनाव से पहले सभी वरिष्ठ नेताओं के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखना कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी सफलता केवल जनसभाओं और नारों पर निर्भर नहीं करती। उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व का तालमेल, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2022 के चुनाव परिणाम से कांग्रेस ने क्या सबक लिया?
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड की 70 सीटों में से भाजपा ने 47 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं। इस परिणाम ने राज्य की राजनीति में भाजपा की स्थिति को मजबूत किया और कांग्रेस को विपक्ष की भूमिका में रहना पड़ा।
कांग्रेस के लिए आगामी चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती पिछले चुनाव के मुकाबले अपने प्रदर्शन में सुधार करना होगा। इसके लिए पार्टी को उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना पड़ सकता है जहां पिछले चुनाव में उसे कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा था।
इसके साथ ही उन क्षेत्रों में भी संगठन को मजबूत करना होगा जहां पार्टी का जनाधार कमजोर रहा है। पहाड़ी जिलों में पलायन, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जबकि मैदानी क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं, औद्योगिक रोजगार, शिक्षा और स्थानीय विकास जैसे विषय राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं।
हालांकि, इन मुद्दों का चुनावी प्रभाव क्षेत्र और मतदाता समूह के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए कांग्रेस को प्रदेशव्यापी रणनीति के साथ विधानसभा स्तर की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा।
राजनीतिक अभियान के साथ जनता के मुद्दों पर जवाब भी जरूरी
चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक रूप से तेज होते हैं। लेकिन मतदाताओं के लिए केवल आरोप सुनना पर्याप्त नहीं होता। वे यह भी जानना चाहते हैं कि राजनीतिक दल उनकी समस्याओं का समाधान किस तरह करेंगे।
कांग्रेस यदि बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य और पलायन को प्रमुख मुद्दा बनाती है, तो उसे इन विषयों पर ठोस नीतिगत विकल्प भी सामने रखने होंगे। इसी तरह, राज्य सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करते समय सरकारी योजनाओं, उपलब्ध आंकड़ों और उनके वास्तविक परिणामों को भी देखना जरूरी होगा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका सरकार से सवाल पूछने और वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करने की होती है। वहीं, सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी अपने कामकाज और फैसलों का जवाब देना है। उत्तराखंड के मतदाताओं के सामने 2027 में दोनों पक्षों के दावों और कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने का अवसर होगा।
आगे की रणनीति पर रहेगी राजनीतिक नजर
दिल्ली में हुई बैठक के बाद अब प्रदेश कांग्रेस की गतिविधियों पर नजर रहेगी। अगले एक महीने में पार्टी किस तरह का कार्यक्रम तैयार करती है, किन मुद्दों को प्राथमिकता देती है और जिला स्तर पर संगठन को कैसे सक्रिय करती है, यह उसकी चुनावी तैयारी की दिशा स्पष्ट करेगा।
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के प्रस्तावित दौरे को लेकर भी कार्यकर्ताओं में उत्सुकता रह सकती है। इन दौरों के कार्यक्रम घोषित होने पर यह स्पष्ट होगा कि पार्टी किन क्षेत्रों और मुद्दों पर विशेष ध्यान देना चाहती है।
इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और चुनावी समितियों की सक्रियता भी महत्वपूर्ण रहेगी। केंद्रीय नेतृत्व की समीक्षा बैठकों का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा, जब उनके निर्देश जमीनी स्तर पर लागू होंगे।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश संगठन को सक्रिय करने और चुनावी रणनीति को व्यवस्थित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। 2 नवंबर को दिल्ली में मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और वरिष्ठ नेताओं की बैठक में प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों, संगठनात्मक तैयारी और जनहित के मुद्दों पर चर्चा हुई।
प्रदेश नेताओं को एक महीने का एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है। वहीं, दीपावली के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के उत्तराखंड दौरे की योजना भी सामने आई है, हालांकि उनकी यात्रा की तारीखों की आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।
अब कांग्रेस के सामने सबसे अहम चुनौती इन तैयारियों को धरातल पर उतारने की है। यदि पार्टी स्थानीय मुद्दों पर प्रभावी संवाद, संगठनात्मक एकजुटता और स्पष्ट नीतिगत विकल्पों के साथ जनता के बीच पहुंचती है, तो उसका चुनावी अभियान अधिक व्यवस्थित हो सकता है। 2027 के चुनाव में मतदाता सरकार के कामकाज और विपक्ष के विकल्पों का आकलन अपने अनुभव और प्राथमिकताओं के आधार पर करेंगे।