दिलीप पुरी की मौत ने फिर पूछे सवाल: गांवों में शराब, सड़कों पर माफिया और दफ्तरों में बैठी व्यवस्था आखिर कर क्या रही है?
(लिमटी खरे)
मध्यप्रदेश में कानून का इकबाल आखिर किसके पास है? सरकार के पास, पुलिस के पास, प्रशासन के पास या फिर उन लोगों के पास, जिनके वाहन के पहियों के सामने अब वर्दी भी सुरक्षित नहीं दिखाई देती? देवास जिले के खातेगांव में थाना प्रभारी दिलीप पुरी की मौत ने प्रदेश की व्यवस्था के सामने यही असहज सवाल खड़ा कर दिया है।
अवैध शराब की तस्करी रोकने पहुंचे थाना प्रभारी को शराब से भरे वाहन ने कुचल दिया। पुलिस टीम संदिग्ध वाहन को रोकने पहुंची थी। आरोप है कि चालक ने वाहन रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ा दिया, जिसकी चपेट में आकर दिलीप पुरी गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनका निधन हो गया। वाहन से बड़ी मात्रा में अवैध शराब बरामद होने की जानकारी भी सामने आई।
यह महज एक सड़क हादसे की खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें कानून लागू कराने की जिम्मेदारी निभाने वाला अधिकारी ही अपनी जान गंवा बैठता है। सवाल यह नहीं कि वाहन चालक ने पुलिस को देखकर गाड़ी क्यों नहीं रोकी। बड़ा सवाल यह है कि आखिर अवैध कारोबार करने वालों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो गए कि उन्हें पुलिस की वर्दी, कानून और कार्रवाई का भय तक नहीं रह गया?
वर्दी की कीमत जान देकर चुकानी पड़े, तो व्यवस्था किसके लिए है?
दिलीप पुरी अपनी ड्यूटी कर रहे थे। वे किसी निजी विवाद में नहीं उलझे थे, बल्कि अवैध शराब की तस्करी रोकने के लिए पुलिस टीम के साथ मैदान में थे। कर्तव्य निभाते हुए किसी पुलिस अधिकारी की मौत उसके परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। पुलिस महकमे के लिए यह गंभीर आघात है और आम नागरिकों के लिए चिंता का विषय।
लेकिन घटना के बाद सवाल उठाना भी जरूरी है। क्या श्रद्धांजलि, पुष्पचक्र, शोक संदेश और मुआवजे की घोषणा से व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? क्या हर बड़ी घटना के बाद जांच के आदेश जारी करना ही सुशासन का प्रमाणपत्र बन गया है?
सरकारी तंत्र में एक पुरानी पटकथा बार-बार दोहराई जाती दिखाई देती है। कोई बड़ी घटना होती है, अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं, जांच के आदेश जारी होते हैं, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, मुआवजे की घोषणा होती है और फिर धीरे-धीरे मामला फाइलों के बीच अपनी गति से चलने लगता है। जनता सवाल पूछती रहती है और व्यवस्था जवाब देने के लिए अगली घटना का इंतजार करती दिखाई देती है।
दिलीप पुरी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनकी मौत से जुड़े पूरे अवैध कारोबार की निष्पक्ष जांच हो। शराब कहां से आई? किसने भरी? किसके माध्यम से भेजी जा रही थी? वाहन किसके नाम पर था? इस कारोबार के पीछे कौन लोग हैं? क्या पहले भी इस क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों की शिकायतें मिली थीं? इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।
यदि कार्रवाई केवल वाहन चालक तक सीमित रह गई, तो असली कारोबारियों तक पहुंचने का रास्ता फिर अधूरा रह जाएगा।
गांव-गांव शराब, फिर नशे पर प्रहार के दावे किसके लिए?
मध्यप्रदेश के अनेक क्षेत्रों में अवैध शराब और नशीले पदार्थों की बिक्री को लेकर समय-समय पर शिकायतें उठती रही हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थानीय नागरिकों की ओर से यह सवाल भी सामने आता है कि जब किसी स्थान पर शराब की बिक्री खुलेआम होने की बात कही जाती है, तो जिम्मेदार विभागों को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिलती?
नशे के खिलाफ अभियान चलाना निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन अभियान की सफलता पोस्टर, नारे, रैलियों और प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब किसी गांव का नागरिक शिकायत लेकर थाने या प्रशासन के पास पहुंचता है।
क्या शिकायत पर तत्काल कार्रवाई होती है? क्या शराब बेचने वाले व्यक्ति के साथ-साथ उसके सप्लाई नेटवर्क की जांच होती है? क्या बार-बार शिकायत मिलने वाले स्थानों पर निगरानी बढ़ाई जाती है? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जाता है?
यदि नशे पर प्रहार केवल सरकारी मंचों पर दिखाई दे और गांव की गली में अवैध कारोबार अपनी जगह बनाए रखे, तो इसे अभियान की सफलता कैसे कहा जा सकता है?
आखिर आम नागरिक पूछे भी तो किससे? जिस शराब की अवैध बिक्री पर कानून कार्रवाई का दावा करता है, वही शराब यदि उसके आसपास उपलब्ध हो तो यह जिम्मेदारी किसकी बनती है? पुलिस की, आबकारी विभाग की, स्थानीय प्रशासन की या उन सभी की, जिनके पास कार्रवाई करने का अधिकार और जिम्मेदारी है?
सरकार को यह बताना चाहिए कि नशे के खिलाफ अभियान का वास्तविक परिणाम क्या है। कितने अवैध कारोबारियों पर कार्रवाई हुई? कितने सप्लाई नेटवर्क तोड़े गए? कितनी बार स्थानीय शिकायतों की जांच हुई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या कार्रवाई के बाद संबंधित क्षेत्रों में अवैध बिक्री वास्तव में बंद हुई?
खनिज माफिया हो या शराब माफिया, कानून से बड़ा कौन?
मध्यप्रदेश में अवैध खनन, अवैध परिवहन और शराब तस्करी को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन जनता की चिंता एक ही है—कानून तोड़ने वाले नेटवर्क को इतनी जगह और ताकत कैसे मिल जाती है?
खनिज के अवैध उत्खनन और परिवहन में सवाल उठते हैं कि मशीनें कहां चलती हैं, वाहन किस रास्ते से निकलते हैं, जांच चौकियों की निगरानी कैसी है और शिकायतों के बावजूद कारोबार कैसे जारी रहता है। शराब के अवैध कारोबार में भी इसी तरह की पड़ताल जरूरी है।
माफिया शब्द बोल देना आसान है, लेकिन उसके पूरे नेटवर्क तक पहुंचना कठिन। किसी अवैध कारोबार के पीछे केवल एक चालक या एक विक्रेता नहीं होता। उसके पीछे आपूर्ति करने वाले, परिवहन की व्यवस्था करने वाले, भंडारण करने वाले और आर्थिक लाभ उठाने वाले लोगों की श्रृंखला हो सकती है।
इसलिए कार्रवाई का लक्ष्य केवल पकड़े गए वाहन या मौके पर मिले व्यक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए। आर्थिक लेनदेन, सप्लाई चेन, गोदाम, वाहन और संबंधित लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। यदि किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत सामने आती है, तो उसके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि किसी अवैध कारोबार की ताकत केवल उसके संचालक में नहीं होती। कई बार उसकी ताकत उस चुप्पी में भी होती है, जो शिकायतों के बावजूद बनी रहती है।
शासन की जिम्मेदारी केवल मुआवजे की घोषणा तक सीमित नहीं
किसी पुलिसकर्मी की ड्यूटी के दौरान मौत होने पर उसके परिवार को आर्थिक सहायता और सम्मानजनक सहयोग देना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन क्या सरकार की जिम्मेदारी यहीं समाप्त हो जाती है?
सरकार को यह भी बताना होगा कि पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है। जोखिम भरे अभियानों में पुलिस टीमों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं या नहीं? अवैध शराब और खनिज कारोबार के खिलाफ पुलिस, आबकारी, खनिज और जिला प्रशासन के बीच समन्वय कितना प्रभावी है? जिन क्षेत्रों से लगातार शिकायतें आती हैं, वहां विशेष निगरानी क्यों नहीं की जाती?
किसी अधिकारी की मौत के बाद केवल घटना की जांच नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों की भी जांच होनी चाहिए जिनमें ऐसा अपराध संभव हुआ। क्या पुलिस टीम को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण मिले थे? क्या अभियान की योजना और वाहन रोकने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार थी? क्या किसी स्तर पर लापरवाही हुई?
इन सवालों का जवाब जांच के निष्कर्षों से ही मिलना चाहिए। लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच समयबद्ध, निष्पक्ष और परिणाम देने वाली हो।
अन्यथा जनता का सवाल स्वाभाविक होगा—जब कानून लागू कराने वाला ही सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करे?
प्रशासनिक निकम्मेपन का प्रमाण शिकायतों का बेअसर रहना है
प्रशासन की कार्यक्षमता का मूल्यांकन केवल बैठकों, निरीक्षणों और आंकड़ों से नहीं होता। असली मूल्यांकन इस बात से होता है कि आम नागरिक की शिकायत पर कितना प्रभावी कदम उठाया गया।
यदि किसी क्षेत्र में अवैध शराब की बिक्री की शिकायतें लगातार मिलती हैं, यदि अवैध खनन के वाहन चलने की बात सामने आती है और यदि स्थानीय नागरिकों की सूचना के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो संबंधित विभागों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
हर बार यह कह देना कि जांच जारी है, पर्याप्त नहीं है। जनता जानना चाहती है कि जांच में क्या सामने आया? कितने लोगों से पूछताछ हुई? कितनी सामग्री जब्त की गई? किन नेटवर्कों की पहचान हुई? क्या किसी विभागीय अधिकारी की भूमिका सामने आई?
कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, आबकारी अधिकारी और खनिज विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों का दायित्व केवल अपने कार्यालयों में बैठकर समीक्षा करना नहीं है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिकायतों पर जमीन पर कार्रवाई हो।
यदि किसी क्षेत्र में बार-बार एक ही तरह की शिकायतें आती हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निगरानी व्यवस्था में कमी कहां है। जनता को केवल कार्रवाई का दावा नहीं, उसका परिणाम चाहिए।
विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल चुनाव के समय सरकार को चुनौती देना नहीं है। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, जनता की शिकायतों को सदन और सड़क तक पहुंचाना तथा प्रशासन को जवाब देने के लिए मजबूर करना भी है।
दिलीप पुरी की मौत के बाद कांग्रेस नेताओं ने कानून व्यवस्था और अवैध शराब के कारोबार को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी घटना को लेकर सरकार को घेरा और अवैध शराब के नेटवर्क की जांच की मांग उठाई है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि विपक्ष ने बिल्कुल आवाज नहीं उठाई।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल घटना के बाद बयान जारी कर देना पर्याप्त है?
क्या विपक्ष ने अवैध शराब और खनिज कारोबार जैसे मुद्दों पर लगातार निगरानी की व्यवस्था बनाई है? क्या विधानसभा में ठोस सवालों के माध्यम से विभागीय जवाबदेही तय कराने की कोशिश की जाती है? क्या जिला स्तर पर नागरिकों की शिकायतों को इकट्ठा कर नियमित रूप से सरकार के सामने रखा जाता है? क्या कांग्रेस ने जनता को यह बताया है कि सत्ता में आने पर ऐसे नेटवर्क को तोड़ने के लिए उसकी ठोस नीति क्या होगी?
सरकार की विफलता बताना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन बेहतर विकल्प देना भी उसकी जिम्मेदारी है। जनता को ऐसा विपक्ष चाहिए जो केवल माइक पर गरजे नहीं, बल्कि सवालों को तब तक उठाए जब तक जवाब न मिल जाए।
सिर्फ सरकार की आलोचना करने से शासन नहीं सुधरता। उसके लिए लगातार निगरानी, तथ्य, जनदबाव और स्पष्ट विकल्प भी चाहिए।
सत्ता पक्ष की उपलब्धियां और विपक्ष के आरोप, जनता की सुरक्षा कहां?
प्रदेश की राजनीति में अक्सर सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाता है और विपक्ष सरकार की कमियां बताता है। एक पक्ष विकास की तस्वीर दिखाता है, दूसरा बदहाली की कहानी सुनाता है। एक पक्ष कानून व्यवस्था बेहतर होने का दावा करता है, दूसरा अपराध और माफिया के बढ़ते प्रभाव की बात करता है।
लेकिन देवास की घटना इन दोनों से सीधा सवाल पूछती है—क्या आम नागरिक और कानून लागू कराने वाले कर्मचारी वास्तव में सुरक्षित हैं?
जनता को भाषणों की प्रतियोगिता नहीं चाहिए। उसे यह जानना है कि अवैध शराब की सप्लाई कौन कर रहा है, अवैध खनन के वाहन किसकी निगरानी में निकलते हैं और शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती। उसे यह भी जानना है कि जोखिम भरे अभियान में पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है।
राजनीति में आरोप लगाना आसान है, जवाबदेही स्वीकार करना कठिन। लेकिन लोकतंत्र में दोनों जरूरी हैं। सरकार से जवाब मांगना विपक्ष का कर्तव्य है और विपक्ष से बेहतर विकल्प मांगना जनता का अधिकार।
अब रस्म अदायगी नहीं, जवाबदेही का समय है
दिलीप पुरी की मौत के बाद कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब जनता के सामने आने चाहिए:
- अवैध शराब से भरे वाहन का स्रोत क्या था और उसे कहां पहुंचाया जा रहा था?
- इस कारोबार में शामिल लोगों की पूरी श्रृंखला की पहचान हुई या नहीं?
- क्या इस क्षेत्र में पहले भी अवैध शराब की बिक्री और परिवहन की शिकायतें मिली थीं?
- उन शिकायतों पर पुलिस और आबकारी विभाग ने क्या कार्रवाई की?
- क्या संबंधित विभागों के बीच सूचना साझा करने और संयुक्त कार्रवाई की प्रभावी व्यवस्था थी?
- पुलिस टीम के पास इस तरह के जोखिम भरे अभियान के लिए पर्याप्त सुरक्षा संसाधन थे?
- यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी?
इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि जनता के हित में जरूरी हैं।
श्रद्धांजलि का अर्थ व्यवस्था बदलने की इच्छाशक्ति हो
दिलीप पुरी अब वापस नहीं लौटेंगे। उनके परिवार का दुख किसी मुआवजे से समाप्त नहीं हो सकता। पुलिस महकमे ने एक अधिकारी खोया है, लेकिन प्रदेश ने उससे भी बड़ा सवाल अपने सामने पाया है—क्या कानून का भय अपराधियों में बचा है?
यदि कोई वाहन चालक पुलिस अधिकारी को कुचलकर भागने की हिम्मत करता है, तो यह पूरे अवैध कारोबार के नेटवर्क और उसके संचालन की परिस्थितियों की गहन जांच की मांग करता है। यह भी देखना होगा कि कानून को चुनौती देने का साहस किन कारणों से पैदा हुआ।
अब सरकार को प्रेस विज्ञप्तियों से आगे बढ़कर परिणाम दिखाने होंगे। प्रशासन को शिकायतों पर कार्रवाई का हिसाब देना होगा। पुलिस को अवैध कारोबार के नेटवर्क तक पहुंचना होगा। विपक्ष को भी अपनी आवाज को मौसमी बयानबाजी से निकालकर लगातार जनहित की निगरानी में बदलना होगा।
और जनता को भी यह याद रखना होगा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना कोई एहसान नहीं, अधिकार है।
क्योंकि जिस प्रदेश में अवैध कारोबार का पहिया कानून की वर्दी को कुचलने लगे, वहां सबसे पहले व्यवस्था को अपना आईना देखना चाहिए। दिलीप पुरी को श्रद्धांजलि केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को जवाबदेह बनाकर दी जा सकती है, जिसमें अगला पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी निभाते हुए असुरक्षित न हो।
(साई फीचर्स)