(ब्यूरो कार्यालय)
भोपाल (साई)। मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीद को लेकर सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों ने सरकारी धन के इस्तेमाल, खरीद प्रक्रिया की निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। एक ओर नगरीय प्रशासन विभाग के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय दुबे का वीडियो चर्चा में है, जिसमें वे विभिन्न नगरीय निकायों द्वारा खरीदी गई वस्तुओं की कीमतों में भारी अंतर का उल्लेख करते दिखाई देते हैं। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने इस पूरे मामले को सूचना के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही के नजरिए से उठाया है।
राहुल सिंह का मूल सवाल यह है कि यदि सरकारी खरीद में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कानून और व्यवस्थाएं पहले से मौजूद थीं, तो संदिग्ध मूल्य-अंतर सामने आने से पहले निगरानी कितनी प्रभावी थी? उनका कहना है कि केवल किसी बैठक में आंकड़े प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि खरीद के दस्तावेजों की जांच हो, जिम्मेदारी निर्धारित की जाए और अनियमितता प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
22 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित समाचारों के अनुसार, प्रदेश के 374 नगरीय निकायों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से तीन वर्षों में लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद का विश्लेषण किया गया। इस विश्लेषण में कुछ वस्तुओं की खरीद दरों में असाधारण अंतर सामने आने का दावा किया गया। हालांकि, कीमतों में अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं है; इसके लिए संबंधित खरीद के दस्तावेजों और परिस्थितियों की जांच आवश्यक है।
संजय दुबे का वीडियो क्यों बना चर्चा का विषय?
मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग की एक बैठक से संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। इसमें वरिष्ठ अधिकारी संजय दुबे अधिकारियों को सरकारी खरीद की दरों और उनके बीच पाए गए अंतर के बारे में बताते दिखाई देते हैं।
प्रस्तुति में मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम के अतिरिक्त प्रबंध निदेशक अंशुमन राज द्वारा किए गए खरीद विश्लेषण के आंकड़ों का उल्लेख किया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, इस विश्लेषण का उद्देश्य अलग-अलग नगरीय निकायों में समान या मिलती-जुलती वस्तुओं की खरीद दरों की तुलना करना और संभावित विसंगतियों की पहचान करना था।
इस मामले ने इसलिए ध्यान खींचा, क्योंकि चर्चा में आई वस्तुएं रोजमर्रा के नगर निकाय कार्यों से जुड़ी हैं। इनमें फिनोलिक डिसइन्फेक्टेंट, एलईडी लाइटें और कचरा उठाने वाले वाहन जैसी चीजें शामिल हैं।
नगरीय निकाय सफाई, प्रकाश व्यवस्था, कचरा प्रबंधन और अन्य स्थानीय सेवाओं के लिए सरकारी धन खर्च करते हैं। इन सेवाओं की खरीद में कीमत, गुणवत्ता, जरूरत और उपयोगिता का उचित संतुलन जरूरी होता है। यदि समान वस्तुओं की खरीद दरों में बहुत अधिक अंतर दिखाई देता है, तो उसकी वजह स्पष्ट करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।
फिनाइल की कीमत 33,500 रुपये तक पहुंचने का मामला
इस पूरे विवाद में सबसे अधिक चर्चा फिनोलिक डिसइन्फेक्टेंट की खरीद दरों को लेकर हुई है। समाचार रिपोर्टों में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, एक नगरीय निकाय में एक लीटर के पैक की कीमत 5 रुपये बताई गई, जबकि दूसरी जगह इसी तरह के उत्पाद के लिए 33,500 रुपये की दर दर्ज होने का उल्लेख किया गया।
यह अंतर पहली नजर में गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, इन दोनों दरों की निष्पक्ष तुलना के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि उत्पाद का प्रकार, पैक का आकार, मात्रा, इकाई, कर, आपूर्ति की शर्तें और खरीद का विवरण वास्तव में तुलनीय हैं।
विशेष रूप से सरकारी खरीद में किसी वस्तु की कीमत को समझने के लिए केवल एक आंकड़ा पर्याप्त नहीं होता। खरीद आदेश, निविदा, आपूर्तिकर्ता का विवरण, बिल, भुगतान रिकॉर्ड और वास्तविक आपूर्ति का सत्यापन भी जरूरी है।
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि समान वस्तु के लिए अनुचित रूप से अधिक भुगतान किया गया, तो यह पता लगाना होगा कि निर्णय किस स्तर पर लिया गया, दर को किसने मंजूरी दी और खरीद की निगरानी किस अधिकारी के पास थी।
राहुल सिंह की आपत्ति का प्रमुख बिंदु भी यही है कि सरकारी खरीद में ऐसी विसंगतियों की पहचान केवल बाद में प्रस्तुति के माध्यम से नहीं होनी चाहिए। पारदर्शिता की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि नागरिक और निगरानी तंत्र समय रहते खरीद की जानकारी देख सकें।
60 वॉट की एलईडी लाइट की खरीद पर भी सवाल
प्रस्तुति में 60 वॉट की एलईडी लाइटों की खरीद का उदाहरण भी सामने आया। समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, एक स्थान पर ऐसी लाइट की खरीद दर 306 रुपये बताई गई, जबकि भोपाल में एक खरीद में 11,800 रुपये प्रति लाइट का आंकड़ा दर्ज होने का उल्लेख किया गया।
इन दरों के बीच अंतर को देखते हुए कई सवाल उठते हैं। क्या दोनों जगह समान तकनीकी विशेषताओं वाली लाइटें खरीदी गई थीं? क्या कीमत में स्थापना, अतिरिक्त उपकरण, वारंटी या अन्य सेवाएं शामिल थीं? क्या खरीद की मात्रा और शर्तें एक जैसी थीं?
इन प्रश्नों का उत्तर दस्तावेजों की जांच से ही मिल सकता है। लेकिन यदि खरीद रिकॉर्ड में दर्ज वस्तुएं वास्तव में समान थीं और कीमतों के अंतर का कोई उचित आधार नहीं था, तो संबंधित निकायों से स्पष्टीकरण मांगना और स्वतंत्र जांच करना आवश्यक होगा।
सरकारी खरीद में तकनीकी विनिर्देशों का स्पष्ट होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अलग-अलग उत्पादों को केवल नाम या वॉट के आधार पर समान नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, तकनीकी अंतर का हवाला देकर हर बड़े मूल्य-अंतर को उचित भी नहीं ठहराया जा सकता। प्रत्येक मामले का प्रमाण आधारित परीक्षण होना चाहिए।
1,134 करोड़ रुपये की खरीद और 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत
इस प्रकरण का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू सरकारी खरीद का कुल आकार है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 374 नगरीय निकायों द्वारा तीन वर्षों में GeM पोर्टल के माध्यम से लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की गई। प्रस्तुत विश्लेषण में यह अनुमान भी सामने आया कि यदि खरीद अधिक उपयुक्त औसत दरों पर की जाती, तो करीब 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत हो सकती थी।
यह आंकड़ा सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग पर विचार करने का अवसर देता है। हालांकि, 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत को वास्तविक नुकसान, सिद्ध घोटाले या वसूल की गई राशि के बराबर नहीं माना जा सकता। यह विश्लेषण पर आधारित अनुमान है, जिसकी पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही संभव होगी।
इस अंतर को समझना जरूरी है। संभावित बचत का अनुमान बताता है कि खरीद की कीमतों की समीक्षा से सरकारी खर्च कम करने की गुंजाइश हो सकती है। लेकिन किसी विशेष खरीद में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, यह निर्धारित करने के लिए उस खरीद के तथ्य, दस्तावेज और लागू नियम देखने होंगे।
यदि प्रशासन इस विश्लेषण को व्यवस्थित कार्रवाई में बदलता है, तो इससे भविष्य में खरीद की गुणवत्ता और लागत दोनों पर बेहतर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।
राहुल सिंह ने क्यों उठाया जवाबदेही का सवाल?
पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने इस प्रकरण को केवल खरीद दरों की विसंगति के रूप में नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता के व्यापक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया है।
उनका तर्क है कि सरकारी कामकाज की सूचनाएं सार्वजनिक करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में पहले से प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी खरीद से संबंधित जानकारी समय पर सार्वजनिक क्यों नहीं हुई और क्या नागरिकों को खरीद की प्रक्रिया की निगरानी करने का पर्याप्त अवसर मिला?
राहुल सिंह ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि सूचना आयुक्त के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने नगरीय निकायों को खरीद और जनता को प्रभावित करने वाले कामकाज की जानकारी स्वप्रेरणा से वेबसाइटों पर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। उनके अनुसार, ऐसे निर्देशों पर प्रभावी अमल सुनिश्चित करना भी जरूरी था।
यहां दो अलग-अलग पहलुओं को समझना आवश्यक है। पहला, खरीद की कीमतों में सामने आए अंतर की तथ्यात्मक जांच। दूसरा, खरीद से संबंधित सूचनाओं को सार्वजनिक करने और प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था का मूल्यांकन। दोनों जुड़े हुए हैं, लेकिन दोनों की जांच के तरीके अलग हो सकते हैं।
RTI अधिनियम की धारा 4 क्या कहती है?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4 सार्वजनिक प्राधिकरणों पर कुछ महत्वपूर्ण सूचनाओं को व्यवस्थित रूप से प्रकाशित करने और पारदर्शिता बढ़ाने की जिम्मेदारी निर्धारित करती है।
धारा 4(1)(b) में सार्वजनिक प्राधिकरणों से संबंधित विभिन्न जानकारियों के प्रकाशन का प्रावधान है। वहीं, धारा 4(2) के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकरणों को प्रयास करना चाहिए कि वे अधिक से अधिक जानकारी नियमित अंतराल पर स्वतः जनता के सामने रखें, ताकि नागरिकों को हर छोटी-बड़ी सूचना के लिए अलग से आवेदन करने की जरूरत कम हो।
सरकारी खरीद के मामले में स्वप्रेरित सूचना सार्वजनिक करने की व्यवस्था विशेष महत्व रखती है। निविदाओं, खरीद की शर्तों, चयनित आपूर्तिकर्ताओं और अनुबंधों से संबंधित लागू नियमों के अनुसार सार्वजनिक की जाने वाली जानकारी नागरिकों को सरकारी खर्च समझने में मदद करती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल कानून का औपचारिक पालन नहीं है। इसका व्यावहारिक लाभ यह है कि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़े, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन मिले और अनियमितताओं की पहचान समय रहते हो सके।
हालांकि, धारा 4 का मतलब यह नहीं है कि हर प्रकार की सूचना बिना किसी अपवाद के सार्वजनिक करनी ही होगी। कानून के अंतर्गत लागू अपवादों और अन्य प्रासंगिक नियमों का भी ध्यान रखना पड़ता है।
क्या केवल प्रस्तुति देना पर्याप्त है?
राहुल सिंह के वक्तव्य का केंद्रीय संदेश यही है कि सरकारी खरीद में सामने आई विसंगतियों को केवल प्रस्तुति या सार्वजनिक बयान तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
प्रस्तुति किसी समस्या की पहचान करने का पहला कदम हो सकती है। लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आगे की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसमें कुछ बुनियादी कदम शामिल हो सकते हैं:
- संबंधित खरीद आदेशों, निविदाओं और बिलों का सत्यापन।
- उत्पाद की तकनीकी विशेषताओं और वास्तविक आपूर्ति की जांच।
- कीमतों के अंतर के पीछे मौजूद कारणों का दस्तावेजी परीक्षण।
- खरीद को मंजूरी देने वाले अधिकारियों और संबंधित प्रक्रियाओं की समीक्षा।
- नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर नियमानुसार विभागीय या कानूनी कार्रवाई।
- जांच के निष्कर्ष और की गई कार्रवाई की जानकारी लागू नियमों के अनुसार सार्वजनिक करना।
इन कदमों से यह निर्धारित किया जा सकता है कि मूल्य-अंतर के पीछे तकनीकी कारण थे, खरीद प्रक्रिया की कमियां थीं या किसी प्रकार की अनियमितता हुई थी।
किसी अधिकारी या आपूर्तिकर्ता को केवल प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन गंभीर विसंगतियों को बिना जांच के छोड़ देना भी सार्वजनिक जवाबदेही की भावना के अनुरूप नहीं होगा।
प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी बनती है?
सरकारी खरीद की प्रक्रिया में आमतौर पर कई स्तर शामिल होते हैं। इनमें आवश्यकता तय करना, तकनीकी विनिर्देश बनाना, खरीद प्रक्रिया पूरी करना, दरों का मूल्यांकन, आदेश जारी करना, सामान प्राप्त करना और भुगतान करना शामिल हो सकते हैं।
इसलिए किसी खरीद में असामान्य दर सामने आने पर यह देखना जरूरी होता है कि संबंधित चरणों पर किस अधिकारी या इकाई की क्या भूमिका थी। केवल विभाग के प्रमुख या खरीद आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले किसी एक व्यक्ति को स्वतः जिम्मेदार मान लेना उचित नहीं है।
साथ ही, विभागीय नेतृत्व की जिम्मेदारी खरीद व्यवस्था की निगरानी, आंतरिक नियंत्रण और शिकायतों पर कार्रवाई के संदर्भ में महत्वपूर्ण होती है।
संजय दुबे का वीडियो सरकारी खरीद में सामने आए मूल्य-अंतर पर प्रशासनिक ध्यान को दर्शाता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि सभी संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हो चुकी है या किसी विशेष व्यक्ति की जिम्मेदारी कानूनी रूप से स्थापित हो गई है।
यही वह बिंदु है जहां राहुल सिंह का जवाबदेही संबंधी सवाल प्रासंगिक हो जाता है: आंकड़ों के सार्वजनिक होने के बाद जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और उसके निष्कर्ष किस प्रकार सामने आते हैं?
जनता और स्थानीय निकायों पर क्या असर पड़ता है?
नगर निकायों का बजट सीधे नागरिकों की स्थानीय सुविधाओं से जुड़ा होता है। सफाई, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था और अन्य नागरिक सेवाओं के लिए उपलब्ध धन का उपयोग कितना प्रभावी ढंग से होता है, इसका असर स्थानीय जीवन पर पड़ सकता है।
यदि खरीद में अनावश्यक खर्च होता है, तो सीमित बजट में दूसरी आवश्यक सेवाओं के लिए उपलब्ध संसाधन प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, उचित दरों पर गुणवत्तापूर्ण सामान खरीदने से नगर निकाय अपने संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग कर सकते हैं।
इसलिए नागरिकों की अपेक्षा केवल यह नहीं होनी चाहिए कि अधिकारी अनियमितताओं का खुलासा करें। यह भी जरूरी है कि खरीद की प्रक्रिया स्पष्ट हो, शिकायतों पर सुनवाई हो और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल का हिसाब उपलब्ध हो।
सूचना का अधिकार नागरिकों को इसी निगरानी प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देता है। धारा 4 के अंतर्गत लागू स्वप्रेरित प्रकटीकरण से संबंधित सूचनाएं नियमित रूप से उपलब्ध हों, तो नागरिकों, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के लिए सरकारी खरीद का परीक्षण करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
आगे क्या होना चाहिए?
इस मामले में आगे की दिशा संबंधित खरीद के रिकॉर्ड की जांच, विभागीय समीक्षा और निष्कर्षों के आधार पर कार्रवाई से तय होगी।
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि जिन खरीद दरों की तुलना की गई है, वे किन वस्तुओं, किन इकाइयों और किन शर्तों से संबंधित हैं। इसके बाद संबंधित निकायों से स्पष्टीकरण लेकर खरीद प्रक्रिया की समीक्षा की जा सकती है।
यदि जांच में नियमों के उल्लंघन या अन्य अनियमितताओं के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। जहां कानूनी कार्रवाई आवश्यक हो, वहां संबंधित एजेंसी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
साथ ही, भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए खरीद के आंकड़ों का नियमित विश्लेषण, तुलनीय वस्तुओं की दरों की समीक्षा और आवश्यक सूचनाओं का समय पर प्रकाशन उपयोगी हो सकता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि जांच की प्रगति और उसके निष्कर्षों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी दी जाए। इससे एक ओर निराधार आरोपों से बचा जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर वास्तविक अनियमितता पाए जाने पर जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
भ्रष्टाचार का खुलासा जरूरी, लेकिन जवाबदेही और कार्रवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण
मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीद की दरों में सामने आए भारी अंतर ने पारदर्शिता और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। संजय दुबे के वीडियो में प्रस्तुत आंकड़े इस विषय पर प्रशासनिक ध्यान को दर्शाते हैं, जबकि पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने सवाल उठाया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 के तहत पारदर्शिता सुनिश्चित करने की व्यवस्था का कितना प्रभावी उपयोग हुआ।
इस प्रकरण में सबसे जरूरी है कि आंकड़ों की निष्पक्ष जांच हो, कीमतों के अंतर के कारण स्पष्ट किए जाएं और जहां अनियमितता प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही, सरकारी खरीद से जुड़ी आवश्यक सूचनाओं को समय पर सार्वजनिक करने की व्यवस्था प्रभावी बनाई जाए।
जनता के हित में वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि किसी बैठक में अनियमितताओं की पहचान हुई, बल्कि यह है कि उसके बाद जांच, सुधार और जवाबदेही की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही। यही सरकारी पारदर्शिता को मजबूत करने और सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।