एक कचौरी, दो समोसा ने दिलाई ‘दस की कच्ची, दो का खारा’ की याद, सिवनी के 37 साल पुराने चुनाव की कहानी फिर चर्चा में

दिल्ली में इन दिनों महिला सुरक्षा और महिलाओं की स्वतंत्रता से जुड़े प्रदर्शनों में एक तुकबंदी वाला नारा चर्चा में है—‘एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा।’ दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े प्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर इस नारे के वीडियो तथा पोस्ट चर्चा में आए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इन प्रदर्शनों में महिला सुरक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की स्वतंत्रता और यौन हिंसा जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं।

नारा भले ही आज का हो, लेकिन इसकी तुकबंदी ने सिवनी के राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय फिर याद करा दिया है, जब महज कुछ शब्दों की एक पंक्ति चुनावी माहौल में चर्चा का केंद्र बन गई थी।

करीब 37 साल पहले, 1989 में सिवनी लोकसभा चुनाव के दौरान ‘दस की कच्ची, दो का खारा’ जैसी पंक्ति राजनीतिक बातचीत और चुनावी माहौल में चर्चित हुई थी। उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गार्गी शंकर मिश्रा सिवनी से चुनाव मैदान में थे और उनके सामने युवा प्रहलाद सिंह पटेल ने चुनौती पेश की थी।

नतीजा आया तो सिवनी की राजनीति में बड़ा उलटफेर दर्ज हुआ।

जब सिवनी में गार्गी शंकर मिश्रा का था प्रभाव

सिवनी की राजनीति में गार्गी शंकर मिश्रा का नाम लंबे समय तक प्रभावशाली नेताओं में लिया जाता रहा। उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार वे सिवनी से लोकसभा के सदस्य रहे और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारियां संभालीं। संसद के रिकॉर्ड में 1983 और 1984 के दौरान उन्हें पेट्रोलियम विभाग के राज्य मंत्री के रूप में दर्ज किया गया है।

1984 के लोकसभा चुनाव में मिश्रा ने सिवनी सीट से 1,90,241 वोट हासिल किए थे और उनका वोट शेयर 54.44 प्रतिशत था। उस चुनाव में वे भाजपा के महेश प्रसाद से काफी अंतर से आगे रहे थे।

ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में 1989 का चुनाव सामान्य चुनाव नहीं माना जा सकता था। एक ओर कांग्रेस का पुराना प्रभाव था तो दूसरी ओर विपक्षी राजनीति में नए समीकरण बन रहे थे।

1989 में बदल रहा था सिवनी का राजनीतिक समीकरण

1989 का चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक बदलावों का दौर था। सिवनी में भी भाजपा और जनता दल के बीच सीट को लेकर समझौते की चर्चा ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया।

इसी दौरान युवा प्रहलाद सिंह पटेल का नाम सामने आया। चुनावी इतिहास के अनुसार पटेल ने इसी चुनाव के माध्यम से पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया। बाद में वे राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दिए।

आपके दिए घटनाक्रम के अनुसार उस समय सिवनी में भाजपा संगठन ने पहले प्रहलाद सिंह पटेल को प्रत्याशी बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी। बाद में सीट जनता दल के हिस्से में जाने और मदन तिवारी को प्रत्याशी बनाए जाने की स्थिति बनी।

इस बदलाव ने स्थानीय स्तर पर राजनीतिक असंतोष को जन्म दिया। पटेल ने नामांकन वापस नहीं लिया और चुनाव मैदान में बने रहे। चुनावी रिकॉर्ड में उन्हें भाजपा प्रत्याशी के रूप में दर्ज किया गया है और उन्होंने कांग्रेस के गार्गी शंकर मिश्रा को पराजित किया।

‘दस की कच्ची, दो का खारा’ कैसे बनी चुनावी चर्चा?

यहीं से उस दौर की चुनावी भाषा का वह हिस्सा आता है जिसकी याद आज की ‘कचौरी-समोसा’ तुकबंदी ने फिर ताजा कर दी है।

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आपके दिए संस्मरण के अनुसार, सिवनी में स्टेडियम निर्माण को लेकर छात्र नेता संजय चौरसिया की मुहिम चल रही थी। इसी राजनीतिक माहौल के बीच एक सभा में गार्गी शंकर मिश्रा की ओर से युवाओं को लेकर कही गई कथित टिप्पणी चर्चा का विषय बनी।

बताया जाता है कि उन्होंने युवाओं के बारे में ‘दस की कच्ची और दो रुपये का खारा’ जैसी टिप्पणी की थी। इसके बाद इसी बात को राजनीतिक तंज के रूप में ‘दस की कच्ची, दो का खारा’ जैसी पंक्ति में ढाला गया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस पूरे प्रसंग के कई विवरण स्थानीय संस्मरण और पत्रकारिता संबंधी स्मृतियों पर आधारित हैं। इनके सभी पहलुओं की स्वतंत्र प्राथमिक दस्तावेजों से पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें ऐतिहासिक संस्मरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

एक अखबार की सुर्खी और बदलता चुनावी माहौल

उस दौर में प्रिंट मीडिया का प्रभाव आज के सोशल मीडिया से अलग लेकिन बहुत व्यापक था।

आज कोई नारा वीडियो के जरिए कुछ ही घंटों में वायरल हो जाता है। 1989 में किसी स्थानीय अखबार की सुर्खी, बाजारों में उसकी चर्चा और लोगों के बीच उसका दोहराया जाना ही किसी राजनीतिक वाक्य को व्यापक पहचान दिलाने का माध्यम बन सकता था।

दिए गए संस्मरण के मुताबिक दैनिक संवादकुंज में इस कथित टिप्पणी को लेकर ऐसी सुर्खी सामने आई जिसने चुनावी चर्चाओं को प्रभावित किया। ‘दस की कच्ची, दो का खारा’ जैसी तुकबंदी लोगों की बातचीत में जगह बनाने लगी।

राजनीतिक अभियानों में ऐसी छोटी और आसानी से याद रहने वाली पंक्तियों की भूमिका अक्सर महत्वपूर्ण होती है। वे लंबे भाषणों की तुलना में तेजी से लोगों की स्मृति में बैठ जाती हैं।

चुनाव परिणाम ने दर्ज किया बड़ा उलटफेर

1989 के सिवनी लोकसभा चुनाव के आंकड़े इस चुनावी मुकाबले की तस्वीर स्पष्ट करते हैं।

उपलब्ध परिणामों के अनुसार:

  • प्रहलाद सिंह पटेल — भाजपा — 2,04,916 वोट — 46.39 प्रतिशत
  • गार्गी शंकर मिश्रा — कांग्रेस — 1,78,391 वोट — 40.39 प्रतिशत
  • मदन तिवारी — जनता दल — 33,653 वोट — 7.62 प्रतिशत

पटेल ने मिश्रा को 26,525 वोटों के अंतर से हराया।

यह परिणाम इसलिए भी उल्लेखनीय था क्योंकि 1984 में गार्गी शंकर मिश्रा ने 54.44 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। पांच साल बाद उनके वोट शेयर में गिरावट दर्ज हुई और सीट का परिणाम बदल गया।

हालांकि किसी एक नारे को चुनाव परिणाम का अकेला कारण मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। चुनाव परिणामों पर प्रत्याशी, संगठन, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन, मतदाताओं का रुझान और राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियां—सभी का प्रभाव पड़ता है।

37 साल बाद फिर तुकबंदी के जरिए विरोध की भाषा

अब 2026 में दिल्ली के प्रदर्शनों में ‘एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’ जैसी पंक्ति चर्चा में है।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ी छात्राओं के प्रदर्शनों में महिला सुरक्षा, स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के अधिकार जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। रिपोर्टों में ‘हम औरतें आजाद हैं’, ‘रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’ जैसे अन्य संदेशों का भी उल्लेख है।

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इन नारों की विशेषता यह है कि गंभीर सामाजिक मुद्दों को छोटे, तुकबंदी वाले और आसानी से याद रहने वाले वाक्यों में व्यक्त किया जा रहा है।

यही वह बिंदु है जहां 1989 का सिवनी और 2026 की दिल्ली की नारेबाजी एक समान दिखाई देती है—शब्द अलग हैं, संदर्भ अलग हैं, लेकिन तुकबंदी को सार्वजनिक असंतोष व्यक्त करने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

नारे क्यों बन जाते हैं राजनीतिक और सामाजिक हथियार?

राजनीतिक इतिहास में नारे केवल शब्दों का समूह नहीं होते। वे किसी समय विशेष के मुद्दे, असंतोष या भावनात्मक प्रतिक्रिया को संक्षेप में व्यक्त करते हैं।

एक प्रभावी नारे में सामान्यतः तीन बातें होती हैं—

  1. वह छोटा और आसानी से याद रहने वाला हो।
  2. उसमें स्थानीय भाषा या रोजमर्रा की चीजों का इस्तेमाल हो।
  3. उसे लोग आसानी से दोहरा सकें।

‘कचौरी’ और ‘समोसा’ जैसी आम चीजों का इस्तेमाल वर्तमान नारे को सहज और यादगार बनाता है। उसी तरह ‘कच्ची’ और ‘खारा’ जैसे रोजमर्रा के संदर्भों ने 1989 के स्थानीय चुनावी माहौल में एक अलग तरह की पहचान बनाई थी—कम से कम उपलब्ध संस्मरण में इसका यही वर्णन मिलता है।

सोशल मीडिया ने बदल दिया नारे के वायरल होने का तरीका

1989 में किसी नारे को फैलने में अखबार, सार्वजनिक सभाएं और मौखिक चर्चा महत्वपूर्ण माध्यम थे। आज सोशल मीडिया ने यह प्रक्रिया कई गुना तेज कर दी है।

दिल्ली के मौजूदा प्रदर्शनों से जुड़े नारे सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट के माध्यम से व्यापक चर्चा में आए हैं। 29-30 सितंबर 2026 की प्रकाशित रिपोर्टों में ‘एक कचौरी, दो समोसा’ वाली पंक्ति को वायरल हो रहे नारों में शामिल बताया गया।

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि किसी स्थानीय प्रदर्शन का नारा भी कुछ घंटों में राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

लेकिन नारे और वास्तविक मुद्दे में अंतर समझना जरूरी

किसी नारे की लोकप्रियता को उसके पीछे मौजूद पूरे सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे का पर्याय नहीं माना जा सकता।

वर्तमान दिल्ली संदर्भ में उपलब्ध रिपोर्टें बताती हैं कि प्रदर्शनकारी महिला सुरक्षा, यौन हिंसा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और महिलाओं की स्वतंत्रता जैसे सवाल उठा रही हैं।

इसी तरह 1989 के सिवनी चुनाव को केवल एक नारे के आधार पर समझना भी अधूरा होगा। आंकड़ों से पता चलता है कि कांग्रेस, भाजपा और जनता दल के बीच वोटों का स्पष्ट विभाजन था और पटेल तथा मिश्रा के बीच 26,525 मतों का अंतर रहा।

इसलिए इतिहास का सबक यह है कि नारा चुनावी या सामाजिक माहौल की अभिव्यक्ति हो सकता है, लेकिन परिणाम के पीछे अनेक कारक काम करते हैं।

सिवनी के पुराने राजनीतिक दौर की एक और दिलचस्प कड़ी

1989 की जीत के बाद प्रहलाद सिंह पटेल ने सिवनी से लोकसभा की राजनीति में प्रवेश किया। उपलब्ध जीवनी संबंधी रिकॉर्ड के अनुसार वे बाद में 1996 में फिर सिवनी से लोकसभा पहुंचे और आगे चलकर बालाघाट तथा दमोह से भी लोकसभा चुनाव जीते।

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दूसरी ओर गार्गी शंकर मिश्रा का राजनीतिक जीवन 1989 के चुनाव के बाद समाप्ति की ओर बढ़ा। उपलब्ध जीवनी रिकॉर्ड के अनुसार उनका निधन फरवरी 1990 में हुआ।

इस दृष्टि से 1989 का चुनाव सिवनी के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमण का बिंदु भी माना जा सकता है।

आज की राजनीति के लिए क्या संकेत?

आज के समय में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए नारे अब भी संचार का प्रभावी माध्यम हैं। अंतर केवल इतना है कि अब कोई नारा अखबार की सुर्खी बनने के साथ-साथ वीडियो, मीम, पोस्ट और हैशटैग के जरिए बहुत तेजी से फैल सकता है।

लेकिन किसी वायरल नारे को समझने के लिए उसके पीछे का संदर्भ जानना भी उतना ही जरूरी है।

‘एक कचौरी, दो समोसा’ के वर्तमान संदर्भ में महिला सुरक्षा का मुद्दा है, जबकि ‘दस की कच्ची, दो का खारा’ सिवनी के 1989 के चुनावी संस्मरण से जुड़ी पंक्ति के रूप में सामने आती है। दोनों को एक ही राजनीतिक घटना मानना उचित नहीं होगा।

फिर भी दोनों उदाहरण यह जरूर दिखाते हैं कि आम बोलचाल की भाषा जब राजनीतिक या सामाजिक असंतोष से जुड़ती है तो वह लंबे समय तक लोगों की स्मृति में रह सकती है।

क्या इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है?

इतिहास शब्दशः दोहराया नहीं जाता। परिस्थितियां, राजनीतिक दल, संचार माध्यम और सामाजिक मुद्दे बदल जाते हैं।

लेकिन राजनीतिक संचार की कुछ प्रवृत्तियां जरूर बार-बार दिखाई देती हैं।

1989 में एक स्थानीय राजनीतिक टिप्पणी से जुड़ी तुकबंदी चुनावी चर्चा में आई। 2026 में दिल्ली के महिला सुरक्षा प्रदर्शनों में रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं से जुड़ी तुकबंदी सोशल मीडिया पर चर्चा में है।

फर्क इतना है कि उस समय अखबार और जनसभाएं सूचना फैलाती थीं, आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया यह काम कर रहे हैं।

 ‘एक कचौरी, दो समोसा’ की मौजूदा चर्चा ने सिवनी के उन लोगों को 1989 की याद दिला दी है जिन्होंने ‘दस की कच्ची, दो का खारा’ जैसी चुनावी तुकबंदी को अपने समय में सुना था।

करीब 37 साल के अंतराल में भारत की राजनीति, मीडिया और जनसंचार के तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं। फिर भी एक बात समान दिखाई देती है—जनता के बीच प्रचलित सरल और याद रहने वाली भाषा कभी-कभी बड़े सामाजिक या राजनीतिक सवालों की पहचान बन जाती है।

सिवनी के 1989 के चुनाव के उपलब्ध आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि प्रहलाद सिंह पटेल ने 2,04,916 वोट हासिल कर गार्गी शंकर मिश्रा को 26,525 मतों से हराया था। वहीं 2026 में दिल्ली का ‘एक कचौरी, दो समोसा’ नारा महिला सुरक्षा और स्वतंत्रता से जुड़े प्रदर्शनों के संदर्भ में चर्चा में आया है।

इस पूरे प्रसंग को केवल नारों की समानता के रूप में देखने के बजाय उस समय और आज के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है। नारे बदलते रहते हैं, मुद्दे भी बदलते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में जनता की आवाज, असहमति और सवाल उठाने की परंपरा लगातार बनी रहती है।

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं)
(साई फीचर्स)