BPCL में 343 दिन चला ‘प्रभारी राज’, आखिर Full-Time CMD बनाने में लगे 11 महीने! कुर्सी भी वही, अधिकारी भी वही
(विनीत खरे)
नई दिल्ली (साई)। देश की ऊर्जा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी BPCL में शीर्ष पद की नियुक्ति का एक दिलचस्प अध्याय सामने आता है। यहां मामला किसी ऐसे अधिकारी का नहीं है, जिसे अचानक कंपनी की कमान सौंपनी पड़ी और बाद में नया व्यक्ति तलाशना पड़ा। मामला इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है।
कुर्सी पर अधिकारी भी वही था, जिम्मेदारी भी वही थी, कंपनी भी चल रही थी—लेकिन पूर्णकालिक CMD के पद पर नियुक्ति का इंतजार करीब 11 महीने तक चलता रहा।
BPCL के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक तत्कालीन CMD जी. कृष्णकुमार का कार्यकाल 30 अप्रैल 2025 को समाप्त हुआ। इसके अगले दिन यानी 1 मई 2025 से संजय खन्ना ने CMD की जिम्मेदारी संभाली। उस समय वे Director (Refineries) भी थे। BPCL के 2024-25 के आधिकारिक दस्तावेज में उन्हें 1 मई 2025 से CMD एवं Director (Refineries) के रूप में दर्ज किया गया है।
लेकिन पूर्णकालिक CMD के रूप में उनकी नियुक्ति की घोषणा 9 अप्रैल 2026 को हुई। उस दिन BPCL ने बताया कि केंद्र की Appointments Committee of the Cabinet (ACC) ने Search-cum-Selection Committee की सिफारिश के आधार पर संजय खन्ना की CMD के रूप में नियुक्ति को मंजूरी दी है।
यानी 1 मई 2025 से 9 अप्रैल 2026 तक कुल 343 दिन का अंतर रहा।
अब सवाल उठता है—अगर अंततः कमान संजय खन्ना को ही देनी थी, तो पूर्णकालिक नियुक्ति के लिए करीब 343 दिन क्यों लगे?
यही वह सवाल है, जो सरकारी नियुक्ति प्रक्रिया की गति पर चर्चा का आधार बनता है।
30 अप्रैल 2025 को खत्म हुआ पुराना कार्यकाल
BPCL के तत्कालीन CMD जी. कृष्णकुमार का कार्यकाल 30 अप्रैल 2025 को समाप्त हुआ। कंपनी के आधिकारिक वार्षिक दस्तावेज में भी उनका कार्यकाल CMD के रूप में 30 अप्रैल 2025 तक दर्ज है।
अगले दिन से संजय खन्ना ने CMD की जिम्मेदारी संभाल ली।
यहां एक जरूरी तथ्य समझना भी जरूरी है। BPCL ‘बिना मुखिया’ नहीं थी। कंपनी का कामकाज किसी शून्य में नहीं चल रहा था। संजय खन्ना शीर्ष जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
इसलिए इस पूरे मामले को “BPCL 11 महीने तक बिना मुखिया रही” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।
ज्यादा सटीक स्थिति यह है कि BPCL में करीब 11 महीने तक पूर्णकालिक CMD की नियुक्ति नहीं हुई और शीर्ष जिम्मेदारी संजय खन्ना के पास रही।
यही इस कहानी का असली प्रशासनिक सवाल है।
1 मई 2025 से शुरू हुआ ‘प्रभारी अध्याय’
1 मई 2025 से संजय खन्ना ने CMD की जिम्मेदारी संभाली। उस समय वे BPCL के Director (Refineries) थे।
BPCL के आधिकारिक रिकॉर्ड में उन्हें उस समय CMD के साथ Director (Refineries) के रूप में दर्ज किया गया।
यानी व्यवस्था कुछ ऐसी थी—
CMD की जिम्मेदारी—संजय खन्ना के पास।
Director (Refineries)—संजय खन्ना।
कंपनी का कामकाज—जारी।
लेकिन पूर्णकालिक CMD की नियुक्ति—अभी बाकी।
सरकारी प्रशासन की भाषा में इसे अंतरिम व्यवस्था कहा जा सकता है।
लेकिन आम आदमी इसे थोड़ा अलग अंदाज में पूछ सकता है—
“जब गाड़ी चलाने वाला मिल गया था, तो ड्राइविंग सीट पर उसका नाम–पट्ट लगाने में इतना समय क्यों लगा?”
यही सवाल इस मामले को साधारण नियुक्ति से अलग बनाता है।
फिर 9 अप्रैल 2026 को क्या हुआ?
लगभग 11 महीने बाद तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो गई।
9 अप्रैल 2026 को BPCL ने आधिकारिक रूप से घोषणा की कि ACC ने संजय खन्ना को कंपनी का Chairman & Managing Director नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है। कंपनी ने कहा कि नियुक्ति Search-cum-Selection Committee की सिफारिश के आधार पर हुई।
उनका कार्यकाल 31 मई 2029 को सेवानिवृत्ति तक या अगले आदेश तक बताया गया है।
और यहां कहानी में सबसे बड़ा प्रशासनिक व्यंग्य अपने आप पैदा हो जाता है—
मई 2025 में जिम्मेदारी मिली, अप्रैल 2026 में उसी जिम्मेदारी को पूर्णकालिक पद का प्रमाणपत्र मिला।
यानी अधिकारी वही, कंपनी वही, कुर्सी वही—बस नियुक्ति की प्रक्रिया को लगभग एक साल चाहिए था।
‘कुर्सी वही, नाम-पट्ट नया’ वाली कहानी
इस पूरे घटनाक्रम को हल्के-फुल्के अंदाज में देखें तो BPCL की CMD कुर्सी ने 343 दिनों तक शायद यही सोचा होगा—
“भाई, मुझे तो पता है मेरे बॉस कौन हैं, सरकार को बताने में इतनी देर क्यों लग रही है?”
हालांकि यह केवल व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है। उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज यह नहीं बताते कि पूर्णकालिक नियुक्ति में देरी का कोई विशेष कारण क्या था।
यही सावधानी जरूरी है।
किसी सरकारी नियुक्ति में देरी को सीधे राजनीतिक मंशा, लापरवाही या किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में निर्णय से जोड़ना उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर उचित नहीं होगा।
लेकिन समयबद्धता का सवाल पूछना एक अलग बात है।
और BPCL का मामला इस सवाल को सामने रखने के लिए पर्याप्त तथ्य देता है।
सरकार से पूछे जा सकते हैं ये सवाल
केंद्र सरकार की नियुक्ति प्रक्रिया में ACC की मंजूरी महत्वपूर्ण चरण है। BPCL ने स्वयं कहा कि संजय खन्ना की नियुक्ति Search-cum-Selection Committee की सिफारिश पर ACC की मंजूरी के बाद हुई।
ऐसे में सार्वजनिक प्रशासन की दृष्टि से कुछ सवाल स्वाभाविक हैं—
पहला सवाल: प्रक्रिया शुरू कब हुई?
अगर 30 अप्रैल 2025 को CMD का कार्यकाल समाप्त होना पहले से निर्धारित था, तो नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया कितनी पहले शुरू की गई थी?
दूसरा सवाल: 343 दिन क्यों?
1 मई 2025 से 9 अप्रैल 2026 के बीच 343 दिन हैं।
क्या इतनी अवधि किसी बड़े महारत्न PSU के शीर्ष पद की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए आवश्यक थी?
इसका आधिकारिक उत्तर उपलब्ध दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता।
तीसरा सवाल: यदि अंततः वही अधिकारी चुना जाना था तो?
यह सबसे चुटीला सवाल है।
जिस अधिकारी को पहले ही CMD की जिम्मेदारी दी गई थी, अंततः उसी अधिकारी को पूर्णकालिक CMD भी बनाया गया।
तो फिर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने में लगभग 11 महीने क्यों लगे?
यह सवाल संजय खन्ना की योग्यता पर नहीं, बल्कि प्रक्रिया की गति पर है।
संजय खन्ना की योग्यता पर सवाल नहीं
यह भी खबर का महत्वपूर्ण पक्ष है।
संजय खन्ना BPCL के अनुभवी अधिकारी हैं। कंपनी के अनुसार उनके पास रिफाइनरी संचालन और तकनीकी सेवाओं में तीन दशक से अधिक का अनुभव है। वे BPCL की मुंबई और कोच्चि रिफाइनरियों का नेतृत्व कर चुके हैं और Director (Refineries) के रूप में कंपनी की बड़ी परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं।
उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि में NIT Tiruchirappalli से Chemical Engineering की डिग्री और Finance Management में postgraduate qualification शामिल है।
इसलिए उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह मामला “अनुभवहीन व्यक्ति को CMD बनाने” का नहीं है।
बल्कि सवाल उल्टा है—
इतना अनुभवी अधिकारी उपलब्ध था और वही व्यक्ति अंततः पूर्णकालिक CMD भी बना, फिर नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा होने में इतना समय क्यों लगा?
BPCL कोई छोटी कंपनी नहीं
यहां कंपनी के आकार को भी समझना जरूरी है।
BPCL स्वयं को Fortune Global 500 कंपनी और Maharatna PSU के रूप में प्रस्तुत करती है। उसकी मुंबई, कोच्चि और बीना रिफाइनरियों की संयुक्त क्षमता लगभग 35.3 MMTPA बताई गई है। कंपनी के अप्रैल 2026 के आधिकारिक बयान के मुताबिक उसका ईंधन स्टेशन नेटवर्क 25,300 से अधिक है।
ऐसी कंपनी का काम केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं है। BPCL रिफाइनिंग, पेट्रोलियम उत्पादों के विपणन तथा तेल-गैस क्षेत्र की अन्य गतिविधियों में भी काम करती है।
इसलिए शीर्ष पद की नियुक्ति केवल कंपनी के भीतर की प्रशासनिक औपचारिकता नहीं मानी जाती। इसका संबंध ऊर्जा क्षेत्र की दीर्घकालिक रणनीति, निवेश, परियोजनाओं और संगठनात्मक निर्णयों से भी जुड़ता है।
क्या ‘प्रभारी’ व्यवस्था से कंपनी का काम प्रभावित हुआ?
यहां उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर संतुलित बात जरूरी है।
ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आता कि इस अवधि में BPCL का संचालन रुक गया था या कंपनी के कामकाज में कोई ठहराव आया था।
इसके उलट, संजय खन्ना स्वयं कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी थे और बाद में उन्हें ही पूर्णकालिक CMD बनाया गया। BPCL ने उनकी नियुक्ति को कंपनी के लिए continuity और strategic focus से भी जोड़ा।
इसलिए “प्रभारी CMD होने से BPCL ठप हो गई” जैसी बात तथ्यात्मक रूप से समर्थित नहीं है।
लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि समयबद्ध नियुक्ति का सवाल महत्वहीन हो जाता है।
प्रशासनिक व्यवस्था में निरंतरता और नियमित नियुक्ति—दोनों अलग विषय हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र में समयबद्ध नियुक्ति क्यों महत्वपूर्ण?
किसी बड़े PSU के शीर्ष पद पर नियमित नियुक्ति का उद्देश्य केवल नाम तय करना नहीं होता। CMD कंपनी की रणनीतिक दिशा, बड़े निवेश, संगठनात्मक प्राथमिकताओं और दीर्घकालिक योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जब किसी पद पर लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार रहता है तो प्रशासनिक निरंतरता तो बनी रह सकती है, लेकिन नियमित नियुक्ति की पारदर्शिता और समयबद्धता पर सवाल उठ सकते हैं।
यही कारण है कि BPCL जैसे मामले में बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि—
क्या ऐसी नियुक्तियां पहले से निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरी की जा सकती हैं?
अगर हां, तो उसके लिए बेहतर प्रक्रिया क्या होनी चाहिए?
राजनीतिक सवाल भी यहीं से निकलता है
किसी सरकारी नियुक्ति पर राजनीतिक सवाल उठना असामान्य नहीं है। लेकिन इस मामले में उपलब्ध दस्तावेज किसी दल या सरकार की किसी विशेष मंशा का प्रमाण नहीं देते।
इसलिए आलोचना को तथ्यों तक सीमित रखना ज्यादा उचित होगा।
केंद्र सरकार से यह पूछा जा सकता है कि BPCL जैसे महारत्न PSU में नियमित CMD की नियुक्ति प्रक्रिया को 30 अप्रैल 2025 से पहले पूरा क्यों नहीं किया गया, जबकि पद पर बैठे CMD का कार्यकाल पहले से ज्ञात था।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंततः संजय खन्ना ही पूर्णकालिक CMD बने।
अर्थात उपलब्ध घटनाक्रम में अंतिम परिणाम और अंतरिम व्यवस्था संभालने वाले व्यक्ति के बीच कोई बदलाव नहीं हुआ।
343 दिन का हिसाब क्या कहता है?
पूरे घटनाक्रम को तारीखों में समझें—
| घटना | तारीख |
| जी. कृष्णकुमार का CMD कार्यकाल समाप्त | 30 अप्रैल 2025 |
| संजय खन्ना ने CMD की जिम्मेदारी संभाली | 1 मई 2025 |
| पूर्णकालिक CMD के रूप में नियुक्ति की ACC मंजूरी | 9 अप्रैल 2026 |
| पूर्णकालिक CMD के रूप में कार्यकाल | 31 मई 2029 तक या अगले आदेश तक |
1 मई 2025 से 9 अप्रैल 2026 तक का अंतर 343 दिन है।
यही आंकड़ा इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
और आज की स्थिति क्या है?
25 सितंबर 2026 की स्थिति में BPCL के पूर्णकालिक Chairman & Managing Director संजय खन्ना हैं।
BPCL की आधिकारिक घोषणा के मुताबिक उन्होंने 9 अप्रैल 2026 को CMD के रूप में पदभार संभाला था। उनका कार्यकाल 31 मई 2029 को सेवानिवृत्ति तक या अगले आदेश तक है।
इसलिए आज BPCL को ‘मुखिया विहीन’ कहना सही नहीं होगा।
बल्कि खबर का सही तथ्य यह है कि—
BPCL ने 1 मई 2025 से 8 अप्रैल 2026 तक अतिरिक्त/अंतरिम व्यवस्था में CMD की जिम्मेदारी संभाली और 9 अप्रैल 2026 से संजय खन्ना पूर्णकालिक CMD बन गए।
अब बचता है सबसे मजेदार सवाल
सरकारी फाइलों की अपनी गति होती है। कभी फाइल दौड़ती है, कभी चलती है और कभी शायद चाय पीने बैठ जाती है।
BPCL की कहानी में भी जनता के लिए चुटीला सवाल यही है—
जब 1 मई 2025 को संजय खन्ना को CMD की जिम्मेदारी देने का फैसला हो गया था और 9 अप्रैल 2026 को आखिरकार उन्हीं को पूर्णकालिक CMD भी बना दिया गया, तो बीच के 343 दिनों में ऐसा क्या था जिसके लिए फाइल को इतना लंबा सफर करना पड़ा?
सरकार के पास इसका प्रशासनिक जवाब हो सकता है। नियुक्ति प्रक्रिया में Search-cum-Selection Committee, संबंधित मंत्रालय और ACC जैसे संस्थागत चरण भी होते हैं।
लेकिन जनता का सवाल फिर भी अपनी जगह रह सकता है—
“महारत्न कंपनी की रिफाइनरी में करोड़ों रुपये की परियोजनाएं आगे बढ़ सकती हैं, तो CMD की नियुक्ति की फाइल को 343 दिन की ‘रिफाइनिंग’ क्यों चाहिए?”
BPCL की कुर्सी खाली नहीं थी, लेकिन स्थायी नियुक्ति का इंतजार जरूर लंबा था
BPCL का मामला एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक तथ्य सामने रखता है। 30 अप्रैल 2025 को जी. कृष्णकुमार का CMD कार्यकाल समाप्त हुआ और 1 मई 2025 से संजय खन्ना ने CMD की जिम्मेदारी संभाली। लगभग 343 दिन बाद, 9 अप्रैल 2026 को ACC की मंजूरी से संजय खन्ना को पूर्णकालिक CMD नियुक्त कर दिया गया।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि BPCL 11 महीने तक नेतृत्वहीन रही। नेतृत्व मौजूद था। कंपनी का संचालन भी चलता रहा।
लेकिन यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही है कि लगभग 11 महीने तक पूर्णकालिक CMD की नियुक्ति लंबित रही।
और यहीं से केंद्र सरकार की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठता है—क्या इतने बड़े महारत्न PSU में शीर्ष पद की नियमित नियुक्ति को और समयबद्ध बनाया जा सकता है?
सवाल किसी व्यक्ति की योग्यता का नहीं है। संजय खन्ना का लंबा अनुभव आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है और अंततः उन्हें ही पूर्णकालिक CMD बनाया गया।
सवाल सिर्फ इतना है कि जब मंजिल वही थी और यात्री भी वही, तो सरकारी नियुक्ति की गाड़ी को 343 दिन क्यों लगे?
BPCL की रिफाइनरी में कच्चा तेल पेट्रोल-डीजल बनने की प्रक्रिया से गुजरता है; इस मामले में तो लगता है CMD की नियुक्ति की फाइल को ही सबसे लंबी ‘रिफाइनिंग प्रक्रिया’ से गुजरना पड़ा।
(लेखक https://www.bharatpsu.com/ के प्रधान संपादक हैं)