अमेठी की हार को स्मृति ईरानी ने किया याद, बोलीं- कार्यकर्ता सोच रहे थे दीदी को सदमा लग गया; 2019 की जीत और 2024 की हार पर खुलकर की बात

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली (साई)। भाजपा महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अमेठी लोकसभा सीट से 2024 में मिली हार को याद करते हुए अपने राजनीतिक सफर और चुनावी नतीजों के बाद के अनुभव साझा किए हैं। अमेठी में करीब एक दशक तक सक्रिय राजनीति और विकास कार्यों से जुड़े रहने के बाद चुनाव हारने का अनुभव कैसा रहा, इस पर स्मृति ईरानी ने विस्तार से अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा कि 2019 में जब उन्होंने अमेठी से बड़ी जीत हासिल की थी, तब लोग उन्हें तलाश रहे थे, लेकिन 2024 में चुनाव हारने के बाद स्थिति अलग थी। उनके मुताबिक, दोनों मौकों पर उनकी अपनी प्रतिक्रिया लगभग एक जैसी रही, लेकिन आसपास के लोगों का व्यवहार बदल गया था।

स्मृति ईरानी ने चुनाव परिणाम वाले दिन की एक घटना भी साझा की। उन्होंने बताया कि हार के बाद वह अमेठी में अपने घर के मंदिर में गई थीं और वहां प्रतिमा को देखकर उन्होंने कहा कि जो किया, अच्छा किया। उनके बगल में मौजूद कार्यकर्ता उस समय हैरान थे और उन्हें लगा कि शायद हार का उन्हें गहरा सदमा पहुंचा है।

स्मृति ईरानी के इस बयान ने एक बार फिर अमेठी की राजनीति, 2019 में उनकी ऐतिहासिक जीत और 2024 के बदले चुनावी समीकरणों की चर्चा को तेज कर दिया है। यह बयान केवल एक चुनावी हार को स्वीकार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीत और हार के दौरान नेताओं के प्रति बदलते राजनीतिक और सामाजिक व्यवहार की तस्वीर भी पेश करता है।

हार के बाद मंदिर पहुंचीं, कार्यकर्ताओं को लगा सदमा लग गया

स्मृति ईरानी ने अपने अनुभव को याद करते हुए बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम वाले दिन वह अमेठी में थीं। परिणाम स्पष्ट होने के बाद वह अपने घर के मंदिर में गईं।

उनके अनुसार, वहां प्रतिमा के सामने उन्होंने कहा कि जो किया, अच्छा किया। उनकी इस प्रतिक्रिया को सुनकर आसपास मौजूद कार्यकर्ता हैरान रह गए। स्मृति ईरानी ने कहा कि उनके बगल में खड़े कार्यकर्ता यह सोच रहे थे कि शायद दीदी को हार का सदमा लग गया है और वह अलग तरह की बातें कर रही हैं।

यह घटना राजनीतिक हार के बाद किसी नेता की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया का एक अलग पक्ष दिखाती है। चुनावी राजनीति में हार और जीत के बाद नेताओं की प्रतिक्रिया अक्सर सुर्खियां बनती है, लेकिन स्मृति ईरानी ने अपने अनुभव को शांत तरीके से स्वीकार करने की बात कही।

उन्होंने बताया कि शाम के करीब छह बजे तक चुनावी नतीजों की स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने अपने परिवार से फोन पर बात की और दिल्ली के लिए रवाना होने की तैयारी की।

2019 और 2024 में बस इतना फर्क था, लोग मुझे तलाश रहे थे या नहीं

स्मृति ईरानी ने 2019 और 2024 के अनुभवों की तुलना करते हुए कहा कि उनकी प्रतिक्रिया में ज्यादा अंतर नहीं था। अंतर लोगों के व्यवहार में था।

उन्होंने कहा कि 2019 में जीत के बाद लोग उन्हें तलाश रहे थे, जबकि 2024 में हार के बाद कोई उन्हें ढूंढने नहीं आ रहा था।

यह टिप्पणी राजनीति की उस वास्तविकता को भी सामने लाती है, जहां चुनावी जीत के बाद किसी नेता के आसपास समर्थकों, कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। वहीं, हार के बाद राजनीतिक गतिविधियों और व्यक्तिगत संपर्कों का स्वरूप बदल सकता है।

स्मृति ईरानी के अनुसार, जब वह घर पहुंचीं तो किसी ने उनसे पूछा कि क्या चुनाव हारने से उन्हें धक्का लगा है। उन्होंने जवाब दिया कि नहीं, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया उसी तरह की थी जैसी 2019 में जीत के बाद थी।

उनके बयान का सार यह था कि चुनाव परिणाम बदल सकते हैं, लेकिन किसी नेता के लिए अपनी राजनीतिक यात्रा और किए गए काम का मूल्यांकन केवल अंतिम परिणाम से नहीं होना चाहिए।

अमेठी में दिए जिंदगी के 10 साल, विकास कार्यों को किया याद

स्मृति ईरानी ने कहा कि उन्होंने अमेठी में अपने जीवन के करीब दस साल दिए। उनके मुताबिक, किसी लोकसभा क्षेत्र में लंबे समय तक काम करना आसान नहीं होता और इस दौरान उन्होंने क्षेत्र के लिए लगातार प्रयास किए।

अमेठी लंबे समय से देश की सबसे चर्चित राजनीतिक सीटों में रही है। राष्ट्रीय राजनीति के कई बड़े नेताओं का इस सीट से जुड़ाव रहा है। ऐसे में यहां चुनाव लड़ना केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श पर भी दिखाई देता है।

स्मृति ईरानी ने अमेठी में किए गए अपने विकास कार्यों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि 2019 से पहले और उसके बाद क्षेत्र में काम करने के लिए उन्होंने लगातार समय दिया।

उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि वह 2014 में अमेठी से चुनाव लड़ने के बाद भले ही जीत नहीं सकीं, लेकिन उन्होंने क्षेत्र के साथ अपना राजनीतिक संपर्क बनाए रखा। 2019 में यही निरंतरता उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुई और उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी को हराकर बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज की।

2024 में चुनावी परिणाम बदल गया और स्मृति ईरानी को हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद अब उनके बयान से यह स्पष्ट है कि वह अमेठी में अपने लंबे राजनीतिक सफर और काम को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं।

2019 की जीत का दिन भी किया याद

स्मृति ईरानी ने 2019 के चुनाव परिणाम वाले दिन को भी विस्तार से याद किया। उन्होंने बताया कि उस दिन सुबह उन्होंने अपने साथ मौजूद लोगों से कहा था कि वे काउंटिंग सेंटर जाएं, जबकि वह खुद अपने कमरे में रहेंगी।

उनके मुताबिक, उन्हें भरोसा था कि उन्होंने क्षेत्र में काम किया है और जनता उसका फैसला करेगी।

2019 का चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी नतीजों में शामिल रहा था। अमेठी को लंबे समय तक कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रभाव वाली सीट माना जाता रहा। ऐसे में स्मृति ईरानी द्वारा राहुल गांधी को हराना भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा गया।

स्मृति ईरानी ने कहा कि वह शाम करीब साढ़े चार बजे तक अपने घर से बाहर नहीं आई थीं। इसके बाद मतगणना और चुनावी परिणामों की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार किया गया।

उन्होंने बताया कि जब उन्हें जानकारी मिली कि मतगणना अभी पूरी नहीं हुई है और रिकाउंट की मांग की गई है, तब उन्होंने कहा कि अंतिम वोट की गिनती पूरी होने तक इंतजार किया जाएगा।

उनके अनुसार, देर रात तक मतगणना की प्रक्रिया चली और अंतिम परिणाम स्पष्ट होने के बाद प्रमाणपत्र लेने के लिए कार्यकर्ता को भेजा गया।

यह पूरा अनुभव उनके 2019 और 2024 के राजनीतिक सफर के बीच एक रोचक तुलना प्रस्तुत करता है। एक चुनाव में ऐतिहासिक जीत और दूसरे चुनाव में हार, लेकिन दोनों अवसरों पर परिणाम आने तक प्रतीक्षा करने और प्रक्रिया पूरी होने का उनका अनुभव चर्चा में है।

अमेठी की राजनीति में क्यों अहम है स्मृति ईरानी का सफर?

अमेठी की राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। इस सीट को लेकर हर लोकसभा चुनाव में विशेष राजनीतिक दिलचस्पी दिखाई देती रही है।

स्मृति ईरानी ने 2014 में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अमेठी से राजनीतिक दूरी नहीं बनाई। अगले पांच वर्षों तक क्षेत्र में सक्रिय रहने के बाद 2019 में उन्होंने चुनावी समीकरण बदल दिया।

2019 में राहुल गांधी की हार ने अमेठी के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव दर्ज किया। यह भाजपा के लिए प्रतीकात्मक और राजनीतिक, दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण जीत थी।

लेकिन 2024 में स्थिति फिर बदल गई। स्मृति ईरानी को हार का सामना करना पड़ा। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि चुनावी राजनीति में किसी एक परिणाम को स्थायी राजनीतिक स्थिति नहीं माना जा सकता।

मतदाता स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों की उपलब्धता, पार्टी की रणनीति, राष्ट्रीय राजनीतिक माहौल और अन्य कई कारकों के आधार पर अलग-अलग चुनावों में अपना फैसला बदल सकते हैं।

इसी कारण स्मृति ईरानी का अमेठी से जुड़ा राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र में चुनावी प्रतिस्पर्धा और बदलते जनादेश का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

जीत और हार के बाद बदलता राजनीतिक व्यवहार

स्मृति ईरानी की टिप्पणी कि 2019 में लोग उन्हें तलाश रहे थे और 2024 में हार के बाद कोई नहीं ढूंढ रहा था, राजनीति के सामाजिक पक्ष की ओर भी ध्यान दिलाती है।

चुनाव जीतने वाले नेताओं के आसपास कार्यकर्ताओं और समर्थकों की सक्रियता बढ़ जाती है। सत्ता और राजनीतिक सफलता के साथ संपर्क बढ़ना एक सामान्य राजनीतिक स्थिति है। इसके विपरीत हार के बाद वही नेटवर्क कमजोर या कम सक्रिय दिखाई दे सकता है।

हालांकि किसी नेता की वास्तविक राजनीतिक ताकत केवल चुनाव परिणाम के बाद उसके आसपास मौजूद लोगों की संख्या से तय नहीं होती। हार के बाद संगठन के साथ सक्रिय बने रहना, जनता से संपर्क बनाए रखना और अगले राजनीतिक चरण की तैयारी करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

राजनीतिक विश्लेषकों के सामान्य दृष्टिकोण से किसी नेता की लंबी पारी में हार और जीत दोनों महत्वपूर्ण अनुभव होते हैं। जीत नेतृत्व की स्वीकार्यता को मजबूत करती है, जबकि हार राजनीतिक रणनीति, संगठन और जनता से संवाद का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर देती है।

स्मृति ईरानी का बयान भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है, जहां उन्होंने हार को अपने राजनीतिक सफर का अंत मानने के बजाय एक अनुभव के रूप में याद किया।

पीएम मोदी पर बात करते हुए भावुक हुईं स्मृति ईरानी

इसी बातचीत के दौरान स्मृति ईरानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में बात करते हुए भावुक हो गईं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना अपने पिता की उम्र से करते हुए उनके प्रति सम्मान और व्यक्तिगत भावनाएं व्यक्त कीं।

स्मृति ईरानी ने कहा कि प्रधानमंत्री के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है और उन पर व्यक्तिगत टिप्पणी या हमला होने पर उन्हें भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया होती है।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के जीवन के एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि मां के निधन के बाद भी उन्होंने अपने निर्धारित सार्वजनिक दायित्वों को निभाया। स्मृति ईरानी ने इसे उनके कर्तव्यबोध और सार्वजनिक जिम्मेदारी के प्रति समर्पण के रूप में देखा।

बात करते हुए वह भावुक हो गईं और कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उनके पिता की उम्र के हैं। उनके बयान में राजनीतिक संबंध से अधिक व्यक्तिगत सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव दिखाई दिया।

स्मृति ईरानी की यह प्रतिक्रिया बताती है कि राजनीतिक नेतृत्व के बीच केवल संगठनात्मक संबंध ही नहीं होते, बल्कि कई नेताओं के बीच व्यक्तिगत सम्मान और भावनात्मक संबंध भी विकसित होते हैं।

भाजपा और स्मृति ईरानी की आगे की राजनीतिक भूमिका

अमेठी में हार के बावजूद स्मृति ईरानी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं और भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रही हैं। वर्तमान में भाजपा महासचिव के रूप में उनकी भूमिका पार्टी के संगठनात्मक कार्यों से जुड़ी है।

लोकसभा चुनाव में हार किसी नेता के राजनीतिक करियर का अंतिम फैसला नहीं होती। भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण रहे हैं, जब नेता चुनाव हारने के बाद भी संगठन, सरकार या संसद की दूसरी भूमिका के माध्यम से सक्रिय रहे हैं और बाद में चुनावी वापसी भी की है।

स्मृति ईरानी का आगे का राजनीतिक सफर भी भाजपा की रणनीति और आने वाले चुनावों में उनकी जिम्मेदारियों के आधार पर तय होगा।

अमेठी से उनका पुराना जुड़ाव भी भविष्य में राजनीतिक चर्चा का विषय बना रह सकता है। क्या वह भविष्य में फिर इस सीट या उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ी भूमिका निभाएंगी, इस पर अभी केवल राजनीतिक संभावनाओं के स्तर पर ही बात की जा सकती है।

जनता के लिए क्या संदेश छोड़ती है हार और जीत की यह कहानी?

स्मृति ईरानी का 2014 से 2024 तक अमेठी से जुड़ा राजनीतिक सफर लोकतंत्र में जनादेश की बदलती प्रकृति को दिखाता है।

2014 में हार, 2019 में बड़ी जीत और 2024 में फिर हार—इन तीन चुनावी पड़ावों से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता का फैसला समय और परिस्थितियों के साथ बदल सकता है।

राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए यह संदेश है कि किसी भी क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहना जरूरी है, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता का होता है।

वहीं आम जनता के लिए यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ताकत को दर्शाता है। जनता अलग-अलग समय पर अपने अनुभव, प्राथमिकताओं और राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनती है।

स्मृति ईरानी ने 2024 की हार को जिस तरह याद किया, उससे यह भी संदेश निकलता है कि राजनीति में सफलता और असफलता दोनों को स्वीकार करने की क्षमता महत्वपूर्ण है।

स्मृति ईरानी द्वारा अमेठी की 2024 की हार को याद करना केवल एक चुनावी नतीजे पर प्रतिक्रिया नहीं है। उनके बयान में 2019 की जीत, 2024 की हार, अमेठी में बिताए करीब दस साल और राजनीति में बदलते रिश्तों का अनुभव एक साथ दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि 2019 और 2024 के बीच सबसे बड़ा अंतर यह था कि जीत के समय लोग उन्हें तलाश रहे थे, जबकि हार के बाद स्थिति बदल गई। मंदिर में जाकर परिणाम को स्वीकार करने वाली उनकी प्रतिक्रिया को देखकर कार्यकर्ताओं का हैरान होना भी इस अनुभव का दिलचस्प हिस्सा रहा।

स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर यह बताता है कि लोकतंत्र में कोई भी चुनाव परिणाम स्थायी नहीं होता। मतदाता का फैसला बदल सकता है और नेताओं को भी हर जीत तथा हार के बाद अपनी भूमिका और रणनीति का नए सिरे से मूल्यांकन करना पड़ता है।

2019 में राहुल गांधी को हराने वाली बड़ी जीत और 2024 की हार, दोनों ही स्मृति ईरानी के राजनीतिक करियर के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। अब भाजपा महासचिव के रूप में उनकी सक्रिय भूमिका और भविष्य की राजनीतिक जिम्मेदारियां यह तय करेंगी कि आने वाले वर्षों में उनका अगला राजनीतिक अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ता है।

अमेठी की यह कहानी अंततः भारतीय लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को मजबूत करती है जिसमें अंतिम फैसला जनता के हाथ में होता है। नेताओं के लिए जीत जनादेश का सम्मान है और हार आत्ममंथन का अवसर। स्मृति ईरानी ने अपने हालिया अनुभव के जरिए यही संकेत दिया है कि राजनीतिक सफर एक चुनावी नतीजे पर खत्म नहीं होता, बल्कि हर परिणाम भविष्य की नई दिशा तय करने का एक अवसर भी बन सकता है।