(ब्यूरो कार्यालय)
मुंबई (साई)। रसोई में तड़का लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चुटकी भर हींग को लेकर इतना बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो सकता है, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा। लेकिन महाराष्ट्र में हींग की खरीद-बिक्री पर लगने वाली Market Fee यानी बाजार शुल्क को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद अब बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 1 सितंबर 2026 को नासिक Agricultural Produce Market Committee यानी Nashik APMC के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि हींग, जिसे अंग्रेजी में Asafoetida कहा जाता है, महाराष्ट्र सरकार की 8 दिसंबर 2005 की अधिसूचना में इस्तेमाल की गई ‘मसाल्याचे पदार्थ’ यानी Spices की व्यापक श्रेणी के अंतर्गत आती है। इसलिए केवल यह कहकर कि अधिसूचना में ‘हींग’ का नाम अलग से नहीं लिखा है, उसे बाजार शुल्क के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।
इस फैसले का सीधा असर नासिक APMC के उस अधिकार पर पड़ा है, जिसके तहत वह अपने बाजार क्षेत्र में हींग की खरीद-बिक्री पर कानून के अनुसार बाजार शुल्क वसूल सकती है। अदालत ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार के 2014 के आदेश और Director of Marketing के 2011 के आदेश को भी रद्द कर दिया।
आखिर हींग पर क्यों शुरू हुआ विवाद?
पूरे विवाद की जड़ महाराष्ट्र में कृषि उपज के बाजार नियमन और उससे जुड़े शुल्क की व्यवस्था में है। नासिक APMC अपने क्षेत्र में हींग की खरीद-बिक्री पर Market Fee वसूल रही थी। इसी को लेकर नासिक के व्यापारी NG Thakkar & Sons ने आपत्ति जताई।
व्यापारी पक्ष का मूल तर्क यह था कि महाराष्ट्र सरकार की संबंधित अधिसूचना में कृषि उपज की जिन वस्तुओं का उल्लेख किया गया है, उनमें ‘Hing’ या ‘Asafoetida’ का नाम अलग से नहीं है। जब वस्तु का नाम ही सूची में नहीं है तो APMC को उस पर बाजार शुल्क लगाने और वसूलने का अधिकार कैसे मिल सकता है?
यह तर्क देखने में सीधा था, लेकिन इसके पीछे कानून की व्याख्या का महत्वपूर्ण सवाल छिपा हुआ था।
सवाल यह था कि यदि किसी सरकारी अधिसूचना में ‘Spices’ यानी मसालों जैसी एक व्यापक श्रेणी दी गई हो और किसी विशेष मसाले का नाम अलग से न लिखा गया हो, तो क्या वह वस्तु उस श्रेणी में स्वतः शामिल मानी जाएगी?
यही सवाल आगे चलकर बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी मुद्दा बना।
मामला पहले सरकारी अधिकारियों के सामने पहुंचा
हींग पर Market Fee को लेकर व्यापारी की शिकायत के बाद मामला महाराष्ट्र के संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के सामने पहुंचा। Director of Marketing ने 15 अक्टूबर 2011 को व्यापारी के पक्ष में फैसला दिया।
इस आदेश में माना गया कि ‘Hing’ यानी ‘Asafoetida’ संबंधित 8 दिसंबर 2005 की अधिसूचना के तहत ऐसी कृषि उपज के रूप में कवर नहीं होती, जिस पर APMC बाजार शुल्क वसूल सके।
नासिक APMC ने इस फैसले को चुनौती दी। मामला महाराष्ट्र सरकार के समक्ष अपील में पहुंचा, लेकिन 4 सितंबर 2014 के आदेश में सरकार ने भी पहले के निर्णय को बरकरार रखा।
इस तरह नासिक APMC की हींग पर बाजार शुल्क वसूलने की शक्ति पर प्रशासनिक स्तर पर रोक बनी रही। इसके बाद APMC ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया।
बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने क्या था मुख्य सवाल?
मामले की सुनवाई Justice Amit Borkar ने की। अदालत के सामने केवल यह तय करना नहीं था कि हींग सामान्य अर्थ में मसाला है या नहीं। असली सवाल यह था कि क्या हींग को महाराष्ट्र की संबंधित कानूनी अधिसूचना में इस्तेमाल की गई ‘Spices’ श्रेणी के भीतर माना जा सकता है, जबकि उसका नाम अलग से सूचीबद्ध नहीं है?
यही अंतर इस मामले को सामान्य खाद्य-वर्गीकरण के सवाल से अलग बनाता है।
कानून में किसी वस्तु पर शुल्क लगाने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि संबंधित वस्तु उस कानून और उसके तहत जारी अधिसूचना में निर्धारित श्रेणी के अंतर्गत आती है या नहीं।
अदालत ने इसी आधार पर विभिन्न कानूनी प्रावधानों और दस्तावेजों की समीक्षा की।
कोर्ट ने क्यों माना कि हींग मसाला है?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विभिन्न कानूनी स्रोतों का सहारा लिया। इनमें Spices Board Act, 1986, Customs Tariff से जुड़े प्रावधान और खाद्य सुरक्षा से संबंधित नियामकीय सामग्री भी शामिल थी।
अदालत के सामने विशेष रूप से यह तथ्य आया कि Spices Board Act की अनुसूची में Asafoetida को मसाले के रूप में शामिल किया गया है। अदालत ने इस कानूनी स्थिति को महत्वपूर्ण माना।
इसका अर्थ यह हुआ कि भारतीय कानून में Asafoetida को मसाले के रूप में पहचान पहले से मौजूद है। इसलिए केवल महाराष्ट्र की अधिसूचना में ‘Hing’ नाम अलग से नहीं लिखे होने के आधार पर उसे मसालों की व्यापक श्रेणी से बाहर करना उचित नहीं होगा।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि सरकार ने किसी अधिसूचना में एक वर्ग या श्रेणी का इस्तेमाल किया है, तो उस श्रेणी में आने वाली वस्तु को सिर्फ इसलिए बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका व्यक्तिगत नाम अलग से नहीं लिखा गया।
यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है।
सिर्फ नाम अलग से नहीं लिखा होना पर्याप्त आधार नहीं
इस मामले में व्यापारी पक्ष का प्रमुख तर्क था कि जब ‘Hing’ या ‘Asafoetida’ का नाम सूची में अलग से नहीं है, तो उस पर Market Fee नहीं लगाई जा सकती।
लेकिन हाई कोर्ट ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
अदालत के अनुसार, यदि अधिसूचना में ‘मसाल्याचे पदार्थ’ यानी Spices जैसी व्यापक श्रेणी दी गई है, तो उस श्रेणी में वास्तव में आने वाली वस्तु को सिर्फ व्यक्तिगत नाम के अभाव में बाहर करना उस व्यापक श्रेणी को संकीर्ण अर्थ देना होगा।
दूसरे शब्दों में, कानून में किसी वस्तु की श्रेणी महत्वपूर्ण है; हर वस्तु का नाम अलग-अलग लिखना हमेशा आवश्यक नहीं होता।
हालांकि अदालत ने एक महत्वपूर्ण सीमा भी स्पष्ट की। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी खाद्य उत्पाद में मसाला मौजूद होने मात्र से वह स्वयं मसाला बन जाएगा या उस पर Market Fee लागू हो जाएगी। वस्तु का संबंधित वैधानिक श्रेणी में वास्तव में आना जरूरी है।
8 दिसंबर 2005 की अधिसूचना बनी फैसले का आधार
इस पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार की 8 दिसंबर 2005 की अधिसूचना बेहद महत्वपूर्ण रही।
अदालत ने अधिसूचना में इस्तेमाल की गई ‘मसाल्याचे पदार्थ’ यानी Spices श्रेणी की व्याख्या की। अनुसूची में कई मसालों के नाम अलग-अलग दिए गए थे, लेकिन हींग का नाम अलग से दर्ज नहीं था।
यहीं से विवाद पैदा हुआ था।
हाई कोर्ट ने माना कि सूची में कुछ मसालों के नाम उदाहरण के तौर पर या विशिष्ट वस्तुओं के रूप में दिए जाने के बावजूद ‘Spices’ का व्यापक वर्ग केवल उन्हीं नामों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
जब अन्य केंद्रीय कानूनों में Asafoetida को स्पष्ट रूप से Spice माना गया है और राज्य की अधिसूचना में भी Spices की व्यापक श्रेणी मौजूद है, तो हींग को उस श्रेणी से बाहर रखने का पर्याप्त आधार नहीं बनता।
अब नासिक APMC क्या कर सकेगी?
फैसले का सबसे सीधा परिणाम नासिक APMC के लिए है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि हींग यानी Asafoetida संबंधित अधिसूचना के तहत मसालों की श्रेणी में आती है। इसलिए नासिक APMC को महाराष्ट्र Agricultural Produce Marketing कानून की धारा 31 के तहत हींग पर Market Fee लगाने और वसूलने का अधिकार है, बशर्ते शुल्क की वसूली कानून, नियमों और लागू अधिसूचनाओं के अनुरूप हो।
अदालत ने अपने आदेश में:
- 15 अक्टूबर 2011 के Director of Marketing के आदेश को रद्द किया।
- 4 सितंबर 2014 के महाराष्ट्र सरकार के आदेश को रद्द किया।
- हींग/Asafoetida को 8 दिसंबर 2005 की अधिसूचना में ‘Spices’ श्रेणी के अंतर्गत माना।
- नासिक APMC को धारा 31 के अनुसार Market Fee लगाने और वसूलने का अधिकार दिया।
- संबंधित व्यापारी को कानून के अनुसार बाजार शुल्क देने के लिए उत्तरदायी माना, जिसमें लागू होने पर पहले भुगतान की गई राशि का समायोजन भी शामिल हो सकता है।
फैसले का व्यापारियों पर क्या असर होगा?
हींग का कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि अब नासिक APMC क्षेत्र में हींग के व्यापार पर Market Fee की वैधानिक स्थिति स्पष्ट हो गई है।
व्यापारियों के लिए इसका मतलब यह है कि केवल इस आधार पर शुल्क से बचने का तर्क देना मुश्किल होगा कि ‘Hing’ नाम अधिसूचना में अलग से दर्ज नहीं है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि बाजार शुल्क की दर या उसकी गणना अदालत ने मनमाने ढंग से तय कर दी है। शुल्क की वसूली संबंधित कानून, नियम और लागू अधिसूचनाओं के अनुसार ही होगी।
यानी फैसले ने मुख्य रूप से हींग के वर्गीकरण और APMC की शुल्क लगाने की वैधानिक क्षमता पर स्थिति स्पष्ट की है।
क्या इससे हींग की कीमत बढ़ सकती है?
फैसले के बाद आम उपभोक्ता के मन में स्वाभाविक सवाल यह हो सकता है कि क्या अब बाजार में हींग महंगी हो जाएगी?
इसका सीधा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।
Market Fee व्यापार की लागत का एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन खुदरा कीमत कई दूसरे कारकों से भी प्रभावित होती है। इनमें आयात लागत, कच्चे माल की कीमत, परिवहन, पैकेजिंग, टैक्स, मुद्रा विनिमय दर, मांग-आपूर्ति और व्यापारी मार्जिन जैसे तत्व शामिल हैं।
इसलिए केवल हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर हींग की खुदरा कीमत कितनी बढ़ेगी या बढ़ेगी भी या नहीं, यह निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है।
फिर भी नासिक APMC क्षेत्र में व्यापार करने वालों की लागत संरचना पर इसका प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि अब Market Fee की वसूली को लेकर कानूनी स्थिति पहले की तुलना में स्पष्ट है।
फैसले का व्यापक कानूनी महत्व क्या है?
इस फैसले का महत्व केवल हींग तक सीमित नहीं माना जा सकता।
इस मामले में अदालत ने एक व्यापक कानूनी व्याख्या पर जोर दिया है—यदि कानून या अधिसूचना किसी वस्तु-वर्ग को व्यापक शब्दों में परिभाषित करती है, तो केवल इसलिए उस वर्ग की वस्तु को बाहर नहीं किया जा सकता कि उसका नाम अलग से नहीं लिखा गया।
हालांकि यह सिद्धांत हर मामले में स्वतः लागू नहीं होगा। संबंधित वस्तु का उस वैधानिक श्रेणी में आना आवश्यक रहेगा।
इसलिए भविष्य में इसी तरह के विवादों में यह देखा जा सकता है कि किसी विशेष वस्तु का कानूनी और नियामकीय वर्गीकरण क्या है तथा वह संबंधित अधिसूचना की व्यापक श्रेणी में आती है या नहीं।
Public Reaction: चुटकी भर हींग, लेकिन बड़ा कानूनी सवाल
हींग भारतीय रसोई का बेहद सामान्य मसाला है। इसलिए इस मामले की सबसे दिलचस्प बात यही है कि एक रोजमर्रा की खाद्य वस्तु का वर्गीकरण वर्षों तक प्रशासनिक और न्यायिक विवाद का विषय बना रहा।
आम उपभोक्ता के लिए यह मामला भले ही तकनीकी लगे, लेकिन व्यापारियों और APMC व्यवस्था के लिए इसका सीधा आर्थिक महत्व है।
इस फैसले के बाद यह बात भी चर्चा में आ सकती है कि सरकारी अधिसूचनाओं में वस्तुओं की सूची बनाते समय व्यापक श्रेणियों और अलग-अलग वस्तुओं के नाम के बीच संतुलन कैसे रखा जाए।
Expert View: असली मुद्दा ‘हींग’ नहीं, कानूनी वर्गीकरण है
कानूनी दृष्टि से देखें तो इस विवाद का केंद्र केवल यह सवाल नहीं था कि हींग मसाला है या नहीं। असली मुद्दा था कि किसी वैधानिक सूची में श्रेणीबद्ध भाषा की व्याख्या किस तरह की जाए।
यदि ‘Spices’ को केवल सूची में लिखे कुछ नामों तक सीमित कर दिया जाए, तो ऐसी श्रेणियों का दायरा बहुत छोटा हो सकता है। दूसरी ओर, किसी भी वस्तु को व्यापक श्रेणी में शामिल करने के लिए उसके वास्तविक स्वरूप और संबंधित कानून से उसका संबंध स्थापित करना जरूरी है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए हींग को मसालों की श्रेणी में रखा।
आगे क्या होगा?
अब फैसले के बाद नासिक APMC को हींग पर Market Fee की वसूली का स्पष्ट न्यायिक आधार मिल गया है। संबंधित व्यापारियों को भी शुल्क व्यवस्था के अनुसार अपने दायित्वों का पालन करना होगा।
भविष्य में इस फैसले का उल्लेख ऐसे मामलों में हो सकता है, जहां किसी वस्तु का नाम किसी अधिसूचना में अलग से दर्ज नहीं है, लेकिन वह किसी व्यापक वैधानिक श्रेणी में आती है।
हालांकि हर विवाद के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए किसी अन्य वस्तु पर इस फैसले को सीधे लागू करने से पहले उसकी संबंधित कानूनी श्रेणी, अधिसूचना और लागू नियमों को देखना आवश्यक होगा।
रसोई में जिस हींग की पहचान आम तौर पर केवल खुशबू और स्वाद बढ़ाने वाले मसाले के रूप में होती है, उसी हींग ने महाराष्ट्र में एक लंबा कानूनी विवाद खड़ा कर दिया। अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस विवाद में स्पष्ट कर दिया है कि Hing यानी Asafoetida को ‘Spices’ की श्रेणी में माना जाएगा और केवल सूची में उसका नाम अलग से नहीं होने के आधार पर उसे इस श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता।
1 सितंबर 2026 का यह फैसला नासिक APMC के लिए महत्वपूर्ण राहत है, क्योंकि अदालत ने उसे कानून के अनुसार हींग पर Market Fee लगाने और वसूलने का अधिकार स्वीकार किया है। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी वस्तु का नियमन केवल उसके व्यक्तिगत नाम से नहीं, बल्कि उस पर लागू व्यापक वैधानिक श्रेणी के आधार पर भी किया जा सकता है।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कानून की नजर में चुटकी भर हींग भी सिर्फ रसोई का मसाला नहीं, बल्कि स्पष्ट कानूनी वर्गीकरण वाली वस्तु है।

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