भोपाल-ग्वालियर के बारे में सामने आया अनसुना रहस्य

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में पुरातत्व विभाग को एक बड़ी कामयाबी मिली है। यहां जावरा रियासत से जुड़ी एक पुरानी लिखित प्रति सामने आई है। यह प्रति लगभग 149 साल पुरानी बताई जा रही है। इसे 1877 में हुए ऐतिहासिक दिल्ली दरबार के दौरान लिथोग्राफी तकनीक से तैयार कराया गया था। यह दस्तावेज देवनागरी और उर्दू-फारसी मिश्रित खड़ी बोली में लिखा गया है। इसमें ब्रिटिश हुकूमत की भारतीय रियासतों के प्रति नीति दर्ज है। इसमें राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक तीनों पहलुओं का जिक्र है।

(ब्यूरो कार्यालय)
रतलाम (साई)।
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में पुरातत्व विभाग को एक बड़ी कामयाबी मिली है। यहां जावरा रियासत से जुड़ी एक पुरानी लिखित प्रति सामने आई है। यह प्रति लगभग 149 साल पुरानी बताई जा रही है। इसे 1877 में हुए ऐतिहासिक दिल्ली दरबार के दौरान लिथोग्राफी तकनीक से तैयार कराया गया था। यह दस्तावेज देवनागरी और उर्दू-फारसी मिश्रित खड़ी बोली में लिखा गया है। इसमें ब्रिटिश हुकूमत की भारतीय रियासतों के प्रति नीति दर्ज है। इसमें राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक तीनों पहलुओं का जिक्र है। इसके अलावा, दस्तावेज में 1857 की क्रांति के बाद की नीति का भी जिक्र है। बड़ौदा रियासत ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसके बदले उसका तीन लाख रुपए का टैक्स माफ हुआ था। ग्वालियर और कोल्हापुर को अंग्रेजों का करीबी सहयोगी बताया गया है।

दस्तावेज की पृष्ठभूमि

दस्तावेज बताता है कि अंग्रेज रियासतों की हैसियत तोपों की सलामी से आंकते थे। नेपाल, बड़ौदा और ग्वालियर को सबसे ऊंचा दर्जा मिला था। इन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती थी।

वहीं भोपाल, त्रावणकोर और कोल्हापुर दूसरे नंबर पर थे। इन्हें 19 तोपों की सलामी मिलती थी। खास बात यह है कि हिंदुस्तान से बाहर के शासकों को भी यह दर्जा मिला था। मस्कट जैसे क्षेत्र को सामरिक महत्व के कारण सर्वोच्च श्रेणी में रखा गया था।

ब्रिटिश हुकूमत की नीति

दस्तावेज में 1857 की क्रांति के बाद की नीति का भी जिक्र है। बड़ौदा रियासत ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसके बदले उसका तीन लाख रुपए का टैक्स माफ हुआ था। ग्वालियर और कोल्हापुर को अंग्रेजों का करीबी सहयोगी बताया गया है।

इसके अलावा, दस्तावेज में प्राकृतिक संसाधनों का भी जिक्र है। नेपाल के लौह, सोना, चांदी और गंधक जैसे खनिजों का विवरण दर्ज है। जम्मू-कश्मीर के केसर, अकीक और बिल्लौर का भी उल्लेख है। यह दिखाता है कि अंग्रेज रियासतों के संसाधनों पर भी नजर रखते थे।

historical documents के महत्व

मध्य प्रदेश पुरातत्व आयुक्त मदन बिभीषण नागरगोजे ने इस खोज पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बताया कि ज्ञान भारत मिशन के तहत प्रदेश से कई दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं। ये दस्तावेज भारत के अनछुए इतिहास को सामने ला रहे हैं। विभाग इन्हें अब डिजिटलाइज कर रहा है।

पुरातत्व विभाग के सलाहकार और लिपि विशेषज्ञ नईम उद्दीन ने इस दस्तावेज की पृष्ठभूमि बताई। यह प्रति जावरा रियासत के नवाब परिवार से जुड़ी है। रतलाम पुरातत्व टीम ने इसे जावरा के पुजारी संघ के प्रमुख महेश शर्मा से हासिल किया। मध्य प्रदेश की खबरें के लिए हमारी वेबसाइट पर विजिट करें।

निष्कर्ष

दस्तावेज में 17 प्रमुख देसी रियासतों का ब्यौरा है। इसके साथ काबुल और मस्कट जैसे भारत से बाहर के क्षेत्रों का भी उल्लेख है। इनका सैन्य, प्रशासनिक और आर्थिक विवरण दर्ज है। इससे साफ है कि अंग्रेज अपनी सुरक्षा के लिए इन क्षेत्रों पर भी नजर रखते थे।

इस खोज के बाद, मध्य प्रदेश के इतिहास को और गहराई से समझने का मौका मिलेगा। मध्य प्रदेश की खबरें और भारत की खबरें के लिए हमारी वेबसाइट पर विजिट करें।