स्वास्थ्य के नाम पर करोड़ों की लूट
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(नन्द किशोर)
भोपाल (साई)।मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले से भ्रष्टाचार की एक ऐसी खौफनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। आम जनता को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भेजे जाने वाले सरकारी धन की किस तरह बंदरबांट की जा रही है, यह जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में हुए एक करोड़ रुपये के फर्जी बिल घोटाले से उजागर हुआ है। बिना कोई सामग्री खरीदे, सिर्फ कागजों पर बिल पास कर करोड़ों रुपये निकाल लिए गए। इस मामले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) मध्यप्रदेश ने सख्त कदम उठाते हुए संविदा जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) श्री आदित्य तिवारी को शासकीय कार्य से तत्काल प्रभाव से विरक्त (हटा) कर दिया है । यह घोटाला सिर्फ एक वित्तीय गबन नहीं है, बल्कि उन हजारों मरीजों के विश्वास के साथ किया गया धोखा है, जो सरकारी अस्पतालों की चौखट पर इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं।
पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुई घोटाले की जांच?
भ्रष्टाचार के इस काले खेल का पर्दाफाश रातों-रात नहीं हुआ। लंबे समय से CMHO कार्यालय में चल रही संदिग्ध गतिविधियों और फर्जी देयकों (बिलों) के भुगतान की भनक जबलपुर प्रशासन को लग गई थी।मामले की गंभीरता को समझते हुए, जबलपुर कलेक्टर ने 01 अप्रैल 2026 को प्राप्त शिकायत के आधार पर एक विशेष जांच दल (Investigating Team) का गठन किया ।
प्रशासनिक टीम ने बिना कोई समय गंवाए31 मार्च 2026 को कार्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जबलपुर में आकस्मिक और सघन निरीक्षण किया । इस छापे के दौरान जब दस्तावेजों और स्टॉक रजिस्टर को खंगाला गया, तो एक के बाद एक कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आने लगे। जांच दल की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि स्वास्थ्य विभाग में ऊपर से लेकर नीचे तक एक संगठित भ्रष्टाचार का सिंडिकेट काम कर रहा था।
वर्तमान स्थिति: 1करोड़ के फर्जी बिलों की पूरी क्रोनोलॉजी
जांच के दौरान स्टोर शाखा की स्टॉक रजिस्टर में जो प्रविष्टियां मिलीं, वे सीधे तौर पर एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा थीं। सरकारी खजाने को लूटने के लिए ‘सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल’ नाम की फर्म का सहारा लिया गया।
- पहला चरण: स्टॉक रजिस्टर के अनुसार, 17 मार्च 2026 को एक ही दिन में 6 देयकों (बिलों) की प्रविष्टि की गई । इन बिलों के माध्यम से कुल42,99,998/- रुपये की सामग्री का क्रय दिखाया गया ।
- दूसरा चरण: इसके ठीक एक हफ्ते बाद, 24 मार्च 2026 को 7 और नए देयकों की प्रविष्टि कर दी गई । इन सात बिलों की कुल राशि57,75,000/- रुपये थी ।
- घोटाले का कुल आकार: इस प्रकार मात्र कुछ ही दिनों के अंतराल में कुल 13 फर्जी देयकों (6+7) के माध्यम से 1,00,74,998/- (एक करोड़ चौहत्तर हजार नौ सौ अन्ठानब्बे) रुपये का भारी-भरकम बिल तैयार कर लिया गया ।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जब जांच दल ने भंडार गृह (Store Room) का भौतिक निरीक्षण किया, तो वहां इन बिलों में दर्ज एक भी सामग्री मौजूद नहीं थी । करोड़ों रुपये का सामान केवल स्टॉक रजिस्टर के पन्नों तक ही सीमित था।
अधिकारियों की मिलीभगत: DPMऔर फार्मासिस्ट के परस्पर विरोधी बयान
जब जांच दल ने पूछताछ शुरू की, तो विभाग के अधिकारियों के बीच खलबली मच गई और वे एक-दूसरे पर दोष मढ़ने लगे।संविदा जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) श्री आदित्य तिवारी ने जांच दल के सामने दावा किया कि शिकायत में उल्लेखित देयक में दर्शाई गई सामग्री आंशिक रूप से प्राप्त कर ली गई है और कुछ सामग्री प्राप्त किया जाना शेष है ।
हालांकि, उनका यह झूठ ज्यादा देर तक नहीं टिक सका।जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि13 देयकों में से कोई भी सामग्री स्टोर शाखा में भौतिक रूप से उपलब्ध नहीं है । इसके विपरीत, एक अन्य कर्मचारी ने DPM की पूरी पोल खोल दी। संविदा फार्मासिस्ट जवाहर लोधी ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से बताया कि स्टॉक रजिस्टर में इन फर्जी देयकों की एंट्री सीधेDPM श्री आदित्य तिवारी के दबाव और उनके कहने पर की गई थी । उसने यह भी स्वीकार किया कि सामग्री भौतिक रूप से भंडार गृह में कभी उपलब्ध कराई ही नहीं गई थी । इस बयान ने यह साबित कर दिया कि बिना सामग्री आए ही कागजों पर हेराफेरी की गई थी ।
वित्तीय नियमों का खुला उल्लंघन और लेखा शाखा की घोर लापरवाही
यह घोटाला सिर्फ स्टोर रूम तक सीमित नहीं था; लेखा शाखा (Accounts Branch) ने भी इस भ्रष्टाचार में पूरी तरह से आंखें मूंद रखी थीं।जांच में पता चला कि13 देयकों में से केवल एक देयक (23 मार्च 2026 का 7,70,000/- रुपये का बिल) को छोड़कर बाकी सभी 12 देयकों का भुगतान किया जा चुका था । यानी, कुल 93,04,998/- (तिरान्न्बे लाख चार हजार नौ सौ अन्ठानब्बे रुपये) की सरकारी राशि बिना किसी भौतिक सत्यापन के वेंडर (सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल) के खाते में ट्रांसफर कर दी गई ।
- भंडार क्रय नियमों की अनदेखी: मध्यप्रदेश भण्डार क्रय तथा सेवा उपार्जन नियम 2015 (यथा संशोधित 2022) के बिन्दु क्रमांक 3 के अनुसार, किसी भी भुगतान से पूर्व यह अनिवार्यतः सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सामग्री का भौतिक निरीक्षण हुआ है और वह विनिर्देशनों के अनुरूप है । लेकिन यहाँ सामग्री प्राप्त करने की प्रत्याशा (उम्मीद) में ही करोड़ों का भुगतान कर दिया गया ।
- कैशबुक का गायब होना: लेखा शाखा की सबसे बड़ी लापरवाही यह सामने आई कि वहां कैशबुक का संधारण सितंबर 2025 तक ही किया गया था । 6महीने से अधिक समय तक कैशबुक अपडेट न होने के कारण इन करोड़ों रुपये के भुगतानों की प्रविष्टि रिकॉर्ड में थी ही नहीं । यह स्पष्ट रूप से एक बड़ी आपराधिक साजिश की ओर इशारा करता है।
संजीवनी केंद्रों के नाम पर भी हुआ भारी फर्जीवाड़ा
जनता को उनके घर के पास प्राथमिक उपचार देने के लिए शुरू की गई संजीवनी क्लीनिक योजना को भी भ्रष्ट अधिकारियों ने कमाई का जरिया बना लिया।जांच दल ने पाया कि शिकायत में उल्लेखित मरम्मत (रंगाई-पुताई) और कंप्यूटर सुधार के देयकों का भी भौतिक अस्तित्व नहीं था । जिले के विभिन्न संजीवनी केंद्रों में भवन मरम्मत का कार्य दिखाया गया था, लेकिन धरातल पर कोई कार्य नहीं हुआ था ।
इसके अलावा, 40 अलमारियों की खरीदी का फर्जीवाड़ा भी सामने आया।दस्तावेजों में कुल40 अलमारियां खरीदी गई बताई गईं, लेकिन वितरण पंजी में केवल 21 अलमारियों का ही वितरण विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों में दिखाया गया । शेष अलमारियों को संजीवनी क्लीनिक कस्तूरबा गांधी वार्ड (चंचला बाई कालेज के बाजू में) रखा जाना बताया गया, जो वास्तविकता से परे था ।
NHMकी बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई: DPMपर गिरी गाज
जांच रिपोर्ट के तथ्य सामने आने के बाद, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) मध्यप्रदेश ने सख्त रुख अपनाया।अपर मिशन संचालक दिशा प्रणय नागवंशी द्वारा03 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में इस पूरे प्रकरण को गंभीर वित्तीय अनियमितता और अनुशासनहीनता करार दिया गया ।
आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि श्री आदित्य तिवारी (संविदाDPM) का यह कृत्य गंभीर प्रकृति की शिकायत की श्रेणी में आता है और यह कार्य के प्रति उनकी घोर लापरवाही एवं उदासीनता को दर्शाता है । इस कृत्य से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की छवि धूमिल हुई है ।
परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन संविदा मानव संसाधन मैन्युअल 2025 की कंडिका 11.6.1 और 11.6.3 के कड़े प्रावधानों का उपयोग करते हुए एक बड़ा कदम उठाया गया । विस्तृत जांच की अवधि तक श्री आदित्य तिवारी को तत्काल प्रभाव से शासकीय कार्य से विरक्त (हटा) कर दिया गया है । सबसे बड़ी बात यह है कि इस जांच अवधि के दौरान उन्हें उनके निर्धारित पारिश्रमिक (सैलरी) का केवल50 प्रतिशत ही प्राप्त होगा ।
आम जनता पर प्रभाव और जन आक्रोश
स्वास्थ्य विभाग आम जनता के जीवन से जुड़ा सीधा महकमा है। जब वहां करोड़ों का घोटाला होता है, तो उसका सीधा असर समाज के गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। जबलपुर की जनता में इस खुलासे के बाद भारी आक्रोश है। स्थानीय लोगों का मानना है कि जो पैसा अस्पतालों में दवाइयों, बिस्तरों और जीवन रक्षक उपकरणों पर खर्च होना चाहिए था, उसे फर्जी बिलों के जरिए डकार लिया गया। कोरोना और अन्य मौसमी बीमारियों के दौर में जहां ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य केंद्रों पर सुविधाओं का टोटा रहता है, वहीं 1 करोड़ रुपये सिर्फ कागजों पर उड़ा दिए गए। जनता अब इस पूरे मामले में शामिल हर छोटे-बड़े अधिकारी की गिरफ्तारी और वेंडर के खिलाफ धोखाधड़ी की FIR की मांग कर रही है।
विशेषज्ञों की राय: सिस्टम में सुधार की सख्त जरूरत
प्रशासनिक विशेषज्ञों और पूर्व स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि यह घोटाला सिस्टम की उस गहरी खामी को उजागर करता है जहां ऑडिट और मॉनिटरिंग तंत्र पूरी तरह से फेल हो चुका है। कैशबुक का 6 महीने तक मेंटेन न होना और फिर भी ट्रेजरी से करोड़ों रुपये पास हो जाना यह साबित करता है कि स्थानीय स्तर पर चेक्स एंड बैलेंस (Checks and Balances) मौजूद नहीं हैं। विशेषज्ञों की राय में, जब तक ई-प्रोक्योरमेंट (E-procurement) और भुगतान से पहले थर्ड-पार्टी द्वारा जियो-टैग (Geo-tagged) भौतिक सत्यापन को अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक ऐसे फर्जी बिल घोटाले होते रहेंगे।
भविष्य की संभावनाएं: क्या होगी आगे की कार्रवाई?
श्री आदित्य तिवारी को कार्य से विरक्त करना इस दिशा में केवल पहला कदम है। मामले की विस्तृत जांच अभी जारी है। भविष्य में इस बात की पूरी संभावना है कि:
- FIRदर्ज होना: सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल के मालिकों और इस पूरे फर्जीवाड़े में शामिल स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों पर पुलिस में आपराधिक मामला (420, गबन) दर्ज किया जा सकता है।
- अन्य जिलों में जांच: यह संभावना भी जताई जा रही है कि संबंधित वेंडर ने प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह का फर्जीवाड़ा किया हो सकता है, जिसकी विस्तृत जांच राज्य स्तरीय टीम कर सकती है।
- कड़ी सजा: दोष सिद्ध होने पर न केवल सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं, बल्कि गबन की गई 93 लाख रुपये की राशि की वसूली भी आरोपियों की संपत्ति कुर्क करके की जा सकती है।
निष्कर्ष / Conclusion
जबलपुर CMHO कार्यालय का यह 1 करोड़ रुपये का फर्जी बिल घोटाला सरकारी तंत्र में व्याप्त उस दीमक का प्रमाण है जो जनहित की योजनाओं को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। बिना एक भी सुई खरीदे 93 लाख रुपये का भुगतान हो जाना कोई साधारण लिपिकीय त्रुटि नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध है। हालांकि, जबलपुर जिला प्रशासन की सतर्कता और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) द्वारा DPM आदित्य तिवारी पर की गई त्वरित कार्रवाई एक सकारात्मक संकेत है कि भ्रष्टाचार को छुपाया नहीं जाएगा। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस महाघोटाले की जड़ तक पहुंचकर ‘सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल’ सहित सभी सफेदपोश अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए। मध्य प्रदेश सरकार को अपने ऑडिट तंत्र को और अधिक मजबूत करना होगा, ताकि भविष्य में जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से स्वास्थ्य के नाम पर होने वाले ऐसे भद्दे मजाक को हमेशा के लिए रोका जा सके।

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