कोलेस्ट्रॉल की इस दवा से किडनी पर असर?रोसुवास्टेटिन पर नई रिसर्च ने बढ़ाई चिंता,जानिए पूरा सच
रोसुवास्टेटिन पर उठे सवाल,लेकिन घबराने से पहले समझिए पूरी तस्वीर
(विनीत खरे)
नई दिल्ली (साई)।आज की तेज रफ्तार जिंदगी, अनियमित खान-पान, तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने ‘बैड कोलेस्ट्रॉल’ यानी LDL को एक आम लेकिन गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना दिया है। दिल की बीमारियों, हार्ट अटैक और स्ट्रोक से बचाव के लिए दुनियाभर में लाखों मरीज स्टैटिन दवाओं का सेवन करते हैं। इन्हीं स्टैटिन्स में एक बेहद लोकप्रिय नाम है रोसुवास्टेटिन (Rosuvastatin), जिसे डॉक्टर अक्सर हाई कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने के लिए लिखते हैं।
लेकिन अब इसी दवा को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या दिल की सुरक्षा देने वाली यह दवा कुछ मरीजों में किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है? यही मुद्दा अब मरीजों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच गंभीर चर्चा का विषय बन गया है।
हाल के वर्षों में प्रकाशित एक बड़े ऑब्जर्वेशनल अध्ययन में यह पाया गया कि रोसुवास्टेटिन लेने वाले मरीजों में एटोरवास्टेटिन की तुलना में पेशाब में खून (Hematuria),पेशाब में प्रोटीन (Proteinuria)और गंभीर किडनी खराबी के कुछ संकेतों का जोखिम थोड़ा अधिक देखा गया। इस अध्ययन में करीब 9.48लाख नए स्टैटिन यूजर्स के डेटा का विश्लेषण किया गया था, जिसमें 1,52,101रोसुवास्टेटिन और 7,95,799एटोरवास्टेटिन उपयोगकर्ता शामिल थे।
रिसर्च की पृष्ठभूमि: पुरानी शंका,अब बड़ा डेटा
रोसुवास्टेटिन को लेकर किडनी संबंधी चिंताएं बिल्कुल नई नहीं हैं। जब इस दवा को मंजूरी मिली थी, तब शुरुआती सुरक्षा मूल्यांकन में कुछ मरीजों में यूरिन में खून और यूरिन में प्रोटीन जैसे संकेत सामने आए थे। मेडिकल साइंस में ये दोनों संकेत कई बार किडनी पर दबाव या शुरुआती क्षति की ओर इशारा कर सकते हैं।
हालांकि उस समय स्टैटिन दवाओं के हृदय संबंधी लाभ इतने मजबूत थे कि इन संकेतों पर व्यापक स्तर पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। लेकिन बाद में प्रकाशित अध्ययन ने इस विषय को फिर से केंद्र में ला दिया।
अध्ययन जॉन्स हॉपकिंस से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया और 2022मेंJournal of the American Society of Nephrology (JASN) में प्रकाशित हुआ। इसमें 2011 से 2019 तक के डिइडेंटिफाइड इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष: कितना बढ़ा जोखिम?
अध्ययन के अनुसार, एटोरवास्टेटिन की तुलना में रोसुवास्टेटिन से जुड़े कुछ किडनी-संबंधी जोखिमों में हल्की लेकिन ध्यान देने योग्य बढ़ोतरी देखी गई।
रिपोर्ट के प्रमुख आंकड़े
- हेमेट्यूरिया (पेशाब में खून) का जोखिम: 8%अधिक
- प्रोटीन्यूरिया (पेशाब में प्रोटीन) का जोखिम: 17%अधिक
- Kidney Failure with Replacement Therapy (KFRT) यानी ऐसी गंभीर स्थिति जिसमें डायलिसिस/ट्रांसप्लांट जैसी जरूरत पड़ सकती है: 15%अधिक
ये आंकड़े अध्ययन में दर्ज Hazard Ratios पर आधारित हैं:
- Hematuria: HR 1.08
- Proteinuria: HR 1.17
- KFRT: HR 1.15
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्ययन ने “हर मरीज में निश्चित नुकसान” नहीं कहा, बल्कि “तुलनात्मक रूप से जोखिम थोड़ा बढ़ा” होने का संकेत दिया। यही फर्क समझना बेहद जरूरी है।
हाई डोज में खतरा ज्यादा,कमजोर किडनी वालों के लिए खास अलर्ट
रिसर्च का सबसे चिंताजनक पहलू डोज से जुड़ा रहा। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन मरीजों को रोसुवास्टेटिन की उच्च खुराक दी गई,उनमें जोखिम अधिक स्पष्ट दिखा।
विशेष रूप से, जिन मरीजों की किडनी पहले से कमजोर थी — जैसे eGFR 30 ml/min/1.73 m²से कम — उनके लिए FDA लेबलिंग के अनुसार रोसुवास्टेटिन की अधिकतम दैनिक खुराक10 mg सुझाई जाती है।
लेकिन अध्ययन में सामने आया कि severe CKDवाले लगभग44%मरीजों को इससे अधिक डोज दी जा रही थी, और कई मामलों में 20 mg या 40 mg तक की खुराक लिखी गई। यह स्थिति चिकित्सा दृष्टि से चिंताजनक मानी गई।
यानी असली चिंता सिर्फ दवा नहीं, बल्कि दवा का चयन + डोज + मरीज की किडनी की मौजूदा स्थिति है।
क्या दिल की सुरक्षा में दोनों दवाएं बराबर हैं?
यह सवाल सबसे अहम है, क्योंकि स्टैटिन दवाएं आखिरकार दिल की सुरक्षा के लिए ही दी जाती हैं।
2022 के जॉन्स हॉपकिंस अध्ययन के अनुसार, रोसुवास्टेटिन और एटोरवास्टेटिन के कार्डियोवैस्कुलर फायदेbroadly similar पाए गए। यानी हार्ट प्रोटेक्शन के लिहाज से दोनों प्रभावी हैं। यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने सावधानीपूर्वक प्रिस्क्राइबिंग और मॉनिटरिंग की सलाह दी।
हालांकि 2025 में प्रकाशित एक दूसरे बड़े अध्ययन (136,680 मरीज) में यह भी देखा गया कि रोसुवास्टेटिन के साथ कार्डियोवैस्कुलर इवेंट्स का जोखिम कुछ कम था, जबकि हेमेट्यूरिया और प्रोटीन्यूरिया में बढ़ोतरी सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं थी। इस अध्ययन ने निष्कर्ष दिया कि कुल मिलाकर रोसुवास्टेटिन के कार्डियोवैस्कुलर लाभ उसके मामूली किडनी जोखिमों से अधिक हो सकते हैं।
इसका मतलब क्या है?
- हर अध्ययन एक जैसा निष्कर्ष नहीं देता
- जोखिम “शून्य” नहीं है
- लेकिन लाभ भी मजबूत हैं
- इसलिए फैसला हमेशा individual patient profile पर होना चाहिए
मरीजों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर आप रोसुवास्टेटिन ले रहे हैं, तो इस खबर को पढ़कर घबराना या दवा अचानक बंद कर देना सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
स्टैटिन दवाएं दिल के मरीजों, डायबिटीज मरीजों, हाई LDL वाले लोगों और हार्ट अटैक/स्ट्रोक के हाई-रिस्क समूहों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। इन्हें अचानक बंद करने से:
- LDL तेजी से बढ़ सकता है
- हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है
- स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है
- पहले से मौजूद कार्डियोवैस्कुलर बीमारी बिगड़ सकती है
इसलिए यह खबर दवा बंद करने का संकेत नहीं, बल्कि जागरूकता,सही मॉनिटरिंग और डॉक्टर से परामर्श का संदेश है।
किडनी खराब होने के शुरुआती संकेत: किन लक्षणों पर रखें नजर
स्टैटिन लेने वाले हर मरीज को इन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए, खासकर अगर वह लंबे समय से हाई डोज ले रहा हो या पहले से किडनी की बीमारी हो।
संभावित चेतावनी संकेत
- यूरिन के रंग में बदलाव
पेशाब का रंग गुलाबी, लाल, भूरा या चाय जैसा दिखना - झागदार पेशाब
बार-बार अत्यधिक झागदार यूरिन आना - शरीर में सूजन
पैरों, टखनों, उंगलियों या आंखों के नीचे सूजन - असामान्य थकान
बिना अधिक काम के भी कमजोरी या भारीपन - पीठ या कमर के पीछे दर्द
पसलियों के नीचे दोनों तरफ दर्द या दबाव - ब्लड प्रेशर बढ़ना
किडनी फंक्शन प्रभावित होने पर बीपी बढ़ सकता है - क्रिएटिनिन याeGFRरिपोर्ट में बदलाव
कई बार बिना लक्षण भी किडनी पर असर दिख सकता है
डॉक्टर क्या सलाह देते हैं?दवा नहीं,निगरानी जरूरी
विशेषज्ञों की राय यही है कि स्टैटिन दवाओं को “वन साइज फिट्स ऑल” तरीके से नहीं देखना चाहिए। हर मरीज की उम्र, शुगर, ब्लड प्रेशर, किडनी फंक्शन, हार्ट रिस्क और पहले से मौजूद बीमारियों को देखकर दवा चुनी जानी चाहिए।
जरूरी मेडिकल सावधानियां
- दवा खुद से बंद न करें
- Kidney Function Test (KFT) समय-समय पर करवाएं
- Urine Routine / Urine Protein Test कराएं
- Serum CreatinineऔरeGFR रिपोर्ट ट्रैक करें
- यदि CKD है, तो डॉक्टर से पूछें:
- क्या मेरी डोज सही है?
- क्या 5 mg/10 mg पर्याप्त है?
- क्या एटोरवास्टेटिन बेहतर विकल्प हो सकता है?
किन मरीजों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए?
- पहले से CKD (Chronic Kidney Disease) वाले मरीज
- डायबिटीज के मरीज
- बुजुर्ग
- हाई डोज (20 mg या 40 mg) लेने वाले
- एक साथ कई दवाएं लेने वाले मरीज
- जिनकी eGFR पहले से कम है
सार्वजनिक चिंता क्यों बढ़ी?
ऐसी खबरें तेजी से वायरल होती हैं क्योंकि:
- कोलेस्ट्रॉल की दवाएं करोड़ों लोग लेते हैं
- “किडनी फेल्योर” शब्द लोगों को स्वाभाविक रूप से डराता है
- सोशल मीडिया पर अक्सर आधी-अधूरी जानकारी फैलती है
- लोग दवा के फायदे से ज्यादा साइड इफेक्ट पर फोकस कर लेते हैं
लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा को संदर्भ के साथ पढ़ना जरूरी है।
यह रिसर्च “कुल दवा खतरनाक है” नहीं कहती, बल्कि “कुछ मरीजों में तुलनात्मक जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए सावधानी रखें” कहती है।
पॉलिसी और हेल्थ सिस्टम के लिए क्या संदेश?
यह मामला सिर्फ एक दवा का नहीं, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक बड़ा संदेश है।
हेल्थ सिस्टम के लिए प्रमुख सीख
- स्टैटिन प्रिस्क्रिप्शन से पहले बेसलाइन KFT जरूरी हो
- हाई-रिस्क मरीजों में eGFR आधारित डोजिंग लागू हो
- फार्मेसी और डॉक्टर दोनों स्तर पर डोज अलर्ट सिस्टम बने
- फॉलो-अप प्रोटोकॉल तय हों
- मरीजों को लिखित सलाह दी जाए कि कब कौन-सा टेस्ट कराना है
भारत जैसे देशों में जहां लंबे समय तक मरीज बिना नियमित जांच के दवा लेते रहते हैं, वहां यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
भविष्य में क्या बदल सकता है?
इस तरह की रिसर्च के बाद आने वाले समय में कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं:
संभावित बदलाव
- डॉक्टर रोसुवास्टेटिन लिखते समय किडनी प्रोफाइल पर अधिक ध्यान देंगे
- हाई डोज की जगह लो-टू-मॉडरेट डोज को प्राथमिकता मिल सकती है
- CKD मरीजों में एटोरवास्टेटिन का उपयोग बढ़ सकता है
- मरीजों के लिए रूटीन मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल मजबूत हो सकता है
- पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का महत्व और बढ़ेगा
सबसे जरूरी बात: डर नहीं,समझदारी
रोसुवास्टेटिन आज भी एक प्रभावी और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली स्टैटिन दवा है। यह लाखों लोगों में LDL कम करने और हार्ट अटैक/स्ट्रोक के जोखिम को घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन हर प्रभावी दवा की तरह, इसका सही इस्तेमाल भी उतना ही जरूरी है।
अगर मरीज की किडनी पहले से कमजोर है, डोज ज्यादा है, या लंबे समय तक मॉनिटरिंग नहीं हो रही, तो समस्या का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में इलाज का सही रास्ता है:
- सही दवा
- सही डोज
- सही मरीज
- सही समय पर टेस्ट
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बिगड़ते खान-पान के कारण ‘बैड कोलेस्ट्रॉल’ (LDL) एक वैश्विक समस्या बन चुका है। इसे नियंत्रित करने के लिए दुनिया भर में स्टैटिन (Statins) दवाओं का सहारा लिया जाता है। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय दवा है रोसुवास्टेटिन (Rosuvastatin)।
हाल ही में अमेरिका की प्रतिष्ठित जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी (Johns Hopkins University) के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला अध्ययन प्रकाशित किया है, जिसने चिकित्सा जगत में नई बहस छेड़ दी है। इस रिसर्च के केंद्र में यह सवाल है कि क्या यह जीवनरक्षक दवा आपकी किडनी (गुर्दे) के लिए अनजाने में कोई बड़ी मुसीबत तो खड़ी नहीं कर रही है?
रिसर्च की पृष्ठभूमि: एक पुरानी शंका पर नई मुहर
दरअसल, रोसुवास्टेटिन और किडनी के स्वास्थ्य के बीच संबंधों को लेकर चिंताएं नई नहीं हैं। जब सालों पहले US Food and Drug Administration (FDA) ने इस दवा को पहली बार मंजूरी दी थी, तभी शुरुआती क्लीनिकल ट्रायल्स में कुछ मरीजों के यूरिन (मूत्र) में खून (Hematuria) और प्रोटीन (Proteinuria) जैसे लक्षण देखे गए थे। चिकित्सा विज्ञान में इन्हें किडनी की खराबी या तनाव के शुरुआती संकेत माना जाता है।
उस समय इन संकेतों पर बहुत गहराई से गौर नहीं किया गया क्योंकि दवा के हृदय संबंधी लाभ बहुत अधिक थे। अब, जॉन्स हॉपकिंस के शोधकर्ताओं ने करीब 9लाख से अधिक लोगों के स्वास्थ्य डेटा का बारीकी से विश्लेषण कर उस कमी को पूरा किया है। इस अध्ययन में रोसुवास्टेटिन की तुलना एक अन्य प्रसिद्ध और सुरक्षित मानी जाने वाली स्टैटिन दवा, एटोरवास्टेटिन (Atorvastatin) से की गई है।
अध्ययन के मुख्य आंकड़े: क्या कहती है रिपोर्ट?
तीन साल तक चली इस व्यापक स्टडी के नतीजे काफी चिंताजनक हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि रोसुवास्टेटिन का सेवन करने वाले मरीजों में किडनी से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम तुलनात्मक रूप से काफी अधिक है। आंकड़ों के आईने में देखें तो स्थिति कुछ इस प्रकार है:
| लक्षण/बीमारी | जोखिम में वृद्धि (Atorvastatinकी तुलना में) |
| हेमेट्यूरिया (यूरिन में खून आना) | 8 प्रतिशत अधिक |
| प्रोटीन्यूरिया (यूरिन में प्रोटीन निकलना) | 17 प्रतिशत अधिक |
| किडनी फेल्योर (गंभीर स्थिति) | 15 प्रतिशत अधिक (हाई डोज लेने वालों में) |
अध्ययन में पाया गया कि जो लोग रोसुवास्टेटिन की उच्च खुराक (High Dose) ले रहे थे, उनमें जोखिम सबसे अधिक था। किडनी फेल्योर की स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि मरीज को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट तक की नौबत आ सकती है।
एक गंभीर चूक: कमजोर किडनी और हाई डोज
रिसर्च में एक और बेहद महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू सामने आया है। नियमों के मुताबिक, जिन मरीजों की किडनी पहले से ही कमजोर होती है या जिन्हें किडनी की कोई पुरानी बीमारी (CKD) है, उन्हें दवा की खुराक बहुत सावधानी से दी जानी चाहिए।
लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया कि कई मामलों में उन मरीजों को भी रोसुवास्टेटिन की भारी डोज (40mgया अधिक) दी जा रही थी जिनकी किडनी पहले से ही सही ढंग से काम नहीं कर रही थी। चिकित्सा मानकों के लिहाज से यह बेहद जोखिम भरा है और किडनी फेल्योर की प्रक्रिया को तेज कर सकता है।
दिल की सुरक्षा में दोनों दवाएं बराबर, फिर जोखिम क्यों?
इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प और विचारणीय पहलू यह है कि हृदय रोगों (Heart Attacks & Strokes) से बचाने के मामले में रोसुवास्टेटिन और एटोरवास्टेटिन दोनों ही एक समान रूप से प्रभावी साबित हुई हैं।
“जब दोनों दवाएं दिल को सुरक्षित रखने में बराबर का काम कर रही हैं, तो ऐसी दवा का चुनाव क्यों किया जाए जो किडनी के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा करती हो?” — यह सवाल अब डॉक्टरों और विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं का चुनाव करते समय मरीज की किडनी की सेहत (eGFR levels) को ध्यान में रखना अब अनिवार्य हो जाना चाहिए।
किडनी खराब होने के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
यदि आप कोलेस्ट्रॉल की दवा ले रहे हैं, तो इन लक्षणों के प्रति सचेत रहें:
- यूरिन के रंग में बदलाव: यूरिन का रंग गहरा लाल या चाय जैसा होना (खून की उपस्थिति)।
- झागदार यूरिन: पेशाब में अत्यधिक झाग आना (प्रोटीन निकलने का संकेत)।
- सूजन: पैरों, टखनों या आंखों के नीचे अकारण सूजन।
- थकान: बिना किसी खास काम के बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।
- पीठ में दर्द: पसलियों के ठीक नीचे पीछे की तरफ दर्द महसूस होना।
मरीजों के लिए विशेष सावधानी और सलाह
यह रिसर्च कोलेस्ट्रॉल के मरीजों को डराने के लिए नहीं, बल्कि जागरूक करने के लिए है। विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
- खुद से दवा न बदलें: यदि आप रोसुवास्टेटिन ले रहे हैं, तो इस खबर को पढ़कर अचानक दवा बंद न करें। कोलेस्ट्रॉल अचानक बढ़ने से हार्ट अटैक का खतरा हो सकता है।
- डॉक्टर से परामर्श करें: अपने डॉक्टर से पूछें कि क्या आपकी किडनी की स्थिति के अनुसार दवा की डोज सही है।
- नियमित टेस्ट: यदि आप लंबे समय से स्टैटिन ले रहे हैं, तो साल में कम से कम दो बार KFT (Kidney Function Test) और Urine Routine टेस्ट जरूर करवाएं।
- डोज का तालमेल: यदि आपकी किडनी की कार्यक्षमता कम है, तो सुनिश्चित करें कि आपको रोसुवास्टेटिन की न्यूनतम आवश्यक डोज ही दी जा रही है।
निष्कर्ष
यह रिसर्च हमें चेतावनी देती है कि कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करना जितना जरूरी है, उतना ही यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इलाज का तरीका शरीर के अन्य अंगों (विशेषकर किडनी) पर भारी न पड़े। चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य ‘एक बीमारी को ठीक करने के लिए दूसरी बीमारी पैदा करना’ कभी नहीं होना चाहिए।
अब समय आ गया है कि डॉक्टर ‘वन साइज फिट्स ऑल’ (एक ही दवा सबके लिए) के बजाय पर्सनलाइज्ड मेडिसिन की ओर बढ़ें, जहाँ मरीज के दिल के साथ-साथ उसकी किडनी का भी पूरा ख्याल रखा जाए।
रोसुवास्टेटिन को लेकर सामने आई रिसर्च एक अहम चेतावनी जरूर है, लेकिन इसे सनसनी की तरह नहीं, क्लिनिकल सावधानी की तरह समझना चाहिए। बड़े डेटा विश्लेषण में एटोरवास्टेटिन की तुलना में रोसुवास्टेटिन से जुड़े कुछ किडनी-संबंधी जोखिमों में हल्की बढ़ोतरी का संकेत मिला है, खासकर हाई डोज और कमजोर किडनी वाले मरीजों में।
फिर भी, यह दवा कई मरीजों के लिए फायदेमंद है और इसे अचानक बंद करना नुकसानदायक हो सकता है। सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि मरीज बिना घबराए अपने डॉक्टर से बात करें, नियमित KFT और यूरिन जांच कराएं, और जरूरत पड़ने पर दवा या डोज की समीक्षा करवाएं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ संदेश है—कोलेस्ट्रॉल का इलाज जरूरी है,लेकिन दिल की सुरक्षा के साथ किडनी की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
Disclaimer: यह समाचार रिपोर्ट केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी निर्णय के लिए या दवा में बदलाव करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य चिकित्सा पेशेवर से परामर्श लें।

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