स्वाधीनता संग्राम की अमर बलिदानी मातंगिनी हाजरा ‘बूढ़ी गांधी’

स्वतंत्रता संग्राम की पावन गाथा में मातंगिनी हाजरा का नाम अमर है। ‘बूढ़ी गांधी’ के नाम से प्रसिद्ध इस वीरांगना ने तिरंगे को झुकने नहीं दिया, भले ही अपने प्राण न्योछावर कर दिए। 19 अक्टूबर की यह जयंती उनकी अमर गाथा को याद करने का अवसर है, जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया।

एक स्त्री,जिसने राष्ट्रभक्ति को जीवन का धर्म बनाया

(✍️ हेमेन्द्र क्षीरसागर)
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल पुरुष क्रांतिकारियों तक सीमित नहीं है। उसमें ऐसी अनेक वीरांगनाओं की भी गाथाएं अंकित हैं जिन्होंने अपनी कोमलता को परे रखकर अद्भुत साहस का परिचय दिया।
इनमें से एक नाम है — मातंगिनी हाजरा, जिन्हें लोग बूढ़ी गांधी’ के नाम से जानते हैं।
उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि उम्र, जाति या सामाजिक स्थिति किसी के देशभक्ति के उत्साह को कम नहीं कर सकती। उन्होंने दिखाया कि जब आत्मा में स्वतंत्रता की अग्नि जल उठती है, तो शरीर का दुर्बल होना कोई मायने नहीं रखता।

🔷 प्रारंभिक जीवन : गरीबी में जन्मी,पर राष्ट्रभक्ति में समृद्ध

मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 को बंगाल के मिदनापुर जिले के होगला गाँव में हुआ था।
वे एक अत्यंत निर्धन परिवार से थीं। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि परिवार उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी ठीक से नहीं उठा पा रहा था।
सिर्फ 12 वर्ष की छोटी आयु में उनका विवाह ग्राम अलीनान के 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया। विवाह के मात्र छह वर्ष बाद ही त्रिलोचन का निधन हो गया।

विधवा मातंगिनी की कोई संतान नहीं थी। उनके सौतेले पुत्र ने उन्हें तिरस्कार और अपमान दिया।
इस अपमान के बावजूद उन्होंने अपना जीवन सेवा, सहानुभूति और समाज की भलाई के लिए समर्पित कर दिया।
वे गरीबों की मदद करतीं, बीमारों का उपचार करातीं और गाँव में सबकी “माँ” के रूप में जानी जाने लगीं।

🔷 1905:बंग-भंग आंदोलन और जागृत चेतना

साल 1905 में जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया, तो पूरे प्रांत में असंतोष की लहर दौड़ पड़ी।
मातंगिनी उस समय चालीस वर्ष की थीं। उन्होंने अपने गाँव में स्वदेशी आंदोलन का प्रचार किया और ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार शुरू किया।
वह कहतीं —

“जो देश हमें पालता है, उसे बचाने की जिम्मेदारी हमारी भी है।”

यहीं से मातंगिनी के भीतर की सोई हुई क्रांतिकारी चेतना जाग उठी। वे हर सभा में जातीं, लोगों को जागरूक करतीं और महिलाओं को भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित करतीं।

🔷 गांधीजी से प्रेरित ‘अहिंसक क्रांति’की राह

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (1920–22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) ने मातंगिनी के जीवन की दिशा ही बदल दी।
उन्होंने चरखा कातना, खादी पहनना और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार जीवन का हिस्सा बना लिया।
1932 में जब असहयोग आंदोलन ने गति पकड़ी, तो मातंगिनी ने खुले तौर पर इसमें भाग लिया और वंदे मातरम्’ के नारे लगाते हुए जुलूसों में शामिल हुईं।

🔷 पहली गिरफ्तारी: काला झंडा और साहस की मिसाल

17 जनवरी 1933 को जब बंगाल के तत्कालीन गर्वनर एंडरसन ‘करबंदी आंदोलन’ को दबाने तामलुक पहुँचे, तो मातंगिनी सबसे आगे काला झंडा लिए खड़ी थीं।
उन्होंने नारे लगाए —

“अंग्रेज़ो भारत छोड़ो! भारत माता की जय!”

ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर छह माह के सश्रम कारावास की सजा दी।
वे मुर्शिदाबाद जेल भेज दी गईं।
इस जेल यात्रा ने उनके जीवन में एक नयी दृढ़ता भर दी।
अब उनके भीतर राष्ट्रभक्ति का नशा सवार था — “अफीम” की जगह “आजादी” का नशा!

🔷 मानवता की मिसाल: बाढ़ राहत में जुटी वीरांगना

1935 में तामलुक क्षेत्र में भीषण बाढ़ आई।
हैजा और चेचक जैसी बीमारियाँ फैल गईं।
तब मातंगिनी ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना राहत कार्य में हिस्सा लिया।
वे गाँव-गाँव जाकर बीमारों की सेवा करतीं, दवा बांटतीं और स्वच्छता का संदेश देतीं।
उनकी सेवा भावना ने उन्हें “तामलुक की माँ” बना दिया।
यह था उनका दूसरा रूप — एक संवेदनशील, दयालु और मानवतावादी महिला।

🔷 भारत छोड़ो आंदोलन : ‘बूढ़ी गांधी’का अमर पराक्रम

1942 में गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया।
उस समय मातंगिनी की उम्र 72 वर्ष थी, पर उनके उत्साह में युवा क्रांतिकारी जैसी ऊर्जा थी।
लोग उन्हें स्नेहपूर्वक बूढ़ी गांधी’ कहने लगे थे, क्योंकि उनका जीवन गांधीजी की शिक्षाओं का साक्षात रूप था।

8 सितम्बर 1942 को तामलुक में ब्रिटिश पुलिस की गोली से तीन स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए।
इस घटना से पूरे इलाके में उबाल आ गया।
मातंगिनी ने 29 सितम्बर को विशाल जुलूस निकालने का निश्चय किया।
उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों से कहा —

“अब वक्त आ गया है, जब या तो देश आज़ाद होगा या हम मिट जाएंगे।”

उन्होंने लगभग 5000लोगों को एकत्र किया और डाक बंगले की ओर मार्च किया।

🔷 अमर बलिदान : तिरंगा झुका नहीं,वीरांगना झुक गईं

जब जुलूस सरकारी बंगले के पास पहुँचा, तो पुलिस ने भीड़ को रोकने की कोशिश की।
लेकिन मातंगिनी सबसे आगे थीं, हाथ में तिरंगा था।
उन्होंने नारे लगाए —

“भारत माता की जय!”
“अंग्रेज़ो भारत छोड़ो!”

पुलिस ने गोली चला दी।
पहली गोली उनके बाएँ हाथ में लगी, पर उन्होंने झंडा गिरने नहीं दिया।
उन्होंने झंडे को दाहिने हाथ में पकड़ लिया।
दूसरी गोली दाहिने हाथ में लगी — पर तिरंगा अब भी ऊँचा था।
तीसरी गोली उनके माथे पर लगी।
वह वहीं गिर पड़ीं — तिरंगे को अपने सीने से लगाए हुए।

लोगों ने देखा कि मरते समय भी उनके होंठों पर “वंदे मातरम्” के शब्द थे।
उनकी शहादत ने पूरे तामलुक को विद्रोह की आग में झोंक दिया।

🔷 स्वाधीन सरकार की स्थापना : मातंगिनी की प्रेरणा

उनके बलिदान के केवल दस दिन बाद तामलुक के लोगों ने अंग्रेज़ों को खदेड़ दिया।
वहाँ तामलुक राष्ट्रीय सरकार’ (Tamralipta National Government) की स्थापना हुई, जो 21 महीनों तक स्वतंत्र रूप से चलती रही।
यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई।
मातंगिनी हाजरा की शहादत ने यह दिखाया कि एक अकेली वृद्ध महिला भी पूरे साम्राज्य को हिला सकती है।

🔷 मातृशक्ति की प्रतीक : एक आदर्श उदाहरण

मातंगिनी हाजरा ने सिद्ध कर दिया कि मातृशक्ति केवल घर की सीमाओं तक सीमित नहीं है।
जरूरत पड़ने पर वही माँ, बहन और बेटी राष्ट्र की रक्षक बन जाती है।
उन्होंने यह सिखाया कि स्त्री केवल सहनशीलता का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रतिकार का भी रूप है।
उनका जीवन संदेश देता है —

“मातृशक्ति से ही मातृभूमि सुरक्षित है।”

🔷 उनकी विरासत : आज भी जीवित प्रेरणा

स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने मातंगिनी हाजरा की स्मृति में अनेक सम्मान किए —

  1. कोलकाता में उनके नाम पर विद्यालय, सड़कें और कॉलोनियां हैं।
  2. तामलुक में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जो तिरंगा थामे उनके बलिदान का प्रतीक है।
  3. भारतीय डाक विभाग ने उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया।
  4. पश्चिम बंगाल विधानसभा परिसर में भी उनकी प्रतिमा स्थापित है।
  5. हर वर्ष 19अक्टूबर को उनके जन्मदिवस पर श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाती हैं।

🔷 इतिहास में उनका स्थान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मातंगिनी हाजरा का स्थान उन अमर शहीदों की श्रेणी में है जिन्होंने बिना किसी लोभ, बिना किसी पद की आकांक्षा के केवल देश के लिए जीवन समर्पित कर दिया।
वे रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी जैसी महान स्त्रियों की श्रेणी में आती हैं जिन्होंने स्त्रीत्व को देशभक्ति से जोड़ा।

उनकी गाथा यह बताती है कि स्वतंत्रता किसी वर्ग, लिंग या आयु की नहीं — बल्कि एक समान अधिकार है जिसके लिए हर व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है।

🔷 मातंगिनी हाजरा के जीवन से मिलने वाले 5अमर संदेश

  1. देशभक्ति उम्र नहीं देखती — 72 वर्ष की आयु में भी उन्होंने मोर्चा संभाला।
  2. स्त्री शक्ति सर्वोपरि है — उन्होंने दिखाया कि मातृशक्ति सबसे बड़ा बल है।
  3. सत्य और अहिंसा सर्वोच्च हथियार हैं — गांधीजी के आदर्शों को उन्होंने व्यवहार में उतारा।
  4. त्याग ही सच्ची विजय है — उन्होंने तिरंगे की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर किए।
  5. सेवा ही धर्म है — बाढ़ राहत और मानवता की सेवा उनकी पहचान रही।

🔷 मातंगिनी हाजरा की स्मृति में राष्ट्र का सम्मान

आज भारत जब स्वतंत्रता के 75 वर्ष से अधिक पूरा कर चुका है, तब भी मातंगिनी की प्रेरणा जीवित है।
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अमर शहीद मातंगिनी हाजरा पुरस्कार’ जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं।
कई सामाजिक संस्थाएं महिलाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करने में उनके जीवन को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

स्कूलों में बच्चों को यह सिखाया जाता है कि तिरंगे का सम्मान केवल झंडा फहराने से नहीं, बल्कि उसके आदर्शों की रक्षा करने से होता है — जैसे मातंगिनी ने किया।

⚖️ निष्कर्ष (Conclusion)

मातंगिनी हाजरा केवल एक नाम नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति प्रेम,त्याग और साहस का प्रतीक हैं।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल हथियारों से नहीं, बल्कि अडिग संकल्प और आत्मबलिदान से जीती जाती है।

“बूढ़ी गांधी” कहलाने वाली यह वीरांगना भारत की प्रत्येक बेटी, माँ और बहन के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
उन्होंने न केवल ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी, बल्कि समाज में यह संदेश भी छोड़ा कि —

“जब तक देश की धरती पर मातंगिनी जैसी बेटियाँ हैं, तब तक भारत माँ का तिरंगा कभी झुकेगा नहीं।”

उनकी जयंती पर हम सबको प्रण करना चाहिए कि हम अपने जीवन में देश के प्रति वही समर्पण, वही निष्ठा और वही त्याग की भावना अपनाएँ।
क्योंकि राष्ट्रभक्ति वह दीपक है जो पीढ़ियों को प्रकाश देता है —और मातंगिनी हाजरा उसका अमर ज्योति हैं।

📍 पता: 17/23 दत्त ड्यूप्लेक्स, स्पोर्ट्स क्लब के सामने, तिलहरी, जबलपुर (म.प्र.)
📧 Email: abhimanojperse@gmail.com
📞 Mobile: 9200000912

(साई न्यूज)