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देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा कई बार हासिल कर चुके इंदौर में यदि दूषित पेयजल से लोगों की मौत हो जाए, तो यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला मामला बन जाता है। भागीरथपुरा क्षेत्र में पिछले एक सप्ताह से पसरा मातम और घर-घर से उठती चीखें इस बात की गवाही दे रही हैं कि यह संकट अचानक नहीं आया, बल्कि वर्षों की लापरवाही का नतीजा है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी होती है, तो उसका खामियाजा आम नागरिकों को अपने जीवन से चुकाना पड़ता है।
इंदौर को आर्थिक राजधानी होने के साथ-साथ स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन स्वच्छता के इन तमगों के पीछे छिपी बुनियादी व्यवस्थाओं की सच्चाई अक्सर अनदेखी रह जाती है। भागीरथपुरा जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में लंबे समय से गंदे पानी की शिकायतें सामने आती रही थीं। स्थानीय निवासियों ने कई बार पेयजल में बदबू, रंग और गंदगी की शिकायत की, लेकिन इन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
यह वही उपेक्षा है, जिसने धीरे-धीरे एक बड़े हादसे का रूप ले लिया।
🔹 वर्तमान स्थिति / Latest Developments
दूषित पानी के सेवन से अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हैं। कई अन्य नागरिक अभी भी बीमार हैं और इलाजरत हैं। घटना के बाद इलाके में भय और आक्रोश का माहौल है।
वर्तमान हालात में:
- प्रभावित क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति रोकी गई
- वैकल्पिक जल व्यवस्था की अस्थायी कोशिशें
- स्वास्थ्य विभाग की टीमें तैनात
- जांच के आदेश और बयानबाजी का दौर
हालांकि इन कदमों को देर से उठाया गया माना जा रहा है, क्योंकि जब तक हालात बेकाबू नहीं हुए, तब तक जिम्मेदार विभागों की नींद नहीं टूटी।
🔹 प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव
यह मामला प्रशासनिक विफलता का जीवंत उदाहरण बन चुका है। नगर निगम, जल प्रदाय विभाग और निगरानी तंत्र की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे पर दोष मढ़ते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा गर्मा गया है:
- सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने
- बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप
- संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक अंकगणित
सबसे अधिक चर्चा में रहा नगरीय प्रशासन मंत्री और क्षेत्रीय विधायक से जुड़ा विवाद, जिसने इस त्रासदी को और अधिक सियासी रंग दे दिया।
🔹 ‘घंटा’ प्रकरण और लोकतांत्रिक मर्यादाएं
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक पत्रकार के साथ किए गए व्यवहार और शब्दों के चयन ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका पर भी बहस छेड़ दी। सवाल पूछना पत्रकार का कर्तव्य है और जवाब देना जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी।
जब किसी मंत्री द्वारा सवालों को तिरस्कार के साथ खारिज किया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे सूचना तंत्र के अपमान के रूप में देखा जाता है। भले ही बाद में खेद व्यक्त किया गया हो, लेकिन इससे उपजे सवाल समाप्त नहीं होते।
🔹 आंकड़े, तथ्य और विश्लेषण
यदि इस घटना का विश्लेषण किया जाए, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं:
- वर्षों पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था
- सीवर और पेयजल लाइनों का समान मार्ग
- नियमित जल परीक्षण का अभाव
- शिकायतों की अनदेखी
विशेषज्ञ मानते हैं कि सीवर लाइन के भीतर से पेयजल पाइपलाइन का गुजरना गंभीर आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आता है। यह केवल तकनीकी चूक नहीं बल्कि मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है।
🔹 आम जनता पर असर
इस त्रासदी का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ा है:
- परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया
- बच्चों और बुजुर्गों में भय का माहौल
- स्वच्छ पानी को लेकर असुरक्षा
- प्रशासन पर से भरोसे में गिरावट
लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि यदि स्वच्छता के लिए पहचाने जाने वाले शहर में यह हाल है, तो बाकी शहरों की स्थिति क्या होगी।
🔹 सामाजिक और स्वास्थ्य प्रभाव
दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियां केवल तत्काल नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि लंबे समय तक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ी है और चिकित्सा संसाधनों पर दबाव पड़ा है।
सामाजिक स्तर पर:
- सामूहिक आक्रोश
- विरोध प्रदर्शन की आशंका
- प्रशासनिक जवाबदेही की मांग
यह घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि मूलभूत सुविधाएं आखिर किसके लिए हैं।
🔹 भविष्य की संभावनाएं / आगे क्या?
इस प्रकरण से सबक लेकर यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे हादसे दोहराए जा सकते हैं। आवश्यक है कि:
- पूरे शहर में जल लाइनों की ऑडिट
- नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण
- जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय
- आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र का गठन
यह केवल इंदौर नहीं, बल्कि देश के सभी शहरों के लिए चेतावनी है।
🧾 Conclusion /निष्कर्ष
भागीरथपुरा की यह घटना यह स्पष्ट कर देती है कि यह संकट केवल दूषित पानी का नहीं, बल्कि शासन और व्यवस्था की संवेदनहीनता का है। जब मूलभूत सुविधाओं की रक्षा में चूक होती है, तो उसकी कीमत आम नागरिक अपने जीवन से चुकाते हैं। आवश्यकता है कि इस त्रासदी को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखकर, इससे सबक लिया जाए और जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराया जाए। जीवन की सुरक्षा किसी भी सरकार और प्रशासन की सर्वोच्च जिम्मेदारी है, और इससे कोई भी बच नहीं सकता।
लिमटी की लालटेन 738
सवाल पानी का नहीं, जीवन का है कैलाश विजयवर्गीय जी . . .
सड़ांध मारती व्यवस्थाओं का नतीजा है इंदौर का भागीरथपुरा प्रकरण . . ..
(लिमटी खरे)
एक सप्ताह से अधिक समय हो चुका है, प्रदेश की आर्थिक राजधानी और देश के सबसे साथ सुथरे शहर का तमगा पाने वाले इंदौर शहर के भागीरथपुरा मोहल्ले में अभी भी घरों पर प्रलाप, विलाप की आवाजें सुनाई दे रहीं हैं। दूषित पेयजल के सेवन से 15 लोग काल कलवित हो चुके हैं, जिसमें बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक शामिल हैं।
इस पूरे मामले को अब सियासी रंग में रंगा जा चुका है। कोई भाजपा के साथ है तो कैलाश विजयवर्गीय के साथ नहीं, कोई दोनों के साथ है तो कोई कैलाश विजयवर्गीय के साथ दिख रहा है पर भाजपा के साथ नहीं . . ., कुल मिलाकर सभी दूषित पानी पर ही चर्चारत दिख रहे हैं। इसी बीच कैलाश विजयवर्गीय जिनके विधानसभा क्षेत्र का यह मामला है और वे जिस नगरीय कल्याण विभाग के मंत्री हैं उसी के अधीन नगर निगम की विफलता को लगभग ढांकते हुए कैलाश विजयवर्गीय जैसे उमरदराज, अनुभवी नेता किस राह पर ले चले हैं। एक पत्रकार के साथ साक्षात्कार में वे घंटा जैसे शब्द का उपयोग करते हैं, कहते हैं, फोकट के सवाल मत पूछा करो. . ., पत्रकार यह भी कह रहे हैं कि शब्दों का चयन ठीक से करिए . . ., क्या है यह, किस राह पर चल पड़े हैं आज के सियासी नुमाईंदे! क्या वे यह चाहते हैं कि समाज का दर्पण कहा जाने वाला पत्रकार जगत अपनी नंगी जीभ से उनके तलुओं को साफ करे! ऐसी स्थिति में पत्रकारों के हितों के संवंर्धन की जवाबदेही अपने कांधों पर उठाने का दावा करने वाले पत्रकार संघों को भी स्वसंज्ञान से कैलाश विजयवर्गीय के उन वक्तव्यों और भावभंगिमाओं का विरोध करना चाहिए था, भले ही कैलाश विजयवर्गीय के द्वारा क्षमायाचना कर ली गई हो।
कैलाश विजयवर्गीय का घंटा प्रकरण अनेक दृष्टिकोण खड़े कर रहा है। आज विपक्ष किस तरह का विरोध करता दिखता है। क्या विपक्ष ने कभी प्रभावी विरोध दर्ज कराया है! विपक्ष में चाहे भाजपा रही हो या कांग्रेस सदैव ही विरोध इस तरह का दिखा मानो सत्ता और विपक्ष के आला नेताओं के बीच एक अघोषित करार हुआ हो कि विरोध इतना करना गुरू कि कुर्सी भर न गिरने पाए . . . .
आजाद भारत में लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, छत, स्वच्छ पेयजल, परिवहन के सुगम साधन आदि मुहैया करवाना हुक्मरानों का नैतिक दायित्व है। ये सुविधाएं मूलभूत सुविधाओं की श्रेणी में ही आती हैं। जिनके घर में 80 से अधिक आयु के बुजुर्ग मौजूद हों उनसे पूछा जाए तो पता चलेगा कि मूलभूत सुविधाएं क्या होती हैं। हमारे दादा जी हमें बताया करते थे कि आजादी के पूर्व गोरे अंग्रेज अफसर घोड़ों पर आते थे और पानी, बिजली की मांग करने पर कहा करते थे कि पानी और बिजली सरकार की जवाबदेही नहीं है। यही कारण है कि आजादी के बाद भी कमोबेश हर घर में एक कुंआ जरूर होता था। आज आजाद भारत में अगर लोगों को साफ पानी नहीं मिल पा रहा है और सेमीनार, कांफ्रेंसेज आदि में नेताओं, अफसरों के सामने बोतलबंद पानी रखा हो तो समझा जा सकता है कि जमीनी हालात किस तरह के हैं। इन हालातों को जानते सभी हैं, पर सुधारने का जतन कोई करना ही नहीं चाहता है।
इंदौर के भागीरथ पुरा में लगातार ही गंदे पानी की शिकायत मिलने के बाद भी नगर निगम ध्रतराष्ट्र के मानिंद ही बैठा रहा। जब लोग बीमार पड़ना आरंभ हुए, तब भी नहीं जागा नगर निगम! महापौर कहते हैं कि अफसर सुनते नहीं, यह बात सही मानी जा सकती है क्योंकि प्रदेश में शिवराज सिंह चोहान के कार्यकाल से ही अफसरशाही के बेलगाम घोड़े जिस रफ्तार से दौड़ रहे हैं वह किसी से छिपी नहीं है। महापौर तो महापौर आलम यह है कि विधायक और कई बार तो सांसदों को भी इससे दो चार होना पड़ा है।
देश का शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां पेयजल की पाईप लाईन्स नाले, नालियों अथवा सीवर लाईन से होकर न गुजर रही हों, पर इंदौर जिसे देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का तमगा कई बार मिल चुका है वहां तो सीवर लाईन अभी डाली गई हैं, और उसके अंदर से पाईप लाईन अगर गुजर रही है तो यह तो आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आने वाला काम है। इसके लिए जब भी यह किया गया हो उस दौरान उस कार्य को प्रमाणित करने वाले, उसका भुगतान करने वाले अधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि इसके चलते ही पेयजल काल बन गया है।
देखा जाए तो इंदौर के भागीरथपुरा में हुई यह घटना केवल इन्दौर तक सीमित नहीं है बल्कि यह देश के अन्य महानगरों के साथ ही साथ छोटे, बड़े शहरों के लिए भी चेतावनी ही मानी जा सकती है। भारत के विभिन्न महानगरों में ऐसी समस्या को रोकने के लिए आपातकालीन दल तैयार होनी चाहिए और सीवर लाइनों के रखरखाव व जल परीक्षण का कार्य निश्चित अंतराल पर अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए।
देखा जाए तो इस पूरे प्रकरण ने देश के हृदय प्रदेश की राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली और क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है और विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर मिल गया है। हम तो बस यही कहना चाहेंगे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव और नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से कि यह मामला दूषित पेयजल का नहीं वरन जीवन का है, जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी हुक्मरानों पर ही आहूत होती है, वे ठहाके लगाकर, घण्टा जैसे शब्दों का प्रयोग करके, कोई सुनता नहीं, यह कहकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते, उन्हें जबवादेह बनना होगा, और अगर वे जवाबदेह नहीं हैं तो विपक्ष को निहित स्वार्थ तजकर रियाया के प्रति उन्हें जवाबदेह बनाने में पूरी ताकत झोंकना होगा . . .
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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

43 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. दिल्ली, मुंबई, नागपुर, सिवनी, भोपाल, रायपुर, इंदौर, जबलपुर, रीवा आदि विभिन्न शहरों में विभिन्न मीडिया संस्थानों में लम्बे समय तक काम करने का अनुभव, वर्तमान में 2008 से लगातार “समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया” के ‘संस्थापक संपादक’ हैं. 2002 से लगातार ही अधिमान्य पत्रकार (Accredited Journalist) हैं एवं नई दिल्ली में लगभग एक दशक से अधिक समय तक पत्रकारिता के दौरान भी अधिमान्य पत्रकार रहे हैं.
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