(दीपक अग्रवाल)
मुंबई (साई)।भारत की फिल्म और टीवी इंडस्ट्री को लंबे समय से ग्लैमर, स्टारडम और अरबों रुपये के कारोबार के लिए जाना जाता रहा है। बड़े बजट की फिल्में, भव्य सेट, हाई-प्रोफाइल इवेंट्स और सितारों की चमक हमेशा इस उद्योग की पहचान रही है। लेकिन इस चमकदार दुनिया के पीछे एक ऐसा वर्ग भी मौजूद है, जिसकी मुश्किलें अब गंभीर आर्थिक संकट का रूप ले चुकी हैं।
बीते कई महीनों से बॉलीवुड और टेलीविजन इंडस्ट्री में काम की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है। इसका सीधा असर उन हजारों लोगों पर पड़ा है जो कैमरे के पीछे रहकर पूरी इंडस्ट्री को चलाते हैं। इनमें असिस्टेंट डायरेक्टर, लाइटमैन, स्पॉट बॉय, कैमरा टीम, मेकअप आर्टिस्ट, एडिटर्स, तकनीकी कर्मचारी, सेट डिजाइनर और छोटे कलाकार शामिल हैं।
धीरे-धीरे बढ़ा इंडस्ट्री का आर्थिक दबाव
मनोरंजन उद्योग से जुड़े कई लोगों का कहना है कि यह संकट अचानक नहीं आया। पिछले कुछ समय से फिल्म निर्माण में निवेश कम हो रहा था। महामारी के बाद इंडस्ट्री पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाई थी और अब आर्थिक अनिश्चितताओं, लागत बढ़ने और दर्शकों की बदलती पसंद ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, जिन्होंने कुछ वर्षों पहले बड़े स्तर पर निवेश किया था, अब अधिक सतर्क नजर आ रहे हैं। नई वेब सीरीज और फिल्मों की मंजूरी में देरी हो रही है। कई प्रोडक्शन हाउस अपने बजट कम कर रहे हैं, जबकि कुछ परियोजनाएं पूरी तरह रोक दी गई हैं।
इसका परिणाम यह हुआ कि नियमित काम मिलने वाले तकनीकी कर्मचारियों की आय में भारी गिरावट आ गई है। कई लोगों का दावा है कि उनकी कमाई पहले की तुलना में 50 से 60 प्रतिशत तक घट चुकी है।
सितारों पर नहीं,असली असर आम कर्मचारियों पर
फिल्म इंडस्ट्री में बड़े सितारों और स्थापित कलाकारों को अब भी बड़े प्रोजेक्ट्स मिल रहे हैं। हाई-प्रोफाइल फिल्मों और विज्ञापनों में उनकी मांग बनी हुई है। लेकिन उद्योग की वास्तविक रीढ़ माने जाने वाले मध्यम और निम्न स्तर के कर्मचारी सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
यह वह वर्ग है जो प्रतिदिन की शूटिंग और प्रोजेक्ट आधारित आय पर निर्भर रहता है। जैसे ही शूटिंग कम होती है, उनकी आय लगभग खत्म हो जाती है।
सबसे ज्यादा प्रभावित होने वालों में शामिल हैं:
- जूनियर कलाकार
- असिस्टेंट डायरेक्टर
- स्पॉट बॉय
- मेकअप और हेयर आर्टिस्ट
- कैमरा असिस्टेंट
- लाइटिंग स्टाफ
- सेट वर्कर
- प्रोडक्शन असिस्टेंट
- एडिटिंग और पोस्ट-प्रोडक्शन कर्मचारी
- जिम ट्रेनर और पर्सनल सपोर्ट स्टाफ
इनमें से अधिकांश लोगों के पास स्थायी नौकरी या मासिक वेतन नहीं होता। उन्हें केवल प्रोजेक्ट या शूटिंग के आधार पर भुगतान किया जाता है।
मुंबई में बढ़ती जिंदगी की लागत ने बढ़ाई मुश्किल
मनोरंजन उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र मुंबई है। अंधेरी, बांद्रा, जुहू और गोरेगांव जैसे इलाकों में अधिकांश प्रोडक्शन हाउस, स्टूडियो और कास्टिंग एजेंसियां स्थित हैं। लेकिन इन इलाकों में रहने का खर्च देश के सबसे महंगे शहरों में गिना जाता है।
एक छोटे फ्लैट का किराया भी कई बार 40 से 50 हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच जाता है। ऐसे में जब आय आधी रह जाए, तो सामान्य जीवन चलाना भी मुश्किल हो जाता है।
कई तकनीकी कर्मचारियों और सपोर्ट स्टाफ को अब अपनी बचत खर्च करनी पड़ रही है। कुछ लोग दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार लेने को मजबूर हैं। कई कर्मचारियों ने अस्थायी नौकरी या छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए हैं ताकि घर का खर्च चल सके।
कुछ लोग तो मुंबई छोड़कर अपने गृह नगर लौटने को भी मजबूर हो चुके हैं क्योंकि वहां रहना अब आर्थिक रूप से संभव नहीं रह गया।
पूरी इंडस्ट्री एक जुड़ी हुई श्रृंखला की तरह काम करती है
फिल्म और टीवी उद्योग केवल कलाकारों तक सीमित नहीं है। यह एक विशाल आर्थिक तंत्र है जिसमें हजारों छोटे-बड़े व्यवसाय जुड़े हुए हैं। जब किसी फिल्म या शो की शूटिंग रुकती है तो उसका असर पूरे नेटवर्क पर पड़ता है।
एक प्रोजेक्ट के रुकने से प्रभावित होने वाले वर्गों में शामिल हैं:
- कैमरा और लाइट उपकरण किराए पर देने वाली एजेंसियां
- ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर
- कॉस्ट्यूम सप्लायर
- सेट निर्माण करने वाले मजदूर
- खानपान सेवाएं देने वाले कर्मचारी
- लोकेशन मैनेजमेंट टीम
- छोटे होटल और लॉज
इस वजह से इंडस्ट्री की मंदी केवल मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं रहती बल्कि उससे जुड़े कई अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करती है।
बदलती दर्शक पसंद भी एक बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि दर्शकों की बदलती पसंद ने भी फिल्म उद्योग को चुनौती दी है। पिछले कुछ वर्षों में दर्शक कंटेंट को लेकर अधिक चयनात्मक हो गए हैं। केवल बड़े सितारे अब फिल्मों की सफलता की गारंटी नहीं माने जा रहे।
दर्शक अब मजबूत कहानी, वास्तविक विषय और बेहतर कंटेंट की मांग कर रहे हैं। कई बड़े बजट की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाईं, जिसके कारण निवेशकों और निर्माताओं का भरोसा प्रभावित हुआ है।
इसके अलावा ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भी बाजार को बदल दिया है। अब हर प्रोजेक्ट पर खर्च करने से पहले कंपनियां कई स्तरों पर वित्तीय समीक्षा कर रही हैं।
ऊर्जा बचत और वित्तीय नियंत्रण का असर
हाल के समय में विभिन्न क्षेत्रों में लागत नियंत्रण और ऊर्जा बचत पर जोर बढ़ा है। इसका प्रभाव मनोरंजन उद्योग पर भी दिखाई दे रहा है। कई प्रोडक्शन कंपनियां शूटिंग शेड्यूल कम कर रही हैं और सीमित संसाधनों में काम पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।
कुछ मामलों में बड़े सेट और महंगी लोकेशंस से बचा जा रहा है। तकनीकी टीमों का आकार भी कम किया जा रहा है ताकि खर्च घटाया जा सके। इसका सीधा असर रोजगार के अवसरों पर पड़ रहा है।
मानसिक दबाव और असुरक्षा भी बढ़ी
आर्थिक संकट का असर केवल आय तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक काम न मिलने की स्थिति ने कई कर्मचारियों में मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना भी बढ़ा दी है।
मनोरंजन उद्योग में पहले से ही प्रतिस्पर्धा अधिक रहती है। ऐसे में काम की कमी ने चिंता और भविष्य को लेकर डर को और बढ़ा दिया है। कई लोग यह नहीं जानते कि अगले महीने उन्हें काम मिलेगा या नहीं।
इंडस्ट्री से जुड़े कुछ संगठनों का कहना है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो हजारों कुशल कर्मचारी इस क्षेत्र को छोड़ सकते हैं।
क्या आने वाले महीनों में सुधर सकती है स्थिति?
मनोरंजन उद्योग के जानकार मानते हैं कि यह संकट स्थायी नहीं है, लेकिन सुधार धीरे-धीरे ही संभव होगा। यदि फिल्मों और वेब कंटेंट में निवेश दोबारा बढ़ता है और दर्शकों की थिएटर में वापसी मजबूत होती है, तो रोजगार के अवसर फिर बढ़ सकते हैं।
कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रोडक्शन हाउस को बेहतर वित्तीय योजना और श्रमिक सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। इंडस्ट्री में काम करने वाले तकनीकी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम सुरक्षा ढांचे की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
इसके अलावा स्किल डेवलपमेंट, मल्टी-टेक्निकल ट्रेनिंग और डिजिटल प्रोडक्शन तकनीकों को अपनाने से भी कर्मचारियों को नए अवसर मिल सकते हैं।
सोशल मीडिया पर भी दिख रही चिंता
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी कई कलाकारों और तकनीकी कर्मचारियों ने अपनी परेशानियां साझा की हैं। कई लोगों ने बताया कि पहले जहां लगातार शूटिंग होती थी, अब महीनों तक काम नहीं मिल रहा।
कुछ पोस्ट में यह भी कहा गया कि इंडस्ट्री की चमक-दमक देखने वाले लोग अक्सर यह नहीं समझ पाते कि इसके पीछे काम करने वाले हजारों लोग कितनी अस्थिर परिस्थितियों में जीवन बिताते हैं।
जनता के बीच भी यह चर्चा बढ़ रही है कि मनोरंजन उद्योग केवल सितारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।
बॉलीवुड के लिए यह चेतावनी का समय
विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा संकट बॉलीवुड और टीवी इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा संकेत है। केवल बड़े बजट और स्टार पावर के भरोसे उद्योग को आगे बढ़ाना अब पर्याप्त नहीं होगा।
सस्टेनेबल प्रोडक्शन मॉडल, कर्मचारियों की सुरक्षा, लागत प्रबंधन और बेहतर कंटेंट रणनीति आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
यदि उद्योग अपने कार्यबल की समस्याओं को नजरअंदाज करता है, तो इसका असर भविष्य में उत्पादन गुणवत्ता और कार्यक्षमता पर भी दिखाई दे सकता है।
भारत की मनोरंजन इंडस्ट्री आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां पर्दे पर दिखाई देने वाली चमक के पीछे आर्थिक संघर्ष की गहरी कहानी छिपी हुई है। फिल्मों और टीवी शोज की धीमी होती रफ्तार ने हजारों तकनीकी कर्मचारियों और सपोर्ट स्टाफ की जिंदगी को प्रभावित किया है।
मुंबई जैसे महंगे शहर में घटती आय के साथ जीवन यापन करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। हालांकि उद्योग में सुधार की उम्मीद अब भी बनी हुई है, लेकिन यह स्पष्ट है कि केवल सितारों की सफलता से पूरी इंडस्ट्री मजबूत नहीं हो सकती। असली मजबूती तब आएगी जब कैमरे के पीछे काम करने वाले हर व्यक्ति को स्थिर अवसर और आर्थिक सुरक्षा मिल सकेगी।

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