सरकार की एक एजेंसी बनाम पिंजरे का तोता और न्याय की दहलीज

दिल्ली की अदालत द्वारा अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बरी किए जाने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। यह फैसला केवल दो नेताओं की कानूनी राहत नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर उठते सवालों का केंद्र बन गया है। “पिंजरे का तोता” टिप्पणी से लेकर वर्तमान राजनीतिक आरोपों तक, संस्थागत स्वायत्तता पर बहस फिर गहरा गई है। यह मामला लोकतंत्र, न्यायपालिका और एजेंसियों की भूमिका पर व्यापक विमर्श को जन्म देता है।

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सरकार की एजेंसी बनाम ‘पिंजरे का तोता’: केजरीवाल की बरी से जांच एजेंसियों की साख पर बड़ा सवाल

क्या जांच एजेंसीज की खोई साख को वापस पुर्नस्थापित करने में है किसी माननीय को दिलचस्पी!