(आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस बनाम मानव मस्तिष्क)
अपनी नैसर्गिक कल्पना शक्ति व मौलिकता को कभी खत्म न होने दें।
(डॉ प्रमोद शंकर सोनी)

बचपन के मेरे एक अभिन्न मित्र ने हाल ही में मुझे फ़ोन किया और मेरे लेखों की प्रशंसा करते हुए कहा—“यार, तू लेख लिखने में इतना समय खराब करता है, इतनी मेहनत करता है ….”
ChatGPT का उपयोग क्यों नहीं करता है ?
यद्यपि मुझे चैट GPT व अन्य AI मॉडल्स के बारे में पूर्व से ही जानकारी थी और मैने इसका उपयोग अभी तक केवल देश व प्रशासन की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल करने के लिए ही एक दो बार किया था। उसके अलावा शायद ही कभी इसका उपयोग मैने कभी किया हो। मुझे सदैव से ही अपने नैसर्गिक लेखन पर अधिक भरोसा रहा है क्योंकि इस दौरान में अपनी कल्पना शक्ति की पराकाष्ठा पर होता हूं। लेकिन उस दिन अपने मित्र के कहने पर मैंने जब ChatGPT को लेखन संबंधी निर्देश दिए तो चंद सेकंड में उसने मेरे सामने एक लंबा-चौड़ा, अतिज्ञान से भरपूर लेख प्रस्तुत कर दिया।
उसे देखकर मुझे लगा मानो मेरे सामने कोई जादू हो गया हो। ज्ञान और जानकारी का वह भंडार सच में चमत्कृत करने वाला था, किंतु उसी क्षण मेरे मन में यह भय भी घर कर गया कि यदि आने वाली पीढ़ियाँ ऐसे साधनों पर निर्भर हो गईं तो मानव मस्तिष्क की नैसर्गिक कल्पना, मौलिकता और चिंतन शक्ति धीरे-धीरे विलुप्त होती चली जाएगी।
मुझे आज भी याद है कि जब मैं लगभग दस वर्ष का था, तब ‘चंपक’ पत्रिका में मेरी पहली कहानी प्रकाशित हुई थी जो कि मेरे बालमन की कल्पना का परिणाम थी। फिर पंद्रह वर्ष की आयु में जब मुझे देशबंधु चित्रकथा प्रतियोगिता में पूरे मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ, तब मेरी कल्पना को जो उड़ान मिली थी, वह आज भी मेरे जीवन की सतत ऊर्जा के रूप में बरकरार है। फिर वह दिन भी आया जब में सालों भारी अवसाद, चिंता और डिप्रेशन के साए में चला गया और मुझे लंबे समय तक अनेक एंटीडिप्रेसेंट दवाईयां लेनी पड़ी जिनके बारे में कुख्यात है कि वे आपकी नैसर्गिक भावनाओं,कल्पना व चिंतन को बुरी तरह प्रभावित कर देती हैं पर उस दौरान भी मैने अपनी नैसर्गिक कल्पना शक्ति को कभी मरने नहीं दिया। परंतु आज जब मैं ChatGPT और अन्य AI मॉडल्स को देखता हूँ तो पाता हूँ कि सच में वे दिन अब दूर नहीं जब नई पीढ़ी की नैसर्गिक रचनात्मकता इन AI के आगे घुटने टेक देगी। मेरे अंग्रेजी पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में टाइपराइटर पर समाचार बनाते समय अथवा लेख लिखते समय अंग्रेजी के सही शब्द को तलाशने में दिमाग को बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी और इसके लिए ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के पन्ने खंगालने पड़ते थे। निसंदेह, वह समय कष्टकारी था पर उस कठिन प्रक्रिया ने ही मेरी सोच और लेखन को परिष्कृत किया। परंतु आज जब ये आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पल भर में सारी जानकारियां और पकी पकाई सामग्री सामने रख देती है, तो लगता है जैसे किसी के हाथ में जादुई चिराग वाला जिन्न आ गया हो जिससे जो मांगोगे वहीं मिलेगा क्षण भर में हाजिर हो जाता है। पर सच कहा जाये तो यह AI का जिन्न आगे की पीढ़ी के लिए भारी खतरे की घंटी है।
जरा सोचिए , AI ने अभी अपनी शैशव अवस्था भी पूरी नहीं की है, और अभी से ही यह हमारे मस्तिष्क को नकारा और निष्क्रिय बना रहा है। कल्पना कीजिए, जब यह और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा, तब हमारी स्वाभाविक कल्पना/ चिंतन शक्ति का क्या होगा?
जिस प्रकार प्रकृति का नियम है “Use it or lose it”, उसी प्रकार यदि हम अपने मस्तिष्क का प्रयोग बंद कर देंगे तो हमारे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स धीरे-धीरे निष्क्रिय होते चले जाएंगे। परिणामस्वरूप यह AI मॉडल्स और अधिक जीनियस होती जाएँगी और हम मंदबुद्धि बनते जाएंगे।
सच मानिए यदि हम हर छोटी-बड़ी बात के लिए ChatGPT अथवा अन्य AI मॉडल्स पर निर्भर होते चले गए, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग अपने माता-पिता या जीवनसाथी का नाम तक AI से पूछ कर बता पाएंगे क्योंकि हमारी स्मरण शक्ति शायद उस समय तक पूरी तरह लुप्त हो जाए। यह परिदृश्य न केवल हास्यास्पद बल्कि बेहद खतरनाक भी है, क्योंकि यह हमें धीरे-धीरे फिर उसी आदिम स्थिति में ले जाएगा जहाँ से मानव सभ्यता ने अपनी यात्रा शुरू की थी।
अब प्रश्न उठता है कि इस स्थिति से किस तरह बचा कैसे जाए?
तो सबसे पहला उपाय है— आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का उपयोग बेहद संयम और आवश्यकता के अनुसार ही किया जाए।
इसका उपयोग गहन शोध, टेक्निकल डेटा अथवा त्वरित जानकारी के लिए ही होना चाहिए, परंतु लेखन, नैसर्गिक सृजन, कविता, चित्रकला, संगीत, पत्रकारिता या किसी भी रचनात्मक कार्य में हमें अपने मस्तिष्क को अधिकतम काम में लेना चाहिए।
स्कूली बच्चों को प्रारंभिक अवस्था से ही पढ़ने-लिखने, कहानियाँ गढ़ने और सोचने की आदत डालनी चाहिए। उन्हें जितना अधिक हो सके मोबाइल और AI मॉडल्स से दूर रहने की सलाह देना चाहिए। जरा सोचिए यदि वे अपने स्कूली जीवन से ही इस तरह की अत्याधुनिक तकनीकों की सहायता लेने लगेंगे तो उनकी नैसर्गिक कल्पनाशक्ति कैसे पनप पाएगी?
इसके विपरीत यदि बच्चे किताबें पढ़ेंगे, पहेलियां रीडिल्स हल करेंगे, डिक्शनरी के पन्ने पलटेंगे और स्वयं मौलिकता से लिखेंगे, तो उनकी मानसिक क्षमता और शक्ति स्वाभाविक रूप से कई गुना विकसित होगी। इसके अलावा एक अन्य उपाय है, AI को साधन मानना, साध्य नहीं। हमें यह समझना होगा कि इस तरह के AI मॉडल्स केवल मददगार हो सकते हैं, परंतु वास्तविक सृजनशीलता केवल मानव मस्तिष्क द्वारा ही संभव है। जिस तरह कैलकुलेटर गणना में मदद करता है, पर गणितज्ञ की खोज और सिद्धांत उसी की बुद्धि से जन्म लेते हैं, ठीक वैसे ही AI केवल जानकारी देने का माध्यम है, कल्पना और रचनात्मकता का पर्याय कभी नहीं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर यह अंधी दौड़ हमें पतन की ओर ही ले जाएगी। अतः आवश्यकता है संतुलन की, जहाँ हम तकनीक का लाभ भी लें और साथ ही अपनी मौलिक चिंतन और कल्पना शक्ति को सुरक्षित भी रखें। यदि हम यह संतुलन कर पाए तो भविष्य की पीढ़ियाँ न केवल तकनीकी दृष्टि से समर्थ और सक्षम होंगी बल्कि रचनात्मक रूप से भी उतनी ही प्रभावशाली होंगी। अतः आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की शक्ति तभी सुंदर है जब वह हमारी कल्पना और मौलिकता में रंग भरे, उसे मिटाए नहीं।
याद रखिए,
तकनीक सहारा है, किन्तु नैसर्गिक सृजन की धारा आज भी मानव हृदय से ही बहती है।
(लेखक तुलसी साहित्य सम्मान से अलंकृत लेखक,भोपालमेंहोम्योपैथिक चिकित्सक व नेशनल एडिटर ‘Timesviews’हैं)
(साई फीचर्स)

हर्ष वर्धन वर्मा का नाम टीकमगढ़ जिले में जाना पहचाना है. पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद एक बार फिर पत्रकारिता में सक्रियता बना रहे हैं हर्ष वर्धन वर्मा . . .
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