डॉ. प्रितम भि. गेडाम
(महाराष्ट्र सरकार से सम्मानित लेखक)
17 सितंबर को हर साल विश्व रोगी सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल मरीजों को चिकित्सा संबंधी जोखिमों से बचाने की बात करना नहीं है, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐसी परिस्थितियां बनाना है, जहां बीमारी से लड़ने पहुंचे व्यक्ति को इलाज के दौरान किसी टालने योग्य नुकसान का सामना न करना पड़े। वर्ष 2026 में इस दिवस का विषय “Safe care for noncommunicable diseases” यानी गैर-संचारी रोगों के लिए सुरक्षित देखभाल है और आधिकारिक नारा “Safe care for life!” यानी जीवन के लिए सुरक्षित देखभाल है।
यह विषय भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और लंबे समय तक चलने वाली अन्य बीमारियां मरीजों को वर्षों तक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े रहने के लिए मजबूर करती हैं। ऐसे में केवल अस्पताल उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। समय पर जांच, सही निदान, सही दवा, सुरक्षित प्रक्रिया, नियमित फॉलोअप और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ उपचार तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी है।
तन्वी की कहानी ने खड़े किए कई गंभीर सवाल
हाल ही में दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में 15 वर्षीय तन्वी परियानी की मृत्यु ने लंबे इलाज और मरीज सुरक्षा से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया। राजस्थान के कोटा की रहने वाली तन्वी जन्मजात जटिल हृदय रोग से पीड़ित थी और वर्षों से उपचार के लिए एम्स जा रही थी।
परिवार के अनुसार, सुधारात्मक हृदय सर्जरी की उम्मीद में परिवार ने वर्षों तक इंतजार किया। उसके पिता ने उपचार में देरी और बार-बार बदलती तारीखों को लेकर सवाल उठाए। तन्वी की 1 सितंबर 2026 को मौत हो गई। इसके बाद अस्पताल ने उसके इलाज और मृत्यु की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए जांच समिति गठित की। हालांकि, अस्पताल का पक्ष परिवार के आरोपों से अलग है और अस्पताल के अनुसार मरीज का व्यापक मूल्यांकन किया गया था तथा उसकी जटिल हृदय संरचना को देखते हुए सुधारात्मक सर्जरी संभव नहीं मानी गई थी।
इस घटना में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मानने से पहले जांच पूरी होना आवश्यक है। लेकिन एक मरीज और परिवार के दृष्टिकोण से यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण है कि गंभीर बीमारी की स्थिति में उपचार की योजना, प्रतीक्षा, विकल्प और जोखिम की जानकारी कितनी स्पष्ट और समय पर दी जाती है।
यही रोगी सुरक्षा का मूल प्रश्न है।
गांवों में इलाज तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की चर्चा केवल बड़े शहरों के अत्याधुनिक अस्पतालों तक सीमित नहीं रह सकती। देश की बड़ी आबादी ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में रहती है। यहां समस्या कई बार अस्पताल के अंदर शुरू ही नहीं होती, बल्कि अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही शुरू हो जाती है।
तेलंगाना के कोलमगुडा क्षेत्र में हाल की एक घटना इसका उदाहरण है। भारी बारिश के बाद सड़क संपर्क टूट जाने पर सात महीने की गर्भवती आदिवासी महिला को ग्रामीणों ने अस्थायी स्ट्रेचर की मदद से उफनते नाले को पार कराया। इससे पहले भी उसी क्षेत्र में एंबुलेंस के गांव तक नहीं पहुंच पाने के कारण एक गर्भवती महिला को बैलगाड़ी से अस्पताल ले जाने की घटना सामने आई थी।
सवाल यह है कि यदि मरीज को अस्पताल तक पहुंचने के लिए नदी, नाला, खराब सड़क या कई किलोमीटर पैदल रास्ता पार करना पड़े तो केवल अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सा सुविधा को पर्याप्त कैसे माना जा सकता है?
रोगी सुरक्षा का अर्थ अस्पताल के दरवाजे से शुरू नहीं होना चाहिए। यह घर, गांव, सड़क, एंबुलेंस और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से ही शुरू होनी चाहिए।
बालाघाट की घटनाओं ने भी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठाए सवाल
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की मौत और बड़ी संख्या में बच्चों के बीमार होने की घटनाओं ने भी ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई है। विभिन्न रिपोर्टों में मृत बच्चों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। स्थानीय स्तर पर 30 से अधिक बच्चों की मौत के दावे किए गए, जबकि सरकारी स्तर पर अलग आंकड़े सामने आए हैं। इस मामले में न्यायिक स्तर पर भी प्रशासन से जवाब मांगा गया है।
यहां सबसे जरूरी बात किसी एक संख्या पर बहस करने के बजाय उस परिस्थिति को समझना है, जिसमें दूरदराज आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को बीमारी, कुपोषण, पानी, पोषण और समय पर चिकित्सा सहायता जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
जब किसी इलाके में बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ते हैं और अस्पताल तक पहुंचना कठिन होता है, तब प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था, निगरानी, टीकाकरण, पोषण, स्वच्छ पानी, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और समय पर रेफरल सिस्टम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
SRS 2024 के आंकड़े बताते हैं ग्रामीण-शहरी अंतर
भारत में मरीजों की स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच का एक गंभीर संकेत Sample Registration System Statistical Report 2024 में मिलता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देश में कुल मौतों में 45.5 प्रतिशत ऐसी थीं जिनसे पहले या तो कोई चिकित्सा सहायता नहीं मिली अथवा देखभाल अप्रशिक्षित व्यक्ति ने की। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात 48.9 प्रतिशत, जबकि शहरी क्षेत्रों में 36.1 प्रतिशत था।
यह आंकड़ा यह साबित नहीं करता कि हर ऐसी मौत स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता या मेडिकल लापरवाही के कारण हुई। मृत्यु का स्थान, बीमारी की प्रकृति, परिवार का उपचार लेने का निर्णय और रिपोर्टिंग जैसे अनेक कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं। फिर भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इतना बड़ा अंतर स्वास्थ्य सेवा की पहुंच पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है।
2024 में:
- 7 प्रतिशत मौतें सरकारी अस्पतालों में हुईं।
- 5 प्रतिशत मौतें निजी अस्पतालों में हुईं।
- 3 प्रतिशत मौतों से पहले योग्य चिकित्सा पेशेवर की देखभाल दर्ज हुई।
- 5 प्रतिशत मौतों में कोई चिकित्सा सहायता नहीं थी या अप्रशिक्षित व्यक्ति ने देखभाल की।
- ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम श्रेणी का अनुपात 9 प्रतिशत रहा।
- शहरी क्षेत्रों में यह 1 प्रतिशत रहा।
इससे स्पष्ट है कि स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार होने के बावजूद समय पर और सुरक्षित चिकित्सा सेवा तक वास्तविक पहुंच अभी भी बड़ी चुनौती है।
विश्व स्तर पर भी रोगी सुरक्षा गंभीर चिंता
रोगी सुरक्षा केवल भारत की समस्या नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य देखभाल के दौरान लगभग हर 10 में से एक मरीज को नुकसान पहुंचता है और असुरक्षित देखभाल से हर वर्ष 30 लाख से अधिक मौतें होती हैं। उपलब्ध आकलनों के अनुसार इस नुकसान का आधे से अधिक हिस्सा रोका जा सकता है।
मरीजों को नुकसान पहुंचाने वाली सामान्य घटनाओं में कई प्रकार की गलतियां शामिल हो सकती हैं, जैसे:
- दवा देने में गलती
- गलत या देर से निदान
- असुरक्षित सर्जिकल प्रक्रिया
- स्वास्थ्य सेवा से जुड़े संक्रमण
- मरीज की गलत पहचान
- असुरक्षित रक्त संक्रमण
- मरीज का अस्पताल में गिरना
- चिकित्सा उपकरणों से जुड़ी समस्याएं
- इलाज के दौरान सही जानकारी का एक स्वास्थ्यकर्मी से दूसरे तक न पहुंचना
इसलिए रोगी सुरक्षा केवल डॉक्टर की जिम्मेदारी नहीं है। यह डॉक्टर, नर्स, तकनीशियन, अस्पताल प्रशासन, दवा आपूर्ति व्यवस्था, एंबुलेंस सेवा और नीति-निर्माताओं सहित पूरी स्वास्थ्य प्रणाली की साझा जिम्मेदारी है।
गैर-संचारी रोगों में सुरक्षा क्यों अधिक महत्वपूर्ण है?
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 में गैर-संचारी रोगों पर विशेष ध्यान दिया गया है। हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों में मरीज को एक बार इलाज कराने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था से अलग नहीं होना पड़ता। उसे लंबे समय तक दवा, जांच, चिकित्सकीय सलाह और फॉलोअप की आवश्यकता हो सकती है।
WHO के अनुसार, ऐसे मरीजों के लिए जोखिम बीमारी की रोकथाम और शुरुआती जांच से लेकर निदान, उपचार, दीर्घकालिक प्रबंधन और स्वयं की देखभाल तक बने रहते हैं। लंबे समय तक स्वास्थ्य व्यवस्था से संपर्क में रहने के कारण सुरक्षा संबंधी जोखिमों के अवसर भी बढ़ जाते हैं।
इसलिए सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा का अर्थ है—
सही मरीज + सही जांच + सही निदान + सही दवा + सही समय + लगातार निगरानी।
दवाओं की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
आज दवा बाजार बहुत बड़ा हो चुका है। मरीज डॉक्टर की सलाह पर दवा खरीदता है और यह विश्वास करता है कि उसे सही गुणवत्ता वाली दवा मिल रही है। इसलिए नकली, घटिया या गलत तरीके से आपूर्ति की गई दवाओं का खतरा सीधे रोगी सुरक्षा से जुड़ जाता है।
दवा की गुणवत्ता के साथ-साथ डॉक्टर द्वारा सही दवा लिखना, सही मात्रा बताना, मरीज को संभावित दुष्प्रभाव समझाना और मरीज द्वारा निर्धारित तरीके से दवा लेना भी आवश्यक है।
बहु-रोग से पीड़ित बुजुर्ग मरीजों में यह चुनौती और बढ़ जाती है, क्योंकि वे एक साथ कई दवाएं लेते हैं। ऐसे मामलों में दवाओं के बीच संभावित प्रतिक्रिया, गलत मात्रा और दवा बदलने की स्थिति में स्पष्ट रिकॉर्ड अत्यंत जरूरी है।
केवल टेस्ट बढ़ना ही बेहतर चिकित्सा का प्रमाण नहीं
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जांच और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। आज कई ऐसी बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, जिनका वर्षों पहले निदान कठिन था।
लेकिन चिकित्सा व्यवस्था में तकनीक का उपयोग विवेकपूर्ण होना भी जरूरी है।
हर बीमारी के लिए जांच की आवश्यकता अलग होती है। मरीज को यह समझने का अधिकार है कि किसी जांच की जरूरत क्यों है, उसका उद्देश्य क्या है और उसके परिणाम से उपचार में क्या बदलाव आएगा।
इसी तरह दवा कहां से खरीदनी है, जांच कहां करानी है और किस विशेषज्ञ से मिलना है—इन सभी मामलों में मरीज को पर्याप्त जानकारी और विकल्प मिलना चाहिए। पारदर्शिता से मरीज और चिकित्सक के बीच विश्वास मजबूत होता है।
डॉक्टरों पर भरोसा और जवाबदेही दोनों जरूरी
भारतीय समाज में डॉक्टर को अक्सर भगवान का दर्जा दिया जाता है। यह सम्मान चिकित्सा पेशे की सामाजिक भूमिका को दर्शाता है। लेकिन सम्मान के साथ जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।
यह भी समझना जरूरी है कि हर खराब चिकित्सा परिणाम मेडिकल लापरवाही नहीं होता। कई गंभीर बीमारियों में सर्वोत्तम उपचार के बावजूद मरीज को बचाया नहीं जा सकता। इसलिए किसी डॉक्टर या अस्पताल को केवल खराब परिणाम के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं है।
लेकिन जहां वास्तविक लापरवाही, गलत प्रक्रिया, गलत दवा, रिकॉर्ड में गंभीर कमी, उपचार में अनुचित देरी या मरीज की सुरक्षा से समझौता हुआ हो, वहां पारदर्शी और विशेषज्ञ जांच आवश्यक है।
2025 में भारत में मेडिकल नेग्लिजेंस से जुड़े करीब 65,000 मामले दर्ज होने की जानकारी 18वीं वार्षिक MedLegal Review के दौरान सामने आई थी। यह आंकड़ा पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र को दोषी ठहराने का आधार नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि चिकित्सा संबंधी विवाद और जवाबदेही एक गंभीर सार्वजनिक मुद्दा बन चुके हैं।
मरीज की आवाज व्यवस्था का हिस्सा बने
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि मरीजों और उनके परिवारों को केवल उपचार प्राप्त करने वाला पक्ष नहीं माना जाना चाहिए। उन्हें सुरक्षित इलाज की प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
मरीज को यह अधिकार होना चाहिए कि वह पूछ सके:
- मेरी बीमारी का निदान क्या है?
- यह जांच क्यों जरूरी है?
- यह दवा क्यों दी जा रही है?
- इसके संभावित दुष्प्रभाव क्या हैं?
- अगला फॉलोअप कब है?
- हालत बिगड़ने पर किससे संपर्क करना है?
- क्या उपचार का कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध है?
मरीज का सवाल पूछना डॉक्टर पर अविश्वास नहीं, बल्कि सुरक्षित चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा है।
ग्रामीण भारत में क्या बदलना जरूरी है?
रोगी सुरक्षा को वास्तविक अर्थ देने के लिए ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में कई स्तरों पर सुधार आवश्यक हैं।
1. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मजबूत हों
गांव के मरीज को छोटी बीमारी के लिए भी सैकड़ों किलोमीटर दूर न जाना पड़े। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त डॉक्टर, नर्स, दवाएं, जांच और आपातकालीन सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।
2. एंबुलेंस नेटवर्क मजबूत हो
सड़क खराब होने पर भी मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाने के वैकल्पिक इंतजाम हों। दुर्गम क्षेत्रों के लिए स्थानीय परिवहन और आपातकालीन रेफरल प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।
3. स्वास्थ्यकर्मियों की कमी दूर हो
केवल अस्पताल की इमारत बनाने से स्वास्थ्य सेवा मजबूत नहीं होती। डॉक्टर, नर्स, तकनीशियन, फार्मासिस्ट और अन्य प्रशिक्षित कर्मचारियों की पर्याप्त उपलब्धता जरूरी है।
4. टेलीमेडिसिन का विस्तार हो
दूरदराज क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों तक डिजिटल माध्यम से पहुंच बढ़ाई जा सकती है। लेकिन टेलीमेडिसिन को स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और रेफरल प्रणाली से जोड़ना भी जरूरी है।
5. मरीज सुरक्षा की स्वतंत्र निगरानी हो
अस्पतालों में मरीज सुरक्षा संबंधी घटनाओं की रिपोर्टिंग, समीक्षा और सुधार की व्यवस्था होनी चाहिए। गलती छिपाने के बजाय उससे सीखने की संस्कृति विकसित करना जरूरी है।
स्वास्थ्य सुविधा केवल शहरों तक सीमित नहीं हो सकती
भारत में एक ओर विश्वस्तरीय अस्पताल और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, वहीं दूसरी ओर ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए अस्पताल तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
एक मरीज को इलाज के लिए अपनी जमीन बेचनी पड़े, एंबुलेंस का खर्च न उठा पाने के कारण मरीज को निजी साधन से ले जाना पड़े या खराब सड़क के कारण गर्भवती महिला को नदी पार करनी पड़े—तो यह केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं रह जाता। यह सामाजिक न्याय, बुनियादी ढांचे और शासन की गुणवत्ता से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
रोगी सुरक्षा का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब शहर के बड़े अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज और दूरस्थ आदिवासी गांव में रहने वाले गरीब मरीज—दोनों को अपने जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए समान सम्मान और समय पर आवश्यक सुविधा मिल सके।
आगे की राह क्या हो?
भारत को मरीज सुरक्षा के लिए केवल नियम बनाने से आगे बढ़कर सुरक्षा आधारित स्वास्थ्य संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है।
इसके लिए अस्पतालों में मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल, दवा सुरक्षा व्यवस्था, संक्रमण नियंत्रण, सही मरीज की पहचान, सुरक्षित सर्जरी, समय पर जांच रिपोर्ट, बेहतर रेफरल व्यवस्था और शिकायतों की निष्पक्ष जांच जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा।
साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा की पहुंच को सड़क, बिजली, इंटरनेट, एंबुलेंस, पोषण, स्वच्छ पानी और स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों से जोड़कर देखना होगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी 2026 के अभियान में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को मजबूत करने, स्वास्थ्यकर्मियों को समर्थन देने और मरीजों को सुरक्षित देखभाल में भागीदार बनाने पर जोर दे रहा है।
इलाज मिलना ही नहीं, सुरक्षित इलाज मिलना जरूरी
विश्व रोगी सुरक्षा दिवस हमें केवल यह याद दिलाने के लिए नहीं है कि अस्पतालों में गलतियां हो सकती हैं। यह हमें यह सोचने का अवसर देता है कि ऐसी गलतियों को कैसे रोका जाए और स्वास्थ्य सेवा की पूरी व्यवस्था को कैसे अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और समान बनाया जाए।
तन्वी परियानी जैसी घटनाएं हमें लंबे इलाज और मरीज की आवाज के महत्व पर सोचने को मजबूर करती हैं। तेलंगाना की गर्भवती महिला की घटना बताती है कि कई बार अस्पताल तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती है। बालाघाट की घटनाएं ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी सुविधाओं की कमजोरियों को सामने लाती हैं। वहीं SRS के आंकड़े ग्रामीण और शहरी भारत के बीच स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच की असमानता की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।
हर मरीज को सम्मानजनक, समय पर, किफायती और सुरक्षित उपचार मिलना चाहिए। गरीब होने की वजह से किसी मरीज को उपचार के लिए इंतजार करते-करते अपनी जिंदगी नहीं गंवानी चाहिए। किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचने के लिए उफनती नदी पार नहीं करनी चाहिए। किसी बच्चे की बीमारी केवल इसलिए गंभीर नहीं होनी चाहिए कि उसका गांव मुख्य सड़क से दूर है।
स्वास्थ्य सुविधा तभी वास्तव में सफल मानी जाएगी, जब वह हर व्यक्ति तक पहुंचे और मरीज को इलाज के दौरान होने वाले टालने योग्य नुकसान से भी सुरक्षित रखे।
यही विश्व रोगी सुरक्षा दिवस 2026 का सार है—“Safe care for life!” यानी जीवन के लिए सुरक्षित देखभाल।
मोबाइल एवं व्हाट्सऐप: 082374 17041
ईमेल: prit00786@gmail.com
(साई फीचर्स)