मध्यप्रदेश बना वैश्विक वन्यजीव संरक्षण का रोल मॉडल, 53 चीतों के साथ ‘चीता स्टेट’ के रूप में उभरा प्रदेश

अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस 2026 के अवसर पर भोपाल में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्यप्रदेश को वैश्विक वन्यजीव संरक्षण का रोल मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि प्रदेश आज ‘चीता स्टेट’, ‘टाइगर स्टेट’ और ‘लेपर्ड स्टेट’ के रूप में नई पहचान बना रहा है। कार्यक्रम में जैव-विविधता संरक्षण, जल संरक्षण और वन्यजीव पुनर्स्थापन से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय और योजनाओं की घोषणा की गई। केंद्र और राज्य सरकार ने पर्यावरण संरक्षण को विकास के साथ जोड़ने पर जोर दिया।

(विद्याधर जाधव)

भोपाल (साई)।अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस 2026 के अवसर पर मध्यप्रदेश ने वन्यजीव संरक्षण और जैव-विविधता के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान को एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया। भोपाल स्थित भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (आईआईएफएम) में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यक्रम एवं चीता संरक्षण वर्कशॉप में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश आज वैश्विक वन्यजीव संरक्षण का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक रोल मॉडल बनकर उभरा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश अब केवल ‘टाइगर स्टेट’ ही नहीं बल्कि ‘लेपर्ड स्टेट’, ‘चीता स्टेट’, ‘वल्चर स्टेट’, ‘घड़ियाल स्टेट’ और ‘वुल्फ स्टेट’ के रूप में भी नई पहचान बना चुका है। उन्होंने कहा कि वर्षों पहले देश से लुप्त हो चुके चीतों को फिर से भारतीय धरती पर बसाना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

53 चीतों के साथ नई पहचान बना मध्यप्रदेश

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि वर्तमान में मध्यप्रदेश में कुल 53 चीते मौजूद हैं। इनमें बड़ी संख्या भारत में जन्मे चीतों की है। श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क और गांधी सागर अभयारण्य अब चीतों का नया घर बन चुके हैं।

उन्होंने कहा कि:

  • वर्ष 2022 में पहली बार नामीबिया से चीते लाए गए
  • इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से भी चीतों का आगमन हुआ
  • भारत में जन्मे चीतों की संख्या लगातार बढ़ रही है
  • प्रोजेक्ट चीता दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव पुनर्स्थापन अभियान बन चुका है

विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए संरक्षण मॉडल के रूप में देखी जा रही है।

कूनो नेशनल पार्क बना वैश्विक आकर्षण का केंद्र

श्योपुर का कूनो नेशनल पार्क अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। कार्यक्रम में कूनो नेशनल पार्क के निदेशक श्री उत्तम कुमार शर्मा ने कहा कि चीता भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहा है और हजारों साल पुराने शैलचित्रों में भी इसकी उपस्थिति दिखाई देती है।

उन्होंने बताया कि:

  • 1952 में भारत से चीते विलुप्त घोषित किए गए थे
  • वर्ष 2009 के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हुई
  • 2021 में प्रोजेक्ट चीता एक्शन प्लान तैयार किया गया
  • अब भारत में चीतों के लिए 10 संभावित स्थानों की पहचान की गई है

उन्होंने कहा कि वर्तमान में कुल 53 चीतों में से 33 भारत में जन्मे हैं, जो परियोजना की सफलता का संकेत है।

जैव-विविधता मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी पूंजी

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश जैव-विविधता की दृष्टि से देश के सबसे समृद्ध राज्यों में शामिल है। प्रदेश में:

  • 5 हजार से अधिक वनस्पतियां
  • करीब 500 पक्षी प्रजातियां
  • 180 से अधिक मछली प्रजातियां
  • 100 से ज्यादा हाथी

मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि “मोगली लैंड” और “सफेद शेरों की धरती” के रूप में प्रसिद्ध मध्यप्रदेश प्राकृतिक धरोहरों से समृद्ध है। लगभग 100 साल बाद जंगली भैंसों की वापसी भी प्रदेश की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

वन्यजीव संरक्षण में नए प्रयोग

कार्यक्रम में वन्यजीव संरक्षण के कई नवाचारों की जानकारी भी साझा की गई। मुख्यमंत्री ने बताया कि:

  • 53 घड़ियाल कूनो नदी में छोड़े गए
  • दुर्लभ कछुओं का संरक्षण किया गया
  • हलाली डेम क्षेत्र में गिद्धों को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा गया
  • मगर और सरीसृप संरक्षण पर भी कार्य जारी है

सरकार अब जंगलों और राष्ट्रीय उद्यानों के पास वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर स्थापित कर रही है ताकि घायल या बीमार वन्यजीवों को तत्काल उपचार मिल सके।

जल संरक्षण अभियान को मिला बड़ा विस्तार

मुख्यमंत्री ने जल संरक्षण को पर्यावरण संरक्षण का आधार बताते हुए कहा कि राज्य में गुढ़ी पड़वा से गंगा दशहरा तक तीन महीने का जल संरक्षण महाअभियान चलाया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि:

  • 3000 करोड़ रुपए की लागत से कार्य जारी हैं
  • 56 हजार जल स्रोतों का जीर्णोद्धार हुआ
  • 827 बावड़ियों का पुनर्निर्माण
  • 1200 से अधिक तालाब विकसित किए गए
  • 212 नदियों में सफाई अभियान चलाया गया

इस अभियान में अब तक 18 लाख लोगों की भागीदारी दर्ज की गई है।

“जल, जंगल और जमीन” संरक्षण में नंबर वन बनने का दावा

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश जल, जंगल और जमीन की उर्वरता बचाने में देश में नंबर वन बन चुका है। उन्होंने कहा कि राज्य में 2 लाख से अधिक जलदूत तैयार किए गए हैं और हजारों जल स्रोतों का पुनर्विकास किया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण को साथ लेकर चलने की यह रणनीति भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मददगार हो सकती है।

एबीएस एंड-टू-एंड वेब पोर्टल का शुभारंभ

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेन्द्र यादव ने एबीएस एंड-टू-एंड वेब पोर्टल का शुभारंभ किया।

इस पोर्टल का उद्देश्य:

  • जैव-विविधता संरक्षण को बढ़ावा देना
  • जन-जागरूकता बढ़ाना
  • पर्यावरणीय संतुलन पर जानकारी उपलब्ध कराना
  • वन्यजीव संरक्षण गतिविधियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना

बताया गया।

इसके साथ ही “भारत की बायोडायवर्सिटी रिपोर्ट 2026” और अन्य प्रचार सामग्री का विमोचन भी किया गया।

डेटा ड्रिवन लैब से वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा

आईआईएफएम में नवस्थापित डेटा ड्रिवन लैब का लोकार्पण भी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा आधारित अनुसंधान से वन्यजीव संरक्षण की रणनीतियों को और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

इस लैब के माध्यम से:

  • वन्यजीव डेटा विश्लेषण
  • संरक्षण रणनीति
  • जलवायु प्रभाव अध्ययन
  • जैव-विविधता मॉनिटरिंग

जैसे कार्यों को वैज्ञानिक आधार मिलेगा।

केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव ने क्या कहा?

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री भूपेन्द्र यादव ने कहा कि जैव-विविधता भारतीय सभ्यता की आत्मा है। उन्होंने कहा कि भारत प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की परंपरा वाला देश रहा है।

उन्होंने कहा:

  • “जिसे हम बना नहीं सकते, कम से कम उसे बिगाड़ें नहीं”
  • जैव-विविधता हमें भोजन, दवाई और जीवन देती है
  • टाइगर रिजर्व जल संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं
  • भारत कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है

उन्होंने कहा कि वर्ष 2030 तक भारत अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल कर सकता है।

रामसर साइट्स और वेटलैंड संरक्षण पर जोर

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वर्ष 2014 तक देश में केवल 24 रामसर साइट्स थीं, जो अब बढ़कर 99 हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि बहुत जल्द इनकी संख्या 100 तक पहुंच जाएगी।

उन्होंने यह भी बताया कि:

  • इंदौर को वेटलैंड सिटी घोषित किया गया है
  • चंबल नदी संरक्षण की योजना बनाई जा रही है
  • मिशन लाइफ के माध्यम से टिकाऊ विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है

विशेषज्ञों का मानना है कि वेटलैंड संरक्षण जलवायु संतुलन और जल संरक्षण दोनों के लिए आवश्यक है।

स्थानीय भागीदारी बढ़ाने पर जोर

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि सामाजिक भागीदारी का विषय भी है।

विशेष रूप से:

  • महिला स्व-सहायता समूहों की भागीदारी
  • जनजातीय समुदायों की भूमिका
  • स्थानीय युवाओं को “चीता मित्र” बनाना
  • पर्यावरण आधारित रोजगार

जैसे विषयों पर जोर दिया गया।

मुख्यमंत्री ने जनजातीय कलाकारों को प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा कर सांस्कृतिक संरक्षण को भी महत्व दिया।

इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस पर चर्चा

इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस (IBCA) के डायरेक्टर जनरल डॉ. एस.पी. यादव ने कहा कि भारत अब बिग कैट संरक्षण में वैश्विक नेतृत्व कर रहा है।

उन्होंने बताया कि:

  • 95 देशों को जोड़ने की पहल जारी है
  • 25 देश पहले ही सदस्य बन चुके हैं
  • दुनिया की 7 बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण पर कार्य हो रहा है
  • भारत में 5 प्रमुख बिग कैट प्रजातियां पाई जाती हैं

उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश का कूनो मॉडल दुनिया के लिए अध्ययन का विषय बन चुका है।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियां

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और संसाधनों के असंतुलित उपयोग से पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • वर्षा का पैटर्न बदल रहा है
  • प्रवासी पक्षियों की संख्या घट रही है
  • कोरल रीफ तेजी से नष्ट हो रही हैं
  • जैव-विविधता पर संकट बढ़ रहा है

ऐसे में सतत विकास और प्रकृति संरक्षण को प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है।

भोपाल में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस 2026 का कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति देश और राज्य की प्रतिबद्धता का मजबूत संदेश बनकर सामने आया। मध्यप्रदेश ने प्रोजेक्ट चीता, जल संरक्षण और वन्यजीव पुनर्स्थापन के माध्यम से राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। यदि इसी दिशा में योजनाओं का क्रियान्वयन जारी रहा तो मध्यप्रदेश आने वाले वर्षों में वैश्विक जैव-विविधता संरक्षण का सबसे मजबूत मॉडल बन सकता है।