जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में महाघोटाला: बिना सामग्री खरीदे पास हुए 1 करोड़ के फर्जी बिल, CMHO डॉ. संजय मिश्रा निलंबित

मध्य प्रदेश के जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में 1 करोड़ रुपये से अधिक का महाघोटाला सामने आया है। बिना कोई सामग्री प्राप्त किए ही सिंह इंटरप्राइजेज भोपाल को लगभग 93 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया। इस गंभीर वित्तीय अनियमितता के आरोप में जबलपुर के प्रभारी सीएमएचओ डॉ. संजय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इस कार्रवाई ने प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा दिया है।

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Dr. sanjay mishra jabalpur RJD and CMHO order 002

(सुमित खरे)

जबलपुर (साई)।मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले से भ्रष्टाचार का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग, जिसकी जिम्मेदारी आम जनता के जीवन की रक्षा करना और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराना है, वहीं के शीर्ष अधिकारियों द्वारा करोड़ों रुपये के सरकारी धन के गबन का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में फर्जी देयक (बिल) लगाकर करोड़ों रुपये का भुगतान किए जाने की पुष्टि हुई है । इस मामले में राज्य शासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए जबलपुर के प्रभारी सीएमएचओ सह प्रभारी क्षेत्रीय संचालक डॉ. संजय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है । यह कार्रवाई स्पष्ट करती है कि मध्य प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर काम कर रही है।

पृष्ठभूमि: कैसे खुला घोटाले का राज (Background)इस पूरे फर्जीवाड़े की सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब जबलपुर कलेक्टर कार्यालय को सीएमएचओ कार्यालय में हो रहे संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और फर्जी बिलों के भुगतान की गोपनीय शिकायतें मिलीं। स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर आ रहे सरकारी फंड की बंदरबांट की सूचना मिलते ही प्रशासन सतर्क हो गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर जबलपुर द्वारा31 मार्च 2026 को एक विशेष जांच दल (Investigating Team) का गठन किया गया

जांच दल ने बिना कोई समय गंवाए उसी दिन (31 मार्च 2026) कार्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जबलपुर में छापा मारा और गहन निरीक्षण किया । इस आकस्मिक निरीक्षण के दौरान स्टोर शाखा और लेखा शाखा के जो दस्तावेज सामने आए, उन्होंने पूरे महकमे में फैले भ्रष्टाचार की पोल खोलकर रख दी।

वर्तमान स्थिति: 1करोड़ रुपये के 13फर्जी बिलों का खेल (Current Situation / Latest Update)जांच दल की रिपोर्ट के अनुसार, घोटाले की मुख्य जड़ ‘सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल’ नाम की फर्म से जुड़ी है। कार्यालय की स्टोर शाखा में रखे स्टॉक रजिस्टर की जांच करने पर पता चला कि महज एक हफ्ते के भीतर करोड़ों रुपये के बिल पास करने की साजिश रची गई थी।

दिनांक17 मार्च 2026 को स्टॉक रजिस्टर में 6 देयकों (बिलों) की प्रविष्टि की गई, जिनकी कुल राशि 42,99,998/- रुपये थी इसके ठीक सात दिन बाद, यानी 24 मार्च 2026 को 7 और देयकों की प्रविष्टि कर दी गई, जिनकी कुल राशि 57,75,000/- रुपये थी इस तरह कुल मिलाकर $6+7=13$ फर्जी देयकों के माध्यम से 1,00,74,998/- रुपये (एक करोड़ चौहत्तर लाख नौ सौ अन्ठानब्बे रुपये) का बिल तैयार किया गया सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि स्टॉक रजिस्टर में करोड़ों रुपये की सामग्री दर्ज कर ली गई, लेकिन भंडार गृह (Store Room) में सुई से लेकर बड़ी मशीनों तक का एक भी सामान भौतिक रूप से मौजूद नहीं था

तथ्य और आंकड़ों का विश्लेषण: अधिकारियों की मिलीभगत और झूठ (Facts, Figures, Data Analysis)

इस पूरे प्रकरण में जब जांच दल ने संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों से पूछताछ की, तो एक-दूसरे पर दोषारोपण का दौर शुरू हो गया।

  • फार्मासिस्ट का चौंकाने वाला बयान: संविदा पर कार्यरत फार्मासिस्ट जवाहर लोधी ने साफ तौर पर कहा कि उसने स्टॉक रजिस्टर में ये सारी प्रविष्टियां जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) श्री आदित्य तिवारी के दबाव और उनके कहने पर की हैं उसने स्पष्ट किया कि सामग्री भौतिक रूप से भंडार गृह में कभी आई ही नहीं थी
  • स्टोर कीपर का झूठ: नियमित स्टोर कीपर नीरज कौरव ने जांच दल को गुमराह करने की कोशिश की।उसने दावा किया कि सामग्री आंशिक रूप से भंडार गृह में उपलब्ध है, लेकिन जब जांच दल ने मौके पर जाकर देखा, तो वहां कोई सामग्री नहीं मिली
  • DPMकी सफाई: जिला कार्यक्रम प्रबंधक आदित्य तिवारी ने भी वही रटा-रटाया जवाब दिया कि कुछ सामग्री प्राप्त हो गई है और कुछ आना बाकी है लेकिन जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि13 देयकों में से किसी भी सामग्री का भौतिक अस्तित्व कार्यालय में नहीं था

सबसे बड़ा वित्तीय अपराध यह किया गया कि सामग्री प्राप्त होने की प्रत्याशा (उम्मीद) में ही करोड़ों का भुगतान कर दिया गया, जो सीधे तौर पर ‘भण्डार क्रय नियमों’ का खुला उल्लंघन है

वित्तीय नियमों की उड़ी धज्जियां और लेखा शाखा की घोर लापरवाही (Administrative Impact)

जांच का दायरा जब लेखा शाखा (Accounts Branch) तक पहुंचा, तो वहां की कार्यप्रणाली देखकर जांच अधिकारी भी दंग रह गए।

  • कुल13 देयकों में से दिनांक 23 मार्च 2026 के एक देयक (राशि 7,70,000/- रुपये) को छोड़कर बाकी 12 देयकों का भुगतान किया जा चुका था
  • यानी सरकारी खजाने से93,04,998/- रुपये (तिरान्नबे लाख चार हजार नौ सौ अन्ठान्नबे रुपये) की भारी-भरकम राशि बिना कोई सामान खरीदे सीधे वेंडर के खाते में ट्रांसफर कर दी गई
  • हद तो तब हो गई जब यह पता चला कि लेखा शाखा द्वारा कैशबुक (Cashbook) का संधारण सितंबर 2025 के बाद से किया ही नहीं गया है इस वजह से इन करोड़ों रुपये के भुगतानों की प्रविष्टि कैशबुक में थी ही नहीं

मध्य प्रदेश भण्डार क्रय तथा सेवा उपार्जन नियम2015 (यथा संशोधित 2022) के बिंदु क्रमांक 17.3 के अनुसार, किसी भी भुगतान से पहले यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि सामग्री का भौतिक निरीक्षण हो चुका है और वह तय मानकों के अनुरूप है लेकिन इस मामले में नियमों को ताक पर रखकर भुगतान किया गया, जो गंभीर वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है

संजीवनी केंद्रों के नाम पर जनता से छलावा (Society Impact) इस घोटाले का सीधा असर आम जनता के स्वास्थ्य पर पड़ा है। शिकायत में संजीवनी क्लीनिकों और स्वास्थ्य केंद्रों के विकास से जुड़े बिल भी शामिल थे।जिले के विभिन्न संजीवनी केंद्रों में भवन मरम्मत, रंगाई-पुताई और कंप्यूटर सुधार के नाम पर भी फर्जी बिल लगाए गए थे इसके अलावा40 अलमारियों की खरीद का बिल लगाया गया था, जिसमें से विवरण पंजी के अनुसार सिर्फ 21 अलमारियों का वितरण विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों में दिखाया गया शेष अलमारियों को कस्तूरबा गांधी वार्ड, चंचला बाई कॉलेज के पास स्थित संजीवनी क्लीनिक में रखा बताया गया । यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए आए फंड का इस्तेमाल जनता की भलाई के बजाय निजी जेबें भरने के लिए किया जा रहा था।

कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई: CMHOडॉ. संजय मिश्रा निलंबित (Political & Administrative Context)इन तमाम ठोस सबूतों और जांच रिपोर्ट के आधार पर लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के आयुक्त द्वारा 03 अप्रैल 2026 को एक सख्त आदेश जारी किया गया

आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि डॉ.संजय मिश्रा ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जैसा महत्वपूर्ण पर्यवेक्षीय (Supervisory) पद धारण करने के बावजूद अपने कर्तव्यों के प्रति घोर लापरवाही बरती और स्वेच्छाचारिता दिखाई उनके इस कृत्य से न केवल शासन की छवि धूमिल हुई है, बल्कि उनका असफल प्रशासकीय नियंत्रण भी उजागर हुआ है

परिणामस्वरूप, मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम 9 (1) के अंतर्गत डॉ.संजय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय कार्यालय क्षेत्रीय संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं, भोपाल संभाग तय किया गया है निलंबन काल में उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ते की पात्रता होगी

आम जनता की प्रतिक्रिया और आक्रोश (Public Reaction)

स्वास्थ्य विभाग में हुए इस महाघोटाले के खुलासे के बाद जबलपुर की स्थानीय जनता और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है। नागरिकों का कहना है कि एक तरफ सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बुनियादी दवाइयां और उपकरण नहीं मिल पाते हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारी करोड़ों रुपये का फर्जीवाड़ा कर रहे हैं। कोरोना महामारी और अन्य स्वास्थ्य संकटों के दौर में जहां एक-एक रुपये का महत्व है, वहां 1 करोड़ रुपये के फर्जी बिल पास होना पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। आम जनता अब इस मामले में शामिल ‘सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल’ और अन्य सभी संलिप्त कर्मचारियों की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग कर रही है।

विशेषज्ञों की राय: सिस्टम की खामियां (Expert Views)

प्रशासनिक और वित्तीय मामलों के जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी रकम का फर्जी भुगतान बिना एक मजबूत ‘सिंडिकेट’ (गठजोड़) के संभव नहीं है। निचले स्तर के क्लर्क से लेकर डीपीएम और अंततः सीएमएचओ तक, जब तक पूरी श्रृंखला भ्रष्ट न हो, तब तक बिना सामान के 93 लाख रुपये का भुगतान ट्रेजरी से पास नहीं हो सकता। विशेषज्ञों के अनुसार, कैशबुक का 6 महीने से अपडेट न होना ऑडिट सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता है। यदि समय-समय पर आंतरिक ऑडिट होता तो यह घोटाला पनप ही नहीं पाता।

भविष्य की संभावनाएं और आगे की जांच (Future Possibilities) प्रशासनिक गलियारों में अब इस बात की चर्चा तेज है कि यह घोटाला केवल जबलपुर तक सीमित नहीं हो सकता। सिंह इन्टरप्राइजेस भोपाल के साथ पूरे प्रदेश के किन-किन जिलों के स्वास्थ्य विभागों ने करार किए हैं, इसकी भी जांच होने की संभावना है। आदेश के अनुसार, क्षेत्रीय संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं, जबलपुर संभाग को निर्देशित किया गया है कि वे तीन दिन की समयावधि में डॉ.संजय मिश्रा के विरुद्ध आरोप पत्र (Charge Sheet) का प्रारूप संचालनालय को अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएं आने वाले दिनों में संविदा फार्मासिस्ट जवाहर लोधी, स्टोर कीपर नीरज कौरव और डीपीएम आदित्य तिवारी पर भी विभागीय जांच के बाद कड़ी दंडात्मक कार्रवाई और पुलिस में धोखाधड़ी की FIR दर्ज होने की प्रबल संभावना है

निष्कर्ष / Conclusion जबलपुर का यह सीएमएचओ घोटाला सरकारी तंत्र में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों की उस मानसिकता को दर्शाता है जो जनता के पैसे को अपनी जागीर समझते हैं।बिना सामग्री प्राप्त किए93 लाख रुपये से अधिक का भुगतान कर देना एक सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र है हालांकि, जबलपुर कलेक्टर की त्वरित कार्रवाई और जांच टीम के निष्पक्ष प्रतिवेदन से यह फर्जीवाड़ा समय रहते पकड़ में आ गया और मुख्य आरोपी को निलंबित कर दिया गया । यह सख्त प्रशासनिक कदम भविष्य में अन्य अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब देखना यह है कि इस महाघोटाले के बाकी आरोपियों पर आपराधिक मामले कब दर्ज होते हैं और लूटी गई सरकारी रकम की वसूली कैसे की जाती है। जनहित में यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से पारदर्शी बने ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं ईमानदारी से पहुंच सकें।