सिवनी हवालाकांड में बड़ा मोड़: हाईकोर्ट से रितेश वर्मा को नियमित जमानत, 2.96 करोड़ हवाला मामले में अहम आदेश

सिवनी हवालाकांड में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने सीओपी पूजा पांडे के ड्राइवर रितेश वर्मा को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि आवेदक की प्रत्यक्ष भूमिका प्रथमदृष्टया सिद्ध नहीं होती और वह केवल ड्यूटी निभा रहा था। 2.96 करोड़ की कथित हवाला राशि से जुड़े इस मामले में यह आदेश जांच और ट्रायल की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है। फैसले से न्यायिक प्रक्रिया, पुलिस जवाबदेही और बीएनएसएस 2023 के प्रावधानों पर भी चर्चा तेज हो गई है।

(सुमित खरे)

जबलपुर (साई)।मध्यप्रदेश के चर्चित सिवनी हवालाकांड में न्यायिक प्रक्रिया ने नया मोड़ लिया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर खंडपीठ ने आरोपी रितेश वर्मा को नियमित जमानत प्रदान कर दी है। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा द्वारा पारित किया गया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आवेदक की अपराध में प्रत्यक्ष और स्वतंत्र भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होती। वह संबंधित अधिकारी का चालक था और प्रथमदृष्टया ड्यूटी के निर्वहन की स्थिति में पाया गया।

क्या है पूरा मामला

यह प्रकरण एफआईआर क्रमांक 473/2025 से जुड़ा है, जो सिवनी जिले के थाना लखनवाड़ा में दर्ज हुआ था। आरोप था कि 2 करोड़ 96 लाख 50 हजार रुपये की हवाला राशि सतना-कटनी से नागपुर की ओर ले जाई जा रही थी।

जांच के दौरान यह आरोप सामने आया कि कुछ पुलिस अधिकारियों ने कथित रूप से इस राशि में से 1 करोड़ 45 लाख रुपये निकाल लिए। इसी क्रम में तत्कालीन एसडीओपी पूजा पांडे के चालक रितेश वर्मा को भी आरोपी बनाया गया।

रितेश वर्मा को 15 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था और वह तब से न्यायिक हिरासत में थे।

पहली जमानत अर्जी और दूसरी याचिका

रितेश वर्मा की ओर से पहले भी जमानत आवेदन प्रस्तुत किया गया था, जिसे दिसंबर 2025 में वापस लेने की अनुमति के साथ निरस्त कर दिया गया था।

इसके बाद दूसरी नियमित जमानत अर्जी दायर की गई, जिस पर सुनवाई के बाद अदालत ने राहत प्रदान की।

यह घटनाक्रम दर्शाता है कि न्यायालय प्रत्येक आवेदन पर तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर स्वतंत्र रूप से विचार करता है।

आवेदक पक्ष के तर्क

वरिष्ठ अधिवक्ता की ओर से प्रस्तुत दलीलों में कहा गया कि:

  • आवेदक केवल वाहन चालक था।
  • उसका कोई स्वतंत्र आपराधिक रोल नहीं है।
  • वह अधिकारी के निर्देशों का पालन कर रहा था।
  • कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
  • चार्जशीट दाखिल हो चुकी है।
  • ट्रायल में समय लग सकता है।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी के फरार होने या साक्ष्य प्रभावित करने की संभावना नहीं है।

राज्य पक्ष का विरोध

राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत तर्कों में कहा गया कि आरोपी घटना स्थल पर मौजूद था और उसकी भूमिका की गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

सरकारी अधिवक्ता ने दलील दी कि मामले की प्रकृति गंभीर है और जांच प्रभावित होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

न्यायालय का अवलोकन

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। आदेश में कहा गया कि:

  • आवेदक की भूमिका सीमित प्रतीत होती है।
  • उसके फरार होने की संभावना नहीं है।
  • ट्रायल में समय लगना संभावित है।
  • जमानत आदेश मामले के मेरिट पर टिप्पणी नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत केवल न्यायिक विवेक का उपयोग है, दोषसिद्धि या निर्दोषता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं।

जमानत की शर्तें

अदालत ने निम्न शर्तों के साथ जमानत स्वीकृत की:

  1. 50,000 रुपये का व्यक्तिगत मुचलका।
  2. समान राशि की एक सॉल्वेंट जमानत।
  3. प्रत्येक सुनवाई पर न्यायालय में उपस्थिति अनिवार्य।
  4. बीएनएसएस की धारा 480(3) का पालन।
  5. बिना अनुमति देश छोड़कर बाहर न जाना।

इन शर्तों से यह स्पष्ट है कि न्यायालय ने स्वतंत्रता और न्यायिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

सिवनी हवालाकांड: पृष्ठभूमि और प्रभाव

यह मामला अक्टूबर 2025 में सामने आया था और तेजी से राज्यस्तरीय चर्चा का विषय बन गया।

आरोप था कि हवाला कारोबार के जरिए बड़ी रकम का अवैध परिवहन किया जा रहा था। बाद में पुलिस अधिकारियों पर ही रकम में हेरफेर के आरोप लगे।

जांच प्रारंभ होने के बाद मामला संवेदनशील बन गया क्योंकि इसमें कानून प्रवर्तन एजेंसी के कर्मियों पर आरोप थे।

यह प्रकरण प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी बन गया।

कानूनी परिप्रेक्ष्य: बीएनएसएस 2023 का प्रभाव

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता का स्थान लिया है।

इस कानून के तहत नियमित जमानत के प्रावधानों में न्यायालय को व्यापक विवेकाधिकार प्रदान किया गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि:

  • आरोपी लंबे समय से हिरासत में हो,
  • ट्रायल शीघ्र संभव न हो,
  • साक्ष्य सुरक्षित हों,

तो जमानत दी जा सकती है।

इस मामले में अदालत ने इन्हीं सिद्धांतों का पालन किया।

सामाजिक और प्रशासनिक आयाम

यह मामला केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता से भी जुड़ा है।

समाज में यह संदेश गया है कि:

  • कानून से ऊपर कोई नहीं।
  • आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
  • न्यायालय अंतिम संरक्षक की भूमिका निभाता है।

साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि आरोप लगना और दोष सिद्ध होना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं।

सार्वजनिक प्रतिक्रिया

सिवनी और आसपास के क्षेत्रों में इस आदेश पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली।

कुछ लोगों ने इसे न्यायिक संतुलन का उदाहरण बताया, जबकि अन्य का मानना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्ती अपेक्षित थी।

कानूनी विशेषज्ञों ने इसे “न्यायिक विवेक का प्रयोग” बताया है।

आगे की प्रक्रिया

मामले में ट्रायल प्रक्रिया जारी रहेगी।

  • आरोप पत्र दाखिल हो चुका है।
  • साक्ष्य परीक्षण होना शेष है।
  • गवाहों के बयान दर्ज किए जाएंगे।

अंतिम निर्णय ट्रायल के बाद ही आएगा।

निष्कर्ष

सिवनी हवालाकांड में रितेश वर्मा को मिली जमानत ने इस बहुचर्चित मामले में नई दिशा दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जमानत आदेश दोषमुक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का एक चरण है।

2.96 करोड़ रुपये की कथित हवाला राशि से जुड़े इस मामले में आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। बीएनएसएस 2023 के तहत दिए गए इस आदेश ने यह संकेत दिया है कि न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जांच की निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

आने वाले समय में ट्रायल की प्रगति और न्यायिक निर्णय इस प्रकरण की अंतिम तस्वीर स्पष्ट करेंगे, लेकिन फिलहाल यह आदेश न्यायिक प्रणाली की सक्रियता और संवैधानिक संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है।