लिमटी की लालटेन757
सरकारी और शैक्षणिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य: छह छंदों के पूर्ण संस्करण पर जोर, देशभर में बहस तेज
संपूर्ण छह छंदों का होगा समावेश;संविधान में स्पष्ट प्रावधान नहीं,किंतु गृह मंत्रालय ने जारी किए निर्देश
(लिमटी खरे)
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केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर जारी नए दिशा-निर्देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दे दिया है। गृह मंत्रालय ने सरकारी और शैक्षणिक आयोजनों में इसके प्रस्तुतीकरण के लिए विस्तृत प्रोटोकॉल तय किए हैं। विशेष रूप से छह छंदों के आधिकारिक पूर्ण संस्करण को प्रमुख राजकीय समारोहों में शामिल करने की बात कही गई है।
हालांकि संविधान में इसके गायन को लेकर स्पष्ट कानूनी अनिवार्यता का उल्लेख नहीं है, फिर भी प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से इसकी औपचारिक भूमिका को मजबूत करने की पहल की गई है।
क्या हैं नए दिशा-निर्देश?
गृह मंत्रालय द्वारा जारी प्रोटोकॉल के अनुसार:
- प्रमुख सरकारी समारोहों में वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया जाएगा।
- राष्ट्रीय ध्वजारोहण के अवसर पर इसका गायन या वादन शामिल हो सकता है।
- राष्ट्रपति और राज्यपालों के औपचारिक आगमन-प्रस्थान समारोह में इसे प्रोटोकॉल का हिस्सा बनाया जाएगा।
- निर्धारित संबोधनों से पहले और बाद में भी इसकी प्रस्तुति की व्यवस्था की जा सकती है।
- राष्ट्रगीत के दौरान उपस्थित जनसमूह को सम्मानजनक मुद्रा में खड़े रहने की अपेक्षा की गई है।
पूर्ण संस्करण की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड बताई गई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता आंदोलन की हुंकार
वंदे मातरम् का इतिहास लगभग 150 वर्ष पुराना है। महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में इसकी रचना की। बाद में 1882 में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में स्थान मिला।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से गाया। 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह स्वदेशी आंदोलन का मुख्य नारा बन गया। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने “वंदे मातरम्” के उद्घोष के साथ ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
1906 में अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंध लगाने के प्रयास के बावजूद यह नारा बंगाल से निकलकर पंजाब, मुंबई और दक्षिण भारत तक फैल गया।
छह छंदों का विवाद और ऐतिहासिक निर्णय
मूल गीत में छह छंद हैं, लेकिन राष्ट्रगीत के रूप में केवल शुरुआती दो छंदों को मान्यता दी गई।
1930 के दशक में कुछ संगठनों ने अंतिम चार छंदों पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि इनमें मातृभूमि की तुलना देवी स्वरूपों से की गई है, जो सभी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं है।
1937 में एक समिति ने केवल पहले दो छंदों को सार्वजनिक रूप से गाने का निर्णय लिया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया। हालांकि इसके गायन को कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं बनाया गया।
संवैधानिक पहलू: अनुच्छेद 25 और धार्मिक स्वतंत्रता
संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
यही कारण है कि वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने के प्रश्न पर संवैधानिक बहस सामने आई है। आलोचकों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की आस्था या धार्मिक मान्यता गीत की कुछ पंक्तियों से मेल नहीं खाती, तो बाध्यता व्यक्तिगत स्वतंत्रता से टकरा सकती है।
समर्थकों का मत है कि यह राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक है और इसे सामूहिक रूप से गाने से राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होती है।
प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव
यह निर्णय केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
- सरकारी संस्थानों में एकरूपता बढ़ेगी।
- राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति औपचारिक सम्मान पर बल मिलेगा।
- राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक बहस तेज हो सकती है।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे निर्णय राष्ट्रीय पहचान के विमर्श को केंद्र में लाते हैं, जिससे सामाजिक संवाद भी प्रभावित होता है।
सामाजिक प्रभाव और जनभावना
सामाजिक स्तर पर यह मुद्दा मिश्रित प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर रहा है।
समर्थन में तर्क:
- राष्ट्रभक्ति की भावना सुदृढ़ होगी।
- युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जोड़ने का अवसर मिलेगा।
- राष्ट्रीय एकता का प्रतीक मजबूत होगा।
विरोध में तर्क:
- बाध्यता से स्वैच्छिक भावना प्रभावित हो सकती है।
- बहुलतावादी समाज में विविध आस्थाओं का सम्मान आवश्यक है।
- देशभक्ति को कानूनी रूप से परिभाषित करना उचित नहीं।
विशेषज्ञों की राय
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान अनिवार्य है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति का स्वरूप संतुलित होना चाहिए।
शिक्षा नीति विशेषज्ञों के अनुसार, यदि राष्ट्रगीत को विद्यालयों में शामिल किया जाता है, तो उसके ऐतिहासिक संदर्भ और मूल भावना को भी विद्यार्थियों को समझाना आवश्यक होगा।
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रभक्ति की भावना जागरूकता और शिक्षा से विकसित होती है, केवल आदेश से नहीं।
डेटा और तथ्य
- रचना काल: लगभग 1875
- उपन्यास में प्रकाशन: 1882
- पहली सार्वजनिक प्रस्तुति: 1896
- राष्ट्रगीत का दर्जा: 24 जनवरी 1950
- आधिकारिक पूर्ण संस्करण की अवधि: लगभग 3 मिनट 10 सेकंड
ये तथ्य दर्शाते हैं कि वंदे मातरम् केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक आंदोलन का प्रतीक रहा है।
भविष्य की संभावनाएं
आने वाले समय में यह विषय न्यायिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है।
संभव है कि:
- इस पर विस्तृत दिशा-निर्देश राज्यों द्वारा भी जारी किए जाएं।
- शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में इसके ऐतिहासिक महत्व को और विस्तार से शामिल किया जाए।
- सामाजिक संगठनों द्वारा जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
साथ ही यह भी संभावना है कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सम्मान और स्वतंत्रता दोनों को समान महत्व दिया जाए।
निष्कर्ष
वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमिट पहचान है। इसका सम्मान निर्विवाद है। प्रश्न केवल यह है कि क्या राष्ट्रप्रेम को कानूनी बाध्यता से जोड़ा जाना चाहिए या उसे स्वैच्छिक भावना के रूप में विकसित होने दिया जाए।
भारत की शक्ति उसकी विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है। ऐसे में आवश्यक है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम रखा जाए।
वंदे मातरम् प्रेरणा, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। यदि इसे संवेदनशीलता और संतुलन के साथ लागू किया जाए, तो यह सामाजिक एकता को मजबूत कर सकता है। लोकतांत्रिक परिपक्वता इसी में है कि सम्मान हृदय से उत्पन्न हो—और वही स्थायी भी होता है।
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भाजपा-नीत केंद्र सरकार ने भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के गायन के लिए विस्तृत आधिकारिक प्रोटोकॉल जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि सरकारी और सार्वजनिक समारोहों में इसे किस प्रकार और किन अवसरों पर प्रस्तुत किया जाएगा। साथ ही, राष्ट्रगीत के दौरान उपस्थित जनसमूह के आचरण और मर्यादा को लेकर भी मार्गदर्शन दिया गया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी इन निर्देशों का उद्देश्य देशभर में सार्वजनिक तथा औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत की गरिमा और औपचारिक भूमिका को सुदृढ़ करना है। विशेष रूप से राजकीय समारोहों और संस्थागत कार्यक्रमों में इसके पालन पर बल दिया गया है।
निर्देशों के अनुसार, वंदे मातरम् का आधिकारिक पूर्ण संस्करण—जिसमें छह छंद शामिल हैं और जिसकी अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है—प्रमुख राजकीय अवसरों पर प्रस्तुत किया जाएगा। इनमें राष्ट्रीय ध्वजारोहण, राष्ट्रपति एवं राज्यपालों के औपचारिक आगमन-प्रस्थान समारोह, तथा उनके निर्धारित संबोधनों से पूर्व और पश्चात आयोजित कार्यक्रम शामिल हैं।
वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वह हुंकार है जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बना। आइए, इसके लगभग डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास, रचना-प्रक्रिया और इससे जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों पर एक दृष्टि डालते हैं।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में इस गीत की रचना की। माना जाता है कि 7 नवंबर 1875 के आसपास इसे लिखा गया और बाद में 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। यह गीत मातृभूमि को देवी-स्वरूप मानकर उसकी वंदना करता है। आनंदमठ की कथा देश के लिए समर्पित संन्यासियों के संघर्ष पर आधारित थी, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना को प्रबल किया।
हालांकि, जब इसे अनिवार्य बनाने की मांग उठती है, तब बहस जटिल हो जाती है। क्या राष्ट्रप्रेम को कानूनी दायरे में बाध्य किया जा सकता है? समर्थकों का मत है कि वंदे मातरम् राष्ट्र की अस्मिता और स्वाभिमान का प्रतीक है। विद्यालयों और सरकारी कार्यक्रमों में इसका सामूहिक गायन राष्ट्रीय एकता और साझा पहचान को मजबूत कर सकता है।
यह गीत क्रांतिकारियों की प्रेरणा रहा है। इसे अनिवार्य करना उस ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम माना जाता है। समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान नागरिकों में अनुशासन और देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ करता है, जो किसी भी राष्ट्र-राज्य की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
दूसरी ओर, विरोधियों का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। कुछ समुदायों की आस्था के अनुसार मातृभूमि को देवी के रूप में संबोधित करना स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में अनिवार्यता व्यक्तिगत विश्वास से टकराव उत्पन्न कर सकती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि देशभक्ति कानून से नहीं, बल्कि अंतःकरण से उत्पन्न होती है; बाध्यता इसे औपचारिकता में बदल सकती है।
संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, परंतु इसके गायन को लेकर कोई कानूनी अनिवार्यता निर्धारित नहीं की। यह निर्णय भारत की बहुलतावादी संरचना और विविध सांस्कृतिक भावनाओं को ध्यान में रखकर लिया गया था। अनिवार्यता का प्रश्न प्रायः राजनीतिक ध्रुवीकरण को जन्म देता है, जिससे संवाद की बजाय आरोप-प्रत्यारोप बढ़ सकते हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया। 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह स्वदेशी आंदोलन का प्रमुख नारा बना। कोलकाता के टाउन हॉल में हजारों लोगों ने “वंदे मातरम्” के उद्घोष से वातावरण गुंजायमान कर दिया।
1906 में अंग्रेजों ने इस नारे पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, फिर भी जनसमर्थन कम नहीं हुआ। बंगाल से निकलकर यह स्वर पंजाब, मुंबई और दक्षिण भारत तक फैल गया। लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी और रिहाई के समय भी जनता ने इसी उद्घोष से उनका स्वागत किया।
मूल गीत में छह छंद हैं, किंतु राष्ट्रगीत के रूप में केवल प्रारंभिक दो छंदों को मान्यता मिली। 1930 के दशक में मुस्लिम लीग ने शेष चार छंदों पर आपत्ति जताई, जिनमें मातृभूमि की तुलना दुर्गा और काली जैसी देवियों से की गई थी। सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए 1937 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने केवल पहले दो छंद गाने का निर्णय लिया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान होगा और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान दिया जाएगा, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में इसकी ऐतिहासिक भूमिका रही है।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि वंदे मातरम् का सम्मान हो या न हो—सम्मान निर्विवाद है। प्रश्न यह है कि क्या सम्मान को कानूनी बाध्यता में बदला जाना चाहिए? भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति अनेक रूपों में होती है—कोई “वंदे मातरम्” कहकर, कोई “जय हिंद” के उद्घोष से, तो कोई सेवा और कर्म के माध्यम से।
लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह इन सभी अभिव्यक्तियों को स्थान दे। वंदे मातरम् भारतीय इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। इसे अनिवार्य बनाने की बहस हमें यह सोचने पर विवश करती है कि राष्ट्रभक्ति आदेश से उत्पन्न हो या आत्मस्वीकृति से? संभवतः बेहतर यही होगा कि वंदे मातरम् प्रेरणा और सम्मान का प्रतीक बना रहे, न कि विधिक बाध्यता का विषय। क्योंकि सच्ची देशभक्ति वही है जो हृदय से उपजे, बाध्यता से नहीं।
लिमटी की लालटेन के 757वें एपिसोड में फिलहाल इतना ही। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया की साई न्यूज पर यह कार्यक्रम प्रतिदिन सुबह 7 बजे प्रसारित किया जा रहा है। आप वेबसाइट या साई न्यूज चैनल पर इसे नियमित देख सकते हैं। यदि आपको लिमटी की लालटेन पसंद आ रही हो तो कृपया इसे लाइक, शेयर और सब्सक्राइब अवश्य करें। हम जल्द ही 758वें एपिसोड के साथ पुनः उपस्थित होंगे। तब तक के लिए अनुमति दीजिए।
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं।)
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