89 सीटें पाकर भी भाजपा असमंजस में, मुंबई की चाबी अब भी शिंदे के हाथ—आर्थिक राजधानी में सत्ता का असली खेल शुरू

भाजपा को बीएमसी चुनाव में 89 सीटें मिलने के बावजूद पार्टी स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाई और अब उसकी रणनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुंबई की सत्ता की चाबी एकनाथ शिंदे के हाथों में होने से गठबंधन राजनीति में तनाव बढ़ गया है। मेयर पद की मांग और सौदेबाजी ने भाजपा की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। आर्थिक राजधानी पर कब्जे की जंग अब शह-मात के बेहद नाज़ुक मोड़ पर पहुँच चुकी है।

लिमटी की लालटेन 743

देश की आर्थिक राजधानी पर कब्जे के लिए अब आरंभ हुआ शह और मात का असली खेल . . .

(लिमटी खरे)

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भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में बीएमसी चुनावों के नतीजों ने न केवल स्थानीय राजनीति की धुरी हिला दी है, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता संतुलन पर भी गहरा असर डाला है। 227 सीटों वाले बृहन्मुंबई नगर पालिका (बीएमसी) में बहुमत के लिए जहाँ 114 पार्षदों की दरकार होती है, वहीं भाजपा को 89, शिवसेना (शिंदे गुट) को 29, शिवसेना (ठाकरे गुट) को 65 और मनसे को 6 सीटें मिली हैं। इस स्थिति में भाजपा और शिंदे गुट का संयुक्त आंकड़ा 118 तक पहुँचता तो जरूर है, लेकिन राजनीतिक चालें और सौदेबाजी के संकेत ने भाजपा की पेशानी पर पसीना ला दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम की एक जनसभा में मुंबई में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन पर तंज करते हुए कहा कि 140 साल पुरानी कांग्रेस अपने ही जन्म स्थान मुंबई में चौथे-पांचवे स्थान पर सिमट गई। यह बयान भले ही कांग्रेस के लिए एक संदेश था, लेकिन मुंबई में जमीनी स्तर पर असली खेल भाजपा और शिंदे गुट के बीच सत्ता संतुलन का है।

बीएमसी का जटिल गणित और शक्ति संतुलन

89 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी है, लेकिन बीएमसी पर सीधा कब्ज़ा उसके हाथ में नहीं है। पिछली बार भी बीएमसी पर शिवसेना का नियंत्रण रहा था और मेयर शिवसेना की किशोरी पेडणेकर थीं। इस बार भाजपा को उम्मीद थी कि वह अकेले 120+ सीटों के आसपास पहुँचकर मुंबई में निर्णायक बढ़त बना लेगी, परंतु शिंदे की सीट-डिमांड ने भाजपा की योजना को पूरी तरह उलट दिया।

सूत्रों के अनुसार टिकट बंटवारे के समय शिंदे गुट ने 91 सीटों की माँग रखकर भाजपा पर भारी दबाव बनाया। भाजपा चाहती थी कि वह कम से कम 120–125 सीटों पर प्रतिस्पर्धा करे, ताकि स्पष्ट बढ़त लेकर किसी भी सहयोगी या निर्दलीय पर निर्भर न रहना पड़े। अंततः भाजपा को 137 सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिला, जिसका असर अब पोस्ट-रिज़ल्ट शक्ति संतुलन में देखने को मिल रहा है।

शिंदे की रणनीति और भाजपा की बढ़ती चिंता

एकनाथ शिंदे ने चुनाव परिणामों के बाद अपने सभी 29 पार्षदों को बांद्रा स्थित ताज लैंड्स एंड होटल में ठहरा दिया है। उनकी यह रणनीति स्पष्ट संकेत देती है कि वे किसी भी तरह की टूट-फूट या संभावित राजनीतिक दबाव से अपने दल को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

हालाँकि राजनीतिक गलियारों में इस कदम की दूसरी व्याख्या भी हो रही है—
क्या शिंदे भाजपा के सामने अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ा रहे हैं?
क्या वे मेयर पद या सत्ता संरचना में बड़ा हिस्सा चाहते हैं?

चर्चा यह भी है कि एकनाथ शिंदे ने भाजपा से ढाई साल के लिए मेयर पद की माँग की है, यह कहते हुए कि यह साल शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे का जन्म शताब्दी वर्ष है। ऐसे में यह मांग स्वाभाविक रूप से भाजपा को भारी पड़ सकती है। भाजपा नहीं चाहेगी कि मेयर पद इतनी आसानी से शिंदे गुट के हिस्से में जाए।

उद्धव ठाकरे की सक्रियता और राजनीतिक समीकरण

इस उथल-पुथल के बीच उद्धव ठाकरे भी पीछे हटते नहीं दिख रहे। ठाकरे गुट का दावा है कि मुंबई का अगला मेयर शिवसेना (शिंदे नहीं, ठाकरे गुट) का ही होगा। ठाकरे समर्थकों का तर्क है कि वे 65 सीटों के साथ अभी भी सबसे बड़ा शिवसेना समर्थन आधार रखते हैं।

बीएमसी की राजनीति में शिवसेना की ऐतिहासिक पकड़ रही है और ठाकरे गुट इसे अपने लिए “पुनर्स्थापना” का अवसर मान रहा है। ठाकरे गुट का कहना है कि शिंदे की जीत केवल कानूनी स्वीकृति का प्रमाण हो सकती है, लेकिन जनाधार का वास्तविक केंद्र उनके पास ही है।

कांग्रेस और विपक्ष की कमजोर स्थिति

कांग्रेस इन चुनावों में लगभग अप्रभावी साबित हुई। न तो उसका शहर स्तरीय संगठन मजबूत था, न ही शहरी मुद्दों पर कोई स्पष्ट एजेंडा। कांग्रेस रणनीतिकार मोदी के बयान को भले ही राजनीतिक हमला कहकर खारिज करें, लेकिन वास्तविकता यह है कि कांग्रेस की शहरी राजनीति लगातार कमजोर हो रही है।

शहरी मतदाता से संवाद की कमी, स्थानीय नेतृत्व का अभाव और सहयोगी दलों पर अत्यधिक निर्भरता ने उसे पिछड़ा दिया है। इसी प्रकार ठाकरे ब्रदर्स को भी जन समर्थन में कमी का सामना करना पड़ा है।

भाजपा की दूसरी रणनीतिक्यासिंधिया मॉडललागू होगा?

राजनीतिक हलकों में एक चर्चा तेजी से फैल रही है—
क्या भाजपा मुंबई में भी वही रणनीति अपनाएगी जो उसने मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार गिराने के समय अपनाई थी?

यानी शिवसेना (ठाकरे) और मनसे के कुछ पार्षदों को साधकर शिंदे के प्रभाव को संतुलित करना।

सूत्रों के मुताबिक भाजपा के फ्लोर मैनेजर सक्रिय हो चुके हैं।
उनकी रणनीति:

  • शिंदे के दबाव को कम करना
  • आवश्यक समर्थन जुटाना
  • मेयर चुनाव में बढ़त हासिल करना

अगर भाजपा यह कदम उठाती है तो मुंबई की राजनीति में बड़ा उलटफेर संभव है।

बीएमसी मेयर चुनाव और आगे का रास्ता

मेयर पद के आरक्षण की लॉटरी जल्द ही निकाली जाएगी। यह तय करेगा कि पद सामान्य, महिला या आरक्षित श्रेणी में रहेगा। लॉटरी के बाद नामांकन और तत्पश्चात मेयर चुनाव होगा।

यह चुनाव अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है—
यह प्रतिष्ठा, सत्ता, और भविष्य की राजनीतिक दिशा का प्रतीक बन चुका है।

जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

मुंबई के नागरिकों में इस पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं:

1.स्थिर नेतृत्व की मांग

लोग चाहते हैं कि शहर विकास कार्यों के लिए स्थिर नेतृत्व जल्द बने।
बीएमसी का बजट कई राज्यों से अधिक है, इसलिए राजनीतिक अस्थिरता विकास को रोक सकती है।

2.सत्ता संघर्ष पर असंतोष

कुछ मतदाताओं का मानना है कि चुनाव के बाद होने वाली सौदेबाजी शहर के हितों से अधिक राजनीतिक लाभ पर केंद्रित है।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि—

  • शिंदे इस चुनाव को अपनी वैधता साबित करने का माध्यम मान रहे हैं
  • भाजपा मुंबई पर पूर्ण नियंत्रण चाहती है
  • ठाकरे गुट अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद में है

इन तीनों के टकराव ने बीएमसी राजनीति को इतिहास के सबसे रोचक मोड़ पर ला खड़ा किया है।

भविष्य की संभावनाएँ

आने वाले दिनों में मुंबई की राजनीति में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ संभव हैं—

  • भाजपा और शिंदे गुट के बीच शक्ति-साझेदारी का समझौता
  • ठाकरे गुट की ओर से नए राजनीतिक गठजोड़ के प्रयास
  • मनसे की भूमिका एक ‘किंगमेकर’ के रूप में
  • मेयर पद की लड़ाई में अप्रत्याशित मोड़

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ दिनों तक यह स्थिति जैसे क्रिकेट मैच के अंतिम ओवर की तरह रोमांचक बनी रहेगी।

8 Conclusion /निष्कर्ष

बीएमसी चुनाव परिणामों ने मुंबई की राजनीति को फिर से हाई-वोल्टेज मोड में ला दिया है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सत्ता को लेकर आश्वस्त नहीं दिख रही, जबकि एकनाथ शिंदे अपनी राजनीतिक ताकत को सर्वोच्च स्तर पर ले जाने की कोशिश में हैं। ठाकरे गुट भी वापसी के प्रयास में है। इन सबके बीच सत्ता की चाबी फिलहाल शिंदे के हाथों में दिखाई दे रही है, और मुंबई में शह-मात का असली खेल अब शुरू हुआ है। आने वाले दिनों में क्या समीकरण बनते-बिगड़ते हैं, इसी पर आर्थिक राजधानी का सियासी भविष्य टिका होगा।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों असम के दौरे पर हैं, एक जनसभा में उन्होंने बृहन्मुंबई नगर पालिका निगम बीएमसी के चुनावों में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि लगभग 140 साल पुरानी कांग्रेस अपने ही जन्म स्थान मुंबई में चौथे या पांचवे स्थान पर रही। पीएम का कहना था कि 1885 में मुंबई में ही कांग्रेस का जन्म हुआ, किन्तु अपनी नकारात्मक राजनीति के चलते कांग्रेस पहले स्थान पर नहीं आ पाई, और तो और सालों तक राज्य पर शासन करने के बावजूद भी कांग्रेस पार्टी पूरी तरह खत्म हो गई है। नरेंद्र मोदी का यह तंज कोई साधारण बात नहीं है। यह गूढ़ चिंतन का विषय माना जा सकता है कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए।

बहरहाल, 227 सीटों वाली बीएमसी में बहुमत के लिए 114 पार्षदों की आवश्यकता है। इस बार भाजपा को 89, शिवसेना शिंदे गुट को 29, शिवसेना ठाकरे गुट को 65 और मनसे को 6 सीटें मिली हैं। भाजपा और शिंदे को अगर मिला लिया जाए तो 118 तक पहुंचता है जो बहुमत के लिए पर्याप्त है। एकनाथ शिंदे शायद इस बात को भांप चुके हैं और अब उनकी रणनीति क्या हो सकती है इस बात को लेकर ही भाजपा की नींद उड़ी नजर आ रही है। शिंदे ने अपनी पार्टी के सभी निर्वाचित 29 पार्षदों को बांद्रा के ताज लैण्डस एण्ड होटल में ले जाकर ठहरा दिया है।

महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की इस चाल से भाजपा के अंदरखाने में शांत पानी में लहरें उठती साफ दिखाई देने लगी हैं, क्योंकि शिंदे ने अगर सौदेबाजी आरंभ की तो भाजपा की उम्मीदों पर बैठे बिठाए पानी फिर सकता है। इसी बीच सियासी बियावान में यह बात भी तेजी से उभर रही है कि शिंदे ने मुंबई में मेयर का पद ढाई साल के लिए यह कहकर मांग लिया है कि यह साल शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे का जन्म शताब्दी वर्ष है। अगर ऐसा हुआ तो यह भाजपा को शायद नागवार गुजरे। इस तरह के उतार चढ़ाव भरे रास्ते को देखते हुए उद्वव ठाकरे ने भी दावा ठोंक दिया है कि मुंबई का अगला मेयर शिंदे गुट वाली शिवसेना का होगा।

आने वाले समय में एकनाथ शिंदे के द्वारा अपनी वैधता को स्थापित करने का प्रयास किया गया है। अब अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों, लोकसभा चुनावों में भी गठबंधन करने का दावा प्रमुख सियासी दलों से किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि शिवसेना के विभाजन के उपरांत यह बड़ा स्थानीय चुनाव था और इसमें शिंदे की जीत यह साबित करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है कि शिवसेना पर उनका दावा सिर्फ कानूनी ही नहीं है, उनकी राजनैतिक जमीन पूरी तरह मजबूत है।

आपको बता दें कि इसके पहले बीएमसी की मेयर शिवसेना की किशोरी पेडणेकर थीं, वे इस बार चुनाव जीतकर बीएमसी की सदस्य तो बन गई हैं पर मेयर के आरक्षण को लेकर शहरी विकास विभाग के द्वारा जल्द ही लाटरी निकाली जाएगी, जिसमें यह तय होगा कि मेयर का पद सामान्य वर्ग, महिला अथवा आरक्षित श्रेणी के लिए आरक्षित किया जाएगा। लाटरी निकलने के बाद पार्षद नामांकन दाखिल करेंगे उसके बाद मेयर का चुनाव कराया जाएगा, जिसकी संभावना इस माह के अंत में होने की है।

इन चुनावों में भाजपा और शिंदे के द्वारा तो अपने आप को साबित कर लिया गया है, किन्तु विपक्ष विशेषकर कांग्रेस और ठाकरे बंधुओं के यह निराशात्मक ही माना जाएगा। देखा जाए तो कांग्रेस के द्वारा लंबे समय से शहरी राजनीति में ठोस एजेंडा प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसके अलावा जमीनी स्तर पर कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा बुरी तरह चरमरा चुका है। शहरी मतदाताओं से संवादहीनता साफ परिलक्षित होती है। स्थानीय नेतृत्व पूरी तरह गायब है और सहयोगी दलों पर ही निर्भरता भी उसकी कमजोरी बनकर उभरी है। कमोबेश यही आलम ठाकरे ब्रदर्स का रहा।

वहीं कुछ जानकारों का कहना है कि बीएमसी चुनावों में टिकिट बंटवारे से लेकर आज तक जो भी हुआ उससे भाजपा खुश नहीं है। इसका कारण यह है कि भाजपा आरंभ में डेढ़ सौ से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक थी, उसे अनुमान था कि वह कम से कम 120 से 125 सीट पर काबिज तो हो ही जाएगी। जब सीटों का बटवारा चल रहा था तब एकनाथ शिंदे के द्वारा 91 सीट मांगे जाने पर भाजपा का सारा गणित ही बिगड़ गया। भाजपा के पास 137 सीट ही शेष रह गईं थीं, जिसमें से उन्होंने 110 सीट लाने का लक्ष्य बनाया ताकि दो चार निर्दलीय को अपने साथ मिलाकर सरकार बनाएं और कोई उनसे बारगेनिंग न कर पाए।

वहीं, अब मुंबई में एक चर्चा और तेजी से सियासी हल्कों में चलती दिख रही है कि जिस तरह मध्य प्रदेश में कमल नाथ सरकार को सिंधिया के कंधों पर बंदूक रखकर गिराया था उसी तर्ज पर अब शिवसेना ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कुछ पार्षदों को अपने साथ मिलाकर एकनाथ शिंदे की सौदेबाजी पर विराम लगाया जा सके। इस मामले में भाजपा के फ्लोर प्रबंधक भी अब अपने सारे घोड़े छोड़ते नजर आ रहे हैं, ताकि एकनाथ शिंदे के दबाव को डाल्यूट किया जा सके। जो भी हो पर इन दिनों मुंबई सबसे हाट टापिक बना हुआ है और जब तक भाजपा और शिंदे के बीच सब कुछ सामान्य नहीं हो जाता तब तक कयासों का बाजार इसी तरह गर्माते रहने की पूरी उम्मीद है . . .

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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)