जिंदगी की रफ्तार बढ़ी, लेकिन सुकून कहां चला गया?
(डॉ. प्रितम भि. गेडाम)
आज का मनुष्य पहले की तुलना में अधिक सुविधाओं के बीच जीवन जी रहा है। घर बड़े हुए हैं, तकनीक ने काम आसान किया है, यात्रा के साधन बढ़े हैं और संचार कुछ सेकंड में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाता है। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल लगातार सामने खड़ा है—क्या इंसान वास्तव में पहले से ज्यादा खुश है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक जीवन में सुविधा और मानसिक शांति एक ही चीज नहीं हैं।
महंगी गाड़ी सुविधा दे सकती है, लेकिन सुकून की गारंटी नहीं। बड़ा मकान आराम दे सकता है, लेकिन मन की शांति नहीं खरीद सकता। बैंक खाते में पैसा सुरक्षा की भावना दे सकता है, लेकिन अकेलेपन का इलाज नहीं है।
आज समाज में एक ऐसी दौड़ दिखाई देती है जिसमें हर व्यक्ति किसी न किसी दूसरे व्यक्ति से आगे निकलना चाहता है। किसी को अधिक पैसा चाहिए, किसी को बेहतर नौकरी, किसी को प्रतिष्ठा, किसी को सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और किसी को दूसरों से बेहतर जीवन दिखाना है।
इस प्रतिस्पर्धा में कई बार व्यक्ति यह भूल जाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल अधिक से अधिक हासिल करना नहीं, बल्कि जो मिला है उसे संतुलन और संतोष के साथ जीना भी है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 का संदेश क्या है?
हर वर्ष 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जुड़े कलंक को कम करना और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में प्रयासों को मजबूत करना है।
वर्ष 2026 की आधिकारिक थीम है—“Lived Experiences Heard: Real Voices, Real Change”, जिसका भावार्थ है—“जीवन के वास्तविक अनुभवों को सुना जाए: वास्तविक आवाजें, वास्तविक बदलाव।”
इस वर्ष का संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा अक्सर विशेषज्ञों, संस्थाओं और आंकड़ों तक सीमित रह जाती है। लेकिन जिस व्यक्ति ने चिंता, अवसाद, सामाजिक अलगाव या किसी अन्य मानसिक स्वास्थ्य चुनौती का अनुभव किया है, उसके जीवन का अनुभव भी महत्वपूर्ण ज्ञान है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य केवल मानसिक बीमारी की अनुपस्थिति नहीं है। यह व्यक्ति के कल्याण और प्रभावी ढंग से जीवन जीने की क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसलिए मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत का केंद्र केवल बीमारी नहीं, बल्कि कल्याण, सम्मान, रिश्ते, सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और जीवन की गुणवत्ता भी होना चाहिए।
भौतिक सुख-सुविधाओं की अंतहीन दौड़
मनुष्य की इच्छाएं स्वाभाविक हैं। बेहतर जीवन की आकांक्षा भी गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब सुविधाएं जीवन का साधन न रहकर जीवन का उद्देश्य बन जाती हैं।
आज अनेक लोग अपनी तुलना दूसरों से करते हैं।
किसी के पास नया मकान है तो हमें अपना मकान छोटा लगने लगता है। किसी की गाड़ी महंगी है तो अपनी गाड़ी कमतर दिखाई देती है। कोई विदेश घूमकर आता है तो हमें लगता है कि हमारा जीवन अधूरा है।
सोशल मीडिया ने इस तुलना को और तेज किया है।
लोग अक्सर दूसरों के जीवन का केवल चमकदार हिस्सा देखते हैं। उन्हें किसी की सफलता दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे का संघर्ष, तनाव, अकेलापन या व्यक्तिगत कठिनाइयां दिखाई नहीं देतीं।
इससे मन में एक ऐसी भावना पैदा हो सकती है कि “बाकी सब खुश हैं और केवल मैं पीछे रह गया हूं।”
यहीं से असंतोष, चिंता और आत्म-मूल्य को लेकर नकारात्मक सोच बढ़ सकती है।
हर व्यक्ति का जीवन पूरी तरह परिपूर्ण नहीं हो सकता
दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसके जीवन में कोई समस्या न हो।
किसी के पास पैसा है तो स्वास्थ्य की चिंता हो सकती है। किसी के पास स्वास्थ्य है तो परिवार से जुड़ी परेशानी हो सकती है। किसी के पास सफलता है तो रिश्तों में तनाव हो सकता है। किसी के पास परिवार है तो आर्थिक संघर्ष हो सकता है।
इसलिए जीवन की तुलना दूसरों से करने के बजाय अपने जीवन की परिस्थितियों को समझना अधिक उपयोगी है।
संतोष का अर्थ महत्वाकांक्षा छोड़ देना नहीं है।
संतोष का अर्थ यह समझना है कि लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करते हुए वर्तमान जीवन को पूरी तरह नष्ट न कर दिया जाए।
व्यक्ति बेहतर नौकरी के लिए प्रयास करे, लेकिन नींद न छोड़े। धन कमाए, लेकिन रिश्तों को पूरी तरह न भूले। सफलता प्राप्त करे, लेकिन स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं।
यही संतुलन मानसिक स्वास्थ्य की बुनियाद बन सकता है।
मानसिक तनाव और शारीरिक स्वास्थ्य का संबंध
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य अलग-अलग डिब्बे नहीं हैं। व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य का असर उसके व्यवहार, नींद, भोजन, कार्यक्षमता और सामाजिक संबंधों पर पड़ सकता है।
इसीलिए लगातार तनाव और मानसिक परेशानी को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि अवसाद, चिंता, सिजोफ्रेनिया, द्विध्रुवी विकार या अन्य मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों के कारण बहुआयामी होते हैं। इन्हें केवल तनाव या जीवनशैली का परिणाम बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के साथ जी रहे हैं और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के मुकाबले सेवाओं की उपलब्धता अभी भी अपर्याप्त है।
इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की भी बड़ी आवश्यकता है।
तनाव को सामान्य मान लेना खतरनाक हो सकता है
हमारे समाज में अक्सर कहा जाता है—“थोड़ा तनाव तो हर किसी को होता है।”
यह बात एक सीमा तक सही हो सकती है, क्योंकि जीवन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। लेकिन जब तनाव लगातार बना रहे, रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, नींद और भूख में बड़ा बदलाव हो, व्यक्ति सामाजिक गतिविधियों से दूर होने लगे या उसे निराशा और असहायता लगातार महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ऐसी स्थिति में परिवार के किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना और आवश्यकता होने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना उचित कदम है।
मदद मांगना कमजोरी नहीं है।
यह अपने जीवन और स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी का संकेत है।
आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत कमजोरी समझना गलत
भारत सहित दुनिया के कई देशों में आत्महत्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में हर वर्ष 7.2 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु आत्महत्या से होती है और 15 से 29 वर्ष की आयु में यह मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है।
आत्महत्या के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। अकेलापन, आर्थिक समस्याएं, रिश्तों का टूटना, भेदभाव, हिंसा, बीमारी, पुराना दर्द, मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां और अचानक पैदा हुआ संकट जैसे अनेक कारक भूमिका निभा सकते हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति को उसकी परेशानी के लिए दोषी ठहराने के बजाय उसके साथ संवाद और सहायता का वातावरण बनाना जरूरी है।
विशेष रूप से संकट के समय व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसके साथ रहना, उसकी बात सुनना और पेशेवर सहायता तक पहुंच बनाने में मदद करना महत्वपूर्ण हो सकता है।
मजदूर, किसान, छात्र और युवा—तनाव किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं
अक्सर मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा केवल शहरी पेशेवरों और कॉर्पोरेट कर्मचारियों के संदर्भ में की जाती है। लेकिन मानसिक तनाव समाज के लगभग हर वर्ग को प्रभावित कर सकता है।
किसान आर्थिक अनिश्चितता और प्राकृतिक जोखिमों से जूझ सकता है। मजदूर रोजगार और आय की अस्थिरता से परेशान हो सकता है। छात्र परीक्षा, करियर और पारिवारिक अपेक्षाओं के दबाव में हो सकता है।
युवा रोजगार, रिश्तों और भविष्य की चिंता से गुजर सकता है। गृहिणी घरेलू जिम्मेदारियों और भावनात्मक दबाव से जूझ सकती है। वरिष्ठ नागरिक अकेलेपन और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर सकते हैं।
इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को केवल किसी एक वर्ग की समस्या मानना उचित नहीं है।
कठिन परिस्थितियों से निपटना भी एक कौशल है
सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं और अन्य सार्वजनिक व्यक्तियों को भी राजनीतिक आलोचना, चुनावी हार-जीत, सामाजिक दबाव, व्यक्तिगत विवाद और लगातार सार्वजनिक निगरानी जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि यह दावा करना उचित नहीं होगा कि किसी विशेष वर्ग के लोगों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं नहीं होतीं। हर व्यक्ति की परिस्थितियां और तनाव से निपटने की क्षमता अलग होती है।
लेकिन सार्वजनिक जीवन से एक सकारात्मक सीख जरूर ली जा सकती है—कठिन परिस्थितियों में संयम, लक्ष्य पर ध्यान, दिनचर्या और सहयोगी लोगों का साथ व्यक्ति को चुनौतीपूर्ण समय से गुजरने में मदद कर सकता है।
इसी तरह सामान्य व्यक्ति भी अपने जीवन में सकारात्मक coping skills विकसित कर सकता है।
दूसरों को खुश करते-करते खुद को मत भूलिए
हमारे समाज में परिवार और रिश्तों को महत्व देना अच्छी बात है। दूसरों की मदद करना और उनकी खुशी का ध्यान रखना भी मानवीय गुण है।
लेकिन समस्या तब होती है जब व्यक्ति हर समय दूसरों को खुश करने के प्रयास में अपनी भावनाओं और जरूरतों को पूरी तरह दबा देता है।
हर रिश्ते में अपनी सीमाएं तय करना जरूरी है।
यदि कोई संबंध लगातार मानसिक तनाव, अपमान, भय या भावनात्मक शोषण पैदा कर रहा है, तो उससे निपटने के लिए सुरक्षित और व्यावहारिक रास्ता तलाशना चाहिए।
किसी की कठपुतली बनकर जीना मानसिक शांति नहीं दे सकता।
दूसरों की अपेक्षाओं से अधिक जरूरी अपनी स्वस्थ सीमाओं और आत्मसम्मान को समझना है।
मानसिक सुकून खरीदा नहीं जा सकता
पैसा जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। बेहतर भोजन, घर, शिक्षा, इलाज और सुविधाओं के लिए पैसा महत्वपूर्ण है।
लेकिन पैसा हर मानसिक परेशानी का समाधान नहीं है।
मानसिक सुकून का संबंध जीवन के अर्थ, रिश्तों, आत्मसम्मान, संतुलन, सुरक्षा, स्वास्थ्य और अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए बेहतर बनाने की क्षमता से भी है।
इसीलिए जीवन में आर्थिक सफलता के साथ मानसिक और सामाजिक कल्याण को भी महत्व देना चाहिए।
प्रकृति और सरल जीवन से मिल सकता है संतुलन
आधुनिक जीवन में प्रकृति से दूरी भी बढ़ी है। लगातार स्क्रीन, काम का दबाव, शोर और भागदौड़ व्यक्ति को मानसिक रूप से थका सकती है।
ऐसे में कुछ सरल गतिविधियां जीवन में संतुलन ला सकती हैं—
- नियमित शारीरिक गतिविधि या व्यायाम करना।
- पर्याप्त नींद और आराम को प्राथमिकता देना।
- परिवार और मित्रों के साथ समय बिताना।
- प्रकृति के करीब समय बिताना।
- संगीत, पढ़ने, यात्रा या किसी स्वस्थ रुचि के लिए समय निकालना।
- नशे और हानिकारक आदतों से दूरी बनाना।
- जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से मदद लेना।
- अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना।
- सोशल मीडिया पर दूसरों से लगातार तुलना करने से बचना।
इनमें से हर उपाय हर व्यक्ति के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं होगा, लेकिन स्वस्थ दिनचर्या मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है।
‘ओवरथिंकिंग’ से बचना, लेकिन समस्याओं से भागना नहीं
मानसिक शांति का अर्थ समस्याओं से भाग जाना नहीं है।
जीवन में समस्याएं आएंगी। नौकरी का संकट हो सकता है, रिश्ते में कठिनाई आ सकती है, आर्थिक नुकसान हो सकता है या स्वास्थ्य संबंधी चुनौती सामने आ सकती है।
ऐसे समय में समस्या को स्वीकार करके उसके समाधान की दिशा में कदम बढ़ाना अधिक उपयोगी है।
हर समस्या को लेकर घंटों एक ही बात सोचते रहना समाधान नहीं है।
सोचना जरूरी है, लेकिन लगातार चिंता करते रहना समाधान नहीं।
लक्ष्य निर्धारित करना, समस्या को छोटे हिस्सों में बांटना, प्राथमिकताएं तय करना और जरूरत पड़ने पर सहायता लेना अधिक व्यावहारिक तरीका है।
मानसिक स्वास्थ्य में ‘सुनना’ क्यों महत्वपूर्ण है?
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का अनुभव करने वाले लोगों की आवाज सुनी जानी चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि प्रभावित लोगों को केवल अपनी कहानी सुनाने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उनकी भागीदारी नीतियों, सेवाओं और निर्णयों को आकार देने में भी होनी चाहिए।
इसका अर्थ परिवार के स्तर पर भी लागू होता है।
किसी परेशान व्यक्ति को तुरंत यह कह देना कि “सब ठीक हो जाएगा” पर्याप्त नहीं है।
कभी-कभी उसे केवल यह महसूस कराने की जरूरत होती है कि कोई उसकी बात सुनने के लिए मौजूद है।
भविष्य की राह: मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता
आने वाले समय में मानसिक स्वास्थ्य को स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा, कार्यस्थल और परिवार—हर स्तर पर प्राथमिकता देने की जरूरत है।
स्कूलों में भावनात्मक और जीवन कौशल की शिक्षा, कार्यस्थलों पर स्वस्थ वातावरण, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य सहायता और समाज में मानसिक बीमारी को लेकर कलंक कम करना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्राथमिक स्तर पर सेवाओं को मजबूत करने के प्रयास किए जा रहे हैं। WHO के अनुसार भारत में Mental Healthcare Act, 2017 मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं और अधिकारों के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
लेकिन कानून और संस्थागत व्यवस्था के साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है।
असली सफलता कितने सुकून से जी रहे हैं, इसमें है
जीवन में आगे बढ़ना जरूरी है। महत्वाकांक्षा रखना जरूरी है। बेहतर घर, बेहतर नौकरी, आर्थिक सुरक्षा और सम्मान की इच्छा भी स्वाभाविक है।
लेकिन इन सबके बीच यह सवाल भी जरूरी है—
क्या हम जो हासिल कर रहे हैं, उसे जी भी पा रहे हैं?
यदि व्यक्ति लगातार काम करता रहे लेकिन परिवार के लिए समय न हो, पैसा कमाता रहे लेकिन नींद न आए, प्रसिद्धि हासिल करे लेकिन भीतर से अकेला रहे, तो जीवन के संतुलन पर विचार करना जरूरी है।
सफलता का अर्थ केवल बैंक बैलेंस, पद, संपत्ति या लोकप्रियता नहीं है।
सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि व्यक्ति अपने जीवन में कितना मानसिक संतुलन, आत्मसम्मान, रिश्तों की गर्माहट और संतोष महसूस करता है।
निष्कर्ष
आज की दुनिया में भौतिक सुविधाएं आवश्यक हैं, लेकिन उन्हें जीवन का अंतिम लक्ष्य बना देना मानसिक सुकून को कमजोर कर सकता है। इंसान को आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन अपनी शांति, स्वास्थ्य और रिश्तों की कीमत पर नहीं।
हर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष है। हर व्यक्ति की अपनी परेशानियां हैं। किसी के पास रोजगार की चिंता है, किसी के पास परिवार की, किसी के पास स्वास्थ्य की और किसी के पास भविष्य की।
इसलिए दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करने के बजाय अपने जीवन की वास्तविकताओं को समझना अधिक जरूरी है।
जिंदगी केवल काटने के लिए नहीं, जीने के लिए है।
इसके लिए हमें अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच अंतर समझना होगा। दूसरों की अपेक्षाओं के दबाव से बाहर निकलना होगा। स्वस्थ रिश्तों को महत्व देना होगा। प्रकृति, व्यायाम, रचनात्मक गतिविधियों और सामाजिक जुड़ाव के लिए समय निकालना होगा और मानसिक परेशानी को छिपाने के बजाय जरूरत पड़ने पर मदद लेनी होगी।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम हमें इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—लोगों के अनुभवों को केवल सुनिए नहीं, उन्हें समझिए और उनके आधार पर बेहतर बदलाव की कोशिश कीजिए।
क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी से बचने का विषय नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ा है कि हम अपने जीवन को कितनी गरिमा, संतुलन और सुकून के साथ जी पा रहे हैं।
पैसा सुविधाएं दे सकता है, लेकिन मन का सुकून जीवन को अर्थ देता है। इसलिए भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में अपनी मानसिक शांति को कभी पीछे नहीं छोड़ना चाहिए।

लेखक परिचय
(महाराष्ट्र सरकार से सम्मानित लेखक)
मोबाइल और व्हाट्सएप नंबर – 082374 17041
ईमेल आईडी prit00786@gmail.com