नितिन गडकरी के ‘पर कुतरने’ की चर्चा या बड़ी जिम्मेदारी की तैयारी?

दिल्ली का तख्त चाह रहा गड़करी के पर कुतरना तो संघ चाह रहा गड़करी की पदोन्नति!
जितना कर्ज माफ किया जा रहा है उसे अगर न माफ करते तो यूपीआई को सशुल्क बनाने से रोका जा सकता था!
(लिमटी खरे)

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी पारी में सब कुछ ठीक ठाक प्रतीत नहीं हो रहा है। इस बार यूपीआई का मसला भी जोर शोर से उछलता दिख रहा है। लोगों का कहना तो यह भी है कि हजारों करोड़ रूपए का कर्ज केंद्र सरकार के द्वारा माफ किया जा रहा है, जबकि इस कर्ज को अगर माफ नहीं किया जाता तो लोगों पर करों का भार नहीं लादा जाता और न ही सरकारी संपत्तियों को निजि हाथों में बेचा जाता।

इसी बीच केंद्रीय मंत्रीमण्डल के फेरबदल के कयासों ने एक बार फिर जोर पकड़ा है। वर्तमान में चूंकि गणेश उत्सव चल रहा है और चार पांच दिन बाद पितृ पक्ष आरंभ हो जाएगा, इसलिए फिलहाल मंत्री मण्डल विस्तार की बात ठण्डे बस्ते के हवाले ही नजर आ रही है।
दिल्ली दरबार से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो मंत्री मण्डल में किसे शामिल करना है और किसे बाहर का रास्ता दिखाना है यह बात फिलहाल टेड़ी खीर ही नजर आ रहा है, क्योंकि दिल्ली दरबार अब उतना शक्तिशाली नहीं रह गया है जितना पिछले दिनों नजर आ रहा था। कुछ मंत्रियों के त्यागपत्र मांगे जाने की खबरें और उनके द्वारा त्यागपत्र देने से इंकार किए जाने की बातें जैसे ही सियासी बियावान में तैरीं वैसे ही लोगों ने दिल्ली दरबार का वजन आंकना आरंभ कर दिया।
दिल्ली दरबार के करीबी सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि दिल्ली दरबार की आंखों में इस समय दो मंत्री चुभते नजर आ रहे हैं। एक हैं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान तो दूसरे भूतल परिवहन मंत्री नितिन गड़करी। दोनों ही मंत्रियों की संघ में खासी पैठ है, यही कारण है कि दिल्ली दरबार चाहकर भी दोनों ही मंत्रियों की कुर्सी का एक भी पाया नहीं खिसका पा रहा है।
शिवराज सिंह चौहान का अपना एक औरा है। उनकी अपनी कार्यशैली है। पहले वे पांव पांव वाले भैया के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय रहे, बाद में वे जगत मामा हो गए। लंबे समय तक मध्य प्रदेश के निजाम रहने के कारण सियासी बियावान में उनकी जड़ें जबर्दस्त तरीके से पैठ बना चुकी हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। माना जा रहा था कि शिवराज सिंह चौहान को एमपी से हटाकर उन्हें कमजोर किया जा सकता है, पर वे पहले की तुलना में और ज्यादा ताकतवर होकर उभरे हैं।
अब बात करें नितिन गड़करी की। नितिन गड़करी को भाजपा सरकार की तीसरी पारी में कमजोर करने की चर्चाएं तेजी से चलने लगीं। नितिन गड़करी के कुछ बयानों ने भी इस चर्चा को हवा देना आरंभ किया। चूंकि वे महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर से आते हैं और नागपुर संघ का मुख्यालय है, इसीलिए उनकी नजदीकियां संघ से होना लाजिमी ही माना जाता है।
संघ के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि संघ के आला नेताओं की नजरों में नितिन गड़करी एक रिजल्ट ओरिएंटेड अर्थात परिणाम देने वाले नेता हैं। जब यह बात सामने आई कि नितिन गड़करी से भूतल परिवहन विभाग लेकर कोई महत्वहीन विभाग उन्हें सौंपा जाए तब संघ के नेता हरकत में आए और उन्होंने दिल्ली दरबार को साफ तौर पर संकेत दे दिए कि गड़करी का विभाग अगर बदला जाता है तो उन्हें कोई बड़ा महत्व वाला जैसे मानव संसाधन एवं विकास विभाग सौंपा जाए।
सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे संघ के नेताओं की सोच यही है कि नितिन गड़करी ने देश की सड़कों का कायाकल्प किया है। यह अलहदा बात है कि सरकार की तीसरी पारी में सड़कों की गुणवत्ता वैसी नहीं रही जैसी कि पहले हुआ करती थी, या जैसी अपेक्षित थी।
सूत्रों ने कहा कि आला नेताओं का तर्क है कि गड़करी अपने प्रयासों, सोच, कार्यप्रणाली आदि के जरिए मानव संसाधन मंत्रालय के जरिए देश में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति ला सकते हैं। वे पेपर लीक मामलों में पूरी तरह अंकुश लगा सकते हैं। इसके अलावा वे जेन जी और जेन अल्फा सभी को बेहतर तरीके से साध भी सकते हैं। इन्हें साधने के लिए मानव संसाधन और विकास मंत्रालय की भूमिका निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण ही होती है। आने वाले समय में जब भी मंत्रीमण्डल विस्तार होगा तब गड़करी को अगर मानव संसाधन विकास मंत्रालय सौंपा जाता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं)
(साई फीचर्स)