(ब्यूरो कार्यालय)
ग्वालियर (साई)। ग्वालियर में बच्चों के घर छोड़ने की घटनाएं बढ़ रही हैं। पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि डेढ़ साल में औसतन हर महीने 33 बच्चे घर छोड़ रहे हैं। यह आंकड़ा हर परिवार के लिए चिंता की बात है। मोबाइल और सोशल साइट्स बच्चों को परिवार से दूर ले जा रहे हैं। इसके अलावा मां-बाप की डांट से भी बच्चे घर छोड़ रहे हैं। पुलिस ने अब तक 175 बच्चों को बरामद किया है। बाकी बच्चों की तलाश अभी जारी है।
बच्चों के घर छोड़ने की घटनाएं
ग्वालियर में बच्चों के घर छोड़ने की घटनाएं अब आम होने लगी हैं। ज्यादातर मामलों में वजह बहुत छोटी होती है। मां ने मोबाइल चलाने पर डांटा। पिता ने पढ़ाई पर ध्यान न देने की बात कही। बस इतनी सी बात पर बच्चे गुस्से में घर से निकल जाते हैं।
पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि डेढ़ साल में औसतन हर महीने 33 बच्चे घर छोड़ रहे हैं। यह आंकड़ा हर परिवार के लिए चिंता की बात है। मोबाइल और सोशल साइट्स बच्चों को परिवार से दूर ले जा रहे हैं।
मोबाइल और सोशल साइट्स का प्रभाव
मोबाइल और सोशल साइट्स बच्चों को परिवार से दूर ले जा रहे हैं। इसके अलावा मां-बाप की डांट से भी बच्चे घर छोड़ रहे हैं। पुलिस ने अब तक 175 बच्चों को बरामद किया है। बाकी बच्चों की तलाश अभी जारी है।
ग्वालियर के अलावा पुलिस के रिकॉर्ड ने भोपाल शहर में बेटियों की सुरक्षा को लेकर एक नई चिंता खड़ी कर दी है। आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या किसी एक साल की बात नहीं है। यह लगातार तीन साल से बनी हुई है।
बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या किया जा सकता है
बच्चों की सुरक्षा के लिए मां-बाप को अपने बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि उनके बच्चे क्या सोचते हैं और क्या महसूस करते हैं। इसके अलावा पुलिस को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए काम करना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा के लिए हमें एक साथ मिलकर काम करना होगा।
इसके अलावा हमें बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना होगा। हमें उन्हें सिखाना होगा कि कैसे सुरक्षित रहा जा सकता है। हमें उन्हें समझाना होगा कि मोबाइल और सोशल साइट्स का उपयोग कैसे किया जा सकता है।
निष्कर्ष
बच्चों के घर छोड़ने की घटनाएं एक गंभीर समस्या है। हमें इस समस्या का समाधान निकालना होगा। हमें मां-बाप को समझाना होगा कि वे अपने बच्चों के साथ समय बिताएं। हमें पुलिस को भी समझाना होगा कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए काम करें।
इसके अलावा हमें बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने होंगे। हमें उन्हें सिखाना होगा कि कैसे सुरक्षित रहा जा सकता है। हमें उन्हें समझाना होगा कि मोबाइल और सोशल साइट्स का उपयोग कैसे किया जा सकता है। बच्चों की सुरक्षा के लिए हमें एक साथ मिलकर काम करना होगा।

मूलतः प्रयागराज निवासी, पिछले लगभग 25 वर्षों से अधिक समय से नई दिल्ली में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय विनीत खरे किसी पहचान को मोहताज नहीं हैं.
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