(ब्यूरो कार्यालय)
इंदौर (साई)। शनिवार, 11 अक्टूबर 2025 – भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था की रीढ़ है न्याय व्यवस्था। आज इंदौर में आयोजित एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय विधि संगोष्ठी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जोर दिया कि न्याय पाना हर नागरिक का मौलिक,बुनियादी और संवैधानिक अधिकार होना चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका को सरल, पारदर्शी तथा आधुनिक बनाने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार की प्रतिबद्धता सामने रखी। इस संगोष्ठी में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्तिगण, वरिष्ठ न्यायाधीश, विधि विशेषज्ञ और विद्वान सहभागी रहे।
- न्याय—प्राचीन परंपरा और आधुनिक संदर्भ
भारत में न्याय की परंपरा सदियों पुरानी है। महाभारत, रामायण जैसे ग्रंथों में राजा को न्याय के स्तंभ के रूप में देखा गया। सम्राट विक्रमादित्य की कथा आज भी न्याय की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रचलित है।
आधुनिक भारत में संविधान ने न्याय को एक अत्यंत महत्व दिया है — अनुच्छेद 14, 21 जैसे प्रावधानों में समानता और जीवन की गरिमा के अधिकार का सुरक्षा अंकित है।
लेकिन व्यावहारिक स्तर पर, न्याय व्यवस्था में देरी, लंबित मामले, न्यायिक भ्रष्टाचार और पहुँच की असमानता जैसी बाधाएँ मौजूद हैं। ये चुनौतियाँ नागरिकों को न्याय प्राप्ति से वंचित करती हैं।
इस पृष्ठभूमि में, मुख्यमंत्री डॉ. यादव का यह उद्घोषणा — “न्याय पाना हर नागरिक का अधिकार” — न केवल एक आदर्श वाक्य है, बल्कि न्याय सुधार की दिशा में एक स्पष्ट संकल्प भी है।
- संगोष्ठी का आयोजन और उद्देश्य
इंदौर में आयोजित संगोष्ठी का शीर्षक था: “Evolving Horizons: Navigating Complexity and Innovation in Commercial & Arbitration Law in the Digital World”।
इसका उद्देश्य था:
- न्यायपालिका और विधि क्षेत्रों में डिजिटल नवाचारों का परिचय।
- वाणिज्यिक विवादों और मध्यस्थता (Arbitration) की चुनौतियाँ और समाधान।
- अंतरराष्ट्रीय विचार-विमर्श से न्याय प्रणाली को अपडेट करना।
- विधि विशेषज्ञों, न्यायाधीशों और विद्यार्थियों के बीच संवाद और अनुभव साझा करना।
मुख्यमंत्री ने दीप प्रज्ज्वलन कर इस संगोष्ठी की शुरुआत की। उन्होंने सम्मानीय न्यायाधीशों और विद्वानों का स्वागत करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम हमारी न्याय व्यवस्था को नई दिशा देगा।
- मुख्यमंत्री का भाषण–मुख्य बिंदु
मुख्यमंत्री डॉ. यादव के मुख्य वक्तव्य के प्रमुख अंश निम्नलिखित हैं:
- न्याय एक मूलभूत अधिकार – उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय न केवल एक कानूनी अधिकार है, बल्कि मानवाधिकार, नागरिक अधिकार और संवैधानिक अधिकार का हिस्सा है।
- संघीय शासन व्यवस्था का मूल स्तंभ – कहा कि भारत के संघीय तंत्र का आधार ही यह है कि हर नागरिक को जीवन, भोजन, स्वास्थ्य और न्याय का समान अधिकार मिले।
- लोक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी – राज्य का पहला दायित्व है कि कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न हो।
- न्यायपालिका की आत्मा – समानता, पारदर्शिता, विनम्रता और समय पर न्याय देना ही न्यायपालिका की आत्मा रही है।
- न्यायर्ती देवी की पट्री खोलना – उन्होंने कहा कि अब न्याय की देवी की आँखों की पट्टी भी हटनी चाहिए ताकि वह खुली आँखों से न्याय कर सके।
- न्याय प्रणाली को सुलभ,सरल और प्रभावी बनाना – केंद्र व राज्य स्तर पर न्यायालयों की मजबूती, ग्राम स्तर पर न्यायालयों की व्यवस्था पर जोर।
- डिजिटल न्याय व्यवस्था – तकनीकी युग में न्यायपालिका को नवाचारों के अनुरूप खुद को रूपांतरित करना चाहिए।
- न्याय के साथ दायित्वों की संतुलना – अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों को अपने दायित्वों का पालन करना भी आवश्यक है।
उनका मानना है कि न्याय व्यवस्था में यदि पारदर्शिता, जवाबदेही और निरंतर सुधार हो, तो वह देश को मजबूत बनाएगी।
- न्यायमूर्तियों एवं विशेषज्ञों के विचार
संगोष्ठी में उपस्थित न्यायाधीश एवं विशेषज्ञों ने भी महत्वपूर्ण विचार रखे:
- न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी (उच्चतम न्यायालय) ने कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य केवल कानून के पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि निष्पक्षता की सीमाओं का विस्तार करना है।
- न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि तकनीकी प्रगति को न्याय प्रणाली से बाहर नहीं रखा जा सकता; बल्कि न्याय को उन्नत करने में उसका उपयोग किया जाना चाहिए।
- न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने कहा कि जैसे-जैसे वाणिज्य विस्तार होगा, विवाद बढ़ेंगे और उन्हें शीघ्र एवं कुशलता से हल करने की आवश्यकता होगी।
- न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने कहा कि भारत को सिर्फ एक आर्थिक भागीदार नहीं, बल्कि निर्मात्री भूमिका भी निभानी है, और न्याय व्यवस्था का असंतुलन उसमें रुकावट नहीं हो सकता।
- मुख्य न्यायाधीश मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय संजीव सचदेवा ने कहा कि मध्य प्रदेश को न्याय और तकनीकी नवाचार का केंद्र बनाना चाहिए।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कानूनों को तकनीकी उन्नति के अनुरूप संशोधित करना चाहिए।
- विदेशी प्रतिनिधि मारिया स्कोउ (डेनमार्क) ने भारत-डेनमार्क सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
इन विचारों से यह स्पष्ट हुआ कि न्याय व्यवस्था में बदलाव का मार्ग एकमात्र है — संवाद, नवाचार और आधुनिकरण।
- मध्य प्रदेश में न्याय सुधार–राज्य सरकार की पहल
मुख्यमंत्री यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार न्याय को और अधिक सुलभ, सरल एवं प्रभावी बनाने की दिशा में सक्रिय है। कुछ पहलों का उल्लेख उन्होंने किया:
- प्रादेशिक एवं जिला न्यायालयों का सुदृढ़ीकरण
- ग्राम न्यायालयों की स्थापना ताकि ग्रामीण क्षेत्र की जनता को कम दूरी पर न्याय मिले
- मानव संसाधन व तकनीकी उन्नयन — केस प्रबंधन सॉफ़्टवेयर, डिजिटल फाइलिंग, ऑनलाइन अपील प्लेटफ़ॉर्म, इत्यादि
- न्यायाधीशों,वकीलों और न्यायिक कर्मचारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम
- समझौता योग्य अपराधों के लिए“समाधान आपके द्वार” जैसी पहल
- ऑनलाइन इंटर्नशिप प्रणाली, केस डायरी संचार प्रणाली आदि
इस तरह की कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि मध्य प्रदेश न्याय सुधार के अग्रिम पथ पर है।
- चुनौतियाँ और सुधार की दिशा
न्याय व्यवस्था को सशक्त करने में निम्न प्रमुख चुनौतियाँ हैं:
- मामलों की भारी संख्या और लंबितता
- वित्तीय असमर्थता और संसाधन की कमी
- कानूनी गलियारे में पहुँच की असमानता
- भ्रष्टाचार और पक्षपात की समस्या
- न्यायपालिका और तकनीकी बदलाव के बीच तालमेल
इन चुनौतियों से निपटने के लिए सुधार की दिशा हो सकती है:
- केस निपटान समयसीमा तय करना
- न्याय सहायता सुविधाओं का विस्तार
- कानूनी साक्षरता और जागरूकता बढ़ाना
- डिजिटल न्याय प्लेटफॉर्म का समावेश
- न्यायपालिका में नियमित आकलन और उत्तरदायित्व व्यवस्था
यदि यह सुधार योजनाबद्ध और समर्पित रूप से लागू हों, तो न्याय प्रणाली अधिक सुदृढ़ और भरोसेमंद बनेगी।
- न्यायपालिका का भविष्य—डिजिटल युग में न्याय
डिजिटल युग में न्याय प्रणाली को निम्न दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है:
- ई-न्याय (e-Justice) — ऑनलाइन याचिका दायर करना, वर्चुअल सुनवाई
- AIआधारित समीक्षा और निर्णय सहायता — जैसे कि केस अनुसंधान, अधिवक्ता सुझाव
- Blockchainआधारित ट्रायल रिकॉर्डिंग — अभिलेखों की सुरक्षा और पारदर्शिता
- ऑनलाइन मध्यस्थता मंच — विवादों को तेजी से हल करने के लिए
- न्याय संबंधित मोबाइल ऐप और चैटबॉट्स — नागरिकों को तुरंत जानकारी व मार्गदर्शन देना
इन नवाचारों को न्यायपालिका अपने मूल मूल्यों — निष्पक्षता, पारदर्शिता, समानता — के साथ जोड़कर ही अपनाए, तभी वे सफल हो पाएँगे।
- जनता और मीडिया की भूमिका
न्याय व्यवस्था सुधार में समाज, मीडिया और नागरिकों की भूमिका निर्णायक है:
- जनता को अपने अधिकारों व दायित्वों के प्रति जागरूक होना चाहिए
- मीडिया को सकारात्मक एवं संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए ताकि न्याय प्रक्रिया के प्रति भरोसा बनी रहे
- नागरिक संगठनों सामाजिक न्याय, विधिक सहायता और निगरानी की भूमिका निभा सकते हैं
- प्रौद्योगिकी समुदाय को न्याय प्रणालियों के डिज़ाइन और नवाचार में सहयोग देना चाहिए
इस तरह न्याय सुधार केवल न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं, पूरे समाज की साझा ज़िम्मेदारी है।
🏁निष्कर्ष
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर में इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर यह स्पष्ट कर दिया कि न्याय पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। उन्होंने न्यायपालिका को पारदर्शी, समान और आधुनिक बनाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता जताई।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, विधि विशेषज्ञों और विदेशी प्रतिनिधियों ने महत्वपूर्ण विचार रखे कि न्याय व्यवस्था को नवाचारों से जोड़ना ही भविष्य की दिशा है।
चाहे न्याय सहायता विस्तार, डिजिटल प्लेटफार्म, ऑनलाइन मध्यस्थता या न्यायालयों का सुदृढ़ीकरण — हर पहल न्याय को अधिक सुलभ और त्वरित बनाने की दिशा में है।
अंत में यह कहना उचित होगा कि यदि विधि व्यवस्था पारदर्शी हो, निष्पक्ष हो, समय पर न्याय दे और तकनीकी रूप से सक्षम हो जाए — तभी देश के हर नागरिक को न्याय का भरोसा होगा और लोकतंत्र की नींव और अधिक मज़बूत होगी।

हर्ष वर्धन वर्मा का नाम टीकमगढ़ जिले में जाना पहचाना है. पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद एक बार फिर पत्रकारिता में सक्रियता बना रहे हैं हर्ष वर्धन वर्मा . . .
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