अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक घटनाक्रमों में गिना जाता है। सदियों के संघर्ष, कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक आंदोलन के बाद जब मंदिर निर्माण ने मूर्त रूप लेना शुरू किया, तो इसे करोड़ों रामभक्तों की आस्था की विजय के रूप में देखा गया। वर्ष 2021 इसी प्रक्रिया का एक अहम पड़ाव था, जब निर्माण कार्य तीव्र गति से आगे बढ़ रहा था।
इसी दौरान वर्तमान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के कुछ बयान सामने आए, जिन्होंने इस पूरे विमर्श को एक अलग दिशा दी। उनका दृष्टिकोण न तो सामान्य राजनीतिक समर्थन जैसा था और न ही प्रत्यक्ष विरोध का स्वर, बल्कि वह सनातन परंपरा और धर्मशास्त्रीय मर्यादाओं की कसौटी पर इस ऐतिहासिक परियोजना को परखने का प्रयास था।
🕉️ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज: वैचारिक पृष्ठभूमि
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज को सनातन धर्म की शास्त्रीय परंपरा का दृढ़ पक्षधर माना जाता है। वे अक्सर यह स्पष्ट करते रहे हैं कि किसी भी धार्मिक कार्य का मूल्यांकन केवल भावनाओं या राजनीतिक निर्णयों के आधार पर नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए।
उनकी यह भूमिका उन्हें कई बार मुख्यधारा के लोकप्रिय विमर्श से अलग खड़ा कर देती है, लेकिन यही स्पष्टवादिता उन्हें एक महत्वपूर्ण वैचारिक स्वर भी बनाती है।
🏗️ 2021में राम मंदिर निर्माण की स्थिति
वर्ष 2021 में राम मंदिर निर्माण कार्य नींव से आगे बढ़कर संरचनात्मक स्तर पर पहुंच चुका था। देशभर में इसे लेकर उत्सव का वातावरण था। दान, सहयोग और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से आम जनता भी इस निर्माण से भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी थी।
हालांकि, इसी समय कुछ संतों और धर्माचार्यों द्वारा यह प्रश्न भी उठाया गया कि:
- क्या मंदिर निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह शास्त्रसम्मत है?
- क्या सभी परंपरागत मठों और आचार्यों से पर्याप्त विमर्श हुआ?
- क्या यह निर्माण केवल आस्था का विषय है या इसमें राजनीति का हस्तक्षेप भी बढ़ा है?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के बयान इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द केंद्रित थे।
🗣️ राम मंदिर पर शंकराचार्य का मूल दृष्टिकोण
2021 में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने यह स्पष्ट किया था कि वे भगवान श्रीराम के प्रति पूर्ण आस्था रखते हैं, लेकिन मंदिर निर्माण जैसे पवित्र कार्य में प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितना उद्देश्य।
उनके अनुसार:
- राम मंदिर सनातन संस्कृति का प्रतीक है, इसलिए इसमें शास्त्रीय अनुशासन अनिवार्य है
- धर्माचार्यों और शंकराचार्यों की भूमिका केवल औपचारिक नहीं होनी चाहिए
- मंदिर को किसी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना धर्म की गरिमा को ठेस पहुंचा सकता है
यह बयान समर्थन और असहमति के बीच संतुलित किंतु कठोर प्रश्नों के रूप में सामने आया।
⚖️ धर्म बनाम राजनीति का सवाल
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि राम मंदिर जैसे धार्मिक विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौला जा रहा है। उन्होंने यह संकेत दिया कि:
- धर्म को सत्ता का उपकरण नहीं बनना चाहिए
- आस्था को प्रचार और उत्सव तक सीमित करना उचित नहीं
- मंदिर निर्माण का उद्देश्य आध्यात्मिक होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रदर्शन
यह दृष्टिकोण उस समय के लोकप्रिय नैरेटिव से अलग था, जहां मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय गौरव और राजनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।
🧠 शास्त्र,परंपरा और निर्णय प्रक्रिया
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि सनातन परंपरा में मंदिर निर्माण केवल वास्तुकला का विषय नहीं होता, बल्कि उसमें:
- शास्त्रीय विधि
- वैदिक अनुष्ठान
- आचार्य परंपरा की सहमति
अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।
उनके अनुसार यदि इन तत्वों की उपेक्षा होती है, तो भविष्य में यह परंपरा के लिए चुनौती बन सकती है।
📊 समाज और संत समाज की प्रतिक्रिया
2021 में उनके इस बयान पर संत समाज और आम जनता की प्रतिक्रियाएं विभाजित रहीं। एक वर्ग ने इसे साहसी और धर्मसम्मत आवाज बताया, जबकि दूसरे वर्ग ने इसे अनावश्यक विवाद खड़ा करने वाला माना।
कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं इस प्रकार रहीं:
- समर्थकों का कहना था कि शंकराचार्य धर्म की आत्मा की रक्षा कर रहे हैं
- आलोचकों का मत था कि ऐसे बयान आस्था के उत्सव में बाधा डालते हैं
- मध्यमार्गी दृष्टिकोण यह था कि प्रश्न पूछना गलत नहीं, लेकिन समय और भाषा महत्वपूर्ण है
🧭 राम मंदिर और भारतीय लोकतंत्र
राम मंदिर केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और सामाजिक चेतना का भी प्रतीक बन चुका है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का बयान इस व्यापक संदर्भ को रेखांकित करता है कि लोकतंत्र में आस्था और विवेक दोनों का संतुलन आवश्यक है।
उनकी टिप्पणी यह स्मरण कराती है कि:
- बहुमत की भावना के साथ अल्पमत की आशंकाओं को भी समझना जरूरी है
- धार्मिक विजय के क्षण में आत्मालोचन भी उतना ही महत्वपूर्ण है
🔮 भविष्य के लिए संदेश
2021 में दिया गया यह बयान भविष्य के लिए कई संकेत छोड़ गया:
- धार्मिक परियोजनाओं में संवाद और समावेशन जरूरी है
- संत समाज की भूमिका केवल प्रतीकात्मक नहीं होनी चाहिए
- आस्था और सत्ता के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करना आवश्यक है
राम मंदिर निर्माण पूर्ण होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसके साथ जुड़े वैचारिक प्रश्न अभी भी जीवित हैं।
🧾 निष्कर्ष
वर्ष 2021 में राम मंदिर निर्माण को लेकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के बयान ने यह स्पष्ट किया कि आस्था का उत्सव विवेक और परंपरा से अलग नहीं हो सकता। उनका दृष्टिकोण न तो मंदिर विरोधी था और न ही आस्था के विरुद्ध, बल्कि वह सनातन धर्म की शास्त्रीय आत्मा को केंद्र में रखकर उठाया गया प्रश्न था।
राम मंदिर भारतीय समाज के लिए गर्व का विषय है, लेकिन उसके साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि वह धर्म, परंपरा और नैतिकता—तीनों की कसौटी पर खरा उतरे।

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