भीलवाड़ा में संत समागम का आध्यात्मिक संदेश
(ब्यूरो कार्यालय)
भीलवाड़ा (साई)।राजस्थान की धार्मिक नगरी भीलवाड़ा में आयोजित सनातन मंगल महोत्सव, संत समागम एवं दीक्षा महोत्सव में डॉ. मोहन यादव ने शामिल होकर सेवा, समर्पण और सांस्कृतिक मूल्यों का संदेश दिया। हरिशेवा उदासीन आश्रम में आयोजित इस भव्य आयोजन में देश-विदेश से संत, विद्वान और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
मुख्यमंत्री ने परमपूज्य स्वामी हंसरामजी महाराज से भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया और भारतीय संस्कृति की मूल भावना “वसुधैव कुटुंबकम्” को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
“सेवा ही परम धर्म” – सांस्कृतिक दर्शन का विस्तार
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति की जड़ें सेवा, समर्पण और विश्वबंधुत्व में निहित हैं। “स्व के साथ पूरी सृष्टि” के कल्याण की भावना ही सनातन जीवन दर्शन का आधार है।
उन्होंने कहा कि:
- खुद के लिए जीना सामान्य है,
- लेकिन समस्त जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों और मानवता के लिए जीना ही सच्चा धर्म है,
- सेवा से श्रीहरि की प्राप्ति होती है,
- भक्ति से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
यह संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी आधार माना जा रहा है।
गुरु-शिष्य परंपरा और जीवन मूल्य
मुख्यमंत्री ने भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान की धारा संतों के माध्यम से निरंतर प्रवाहित होती रही है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि बच्चों को वेद-पुराण, संस्कार और सेवा के मूल्य सिखाए जाएं। धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है।
सिंहस्थ महाकुंभ-2028 का आमंत्रण
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब सिंहस्थ का आयोजन होता है। उन्होंने उज्जैन में वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ के लिए संतों और साधु-महात्माओं को आमंत्रित किया।
उज्जैन में होने वाला सिंहस्थ महाकुंभ न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता का वैश्विक मंच भी है।
उन्होंने संतों से आह्वान किया कि वे सिंहस्थ में आकर आशीर्वाद रूपी अमृत से समाज को पवित्र करें।
दीक्षा महोत्सव: तीन युवा संतों को संन्यास
कार्यक्रम में तीन युवा संतों – श्री ईशानराम जी महाराज, श्री केशवराम जी महाराज और श्री सुमज्ञराम जी महाराज – को संन्यास दीक्षा दी गई।
मुख्यमंत्री ने तीनों नवदीक्षित संतों का अभिनंदन करते हुए कहा कि दीक्षा संस्कार गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता का प्रतीक है।
यह दीक्षा केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का दायित्व भी है।
राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ
कार्यक्रम में राजस्थान सरकार के प्रतिनिधियों और विभिन्न संत-महात्माओं की उपस्थिति ने इसे अंतरराज्यीय सांस्कृतिक संवाद का स्वरूप दिया।
मुख्यमंत्री ने “रा” से राजस्थान और “म” से मध्यप्रदेश को जोड़ते हुए ‘राम’ की सांस्कृतिक एकता का प्रतीकात्मक उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” मंत्र का उल्लेख करते हुए सामाजिक समरसता और विकास को जोड़ने का प्रयास भी दिखाई दिया।
सामाजिक प्रभाव और जनभावना
धार्मिक आयोजनों का प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता।
ऐसे आयोजनों से:
- सामाजिक एकता मजबूत होती है
- युवा पीढ़ी को सांस्कृतिक दिशा मिलती है
- सेवा और परोपकार की भावना बढ़ती है
- क्षेत्रीय पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है
भीलवाड़ा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इसे जनआस्था का विराट रूप दिया।
संतों की भूमिका और समाज
मुख्यमंत्री ने कहा कि संत समाज नैतिक मूल्यों, करुणा और सद्भाव के संवाहक हैं। आश्रमों के माध्यम से असहायों और जरूरतमंदों को सहायता प्रदान करना सामाजिक जिम्मेदारी का उदाहरण है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलते सामाजिक परिवेश में संतों की भूमिका मार्गदर्शक की है, जो समाज को मूल्य आधारित जीवन की ओर प्रेरित करती है।
भविष्य की दिशा: संस्कृति और विकास का संतुलन
राज्य सरकार द्वारा तीर्थ स्थलों के विकास, श्रीरामचंद्र गमन पथ और श्रीकृष्ण पाथेय जैसे प्रकल्पों का उल्लेख सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में संकेत देता है।
यदि इन पहलों को सुव्यवस्थित रूप से क्रियान्वित किया जाता है, तो यह धार्मिक पर्यटन, स्थानीय रोजगार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है।
सिंहस्थ महाकुंभ-2028 की तैयारियां भी प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से व्यापक प्रभाव डालेंगी।
️⃣ निष्कर्ष
भीलवाड़ा में आयोजित सनातन मंगल महोत्सव ने सेवा, समर्पण और “स्व से सृष्टि” तक कल्याण की भारतीय अवधारणा को पुनः रेखांकित किया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का संदेश केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है।
सिंहस्थ महाकुंभ-2028 के लिए संतों को दिया गया आमंत्रण भविष्य के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संवाद की दिशा तय करता है। सेवा को परम धर्म और समाज को एक परिवार मानने का यह संदेश वर्तमान समय में प्रासंगिक और प्रेरक दोनों है।

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