“प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी रानी अब्बक्का चौटा” — वीरता, रणनीति और आत्मबलिदान की अदम्य कहानी

रानी अब्बक्का चौटा — भारत की वह वीरांगना, जिसने 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों की साम्राज्यवादी नीतियों को ध्वस्त कर दिया। कर्नाटक के उल्लाल की इस जैन रानी ने चार दशकों तक विदेशी सेनाओं से संघर्ष किया और देश की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी कहलाईं। उन्हें आज “अभय रानी” और “वीरा रानी” के रूप में याद किया जाता है।

🟩 16वीं शताब्दी कीअभय रानी’:जब उल्लाल की धरती पर गूँजा स्वतंत्रता का स्वर

(हेमेन्द्र क्षीरसागर)

कर्नाटक की पवित्र भूमि उल्लाल, 16वीं शताब्दी में विदेशी शक्तियों के खिलाफ भारत के संघर्ष का केंद्र बनी।
इसी भूमि पर 1525ई. में जन्मी रानी अब्बक्का चौटा, भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी बनीं — जिन्होंने पुर्तगालियों की औपनिवेशिक ताकत को चार दशकों तक झुकने नहीं दिया

रानी अब्बक्का चौटा का नाम भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में इसलिए दर्ज है क्योंकि उन्होंने उस समय लड़ाई लड़ी, जब महिलाएं सामाजिक बंधनों में जकड़ी थीं।
उन्होंने न केवल युद्ध कौशल में महारत दिखाई बल्कि राजनीतिक चातुर्य और रणनीति में भी पुर्तगालियों को परास्त किया।

🟦 राजवंश और पारिवारिक पृष्ठभूमिचौटा वंश की जैन रानी

रानी अब्बक्का चौटा का जन्म चौटा राजवंश में हुआ था, जो एक प्राचीन जैन बंट मूल का राजवंश था।
यह राजवंश 12वीं से 18वीं शताब्दी तक दक्षिण कर्नाटक के तुलुनाडु क्षेत्र में शासन करता रहा।
उल्लाल उस समय एक समृद्ध तटीय व्यापारिक राज्य था।

उनके पिता ने बाल्यावस्था से ही अब्बक्का को

  • घुड़सवारी,
  • तलवारबाजी,
  • धनुर्विद्या, और
  • रणनीतिक युद्ध कौशल की शिक्षा दी।

अब्बक्का न केवल एक योद्धा थीं, बल्कि न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासक भी बनीं। उनके शासनकाल में उल्लाल समृद्ध, सुरक्षित और संगठित राज्य के रूप में जाना जाता था।

🟨 उल्लाल की रानी बनींजब दक्षिण भारत पर मंडरा रहा था पुर्तगाली खतरा

1555ई. का वह समय था जब पुर्तगाली शक्तियाँ दक्षिण भारत में अपनी जड़ें जमा चुकी थीं।
उन्होंने कालीकट, बीजापुर, दमन, और मुंबई जैसे बंदरगाहों को जीतकर गोवा को अपना मुख्यालय बना लिया था।
अब उनकी नजरें व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मंगलूरु बंदरगाह पर थीं।

परंतु उनसे मात्र 14किलोमीटर की दूरी पर उल्लाल नाम का एक छोटा पर सशक्त राज्य था —
जिसकी शासक थीं 30वर्षीया रानी अब्बक्का चौटा।
पुर्तगालियों ने उन्हें कमजोर समझने की भूल की — और वही उनकी सबसे बड़ी हार साबित हुई।

🟥 पहली भिड़ंतपुर्तगालियों का घमंड चकनाचूर

पुर्तगालियों ने सबसे पहले कुछ सैनिकों को रानी को पकड़ने भेजा।
लेकिन नतीजा यह हुआ कि उनमें से कोई भी सैनिक वापस नहीं लौटा।
क्रोधित होकर पुर्तगाल के एडमिरल डॉम अल्वेरो डी सिल्वेरा ने बड़ी सेना के साथ हमला किया,
परंतु वह घायल होकर लौट गया — उल्लाल की धरती पर रानी के रणकौशल ने उसका अहंकार तोड़ दिया।

दूसरी और तीसरी कोशिशों में भी पुर्तगालियों को हार का सामना करना पड़ा।
हर बार रानी अब्बक्का की सेना ने रणनीति, अग्निबाणों’ और छापामार युद्धकला से उन्हें ध्वस्त कर दिया।

🟦 शेरनीकी तरह लड़ी रानी अब्बक्काचौथी लड़ाई का इतिहास

चौथी बार पुर्तगालियों ने पूरी तैयारी के साथ मंगलूर बंदरगाह पर कब्जा कर लिया।
जनरल जोओ पीक्सीटो ने यह सोचकर उल्लाल की ओर प्रस्थान किया कि रानी की शक्ति अब कमजोर हो चुकी है।

जब वे किले तक पहुँचे तो वहाँ सन्नाटा था।
पुर्तगाली सेना ने बिना लड़े किला जीत लिया समझा और जश्न मनाने लगी।

किन्तु —
रात ढलते ही रानी अब्बक्का अपने 200चयनित सैनिकों के साथ शेरनी की भाँति उन पर टूट पड़ीं।
पलक झपकते ही जनरल और अधिकांश पुर्तगाली सैनिक मारे गए।
शेष सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

उसी रात रानी ने मंगलूर बंदरगाह पर पलटवार किया और पुर्तगालियों के चीफ को मारकर बंदरगाह को मुक्त करा लिया।
यह जीत इतिहास में दक्षिण भारत की सबसे बड़ी समुद्री विजय मानी जाती है।

🟩 अभय रानी’ –साहस और रणनीति की प्रतीक

रानी अब्बक्का को “अभय रानी” कहा गया क्योंकि वह निर्भय,निडर और रणनीतिक रूप से अद्वितीय थीं।
उनकी सेना में

  • हिंदू,
  • मुसलमान,
  • जैन,
  • और स्थानीय मछुआरे – सभी शामिल थे।

उन्होंने धर्म से ऊपर उठकर “एकता से स्वतंत्रता” का संदेश दिया।
उनकी लड़ाई केवल जमीन की नहीं थी,
बल्कि यह भारत की आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की लड़ाई थी।

🟦 रानी की रणनीति– ‘अग्निबाणऔर समुद्री युद्धकला

रानी अब्बक्का अपने समय की पहली शासक थीं जिन्होंने अग्निबाण (Fire Arrows) का प्रयोग किया।
इन बाणों में ज्वलनशील पदार्थ लपेटे जाते थे, जिन्हें दुश्मन जहाजों पर फेंककर आग लगाई जाती थी।
इसके अलावा, वे गुरिल्ला रणनीति की माहिर थीं —
रात के समय छोटे समूहों में हमला करना, समुद्र तट का उपयोग छिपने के लिए करना,
और स्थानीय भूगोल का पूर्ण लाभ उठाना —
यह उनकी युद्धनीति की सबसे बड़ी ताकत थी।

🟨 विश्वासघात और बलिदानजब देश की बेटी कैद में गई

इतिहास की सबसे दुखद घटना यह रही कि रानी अब्बक्का को उनके ही पति ने धोखा दिया।
धन के लोभ में उसने पुर्तगालियों से मिलकर रानी को पकड़वा दिया।
रानी को बंदी बना लिया गया और उन्होंने 1570ई. में कारावास में वीरगति प्राप्त की।

लेकिन रानी अब्बक्का की मृत्यु के बाद भी उनकी वीरता की गाथा जन-जन में गूँजती रही।
उनका नाम दक्षिण भारत के लोकगीतों और मंदिरों में आज भी श्रद्धा से लिया जाता है।

🟩 इतिहास की उपेक्षाक्यों नहीं सिखाया गयारानी अब्बक्काका अध्याय?

यह प्रश्न उठता है कि इतनी महान रानी, जिसने विदेशी ताकतों को बार-बार पराजित किया —
उसका नाम हमारे इतिहास के मुख्य पाठ्यक्रम में क्यों नहीं है?
यदि वही रानी किसी यूरोपीय देश में जन्मी होतीं,
तो आज उन पर फिल्में,पुस्तकें और स्मारक होते।

भारत की वीर नारियों की परंपरा में जहाँ झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम अग्रणी है,
वहीं रानी अब्बक्का चौटा उस पंक्ति की प्रथम प्रेरक रानी थीं।
उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों को औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित किया।

🟦 वीरा रानी अब्बक्का उत्सव” –उनके स्मरण का पर्व

रानी अब्बक्का की स्मृति में हर वर्ष कर्नाटक के उल्लाल में “वीरा रानी अब्बक्का उत्सव” मनाया जाता है।
इस अवसर पर उनकी वीरता, राष्ट्रप्रेम और बलिदान को याद किया जाता है।
इस महोत्सव में

  • महिला सशक्तिकरण,
  • समाजसेवा,
  • और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाली महिलाओं को
    वीरा रानी अब्बक्का पुरस्कार” से सम्मानित किया जाता है।

यह उत्सव आज भी महिलाओं को यह सिखाता है कि

“संस्कार, साहस और स्वाभिमान ही सच्ची स्वतंत्रता की नींव हैं।”

🟨 रानी अब्बक्का से मिलने वाली प्रेरणाआधुनिक भारत के लिए संदेश

रानी अब्बक्का चौटा का जीवन आज के भारत के लिए अनेक प्रेरणाएँ देता है —

  1. राष्ट्रप्रेम सर्वोपरि है – जब देश पर संकट हो, तो व्यक्तिगत स्वार्थ त्यागना चाहिए।
  2. महिला शक्ति का सम्मान – उन्होंने सिद्ध किया कि महिलाएं केवल घर की नहीं, राष्ट्र की भी रक्षक हैं।
  3. धर्मनिरपेक्ष एकता का उदाहरण – उनकी सेना में सभी धर्मों के योद्धा थे।
  4. रणनीति और आत्मबल – कठिन परिस्थितियों में भी संयम और चातुर्य से विजय प्राप्त की जा सकती है।

🟩 निष्कर्ष (Conclusion)

रानी अब्बक्का चौटा भारतीय इतिहास की वह पहली वीर महिला स्वतंत्रता सेनानी हैं
जिन्होंने विदेशी शासकों के विरुद्ध अपनी धरती, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।
उनकी गाथा केवल एक योद्धा की नहीं, बल्कि भारत की उस नारी शक्ति की कहानी है
जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

आज जब हम “नारी सशक्तिकरण” की बात करते हैं,
तो रानी अब्बक्का का नाम गर्व से लिया जाना चाहिए —
क्योंकि उन्होंने 16वीं शताब्दी में वही कर दिखाया जो आज भी प्रेरणा देता है।

उनकी स्मृति में गाया जाने वाला एक स्थानीय गीत इस भावना को सबसे सुंदर शब्द देता है –

“उल्लाल की धरती गाती है,
अब्बक्का रानी की शौर्य कहानी,
जिसने पुर्तगाल को हराया,
और भारत की आन बढ़ाई।”

(साई फीचर्स)