कांग्रेस में नई जान फूंकने की तैयारी: क्या प्रियंका वढ़ेरा संभालेंगी संगठन की कमान? 12 साल से दरक रहे ढांचे पर बड़ी सर्जरी की सुगबुगाहट

लगातार चुनावी पराजयों और संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही कांग्रेस एक बड़े नेतृत्व बदलाव की ओर बढ़ती दिख रही है। पार्टी के भीतर प्रियंका वढ़ेरा को संगठन की कमान सौंपने की चर्चा तेज है। दिग्विजय सिंह की संघ की तारीफ ने भी सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। कांग्रेस का जमीनी ढांचा जिस तरह दरका हुआ दिख रहा है, उससे मजबूत, ऊर्जा से भरे और नए नेतृत्व की जरूरत और भी स्पष्ट हो गई है।

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कांग्रेस के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती

28 दिसंबर 1885 को गठित कांग्रेस अपने लगभग 140 वर्षों के इतिहास में पहले भी संकटों से गुज़री है, लेकिन मौजूदा स्थितियों को पार्टी का सबसे गंभीर दौर माना जा रहा है। पिछले 12 वर्षों से सत्ता से बाहर और लगातार चुनावी पराजयों से जूझता संगठन अब टूटन के कगार पर नजर आ रहा है। नेतृत्व पर सवाल, जमीनी कैडर की कमजोरी, बूथ स्तर पर निष्क्रियता और लगातार बढ़ती गुटबाज़ी ने पार्टी की पुरानी रौनक को लगभग मिटा दिया है।

ऐसे समय में कांग्रेस के अंतर्कक्ष में एक नई बहस तेज हो गई है—
क्या अब संगठन की कमान प्रियंका वढ़ेरा को सौंप दी जानी चाहिए?

दिग्विजय सिंह के संघ वाले बयान ने बढ़ाई बेचैनी

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा हाल ही में संघ की कार्यशैली की तारीफ ने पार्टी के भीतर भूचाल ला दिया। जिसे कांग्रेस लंबे समय से अपना वैचारिक प्रतिद्वंद्वी मानती आई है, उसी संगठन के प्रति प्रशंसा ने कई सवाल खड़े कर दिए।

हालांकि बयान की मंशा पर विभिन्न तरह के विश्लेषण किए जा रहे हैं, पर इतना तय है कि:

  • कांग्रेस नेतृत्व की दिशा पर भ्रम बढ़ा है
  • पार्टी की वैचारिक स्पष्टता धुंधली हुई है
  • जमीनी कैडर में असंतोष और भ्रम दोनों पैदा हुए हैं

यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब स्वयं कांग्रेस अंदर से बिखरी हुई दिख रही है और उसे एक सशक्त और विश्वसनीय नेतृत्व की तलाश है।

कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बढ़ती उम्र बनाम युवा नेतृत्व की बहस

कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे 83 वर्ष के हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने 46 वर्षीय नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर युवा नेतृत्व का संदेश दिया है। इससे कांग्रेस के भीतर यह चर्चा और तेज हो गई है कि:

क्या अब कांग्रेस को भी युवा नेतृत्व की ओर बढ़ जाना चाहिए?”

राहुल गांधी को लेकर पार्टी में दो मत स्पष्ट हैं:

  • एक धड़ा मानता है कि वे स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं
  • दूसरा धड़ा पिछले 15–20 वर्षों के प्रदर्शन को देखते हुए उनके नेतृत्व को प्रभावी नहीं मानता

इसी खींचतान के बीच प्रियंका वढ़ेरा का नाम तेजी से उभर रहा है।

प्रियंका वढ़ेरा: सीमित उपलब्धियां, लेकिन मजबूत अपील

प्रियंका वढ़ेरा की राजनीतिक उपलब्धियां भले ही अधिक न हों, पर उनकी लोकप्रियता, भावनात्मक अपील और जनता से संवाद की क्षमता ने उन्हें एक प्रभावी विकल्प के रूप में स्थापित किया है।

प्रियंका की प्रमुख ताकतें

  • सीधे जनता से संवाद करने का माद्दा
  • सहज, सरल और स्पष्ट बोलने की शैली
  • युवाओं में क्रेज
  • जनसभाओं में मजबूत उपस्थिति
  • करिश्माई व्यक्तित्व

कांग्रेसी कैडर के बीच यह धारणा वर्षों से मौजूद है कि प्रियंका वढ़ेरा का स्टाइल इंदिरा गांधी की याद दिलाता है। यही कारण है कि परंपरागत कार्यकर्ता उन्हें राहुल गांधी की तुलना में अधिक “जन-नेता” मानते हैं।

कांग्रेस में असली समस्या—नेतृत्व नहीं, संगठन की सांसें टूटना

राजनीतिक समीक्षक इस बात पर एकमत हैं कि कांग्रेस की मौजूदा समस्या सिर्फ नेतृत्व मुद्दा नहीं है। बड़ी चुनौती यह है कि कांग्रेस का बूथ स्तर का ढांचा लगभग ध्वस्त हो चुका है।

  • ग्राउंड लेवल पर संगठन निष्क्रिय
  • राज्यों में गुटबाज़ी चरम पर
  • सोशल मीडिया व नए चुनावी मॉडल में पिछड़ापन
  • युवा और महिला कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी

ऐसे माहौल में प्रियंका वढ़ेरा जैसी ऊर्जावान छवि वाली नेता को कमान सौंपने की कवायद पार्टी में नई जान फूंक सकती है।

लेकिन ‘परिवारवाद’ का आरोप क्या और बढ़ेगा?

कांग्रेस पर वर्षों से परिवारवाद के आरोप लगते आए हैं। नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव, सोनिया, राहुल… और अब प्रियंका?

यदि उन्हें अध्यक्ष बनाया जाता है, तो विरोधी दलों और असंतुष्ट कांग्रेसी धड़ों को इसे नया हथियार मिल सकता है।
यह पहलू पार्टी के भीतर गहरी उथल-पुथल भी ला सकता है।

दिग्विजय सिंह का बयान—क्या यह कांग्रेस की नई राजनीति का संकेत?

दिग्विजय सिंह का संघ की तारीफ करना कई मायनों में कांग्रेस के भीतर वैचारिक पुनर्रचना का संकेत माना जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि:

  • यह कांग्रेस की रणनीतिक दिशा में बदलाव का इशारा हो सकता है
  • पार्टी पारंपरिक सेक्युलरिज्म और आधुनिक सॉफ्ट-नेशनलिज्म के बीच नई लाइन खींचना चाहती है
  • बदलती राजनीतिक जमीन ने कांग्रेस को पुराने ढांचे से आगे सोचने पर मजबूर किया है

यह बयान भले ही व्यक्तिगत हो, पर इसके असर व्यापक हैं।

प्रियंका–राहुल की वन-टू-वन मीटिंग का “इनसाइड स्टोरी”

सूत्रों के अनुसार नए साल के पहले सप्ताह में प्रियंका और राहुल गांधी के बीच लंबी, गंभीर बातचीत हुई। इसमें प्रियंका ने कहा कि वे पार्टी के हित में बड़े फैसले के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

राहुल गांधी के सुझाए तीन नाम

  1. जयराम रमेश
  2. अजय माकन
  3. दिग्विजय सिंह

प्रियंका वढ़ेरा ने तुरंत कहा कि इनसे बात नहीं बनने वाली
और वे खुद जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं—यदि राहुल और सोनिया मंजूरी दें।

राहुल गांधी की दुविधा—“प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” का हमला

राहुल गांधी ने बताया कि वे खुद इसलिए दूर रहते हैं कि भाजपा उन्हें “प्राइवेट लिमिटेड पार्टी” का तंज न कस दे।
जिस पर प्रियंका ने कहा कि विपक्ष आज भी यही कहता है—इसलिए डरने की जरूरत नहीं।

खड़गे का कार्यकाल अक्टूबर 2027 तक है और उनकी राज्यसभा की सदस्यता इसी वर्ष जून में समाप्त हो रही है। ऐसे में बदलाव की जमीन बनती दिख रही है।

कांग्रेस का भविष्य: क्या नया अध्याय शुरू होने वाला है?

यदि सोनिया गांधी की मंजूरी मिल जाती है और राहुल का समर्थन प्राप्त हो जाता है:

तो देश जल्द ही कांग्रेस के रूप में एक नई महिला अध्यक्ष देख सकता हैप्रियंका वढ़ेरा।

विशेषकर युवाओं और महिला कार्यकर्ताओं में उनकी लोकप्रियता पार्टी को ऊर्जा दे सकती है।

पार्टी की नई पारी में प्रियंका की भूमिका निर्णायक हो सकती है—
चाहे अध्यक्ष बनकर या संगठन के किसी सर्वोच्च पद पर।

8️⃣ निष्कर्ष

कांग्रेस इस समय अपने सबसे कठिन और निर्णायक दौर से गुजर रही है। लगातार चुनावी पराजय, कमजोर संगठन और नेतृत्व पर उठते सवालों ने पार्टी की नींव को हिला दिया है। ऐसे समय में प्रियंका वढ़ेरा को नेतृत्व सौंपने की चर्चा ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है।

यदि यह फैसला जमीन पर उतरता है, तो कांग्रेस एक नई ऊर्जा के साथ वापसी की शुरुआत कर सकती है। लेकिन परिवारवाद का आरोप, आंतरिक गुटबाज़ी और वैचारिक भ्रम जैसी चुनौतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं।

आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि कांग्रेस अपने भविष्य की दिशा किस हाथ में सौंपने जा रही है—
और क्या प्रियंका वढ़ेरा पार्टी में नई जान फूंक पाएंगी।

लिमटी की लालटेन 740

कांग्रेस में जान फूंकने अब प्रियंका वढ़ेरा को थमाई जा सकती है संगठन की कमान . . .

दरक रहा है 12 सालों से सत्ता से बाहर रहने वाली कांग्रेस का जमीनी संगठन!

(लिमटी खरे)

28 दिसंबर 1885 को स्थापित लगभग एक सौ चालीस साल पुरानी कांग्रेस अपने जीवनकाल के सबसे चुनौतिपूर्ण अव्यवस्थाओं से दो चार होती दिख रही है। चुनावों में एक के बाद एक पराजय, नेतृत्व को लेकर उठते प्रश्न, संगठनात्मक कसावट का अभाव, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का बिखराव जैसे मुद्दों पर देश भर में चर्चा हो रही है पर पता नहीं क्यों कांग्रेस के आला नेता इस पर चर्चा करने से गुरेज करते नजर आते हैं। इसी बीच कांग्रेस में अर्जुन सिंह के उपरांत चर्चाओं में बने रहने वाले दिग्विजय सिंह के द्वारा भाजपा के पितृ संगठन माने जाने वाले संघ की तारीफ में कशीदे गढ़ दिए जिससे कांग्रेस के अंदरखाने में जमकर तूफान मचा हुआ दिख रहा है।

इसी बीच कांग्रेस के अंदरखाने में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि अब समय आ गया है कि कांग्रेस संगठन की कमान किसी युवा को सौंप देना चाहिए, क्योंकि भाजपा के द्वारा नितिन नबीन को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है जो महज 46 साल के हैं। वहीं कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे 83 साल के हैं। कांग्रेस के आला नेता वैसे तो राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने पर अमादा हैं पर कांग्रेस के अनेक धड़े उनकी अगुआई को इसलिए नकारते नजर आ रहे हैं, क्योंकि लगभग डेढ़ दो दशकों से कांग्रेस में वही हो रहा है जो राहुल गांधी चाह रहे हैं, उसके बाद भी कांग्रेस औंधे मुंह ही गिरती चली आई है।

प्रियंका वढ़ेरा की अगर बात की जाए तो उनकी राजनैतिक तौर पर भले ही उपलब्धियां न के बराबर हों, पर युवाओं में अभी भी उनका क्रेज बरकरार है। उनका राजनैतिक व्यक्तित्व, भावनात्मक अपील, सहज संवाद शैली के साथ ही साथ जनसभाओं में उनकी उपस्थिति को भी प्रभावशाली माना जाता रहा है। एक आंकलन के अनुसार कांग्रेस का पारंपरिक कार्यकर्ता आज भी प्रियंका वढ़ेरा को राहुल गांधी के मुकाबले स्वाभाविक जन नेता के रूप में देखता है, जिसमें जनता से सीधे संवाद का माद्दा है।

राजनैतिक तौर पर देखा जाए तो आज कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की आवश्यकता उतनी नहीं है, जितनी की संगठन को पुर्नजीवित करने की है। केंद्र से लेकर प्रदेश और बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं में उर्जा भरने, दिशा देने और एक साफ सुथरा स्पष्ट उद्देश्य उनके सामने रखने की आवश्यकता है। इन परिस्थितियों में प्रियंका वढ़ेरा को कांग्रेस की कमान सौंपने की कवायद अगर धरातल पर उतरती है तो इससे पार्टी में जान फूंकने का संदेश प्रसारित हो सकता है। यह कदम कांग्रेस के युवा और महिला कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरक साबित हो सकता है।

इस मामले में अगर आप दूसरे पहलू पर विचार करें तो कांग्रेस पर वैसे भी परिवारवाद के आरोप लगते आए हैं। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी फिर सोनिया गांधी और उसके बाद राहुल गांधी, अब अगर प्रियंका वढ़ेरा को आगे लाया जाता है तो गांधी परिवार के ही सदस्यों के इर्द गिर्द सत्ता की धुरी घूमती रहने से कांग्रेस के विरोधियों और कांग्रेस में ही असंतुष्ट धड़ों को एक नया राजनैतिक हथियार भी मिल सकता है इस कवायद से।

वैसे कांग्रेस संगठन आज भी अस्सी के दशक में ही सांसे लेता दिखता है। कांग्रेस आज भी जमीनी स्तर की भावनाओं के बल पर सत्ता में वापसी का सपना संजोए दिखती है जबकि सोशल मीडिया, क्षेत्रीय समीकरणों, मजबूत कैडर, नए गठबंधनों आदि पर भाजपा का जोर है, यही कारण है कि आज भाजपा केंद्र के साथ ही साथ अनेक राज्यों में अपना परचम लहराती दिखती है।

वहीं, दूसरी ओर संघ और भाजपा को पानी पीकर कोसने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह अगर संघ के कामकाज की तारीफ कर रहे हों तो इसके मायने सियासी बियावान में खोजे जाना स्वाभाविक ही है। उनके द्वारा क्या कहा गया यह बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण तो यह है कि उनकी इस तरह की टिप्पणी के पीछे राजनैतिक, सामाजिक और रणनीतिक आधार क्या है! एक तरह से देखा जाए तो दिग्विजय सिंह का यह कथन राजनैतिक विचारधारा की सीधी रेखा नहीं खींची गई है, दरअसल इसे कांग्रेस की पुरानी सोच और वर्तमान परिस्थितियों के मुताबिक बदलती रेखाओं का एक जाल माना जा सकता है। माना जाता है कि कांग्रेस आज भी सेक्युलरिजम और बहुतलावाद पर कायम है तो संघ का दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दर्शन की हिमायत करना है।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के अंदर अब यह चर्चा भी तेजी से चल रही है कि कांग्रेस अपनी नई पारी का रोडमेप तैयार करने में जुट चुकी है। प्रियंका वढ़ेरा फिलहाल कांग्रेस में बिना प्रभार वाली महासचिव हैं। उनके करीबी सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि नए साल के पहले सप्ताह में ही प्रियंका और राहुल के बीच वन टू वन लंबी चर्चा हुई। इस दौरान प्रियंका ने कांग्रेस के हालिया हालातों पर चर्चा करते हुए साफ कह दिया कि वे पार्टी हित में बड़ा फैसला लेने को पूरी तरह तैयार हैं।

सूत्रों की मानें तो प्रियंका ने राहुल गांधी को साफ शब्दों में कहा कि कांग्रेस को अब लड़ने, मरने वाला, पार्टी काडर को संजीवनी देने वाला, उत्तर से दक्षिण भारत तक अर्थात समूचे देश में उसकी स्वीकार्यता हो, ऐसा अध्यक्ष चाहिए। इसी बीच राहुल का मन टटोलते हुए प्रियंका ने पूछा कि उनके मन में कोई नाम हो तो बताएं। कुछ देर खामोश रहने के बाद राहुल गांधी ने कहा कि उनके जेहन में जो नाम हैं, पहला है जयराम रमेश का और दूसरा है अजय माकन का और तीसरा नाम है दिग्विजय सिंह का। प्रियंका ने सुनते ही कहा कि इनसे बात नहीं बनने वाली। अगर राहुल तैयार हों तो प्रियंका स्वयं यह जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं।

सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि प्रियंका के प्रस्ताव पर राहुल ने कहा कि वे स्वयं खुद को इससे दूर इसलिए रखे हुए हैं क्योंकि भाजपा कहीं उन्हें प्राईवेट लिमिटेड पार्टी का तंज न कसने लगे . . .! राहुल की दुविधा भांपते हुए प्रियंका बोलीं कि इसमें नया क्या है, विपक्षी तो आज भी यही कहा करते हैं। यहां आपको यह बता दें कि कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का पांच साल का कार्यकाल अक्टूबर 2027 में समाप्त होने जा रहा है और राज्य सभा में उनका कार्यकाल इसी साल जून तक का है। इन परिस्थितियां में प्रियंका वढ़ेरा जिस जिम्मेदारी को उठाने की बात कर रही हैं उस पर अगर सोनिया गांधी का अनुमोदन मिल जाता है और राहुल गांधी को यह बात जंच जाती है तो देश की सबसे पुरानी पार्टी को जल्द ही नया अध्यक्ष मिल सकता है वह भी नेहरू गांधी परिवार की महिला सदस्य के रूप में, जिनकी स्वीकार्यता सर्वव्यापी विशेषकर युवाओं में पर्याप्त मानी जा सकती है।

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(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)